सोमवार, 6 मई 2013

फेसबुक पर कविता


सुनो प्यारे, इन दिनों मैं गहरे अवसाद में हूं। यह अवसाद न पारिवारिक है न सामाजिक। यह कविता-संबंधित अवसाद है। न.. न.. ऐसा मत समझियो कि मैं कोई कविता लिखने की कोशिश कर रहा हूं। कविता-लेखन से तो मेरा न दूर का कोई रिश्ता है न पास का। कवि और कविता से जित्ता अधिक बचकर रहा जाए उत्ता ही दिमागी-स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।
लेकिन क्या करूं, दूरी बनाए रखने के बाद भी कवि और कविता मेरा पीछा नहीं छोड़ते।

दरअसल, कवि जब से फेसबुक पर अवतरित हुआ है, उसने कविता को आइटम-सांग जैसा बना दिया है। फेसबुक के कवि को तो कविता लिखने से मतलब। अब कविता का सिर-पैर-हाथ-कान-नाक-मुंह कहां और किधर जा रहे हैं, इससे उसे कोई सरोकार नहीं। फिर एक समस्या यह भी है कि फेसबुक के कवि से कविता के बाबत आप कुछ कह नहीं सकते। उसकी कविता में मीन-मेख नहीं निकाल सकते। उसे शब्दों की हेरा-फेरा पर राय नहीं दे सकते।

दरअसल, फेसबुक का कवि ऐंग्री-यंग से कम नहीं होता है। जहां जरा-सा टोक नहीं कि आपका खाना खराब। कविता पर आपके सामान्य-ज्ञान को वो पलभर में खारिज करने की क्षमता रखता है। बिना टोके, बिना चिढ़े आप बस उसकी कविता को पढ़िए। उसे बधाई दीजिए। उसे मुक्तिबोध, निराला से बड़ा और बेहतर कवि बतलाइए। फिर देखिए फेसबुक का कवि कैसे आपको टैग कर-करके आपके फेसबुक की दीवार की साना-पोती करता है।

हालांकि फेसबुक मित्रों के समक्ष कविता पर मैं अपनी राय जाहिर करता रहता हूं। कई दफा कह व लिख चुका हूं कि कविता की मुझे कतई तमीज नहीं। बावजूद इसके, फेसबुक के स्थापित कवि कहां मानने वाले हैं। आए दिन वे मेरे संदेश-बक्से में अपनी कविता पढ़ने और राय देने का लिंक डालते रहते हैं। आग्रह में उनके आग्रह कम दुराग्रह ज्यादा झलकता है। मतलब, कविता पढ़ो और तुरंत राय दो नहीं तो टैग होने को तैयार रहो।

अब मैं कविता का अज्ञानी भला क्या पढ़ूं और क्या राय दूं! यहां अपने लिखे पर कभी खुद की राय ले नहीं पाता। जित्ता लिखता हूं सब का सब छप-छपाकर अगले दिन तक रद्दी हो जाता है। ऊपर से पत्नी ताना मारती है कि तुम्हें लिखना नहीं आता।

फेसबुक के कवियों की कविताओं को झेल-झेलकर मैं अवसादग्रस्त-सा होने लगा हूं। रात को सोते वक्त भी कविता की चार लाइनें मुझे परेशान किए रहती हैं। ऐसा लगता है, कवि और कविता की दुनिया में मुझे जबरन ठेला जा रहा है।

कभी-कभी खुद पर गुस्सा भी बहुत आता है कि मैंने बेकार ही फेसबुक की दुनिया में कदम रखा। बेकार ही मैं लेखक हुआ। अगर इनमें से कुछ न होता तो आज चैन की बंसी बजा रहा होता। फेसबुक के कवि की कविता को न झेल रहा होता। यों फेसबुक पर रहने के कई फायदें हैं किंतु यहां के कवि की कविता को झेलना सबसे कर्रा काम है। पर क्या करूं फेसबुक पर कविता से पिंड छुड़ाना इत्ता आसान भी तो नहीं है।

वैसे फेसबुक के कवि स्वीकार तो नहीं करेंगे किंतु सच यही है कि फेसबुक पर कविताएं लिखी नहीं पेली और ठेली जाती हैं। यहां दिन भर कविताओं में शब्दों की बाजीगीरी चलती रहती है। यहां मौजूद हर कवि खुद को किसी वरिष्ठ लेखक-साहित्यकार से कम नहीं समझता। आए दिन किसी न किसी से लड़ता-भिड़ता ही रहता है। बस एक ही जिद, मेरी कविता पढ़ो और तुरंत राय दो।

खुदा बचाए फेसबुक के कवियों और उनकी ठेला-पेली युक्त कविताओं से। वो तो यह अच्छा है कि मैं खुद कवि नहीं हूं। नहीं तो मैं भी फेसबुक के कवियों की तरह इस-उस को टैग कर अपनी कविताएं यहां-वहां ठेल-पेल रहा होता।

रविवार, 5 मई 2013

सबकुछ तो ठीक चल रहा है...


