रविवार, 28 अप्रैल 2013

भाग मुशर्रफ भाग

भागना कोई बुरी बात नहीं। दुनिया में हर कोई किसी न किसी कारण भाग ही रहा है। कोई दर्द से मुक्ति पाने के लिए भाग रहा है, कोई पत्नी से बचने के लिए भाग रहा है, कोई पैसा कमाने के लिए भाग रहा है, कोई नेता बनने के लिए भाग रहा है, कोई पुरस्कार पाने के लिए भाग रहा है तो कोई सिर्फ इसीलिए भाग रहा है क्योंकि भागना उसकी नियति है। 

अब उस दिन अगर मियां मुशर्रफ गिरफ्तारी के डर से भागे तो क्या गलत भागे! न भागते तो तुरंत गिरफ्तार होकर अपनी बदनामी ही कराते। न भागते तो पूरी दुनिया को पता कैसे चलता कि मियां जनरल मुशर्रफ भाग भी सकते हैं। भागना तो मियां मुशर्रफ की आदत में शुमार है।

हालांकि मियां मुशर्रफ का भागना उन्हें ज्यादा राहत नहीं दे पाया। बाद में वे धर ही लिए गए लेकिन एक मिसाल तो कायम हो गई न जरनल के भागने की। मियां मुशर्रफ का भागना फिलहाल इतिहास में दर्जा पा गया है। अब दुनिया-समाज-विपक्ष-दुश्मन चाहे कुछ कहते, चाहे कुछ समझते रहें।

मियां मुशर्रफ को भागने की पुरानी प्रेक्टिस है। हालांकि जब तलक वे पाकिस्तान के राष्ट्रपति बनकर रहे, तब तलक उनने लोगों को खूब भगाया। भगा-भगाकर खूब परेशान किया। लेकिन जैसे ही उनके नीचे से राष्ट्रपति की कुर्सी सरकी, वैसे ही वे यहां-वहां भागते नजर आए। भागकर तकरीबन चार साल बाहर रहे। मगर वतन लौटते ही गिरफ्तारी के डर से फिर से भागना पड़ा। लेकिन यह भागना भी कोई भागना था। भागकर जाते कहां अपने ही फार्म हाउस में नजरबंद कर लिए गए मियां मुशर्रफ। हाय...।

कहते हैं, बड़े नसीब वाले होते हैं भागने वाले। भागने वालों का भाग्य बहुत तेजी से बदलता। प्रसिद्धि उन्हें बहुत जल्दी मिलती है। दुनिया उन्हें तुरंत पहचान लेती है। भागने वालों के नाम के आगे 'भगोड़ा' लग जाए फिर तो बात ही क्या है। सुना है, एक मामले में मियां मुशर्रफ भी 'भगोड़ा' शब्द से नवाजे जा चुके हैं। कोई नहीं..कोई नहीं.. 'भगोड़ा' कोई गाली थोड़े होता है। 'भगोड़ा' तो उसे कहते हैं, जो भागने में उस्ताद हो, जैसे मियां मुशर्रफ।

मेरा दवा है, मियां मुशर्रफ ने अगर पाकिस्तान में भागने-भगाने का ट्रेनिंग सेंटर खोला होता तो बहुत चलता। यों भी, आजकल के आदमी की पहली चाहत भागकर सबकुछ पाने की रहती है। और मियां मुशर्रफ ठहरे पुराने 'भगोड़े'। पाकिस्तानी आवाम को कम से कम यह हुनर तो मियां मुशर्रफ से सिखना ही चाहिए था।

सुना है, मियां मुशर्रफ काफी परेशान हैं। दीवारों के बीच कैद होकर रह गए हैं। जिस राजनीतिक खेल को खेलने वे वापस पाकिस्तान लौटे थे, उसमें पलीता लग चुका है। अब न उनके हाथ सत्ता की हनक रही न जरलन की पदवी। उनका गुरूर सिमटकर नजरबंदी में तब्दील हो गया है। अब तो यहां-वहां भागने से भी कुछ हासिल नहीं।

मियां मुशर्रफ के साथ हुआ तो जैसे को तैसा ही है। बे-कारण मुल्क और आवाम को भगाने वाला आज खुद ही भागने के इल्जाम में अंदर है। वैसे मियां मुशर्रफ ने भारत के अंदर भी उछल-कूद कुछ कम नहीं की है। इसके लिए उन्हें मुंह की भी खानी पड़ी है। बची-कुची अब अपनी जेल के अंदर खा रहे हैं।

नजरबंद मियां मुशर्रफ अब देखते हैं भागकर कहां जाते हैं। खबर है, उनके भागने पर अब सख्त पाबंदी लग चुकी है। बढ़िया है। चलो कुछ दिन तो मियां मुशर्रफ अपने भागने की थकान को जेल के भीतर मिटा सकेंगे। बाकी उनके खुदा पर निर्भर।

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