सोमवार, 29 अप्रैल 2013

गिरावट के मारे सोना-चांदी बेचारे


गिरने की भी एक हद होती है प्यारे। लेकिन सोने-चांदी ने तो गिरावट की हर हद को ही पार कर दिया। इत्ता गिरे, इत्ता गिरे कि गिर-गिरकर अपना नाम और दाम दोनों को ही डूबो दिया। सोना-चांदी खुद तो डूबे ही साथ में न जाने कित्ते निवेशकों, व्यापरियों, कारीगरों को ले डूबे। देख रहा हूं सब डूब-डाबकर मातम मना रहे हैं। क्यों नहीं मनाएंगे मातम...। मातम तो उन्हें मनाना ही होगा। आखिर सोने-चांदी की चमक ने उनका दिमाग जो सातवें आसमान पर चढ़ाकर रख दिया था। अब जब दोनों खूब-खूब गिर चुके हैं, हर कोई इनसे बचने की सलाह दे रहा है। मगर लालची मन कहां मानने वाला है! आज सब सोने-चांदी की गिरावट पर मातम मना रहे हैं, कल को हो सकता है, बढ़त पर डांस भी करने लग जाएं। इसे ही इंसानी फितरत कहते हैं।

लेकिन यह ठीक ही हुआ। मैं देख करता था, जिनके कने ग्राम दो ग्राम सोना या किलो दो किलो चांदी थी, खुद को किसी धन-कुबेर से कम नहीं समझते थे। सड़क पर यों ऐंठ कर चलते थे मानो उनके सामने सब बौने हैं। रईसीयत उनके भीतर इस हद तक आ चुकी थी कि रुपए दो रुपए की वैल्यू ही नहीं समझते थे। कुछ बोलो तो कहते थे, 'हम सोने-चांदी में खेलने वाले लोग कहां रुपए दो रुपए के झंझट में पड़ें। हमारी औकत इनसे कहीं ज्यादा बड़ी है।' मगर अफसोस आज उन्हें अपनी औकात के भी लाले पड़ गए हैं।

प्यारे वक्त की मार देखो। सोना-चांदी के रईस आज सिर पर हाथ धरे अपनी किस्मत को रो रहे हैं। पीली धातु ने जो घुमकर पलटवार किया है, सब के सब चारों खाने चित्त हैं। मुझे तो डर है कहीं सदमें में न पहुंच जाएं।

कहते हैं, लत चाहे शराब-कबाब की हो या सोने-चांदी की बुरी ही होती है। कब, कौन, कहां पलटी मार जाए किसी का भरोसा नहीं रहता। लोग कहते नहीं थकते थे कि उन्हें खुद से ज्यादा सोने-चांदी की चमक पर भरोसा है। आज सोने-चांदी ने उसी भरोसे को धूल में मिला दिया है। न सिर्फ धूल में मिलाया बल्कि एक ऐसा शूल भी दे दिया जिसकी भरपाई इत्ती जल्दी संभव नहीं।

जो जित्ती तेजी से उठता है वो एक दिन उत्ती ही तेजी से धड़ाम भी होता है, यह नियम है। फिर प्यारे क्यों दुखी हो सोना-चांदी की इस गिरावट पर। अब तलक सोना-चांदी की बढ़त पर मजे लिए अब थोड़े दिन उसकी गिरावट का दर्द भी झेलो। ताकि पता तो चल सके गिरने का दर्द कैसा होता है।

सोने-चांदी की गिरावट पर जिन्हें दुखी होना है वे दुखी होएं या फिर जिन्हें मातम मनाना है वे मातम मनाएं किंतु मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं है। न मेरे कने सोने का भंडार है न चांदी की टकसाल। मेरे कने जो है वो न इनसे छिपा है न उनसे। मैं स्वतंत्र हूं अपनी खुशियों के संग-साथ। सोने-चांदी की चमक में पड़ना खामाखां की टेंशन मोल लेना है। यहां पहले ही टेंशने क्या कम हैं जो अतिरिक्त टेंशन पालूं।

सोने-चांदी से पाई रईसीयत भी क्या रईसीयत होती है। असली रईसीयत तो दिल की होती है। भाव चाहे कित्ता ही गिर जाए मगर दिल की मजबूती नहीं पिघलनी चाहिए।

ध्यान रखियो, सोना-चांदी तो हाथ का मैल हैं। इस मैल से हम जित्ता हो सके उत्ता दूर रहें तो ही अच्छा। वरना तो फिर खुद मालिक...।

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