अजीब लोग हैं यहां के। अजीबो-गरीब से सवाल पूछते हैं मुझसे। जबकि जानते हैं, मुझसे उनके किसी सवाल का संतोषप्रद उत्तर नहीं मिलेगा। लेकिन फिर भी...। पूछते हैं, 'यह देश किधर जा रहा है? देश की राजनीति और देश के नेता किधर जा रहे हैं? आखिर ऐसा कब तलक चलेगा?' बताइए, उक्त सवालों का मैं क्या उत्तर दे सकता हूं? मैं कोई त्रिकालदर्शी या ज्योतिषी तो हूं नहीं कि मंत्र फूंका या यहां-वहां की लकीरें देखीं और बतला दिया कि ये यहां और वो वहां तलक ही जाएगा बस। फिर सब अपने-अपने रास्तों पर आ जाएंगे।

खामाखां की बात पूछते हैं।

अरे भाई, मुझसे क्या मतलब कि यह देश, राजनीति और नेता लोग कहां और किधर जा रहे हैं। जहां भी जा रहे हैं ठीक ही जा रहे होंगे। इत्ते भोले तो वे भी नहीं हैं, कि चल दिए और रास्ता नहीं मालूम। आजकल के जमाने में हर कोई अपने-अपने हिसाब से होशियार है। कोई अपनी होशियार जतलाकर नंबर बटोर ले जाता है तो कोई चुप रहकर नंबर बटोरता रहता है। और फिर देश से जुड़ी राजनीति, राजनीति से जुड़े नेताओं की तो बात ही निराली है, उन्हें सब मालूम रहता है कि देश-समाज-राजनीति-व्यवस्था-नीति-नियम-सिद्धांत कहां और किधर जा रहे हैं।

देखिए, मैं देश का हिस्सा जरूर हूं किंतु राजनीति और नेता लोगों में मेरा कतई इंट्रस्ट नहीं है। लेकिन मैं यह मानता हूं कि देश हमारा चकाचक चल रहा है। देश का चलना-फिरना मुझे साफ दिखता है। देश निरंतर प्रगतिपथ पर अग्रसर है। मुद्रास्फीति की दर ठीक है। अर्थव्यवस्था शेयर बाजार के कंधों पर टिकी हुई है। देश के गरीब-किसान खूब खा-पी रहे हैं। इधर, सुनने में आया भी था कि किसानों-गरीबों की इटिंग हैविट पहले से बढ़ी है।

देश की बाकी चीजों-बातों को नेता लोग अपनी-अपनी राजनीति के सहारे संभाल ही रहे हैं, काफी है।

लेकिन फिर भी बताए देता हूं कि मैं जानता कुछ नहीं हूं। यह तो मुझे वो पता है, जो मैंने यहां-वहां के लोगों द्वारा कही गई बातों को सुन रखा है। यों भी मैं, अतिरिक्त दिमाग खोटी न करना पड़े, इसीलिए सुनी-सुनाई बातों को ज्यादा तव्वजो देना उचित समझता हूं। ले-देके एक दिमाग मिला है, उसे भी हर वक्त बे-फालतू की बातों में लगाए रहो। यह दिमाग के साथ ना-इंसाफी है प्यारे।

कुछ लोगों से सुनने में आया है कि देश पर चीनी संकट आन खड़ा हुआ है। सुना है, चीनी फौजी कुछ किलोमीटर तक भारतीय सीमा के अंदर घुस आए हैं। तो इसमें इत्ता संकटप्रद या गंभीर होने की क्या आवश्यकता है प्यारे। जैसे आए हैं, वैसे ही चले भी जाएंगे। अपने नेता लोग हैं न बातचीत कर मसले को सुलटा लेंगे। जैसे पाकिस्तान से बातचीत का दौर चलता रहा है, अब चीन से भी चलने लगेगा। यह कोई नई बात थोड़े है। यों भी, ऐसे मसले सिर्फ बातचीत से ही सुलट जाते हैं, पुतले फूंकने या क्रांति-क्रांति चिखने-चिल्लाने से नहीं।

फिर भी जिनके दिल-जिगर-मन में जोश की भावना हर वक्त उमड़ती-घुमड़ती रहती है, उन्हें सलाह है कि वे तुरंत सीमा पर चले जाएं। शांति मिलेगी।

यह देखिए, कुछ न जानते हुए भी मैं इत्ता कुछ बतला गया। अब मुझसे कुछ और मत पूछिएगा। मैं फिर कह रहा हूं देश, राजनीति और नेता लोग के बीच सबकुछ ठीक चल रहा है। फिर भी मेरी कही बात का यकीन न हो तो अपने दिमाग की एनर्जी जाया करें मगर मुझे बख्शें। मेरे कने और भी काम हैं देश-दुनिया-समाज-राजनीति-व्यवस्था की चिंता करने के सिवाय।

शनिवार, 4 मई 2013

तारीफ की कीमत


लीजिए जनाब, अब तारीफ करना भी 'गुनाह' की श्रेणी में आ गया है। इस गुनाह की कीमत एक मंत्री जी को मंत्रिमंडल से 'बर्खास्त' होकर चुकानी पड़ी है। बेचारे मंत्री जी का गुनाह बस इत्ता-सा था कि उन्होंने सड़कों को हेमा मालिनी और माधुरी दीक्षित के गालों जैसा बनवाने की बात कही थी। आखिर इसमें क्या गलत है अगर प्रदेश की सड़कें हेमा मालिनी और माधुरी दीक्षित के गालों सरीखी हो जाएं। सुंदरता की तारीफ करना कोई गुनाह तो नहीं प्यारे!

दुनिया भर में तमाम तरह के लोग अपने-अपने तरीके से अभिनेत्रियों की खूबसूरती की तारीफ करते रहते हैं, उनका तो कुछ नहीं बिगड़ता। एक बेचारे हमारे मंत्री जी ने तारीफ क्या कर दी, उनकी गर्दन पर बर्खास्तगी की तलवार चला दी गई। बहुत ना-इंसाफी है यह। इसका मतलब तो यह हुआ कि मंत्री स्तर के हर मंत्री को अब किसी अभिनेत्री की तारीफ करने से पहले सौ दफा सोचना पड़ेगा। कुछके तो अरमान दिल के दिल में ही रह जाएंगे।

