सोमवार, 29 अप्रैल 2013

धर्मनिरपेक्षता का स्वाद


सुनो प्यारे, मैं धर्मनिरपेक्ष बनना चाहता हूं। भले ही थोड़े दिन के लिए पर धर्मनिरपेक्षता का स्वाद चखना चाहता हूं। देखना चाहता हूं, धर्मनिरपेक्ष होकर आईने के बीच मेरी सूरत कैसी नजर आती है।

मैंने धर्मनिरपेक्षता के बारे में काफी कुछ सुन-पढ़ रखा है। बताते हैं, धर्मनिरपेक्षता बड़ी गजब की चीज होती है। एक दफा जिसे धर्मनिरपेक्षता स्वाद लग जाता है, आसानी छुटता नहीं। धर्मनिरपेक्षता का स्वाद चखने को राजनीति से बेहतर दूसरी कोई जगह नहीं।

धर्मनिरपेक्षता का स्वाद चखने के लिए मैं राजनीति में भी आ सकता हूं। राजनीति में आकर धर्मनिरपेक्षता के साथ-साथ कई और निरपेक्षताओं के स्वाद भी आसानी से चखे जा सकते हैं।
मैंने देख लिया है, लेखक बने रहने का कोई फायदा नहीं है। लेखक बने रहकर न आप राजनीति न धर्मनिरपेक्षता किसी का स्वाद नहीं चख सकते। लेखक को निष्पक्ष होना चाहिए सो यह मेरे बस की बात नहीं। वैसे भी लेखक लेखन के बीच राजनीति तो कर सकता है किंतु जनतांत्रिक राजनीति करने का हुनर उसे खास राजनीति में आकर ही आ पाता है। कौन-सी जुगाड़ कब और कहां साधनी है, यह राजनीति में रहकर ही सीखा व समझा जा सकता है।

वैसे धर्मनिरपेक्ष बनना कोई बहुत कठिन बात नहीं। आप किसी भी धर्म, समुदाय या संप्रदाय के प्रति धर्मनिरपेक्ष बन सकते हैं। धर्मनिरपेक्षता का चोला पहन लेने से वोट और कुर्सी का लाभ यथावत बना रहता है। जनता के बीच आपकी छवि एक उम्दा धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति की बनती है। इसका सबसे बड़ा फायदा आपको समाजवाद-मार्क्सवाद-राष्ट्रवाद के बीच आसानी से मिलता रहता है। अगला तो यही समझता है कि आप धर्मनिरपेक्ष हैं लेकिन अंदर से क्या हैं यह कोई नहीं जान-समझ पाता।

राजनीति के बीच, इन दिनों, धर्मनिरपेक्ष नेताओं का ही बोल-बाला है। अपनी-अपनी धर्मनिरपेक्षताओं को भुनाने के लिए वे हर संभव प्रयास में जुटे हुए हैं। गुजरात से लेकर बिहार तलक धर्मनिरपेक्षता खूब जोर मार रही है।

बढ़िया है, धर्मनिरपेक्ष भी बने रहो और फायदे की राजनीति भी करते रहो।

उनकी धर्मनिरपेक्ष छवियों (!) को देखकर मेरे मन में भी लड्डू फूटते हैं। मन करता है, धर्मनिरपेक्षता का लड्डू खुद भी खाऊं और अपने चाहने वालों को भी खिलाऊं। एक दफा धर्मनिरपेक्ष छवि बनने के बाद फिर आपके चरित्र पर कोई उंगली नहीं उठा सकता। मैं, दरअसल, ऐसी ही छवि गढ़ना चाहता हूं।

अगर सब ठीक रहा तो जल्द ही कोई 'धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक' दल देखकर मैं खुद की छवि पर धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति का ठप्पा लगाऊंगा। एक दफा धर्मनिरपेक्ष बन गया तो बाकी की चीजें बेहद आसान हो जाएंगी मेरे लिए। साथ ही, लेखक और लेखन की फॉरमेंलटी से भी मुक्ति पा जाऊंगा। धर्मनिरपेक्षता का स्वाद अन्य स्वादों से कहीं अधिक लजीज होगा, ऐसा मैं मानता हूं।

फिर क्यों न धर्मनिरपेक्ष बनकर धर्मनिरपेक्षता का स्वाद चखा जाए।

भूकंप आया और हिला गया


सुना कि दिल्ली और आसपास भूकंप के झटके आए। काफी लोग, काफी चीजें हिलीं। कुछ को खबरिया चैनलों ने हिलाया तो कुछ खुद ही हिल लिए। आखिर बात ही हिलने और झटका खाने वाली थी। भूकंप के झटकों और लोगों के हिलने को मैंने बरेली में भी महसूस किया। कहीं-कहीं, कुछ-कुछ बरेली के लोग भी हिले। हिलना लाजिमी था क्योंकि दिल्ली बरेली के बीच दूरी ही कित्ती है!

