सोमवार, 29 अप्रैल 2013

भूकंप आया और हिला गया


सुना कि दिल्ली और आसपास भूकंप के झटके आए। काफी लोग, काफी चीजें हिलीं। कुछ को खबरिया चैनलों ने हिलाया तो कुछ खुद ही हिल लिए। आखिर बात ही हिलने और झटका खाने वाली थी। भूकंप के झटकों और लोगों के हिलने को मैंने बरेली में भी महसूस किया। कहीं-कहीं, कुछ-कुछ बरेली के लोग भी हिले। हिलना लाजिमी था क्योंकि दिल्ली बरेली के बीच दूरी ही कित्ती है!

वैसे भूकंप के झटके तो अब आए हैं किंतु दिल्ली में काफी समय से कुछ-न-कुछ हिल-डुल ही रहा है। खासकर, राजनीति के बीच तो काफी कुछ हिल रहा है। नेता लोग निरंतर एक-दूसरे को झटके दे रहे हैं। कभी बयानबाजी से तो कभी टोपी-तिलक के बहाने। मेरे ख्याल में भूकंप के झटकों का असर नेताओं पर ज्यादा नहीं हुआ। अगर होता तो अब तलक एक-दूसरे के खिलाफ राजनीति शुरू हो गई होती। विरोध की राजनीति करने का एक भी मौका हमारे नेता लोग जाने नहीं देते।

मुझे लगता है, यह समय ही झटकों का है। हर दूसरे-तीसरे दिन कोई-न-कोई अटका-झटका लग ही जाता है। कमाल देखिए, सारे झटकों की मार झेलती जनता ही है। नेता लोग तो बस संसद में बैठकर झटकों पर बहस करते हैं।

महंगाई ने तो झटका देने को अपनी आदत बना लिया है। हर दिन वो कोई-न-कोई झटका देती ही रहती है। कभी आटे के दाम बढ़ जाते हैं तो कभी चीनी के। हां, तेल की कीमतों के कम होने से झटकों में नन्ही-सी राहत जरूर मिली है। मगर यह ऊंट के मुंह में जीरा समान है।

अभी दो रोज पहले सोना-चांदी ने जबरदस्त झटका दिया। ऐसा झटका दिया कि हर कोई चारों खाने चित्त हो गया। जिन्होंने कभी सोचा नहीं था कि सोना-चांदी इत्ता तगड़ा झटका मार सकते हैं, वे भी माथे पर बल डाले उदास बैठे हैं। सोना-चांदी के झटकों ने तो उनकी सोचने-समझने-विचारे की शक्ति तक को क्षीण कर दिया है। पर, क्या कर सकते हैं सब समय-समय की बात है।

वैसे आप मानें या न मानें पर जीवन में झटके जरूरी हैं। ताकि जीवन से जुड़ी कड़वी सच्चाईयों को झटकों के बहाने समझा-जाना जा सके। भूकंप जो झटके देता है, उससे नुकसान तो होता है, पर सीख भी मिलती है कि हम प्रकृति का किस हद तक दोहन करते चले जा रहे हैं। भूकंप के झटके दरअसल प्रकृति का मनुष्य जाति के खिलाफ रिएक्शन है। पर रिएक्शन पर एक्शन हम कम ही ले पाते हैं।

भूकंप के झटकों पर हो-हंगामा दो-चार दिन खूब चलेगा। फिर सब भूल-भाल जाएंगे। सब अपने-अपने काम-धंधों पर लौटकर किसी और झटके को झेलने में लग चुके होंगे। क्या किया जाए यहां हर आदमी कने एक से ज्यादा झटके हैं। उसकी पूरी जिंदगी ही झटकों से ऊबरने में खप जाती है। इसीलिए देख रहा हूं लोग-बाग भूकंप के झटकों पर उस तरह से हैरान-परेशान नहीं हैं, जैसाकि होना चाहिए। शायद उन्हें लगा था कि कुछ हिला है और हिलकर खुद ही ठहर गया। भूकंप बेचारे ने भी सोचा होगा कि बेकार ही उसने यहां लोगों को झटके दिए, इन्हें तो पहले से ही तमाम तरह के झटकों को झेलने की आदत है।

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