अरे, हमें तो धन्यवाद देना चाहिए मंत्री जी को कि उन्होंने हेमा मालिनी और माधुरी दीक्षित के बहाने खूबसूरत सड़कों का एक बेहतरीन मॉडल प्रस्तुत किया। कित्ता अच्छा होता अगर मंत्री जी के मॉडल को संज्ञान में लाकर इस पर गंभीरता के काम किया जाता। सड़कों को निहायत ही खूबसूरत और चिकना बनाया जाता। उन पर से गड्ढेनुमा दागों को हटाया जाता। गड्ढे हर तरह से खूबसूरती में बाधक होते हैं। प्रदेश की ज्यादातर सड़कों पर गड्ढों का ही राज रहता है। सड़क-यात्रा के दौरान पिछले दिनों एक मंत्री जी की कमर में गड्ढों के कारण दर्द बैठ गया। मंत्री जी गड्ढों से कहीं ज्यादा उस सड़क को बनाने वालों पर नाराज हुए। मंत्री जी की नारजगी का मैं समर्थन करता हूं। दरअसल, सड़क पर चलकर ही पता लगाया जा सकता है कि सरकार के मंत्री कित्ता और कहां तक काम कर रहे हैं।

लेकिन यह मामला सड़क से कहीं ज्यादा खूबसूरती की तारीफ करने का बनता है। खूबसूरती के सिंबल को अभिनेत्रियों में ही खोजा व परखा जा सकता है।

मेरे ख्याल में जहां बात देश-प्रदेश-राज्य के विकास की हो वहां ऐसी खूबसूरतियों पर विचार के साथ-साथ तारीफ करने में भी कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। खूबसूरती होती ही तारीफ करने के लिए है।

मुझे दुख होता है, जो लोग खूबसूरती की तारीफ को पचा नहीं पाते। तारीफ को हीन भावना से देखते हैं। तारीफ पर पहरे बैठाते हैं। जरा सोचकर देखिए, बेचारे मंत्री जी के दिल पर क्या गुजरी होगी, जो उन्हें तारीफ इत्ती बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। इसमें बुरा भी क्या है अगर सड़कें अभिनेत्रियों के गालों जैसी हो जाएं तो। इत्ती खूबसूरत सड़कों पर चलने का आनंद ही कुछ और होगा।

तारीफ की कीमत अगर मंत्रियों को ऐसे ही चुकानी पड़ती रही तो विकास का मॉडल ही ध्वस्त हो जाएगा। फिर न कोई किसी की तारीफ करेगा न सुंदरता पर आहें भरेगा। फिर तो तारीफ के सारे विकल्प ही खत्म हो जाएंगे।

हमें इन विकल्पों को बचाना होगा। तारीफ की कीमत का एहसास हर किसी को करना होगा। कोशिश करनी होगी तारीफ के बहाने जैसा उन मंत्री जी के साथ हुआ किसी और के साथ न होए।

हे! विकीलीक्स, मेरी पोल भी खोल


विकीलीक्स के केबल का मैं मुरीद हूं। दिल से चाहता हूं कि विकीलीक्स एक केबल मेरे घर पर भी डाले। मैं भी विकीलीक्स के केबल में फंस जाऊं। किसी न किसी बहाने मेरी पोल भी खुल जाए। पोल खुलकर मैं बदनाम हो जाऊं। मीडिया से लेकर रिश्तेदारों के बीच मेरी बदनामी पर तरह-तरह की चर्चाएं हों। फैलते-फैलते मेरी बदनामी की बातें संसद के भीतर भी पहुंच जाएं। सांसद लोग मुझ पर जिरह करें। कोई मुझे दुत्कारे, कोई मुझे लताड़े। कोई मेरा हुक्का-पानी बंद करने का प्रस्ताव रखे। आह! कित्ता खुशनुमा होगा वो दिन जब विकीलीक्स मेरी ईमानदारी पर से बदनामी की पोल खोलेगा।

सच कहूं, जब भी मैं विकीलीक्स को अलां-फलां नेता लोगों की पोल खोलते सुनता-पढ़ता हूं, मेरे मन में उनके प्रति सम्मान का भाव जागता है। सम्मान के बहाने उनकी महानता पर कसीदे पढ़ने का दिल करता है। रात भर में ही वे लोग बदनाम होने के साथ-साथ नामवाले हो जाते हैं। जो लोग नहीं जानते, वे भी उनके नाम को जान-पहचान जाते हैं।

बस, ऐसा ही नाम मैं भी चाहता हूं। मुझे इस बात की रत्ती भर फिक्र नहीं कि बदनामी के कारण मेरा नाम होगा। आजकल जमाना ही बदनामी के सहारे नाम कमाने वालों का है। जिनका नाम होता है, उन्हें ही लोग-बाग हिम्मवाला कहते हैं। जी हां, मैं भी वैसा ही हिम्मतवाला बनना चाहता हूं। विकीलीक्स के बहाने पोल खुलकर बदनाम होने का सुख ही कुछ और है प्यारे।

न भूलें, विकीलीक्स की पोल खुलाई से अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि मिलती है।

पर मुझे यह समझ नहीं आता कि लोग विकीलीक्स को इत्ता बुरा-भला क्यों कहते हैं? जहां किसी की पोल खुली नहीं, बस चेले-चपाटे तैयार हो जाते हैं, अपने लोगों को डिफेंट करने और विकीलीक्स को उट-पटांग कहने के लिए। समझने का प्रयास ही नहीं करते कि विकीलीक्स के केबल हमेशा सच बोलते हैं, सच के सिवाय कुछ नहीं बोलते। मुफ्त में घर बैठे एक अंतरराष्ट्रीय पोल खोलू एजंसी से अगर अपने नाम पर बदनामी का ठप्पा लग रहा है, तो उसमें हर्ज ही क्या है! ऐसा सौभाग्य केवल नसीब वालों को ही नसीब होता है।

