सोमवार, 29 अप्रैल 2013

जुबान की राजनीति


देखो प्यारे, जुबान और निगाह दोनों में ज्यादा फर्क नहीं होता। दोनों कभी भी, कहीं भी बहक सकती हैं। जुबान और निगाह का बहकना चरित्र में 'श्रीवृद्धि' करने में सहायक होता है। यह आपको दूसरों की निगाह में 'महान' बनाता है। निगाहों के बहकने का फलसफा जित्ता बेहतर आशिक समझते हैं, उत्ता कोई और नहीं समझ सकता। और, जुबान के बहकने का मजा तो राजनीति में रहकर नेता लोग उठा ही रहे हैं। वैसे, अब इसके छींटे साहित्य के दामन पर भी पड़ते नजर आने लगे हैं।

फिलहाल, यहां फोकस केवल जुबान की राजनीति पर रहेगा।

यह सुखद है कि हमारी राजनीति में जुबान के बहाने चर्चा में बने रहने के मामले लगतार बढ़ रहे हैं। हर नेता की यह तमन्ना रहती है कि वो बस जुबान की राजनीति करे। जुबान की राजनीति करने का राजनीतिक लाभ जहां संभव हो वहां उठाया जाए। देखिए, जुबान की राजनीति में नेता के कद का कोई महत्त्व नहीं रहता। कद चाहे जित्ता बड़ा या छोटा हो बस जुबान को बहकाने की प्रैक्टिस होनी चाहिए। जुबान का असर भी कुछ ऐसा रहे कि समाने वाला चारों खाने चित्त हो जाए। उसके साथ हमेशा काटो तो खून नहीं की स्थिति बनी रहे।

इन दिनों जिन नेता जी की जुबान जिस कायदे और लहजे में बहक रही है, उसका अपना ही मजा है। नेता जी जुबान हिला रहे हैं और मस्त सुर्खियां बटोर रहे हैं। हालांकि सियाने उनसे ऐसा न करने को कह रहे हैं पर नेता जी कहां मानने वाले हैं। उन्होंने तो सोच लिया है कि वे बस जुबान की राजनीति ही करेंगे।

यों भी राजनीति में रहकर जुबान की राजनीति करने में कोई बुराई भी नहीं है। यह नेताओं का राजनीतिक अधिकार है। सोचने वाली बात है कि नेता जुबान से राजनीति नहीं करेगा तो फिर भला किससे करेगा? कुछ नेताओं की कुर्सी ही जुबान के सहारे चल-फिर रही है। इसमें उन्हें परम-आनंद की अनुभूति होती है।

वैसे नेता जी जिन नेता जी पर जुबानी फिकरे कस रहे हैं, कभी वे उनके लंगोटिया यार हुआ करते थे। पर, राजनीति में कहां एक-दूसरे के लंगोट की फिक्र की जाती है। यहां तो हम दम हर किसी की यह कोशिश रहती है कि सामने वाले की लंगोट जित्ता जल्दी हो उत्ता जल्दी उतर या उतार ली जाए। इसमें शालीनता और अश्लीलता का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला हिसाब होता है यहां।

फिर भी अगर कोई राजनीति के बीच शुचिता या समानता के ख्वाब देखता है तो उसे मेरी सलाह कि वो यह न देखे क्योंकि राजनीति का स्तर अब जुबान केंद्रित हो चला है।

यही सब देख-सुनकर मैं हमारी राजनीति और हमारे नेताओं को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेता। बस उनके कहे-बोले का आनंद लेता रहता हूं। क्योंकि मुझे मालूम है कि वे सुधरेंगे नहीं और मैं उनको सुधरने के तईं बोलूंगा नहीं। तो फिर क्या फायदा ऐवईं अपने दिमाग को खोटी करने में! जहां, जिसकी, जैसी जुबान बहक रही है उसे बहकने दें और घर बैठे आनंद लें।

बस इत्ता ध्यान रखिए, जुबान की राजनीति में किसी का कोई सगा नहीं होता। दरअसल, अब यही राजनीति का 'वास्तविक तकाजा' भी है।

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