सोमवार, 29 अप्रैल 2013

धर्मनिरपेक्षता का स्वाद


सुनो प्यारे, मैं धर्मनिरपेक्ष बनना चाहता हूं। भले ही थोड़े दिन के लिए पर धर्मनिरपेक्षता का स्वाद चखना चाहता हूं। देखना चाहता हूं, धर्मनिरपेक्ष होकर आईने के बीच मेरी सूरत कैसी नजर आती है।

मैंने धर्मनिरपेक्षता के बारे में काफी कुछ सुन-पढ़ रखा है। बताते हैं, धर्मनिरपेक्षता बड़ी गजब की चीज होती है। एक दफा जिसे धर्मनिरपेक्षता स्वाद लग जाता है, आसानी छुटता नहीं। धर्मनिरपेक्षता का स्वाद चखने को राजनीति से बेहतर दूसरी कोई जगह नहीं।

धर्मनिरपेक्षता का स्वाद चखने के लिए मैं राजनीति में भी आ सकता हूं। राजनीति में आकर धर्मनिरपेक्षता के साथ-साथ कई और निरपेक्षताओं के स्वाद भी आसानी से चखे जा सकते हैं।
मैंने देख लिया है, लेखक बने रहने का कोई फायदा नहीं है। लेखक बने रहकर न आप राजनीति न धर्मनिरपेक्षता किसी का स्वाद नहीं चख सकते। लेखक को निष्पक्ष होना चाहिए सो यह मेरे बस की बात नहीं। वैसे भी लेखक लेखन के बीच राजनीति तो कर सकता है किंतु जनतांत्रिक राजनीति करने का हुनर उसे खास राजनीति में आकर ही आ पाता है। कौन-सी जुगाड़ कब और कहां साधनी है, यह राजनीति में रहकर ही सीखा व समझा जा सकता है।

वैसे धर्मनिरपेक्ष बनना कोई बहुत कठिन बात नहीं। आप किसी भी धर्म, समुदाय या संप्रदाय के प्रति धर्मनिरपेक्ष बन सकते हैं। धर्मनिरपेक्षता का चोला पहन लेने से वोट और कुर्सी का लाभ यथावत बना रहता है। जनता के बीच आपकी छवि एक उम्दा धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति की बनती है। इसका सबसे बड़ा फायदा आपको समाजवाद-मार्क्सवाद-राष्ट्रवाद के बीच आसानी से मिलता रहता है। अगला तो यही समझता है कि आप धर्मनिरपेक्ष हैं लेकिन अंदर से क्या हैं यह कोई नहीं जान-समझ पाता।

राजनीति के बीच, इन दिनों, धर्मनिरपेक्ष नेताओं का ही बोल-बाला है। अपनी-अपनी धर्मनिरपेक्षताओं को भुनाने के लिए वे हर संभव प्रयास में जुटे हुए हैं। गुजरात से लेकर बिहार तलक धर्मनिरपेक्षता खूब जोर मार रही है।

बढ़िया है, धर्मनिरपेक्ष भी बने रहो और फायदे की राजनीति भी करते रहो।

उनकी धर्मनिरपेक्ष छवियों (!) को देखकर मेरे मन में भी लड्डू फूटते हैं। मन करता है, धर्मनिरपेक्षता का लड्डू खुद भी खाऊं और अपने चाहने वालों को भी खिलाऊं। एक दफा धर्मनिरपेक्ष छवि बनने के बाद फिर आपके चरित्र पर कोई उंगली नहीं उठा सकता। मैं, दरअसल, ऐसी ही छवि गढ़ना चाहता हूं।

अगर सब ठीक रहा तो जल्द ही कोई 'धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक' दल देखकर मैं खुद की छवि पर धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति का ठप्पा लगाऊंगा। एक दफा धर्मनिरपेक्ष बन गया तो बाकी की चीजें बेहद आसान हो जाएंगी मेरे लिए। साथ ही, लेखक और लेखन की फॉरमेंलटी से भी मुक्ति पा जाऊंगा। धर्मनिरपेक्षता का स्वाद अन्य स्वादों से कहीं अधिक लजीज होगा, ऐसा मैं मानता हूं।

फिर क्यों न धर्मनिरपेक्ष बनकर धर्मनिरपेक्षता का स्वाद चखा जाए।

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