मैं तो इस प्रयास में हूं कि विकीलीक्स के बहाने ही सही मेरा नसीब भी जागे। खुद की पोल खुलने के एहसास को मैं मंजरे-आम पर देखना व महसूस करना चाहता हूं। किसी को हो या न हो मगर मुझे अपनी मुफ्त की बदनामी को कैश करने का बहुत शौक है। मैं चाहता हूं मेरे इस शौक में हर कोई भागीदार बने।

कहे कोई कुछ भी लेकिन इत्ता तो मानना ही पड़ेगा कि विकीलीक्स के पोल खोलू केबल हमारे यहां की जासूसी एजंसियों से कहीं ज्यादा मजबूत एवं चपल हैं। अब तलक विकीलीक्स ने जित्तों की पोल खोली है, सभी किसी न किसी मामले में फंसे नजर आए हैं। बावजूद इसके वे विकीलीक्स को बुरा-भला कहते हैं, वाकई यह बहुत ही दुखद है।

लेकिन मैं निश्चिंत कर देना चाहता हूं विकीलीक्स को कि मैं अपनी पोल खुलाई या बदनामी पर उसे जरा भी नहीं कोसूंगा। दिल से उसके खुलासे का समर्थन करूंगा। अगर संभव हुआ तो विकीलीक्स के संस्थापक जुलियन असांजे को रात्री भोज पर भी आमंत्रित करूंगा। मैं जुलियन अंसाजे का फैन हूं।

अब बस इंतजार है विकीलीक्स के बहाने खुद की पोल खुलाई का। बदनाम होने का। नाम कमाने का। नाम के सहारे हिम्मतवाला बनने का। और मीडियाई सुर्खियां बटोरने का।

महंगाई बढ़ाते गरीब!


सुब्बा जी ने कुछ गलत नहीं कहा। सौ फीसद सच कहा। मैं उनके कहे का दिल से समर्थन करता हूं। बे-वजह ही लोग-बाग अमीरों को महंगाई और खान-पान के लिए गरियाते रहते हैं। जबकि महंगाई बढ़ाने में सबसे बड़ा हाथ देश के गरीबों का है। देश के गरीब अब गरीब नहीं रहे। वे गरीब बने रहकर अमीरों की बराबरी करने लगे हैं। अमीरों की तरह खाने, अमीरों की तरह रहने, अमीरों की तरह हंसने-बोलने, अमीरों की तरह मुटियाने लगे हैं।

बताइए, दूध-धी-मक्खन-अंडा यह सब क्या गरीबों के खाने की चीजें हैं! लेकिन फिर भी देश के गरीब इन्हें मजे से खा रहे हैं। अमीरों का खाना गरीब खाएं, भला कौन बर्दाशत करेगा? कम से कम सुब्बा जी तो कतई नहीं करेंगे। इसीलिए उनने साफ कह दिया कि गरीब ही देश में महंगाई बढ़ा रहे हैं।

मेरी कम-अक्ली देखिए, मैं अब तलक सरकार और अमीरों को ही महंगाई के लिए जिम्मेदार ठहराता रहा। जब भी खाने-पीने के दामों में बढ़ोत्तरी होती, सरकार पर मेरा खून जरूर खौलता। 'आरओ' का पानी पी-पीकर उन्हें कोसता। हाय! मैं कित्ता मूर्ख था। सरकार व अमीरों के प्रति कित्ती दुष्ट सोच रखता था। वो तो भला हो सुब्बा जी का जो उनने सही समय पर बतला दिया कि महंगाई और मोटापा गरीबों के कारण ही तो बढ़ रहा है।

मुझे लगता है, देश के गरीब अक्सर भूखे होने की नौटंकी करते हैं। अपने शरीर को कंकालनुमा दिखलाकर सरकार व अमीरों की हमदर्दी बटोरना चाहते हैं। पेट में अन्न के तमाम दाने पड़े रहने के बावजूद झूठ बोलते हैं कि उनने कई दिनों से कुछ खाया नहीं। खाने के वास्ते हाथ फैलाना गरीब की पुरानी आदत है। लेकिन हमारी सरकार भी अजीब है गरीब की नौटंकी को सच मान लेती है। उसके तईं आनाज सस्ता कर देती है। और तो और चुनावों के वक्त उसके पैर तक पकड़ लेती है। मेरे विचार में देश के गरीबों को इत्ता भाव देना ठीक नहीं।

खुद ही देख लीजिए, हमारा देश कित्ती तेजी से प्रगति कर रहा है। हमारी प्रगतिशील सरकार विकास दर को हमेशा ऊंचा बनाए रखने में लगी रहती है। सुब्बा जी समय-समय पर ब्याज दरों में कटौती कर देश की जनता पर लोन का बोझ कम करने का प्रयास करते रहते हैं। सरकार और सुब्बा जी के प्रयासों का असर गरीबों पर साफ मालूम चल रहा है। गरीब भी अब अमीरों के बराबर प्रगति कर रहे हैं। गरीबों की प्रगति अगर देखना है तो दिल्ली में देखिए, गुजरात में देखिए, बिहार में देखिए, मध्य-प्रदेश में देखिए और कुछ-कुछ उत्तर प्रदेश में भी देख सकते हैं। आजकल गुजरात की प्रगति की तो खूब चरचाएं हैं यहां-वहां।

दरअसल, प्रगति कर-करके गरीब ही देश के भीतर महंगाई को बढ़ा रहे हैं। प्रगति करना ठीक बात है परंतु खान-पान पर भी तो कंट्रोल रखना चाहिए देश के गरीबों को। लेकिन अच्छा खाना खाने बगैर मानते ही नहीं। अरे, यह क्या तुक है कि जो अमीर खाएं वो गरीब भी खाएं! खाने की यह जिद्द ही तो महंगाई को बढ़ा रही है। बिल्कुल सही फरमाया सुब्बा जी।

आगे से आप भी कान खोलकर सुन लें महंगाई के लिए अमीरों को कतई दोष न दें। हमेशा ध्यान रखें कि देश के गरीब ही महंगाई को बढ़ा रहे हैं, अच्छा खा-पीकर। फिर भी अगर देश का गरीब खुद को गरीब कहता है तो साफ झूठ बोलता है। आप गरीब की भूख पर न जाएं। अपनी अक्ल लगाएं और सुब्बा जी के कहे पर गौर फरमाएं।

गुरुवार, 2 मई 2013

नियंत्रण-मुक्त चीनी


सरकार का 'धन्यवाद' कि उसने चीनी पर से खुद का नियंत्रण हटा लिया। चीनी अबसे बाजार के हवाले हैं। बाजार जैसा चाहेगा, चीनी वैसी ही बिकेगी। दरअसल, सरकार को यह काम बहुत पहले ही कर लेना चाहिए था। सरकार खुद पर से जित्ता हो सके, उत्ता बोझ तो कम करे ही। आखिर सरकार कब तलक चीनी, चावल, आटे-दाल, तेल आदि के भाव को संभालती रहेगी। सरकार कने और भी जरूरी काम हैं। और फिर सरकार एक अरब लोगों को संभाल रही है, यह क्या कम है!

आजकल का जमाना 'बाजार' का है। समाज-देश-राजनीति में चीजें बाजार के हिसाब से ही तय हो रही हैं। जैसा बाजार चाहता है, वैसा होता है। इसमें कोई बुराई भी नहीं। बाजार की गिरफ्त में आते ही हर चीज का हुलिया बदल जाता है। देखिए न, फैशन से लेकर राशन तक धीरे-धीरे कर सबको बाजार ने बदल डाला है। अब न कंट्रोल की दुकानों पर भीड़ लगती है न खरीददारी के लिए सड़कों पर मारा-मारी रहती है। सब अब 'ऑन-लाइन' है। बाजार ने खरीददारी को इत्ता सरल बना दिया है कि आप चीनी से लेकर कपड़े तक सब ऑन-लाइन खरीद सकते हैं। न नकद का झंझट न मोल-भाव तय करने का लफड़ा।

बाजार हमेशा लाभ की बात करता है। यह बात सरकार भी जानती है। सरकार के इस कदम से शुगर इंडस्ट्री को खासा लाभ मिलने की उम्मीद है। अब चीनी ज्यादा स्मार्ट होकर बिका करेगी। बढ़िया है, बाजार के सहारे अगर चीनी की स्मार्टनेस में इजाफा हो रहा है, तो क्या बुराई है!

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि चीनी ने हम इंसानों पर जुलम भी बहुत ढाहे हैं। आज हर घर में एक न एक बंदा तो शुगर का मारा मिलेगा ही। शुगर की बीमारी ने रहन-सहन के साथ-साथ खाने-पीने तक के हाजमे को बिगाड़ कर रख दिया है। यह वजह है कि लोगों के बीच शुगर-फ्री का चलन तेजी से बढ़ रहा है। मैंने तमाम लोग ऐसे देखे हैं, जिन्हें चीनी का नाम सुनते ही शुगर का दौरा पड़ना शुरू हो जाता है।

तो फिर सरकार ने क्या गलत किया जो चीनी को बाजार के हवाले कर दिया। बाजार अपने ढंग से चीनी की कीमत बढ़ाए-घटाएगा। इस बहाने कम से कम चीनी के प्रति लोगों का नजरिया तो बदलेगा।

बहरहाल, सरकार के फैसले का स्वागत करते हुए मैंने भी चाय में चीनी की मात्रा को कम कर दिया है। चीनी का हिसाब भी पेट्रोल की तरह रखा है। दाम के बढ़ने-घटने को उसी हिसाब से मैनेज करता हूं। इस महंगाई में कुछ तो ऐसा किया जाए ताकि बोझ का दवाब कहीं तो कम हो। वरना सरकार तो मानने वाली नहीं। उसने तो ठान ली है जब तलक सत्ता में रहेगी महंगाई का साथ नहीं छोडेगी।

गुजारिश सबों से यही है कि अपनी-अपनी जीभ पर नियंत्रण रखें। उसे ज्यादा मीठी न बनाएं। शुगर-फ्री की आदत डाल लें। सरकार जैसा चलने को कहे, ठीक वैसा ही चलते रहें। अभी चीनी को सरकार ने नियंत्रण-मुक्त किया, हो सकता है कल को वो गेंहू-आटे को भी नियंत्रण-मुक्त कर दे। आखिर वो सरकार है, कुछ भी कर सकती है। इसीलिए सरकार के फैसलों पर बहस न करें। बस, खुद को उसके सांचे में ढालने का प्रयास करते रहें।

आइपीएल है तो तरक्की है!


होते हैं कुछ लोग जिन्हें देश की तरक्की को देखकर हर समय जलन-सी होती है। उन्हें हर तरक्की के पीछे बाजारवाद-पूंजीवाद की बू आती है। अब देखिए न, हमारा देश कित्ती तरक्की कर रहा है! देश से प्रत्येक छोटी-मोटी समस्या-दिक्कत गायब हो चुकी है। गरीब भी अब गरीब कहां रहे हैं। न यहां कोई भूखा है न नंगा। न महंगाई है न भ्रष्टाचार। सब मस्त होकर जंपिंग-जपांग की धुन पर उदबिलाऊ नृत्य कर रहे हैं। टी.वी. पर विज्ञापन चीख-चीखकर कह रहे हैं, अब हर कोई नाचेगा, कोई नहीं बचेगा। तो प्यारे आइपीएल की इस अलबेली घड़ी में हर कोई नाच और बजा ही रहा है।

यह आइपीएल की तरक्की है। और, आइपीएल की तरक्की देश की तरक्की है। मुझे आइपीएल और देश की तरक्की पर नाज है।

मैं जानता हूं मेरी इस सोच से प्रगतिशील सहमत न होंगे। उन्हें मेरी सोच और विचार में से बाजारवाद-पूंजीवाद की बू आ रही होगी। मेरी सोच के साथ, अब तलक वे मुझे खारिज भी कर चुके होंगे। किंतु मैं परवाह नहीं करता। मैं समय के साथ चलने-संवरने वाला प्राणी हूं। बाजार मेरी आत्मा और पूंजी मेरा शरीर है।

क्या आपने देखा नहीं कि आइपीएल के शुरू होते ही देश-समाज में से हर समस्या विलुप्त-सी हो गई। खबरिया चैनलस अब महंगाई-गरीबी पर कम और आइपीएल की तड़क-भड़क पर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं। आइपीएल की खबरों में जो मस्ती है, वो देश से जुड़ी खबरों में कहां। देश का हाल नेता जानें। खेल का हाल बताने को खबरिया चैनलस हैं ही।

जी हां, इसे ही तो कहते हैं तरक्की का असली मुकाम।

क्यों भूलते हैं, केवल आइपीएल के सहारे ही देश में करोड़ों रुपया आएगा। खिलाड़ियों को लाखों रुपए बांटे जाएंगे। विज्ञापन एजंसियां और अमीर बनेंगी सो अलग। खबरिया चैनलों की टीआरपी बढ़ेगी। क्या इससे हमारे देश, हमारे खेल का नाम ऊंचा न होगा! देखिए, पूंजी से ही पूंजी बढ़ती है और बाजार से ही बाजार बढ़ता है। फिर इस तरक्की पर प्रगतिशीलों को क्यों और किसलिए आपत्ति होनी चाहिए?

यह सब पहचान को नया आकार देने के लिए जरूरी है।

हमें एहसानमंद होना चाहिए आइपीएल का कि इसने कुछ दिनों के लिए ही सही मगर बेफालतू की चिंताओं से मुक्त तो किया। नहीं तो हर समय यहां-वहां कांय-कांय ही लगी रहती थी। पर अब काफी राहत है।

मैं तो कहता हूं, मस्त होकर आइपीएल देखिए। चियरलिडर्स के ठुमकों पर मदहोश होइए। पानी तरह पैसे को बहने दीजिए। जिसे जो कहना है, उसे कहने दीजिए, आप तो बस यह मानकर चलिए कि देश तरक्की कर रहा है, भले ही आएपीएल के बहाने सही।

आईपीएल और चियरलिडर्स


लीजिए, आईपीएल-6 भी शुरू हो गया। अब अगले 54 दिनों तलक मस्ती ही मस्ती, रोमांच ही रोमांच तारी रहेगा। क्रिकेट-प्रेमी तो दिनभर टी.वी. में मुंह घुसेड़े बैठे रहेंगे। खबरिया चैनल अपने-अपने तरीके से आईपीएल का मजा दर्शकों को दिखाएंगे और टीआरपी का ग्राफ बढ़ाएंगे। थोड़े दिनों के लिए देश-समाज के बीच से समस्त समस्याएं विलुप्त हो जाएंगी। न महंगाई पर बात होगी, न भ्रष्टाचार का जिक्र होगा, न पानी का रोना रोया जाएगा, न राजनीतिक स्थिरिता-अस्थिरिता पर बहस छिड़ेगी। केंद्र में अगर कुछ होगा तो बस आईपीएल, आईपीएल और आईपीएल ही होगा। बढ़िया है, इस बहाने कम से कम देश-समाज बेतुके झंझटों से मुक्ति तो पाएगा।

साथ ही साथ आईपीएल के बहाने मुझे भी सुनहरा मौका मिल जाएगा चियरलीडर्स को ताड़ने-घूरने का। कुछ हद तक आईपीएल की मस्ती का दारोमदार चियरलिडर्स की अदाओं पर भी निर्भर करता है। चौक्का पड़े या छक्का चियरलिडर्स का जलवा देखने लायक होता है वहां। चियरलिडर्स की मस्तियों को देखकर अक्सर मन करता है, उनके साथ नाचने-कूदने का। मनोरंजन का पूरा टॉनिक उनमें समाहित रहता है।

मेरे विचार में चियरलिडर्स की भूमिका केवल आईपीएल में ही नहीं बल्कि वन-डे और टेस्ट क्रिकेट में भी समान रूप से होनी चाहिए। यानी खेल का खेल और मनोरंजन का मनोरंजन।

चियरलिडर्स में जाने क्या कशिश-सी होती है कि उन्हें देखते ही मेरे सारे गम, सारी दिक्कतें पलभर में रफूचक्कर हो जाती हैं। उनकी कमर की थिरकन खेल के रोमांच को दूना कर देती है। जिस स्त्री-विमर्श के वास्ते हम यहां-वहां भागते-फिरते हैं, वो पूरा का पूरा उनके भीतर मौजूद रहता है। बावजूद इसके, कुछ लोग चियरलिडर्स को अश्लील और उनके नृत्य को अश्लीलता करार देते हैं। नादान हैं लोग जो शील-अश्लील में फर्क नहीं समझते। उन्हें पता ही नहीं कि सिर्फ चियरलिडर्स के कारण ही तो आईपीएल का रोमांच बरकरार है।

चियरलिडर्स की यह बात मुझे बेहद भाती है कि वे घूरने या तांकने का बुरा नहीं मानतीं। आप आराम से उन्हें देखकर अपनी आंखों को शीतल कर सकते हैं। आपके कने दोनों विकल्प हैं, चाहे तो उन्हें मैदान में घूरें या फिर अपने टी. वी. चैनल पर। कहीं किसी किस्म की कोई रोक-टोक नहीं। सचमुच चियरलिडर्स का दिल बड़ा होता है।

मेरा तो सभी से यह कहना है कि सब लोग चियरलिडर्स के संग-साथ अपने-अपने दिलों को लगाए रखें। उनमें अश्लीलता नहीं मनोरंजन को खोजें। अश्लीलता पर आधारित तमाम दकियानूसी स्थापनाओं से बाहर आकर केवल चियरलिडर्स पर ध्यान केंद्रित रखें। फिर देखिएगा कि दिल-दिमाग कित्ता सुकून पता है।

फिलहाल, मैंने पत्नी से कह दिया है कि अगले 54 दिनों तक उसे न देखकर मैं सिर्फ चियरलिडर्स को ही देखूंगा। उनकी दिलकश मस्ती में डूबा रहूंगा। उनके नृत्य, उनकी कमर, उनकी अदाओं का भरपूर मनोरंजन उठाऊंगा। फिर भी अगर पत्नी को बुरा मानना है तो मना जाए चियरलिडर्स की खातिर हर खतरा उठाने को मैं तैयार हूं!

मैं चाहता हूं आईपीएल की मस्ती का जुनून ऐसे ही सब पर तारी रहे। दीन-दुनिया को भूल सब बस आईपीएल की रोमानियत में ही डूबे रहें। क्रिकेट के साथ-साथ चियरलिडर्स के जलबों को एनजॉय करें। और जो जो कुछ भी कह रहा है, उस पर खाक डालें। बस इत्ता ध्यान रखें, अगर आईपीएल का मनोरंजन पास है तो सबकुछ पास है प्यारे।

बुधवार, 1 मई 2013

क्योंकि मैं मूर्ख हूं


हां, मैं मूर्ख हूं! ऐसा-वैसा नहीं, बहुत बड़ा वाला मूर्ख हूं। अपनी मूर्खता का ‘प्रमाणपत्र‘ जेब में लिए घूमता हूं। मूर्खता के सहारे कई दफा पागलखाने के चक्कर भी लगा आया हूं। खुद को पागलों के बीच पाकर मुझे असीम खुशी मिलती है। मैं पागलों की वैचारिकता एवं बुद्धिजीविता का कायल हूं।

खुद मूर्ख होकर ही मैं मूर्खता के मर्म को समझ-जान पाया हूं। दुनिया में मूर्खता से बड़ी न कोई विचारधारा है न प्रगतिशीलता। जो लोग खुद को दुनिया-समाज का सबसे बड़ा बुद्धिजीवि घोषित करते-करवाते हैं, दरअसल, वे खुशफहमी का शिकार होते हैं। सच का सामना करने से घबराते हैं। हालांकि बुद्धिजीवि बिरादरी मानेगी नहीं लेकिन दस-बीस ग्राम की मूर्खता उनमें भी घुली रहती है। गाहे-बगाहे अपनी मूर्खता का प्रदर्शन वे भी करते रहते हैं फिर भी खुद को किसी तुर्रामखां से कम नहीं समझते।

लेकिन मुझे इससे क्या वे खुद को चाहे जो समझें मगर मैं खुद को मूर्ख ही मानता व समझता हूं।

दरअसल, मेरे भीतर मूर्खता वाले लक्षणों को सबसे पहले मेरी पत्नी ने पहचाना। मुझे भिन्न-भिन्न कोणों व दृष्टिकोणों से जांचा-परखा। मेरी विचारधारा और मूर्ख की विचाराधारा को एक समान रखकर देखा। मेरी बौद्धिक एवं वैचारिक प्रगतिशीलता को जमीनी स्तर पर आजमाया। मेरी शाब्दिक लफ्फबाजियों का सरेआम प्रदर्शन किया। मेरी दिमागी संरचना का पोस्टमार्टम करके पत्नी ने पाया कि मेरे अंदर सिर्फ आधा ग्राम बुद्धि को छोड़कर बाकी सब मूर्खता ही मूर्खता भरी हुई है। स्पष्ट शब्दों में कह सकते हैं कि मेरे दिमाग में आत्याधिक मात्रा में भूसा भरा है।

लेकिन मुझे खुद के मूर्ख होने पर जरा भी रंज नहीं, पत्नी को भी नहीं है। पत्नी का साफ कहना है कि उसे मूर्खों को बाहर देखने जाने की जरूरत नहीं, यहां तो घर में ही मौजूद है। पत्नी ने बाकायदा मेरी मूर्खता के प्रमाणपत्र छपवाएं हैं। जिन्हें सभी रिश्तेदारों और मिलने-जुलने वालों के बीच बांटा हैय जिनमें से एक मैं हमेशा अपनी जेब में रखता हूं। ताकि भूल-चूक होने पर माफी मिल सके।

संभवता, मैं ऐसा पहला खुशनसीब पति होऊंगा जिसे पत्नी से मूर्ख होने का प्रमाणपत्र हासिल है। नहीं तो मैंने देखा-सुना है कि पति लोग मूर्ख होते हुए भी खुद को मूर्ख नहीं मानते। मगर मैं केवल सच्चाई में विश्वास करता हूं।

जानता हूं, मूर्ख को लोग-बाग बेहद ‘हेय‘ दृष्टि देखते हैं। मूर्ख कहकर उनका मजाक उड़ाते हैं। वैचारिक स्तर पर उन्हें अल्प-बुद्धि समझते हैं। चलते-फिरते कहीं भी उन्हें दुत्कार देते हैं। दरअसल, नादान होते हैं लोग। जानते ही नहीं कि वे क्या कर और कह रहे हैं। मूर्ख होना कतई हेय नहीं बल्कि बेहद सम्मान की बात है। मूर्ख लोग बुद्धिजीवियों-प्रगतिशीलों की तरह शब्दों का आडंबर नहीं रचते, जो जैसा होता है उसे वैसा ही कहते हैं। खामाखां के विवादों-बहसों से हट-बचकर चलते हैं। और, खुद को भीड़ में अंतिम पायदान पर रखते हैं। इसे मैं मूर्ख बिरादरी की श्रेष्ठता मानता हूं। यही कारण है कि मैं एक ‘सर्वश्रेष्ठ मूर्ख‘ हूं।

मुझे बुद्धि की दरकार नहीं। मूर्खों के लिए तो मूर्खता ही उनकी बुद्धि होती है। मूर्ख बने रहकर जित्ती सरलता से चीजों को देखा-समझा जा सकता है, उत्ता बुद्धिजीवि बने रहकर नहीं। मूर्ख बने रहकर मस्त बने रहना किसी उपलब्धि से कम नहीं है मेरे तईं।

फिलहाल, खुश हूं कि मैं मूर्ख हूं। इसमें पत्नी की भागीदारी को चाहकर भी नहीं भूला सकता। अगर आप मूर्ख नहीं है, तो जल्द से जल्द बनने का कष्ट करें। फिर देखिएगा कि यह दुनिया, यह समाज कित्ता रंगीन और मस्त नजर आएगा।

चीन पर कविता


मैं चीन पर एक कविता लिखना चाहता हूं। एक ऐसी कविता जिसे पढ़कर जोश आए और क्रांति का माहौल बने। चीन पर लिखी कविता के बहाने मैं दुनिया-जहान में जाना-पहचाना जाऊं। क्या प्रगतिशील, क्या वामपंथी, क्या जनवादी सब के सब मेरी कविता के आगे फीके पड़ जाएं। अखबार से लेकर फेसबुक व ट्विटर तक पर बस मेरी कविता की ही बात हो। बात ही बात में बात इत्ती दूर तलक निकल जाए कि चीन को अपने तंबू उखाड़ने पड़ें। चीनी सैनिक जमीन पर कब्जा जतलाने का इरादा छोड़ मेरी कविता को कब्जे में लेने की बात सोचने लगें।
चीन पर लिखी जाने वाली अपनी कविता के प्रभाव एवं प्रसिद्धि की कल्पना मैं सहज ही कर सकता हूं। लेकिन समस्या बस एक ही आड़े आ रही है कि मैं कविता कैसे और किस मूड के हिसाब से लिखूं।

दरअसल, मैं कवि नहीं हूं। और, कविता के लिए कवि होना अति-आवश्यक है। साथ-साथ जोशीले और क्रांतिकारी शब्दों पर एकाधिकार होना भी जरूरी है। चीन पर कविता ऐसी लिखी जाए कि चीनी भी पानी मांगने लगें। मगर पानी मांगने वाली ऐसी प्रभावी कविता को मैं चाहकर भी नहीं लिख पा रहा हूं।

लिखने ‘चीन पर कविता‘ बैठता हूं लेकिन बन वो व्यंग्य जाता है। न चाहते हुए भी शब्दों की अभिव्यक्ति एकदम से व्यंग्य में तब्दील हो जाती है। आप यकीन नहीं करेंगे, चीन पर कविता लिखने के वास्ते मैं पिछले दो हफ्ते से छुट्टी पर हूं। लगभग एक हफ्ते से पत्नी से बात तक नहीं की है। मेरे फेसबुक की दीवार सुनी पड़ी है और ट्विटर के ट्व्टि बंद हैं। क्या करूं, दिल-दिमाग में तो बस चीन पर कविता लिखने का जोश भरा हुआ है। अफसोस... जोश कागज तलक आ नहीं पा रहा।

कभी-कभी तो खुद के व्यंग्य-लेखक होने पर ही बहुत गुस्सा आता है। मन करता है, अपने लिखे सारे व्यंग्य रद्दी की टोकरी में डाल कहीं डूबा आऊं या फिर अपने व्यंग्य-लेखक को ही गोली मार दूं। हर वक्त व्यंग्य की बात सूझना मेरे तईं अब परेशानी का सबब बनता चला जा रहा है। व्यंग्य-लेखन न हुआ जी का जंजाल हो गया।

अभी अगर मेरी जगह कोई वरिष्ठ या फिर फेसबुक कवि होता तो झण भर में चीन पर कविता लिख अपने हाथ झाड़ चुका होता। और ऐसी धांसू, जोशीली व क्रांतिकारी कविता लिखी होती कि चीन तो क्या पाकिस्तान भी भारत पर आंखें तरेरने से भय खाता। कविता लिख और फेसबुक पर डालकर कवि अब तलक न जाने कित्तों के कमेंट पा चुका होता और न जाने कित्तों को टैग कर उनका प्यारा बन चुका होता। यही होता है फेसबुक के कवि का कविता लिखने का कमाल।

मुझे लगता है, चीन पर कविता लिखने की इच्छा मेरे मन में ही दफन होकर रह जाएगी। मगर मैं प्रयासरत हूं कि ऐसा न हो। बहुत लंबी न सही पर कुछ लाइनों की ही मैं चीन पर कविता लिखूं जरूर।

व्यंग्य की धारा को छोड़ मैंने पुनः चीन पर कविता लिखने का मन बनाया है। जरा दो-चार वरिष्ठ किस्म के कवियों को पढ़कर अपने मन में थोड़ी-बहुत प्रेरणा का संचार कर लूं। या फिर कुछ फेसबुक के कवियों को पढ़ लूं। ताकि चीन पर मेरी लिखी कविता कविता ही लगे। वैसे, चीन पर लिखी मेरी कविता का लुत्फ कुछ और ही होगा, ऐसी मुझको उम्मीद है।