वैसे भूकंप के झटके तो अब आए हैं किंतु दिल्ली में काफी समय से कुछ-न-कुछ हिल-डुल ही रहा है। खासकर, राजनीति के बीच तो काफी कुछ हिल रहा है। नेता लोग निरंतर एक-दूसरे को झटके दे रहे हैं। कभी बयानबाजी से तो कभी टोपी-तिलक के बहाने। मेरे ख्याल में भूकंप के झटकों का असर नेताओं पर ज्यादा नहीं हुआ। अगर होता तो अब तलक एक-दूसरे के खिलाफ राजनीति शुरू हो गई होती। विरोध की राजनीति करने का एक भी मौका हमारे नेता लोग जाने नहीं देते।

मुझे लगता है, यह समय ही झटकों का है। हर दूसरे-तीसरे दिन कोई-न-कोई अटका-झटका लग ही जाता है। कमाल देखिए, सारे झटकों की मार झेलती जनता ही है। नेता लोग तो बस संसद में बैठकर झटकों पर बहस करते हैं।

महंगाई ने तो झटका देने को अपनी आदत बना लिया है। हर दिन वो कोई-न-कोई झटका देती ही रहती है। कभी आटे के दाम बढ़ जाते हैं तो कभी चीनी के। हां, तेल की कीमतों के कम होने से झटकों में नन्ही-सी राहत जरूर मिली है। मगर यह ऊंट के मुंह में जीरा समान है।

अभी दो रोज पहले सोना-चांदी ने जबरदस्त झटका दिया। ऐसा झटका दिया कि हर कोई चारों खाने चित्त हो गया। जिन्होंने कभी सोचा नहीं था कि सोना-चांदी इत्ता तगड़ा झटका मार सकते हैं, वे भी माथे पर बल डाले उदास बैठे हैं। सोना-चांदी के झटकों ने तो उनकी सोचने-समझने-विचारे की शक्ति तक को क्षीण कर दिया है। पर, क्या कर सकते हैं सब समय-समय की बात है।

वैसे आप मानें या न मानें पर जीवन में झटके जरूरी हैं। ताकि जीवन से जुड़ी कड़वी सच्चाईयों को झटकों के बहाने समझा-जाना जा सके। भूकंप जो झटके देता है, उससे नुकसान तो होता है, पर सीख भी मिलती है कि हम प्रकृति का किस हद तक दोहन करते चले जा रहे हैं। भूकंप के झटके दरअसल प्रकृति का मनुष्य जाति के खिलाफ रिएक्शन है। पर रिएक्शन पर एक्शन हम कम ही ले पाते हैं।

भूकंप के झटकों पर हो-हंगामा दो-चार दिन खूब चलेगा। फिर सब भूल-भाल जाएंगे। सब अपने-अपने काम-धंधों पर लौटकर किसी और झटके को झेलने में लग चुके होंगे। क्या किया जाए यहां हर आदमी कने एक से ज्यादा झटके हैं। उसकी पूरी जिंदगी ही झटकों से ऊबरने में खप जाती है। इसीलिए देख रहा हूं लोग-बाग भूकंप के झटकों पर उस तरह से हैरान-परेशान नहीं हैं, जैसाकि होना चाहिए। शायद उन्हें लगा था कि कुछ हिला है और हिलकर खुद ही ठहर गया। भूकंप बेचारे ने भी सोचा होगा कि बेकार ही उसने यहां लोगों को झटके दिए, इन्हें तो पहले से ही तमाम तरह के झटकों को झेलने की आदत है।

गिरावट के मारे सोना-चांदी बेचारे


गिरने की भी एक हद होती है प्यारे। लेकिन सोने-चांदी ने तो गिरावट की हर हद को ही पार कर दिया। इत्ता गिरे, इत्ता गिरे कि गिर-गिरकर अपना नाम और दाम दोनों को ही डूबो दिया। सोना-चांदी खुद तो डूबे ही साथ में न जाने कित्ते निवेशकों, व्यापरियों, कारीगरों को ले डूबे। देख रहा हूं सब डूब-डाबकर मातम मना रहे हैं। क्यों नहीं मनाएंगे मातम...। मातम तो उन्हें मनाना ही होगा। आखिर सोने-चांदी की चमक ने उनका दिमाग जो सातवें आसमान पर चढ़ाकर रख दिया था। अब जब दोनों खूब-खूब गिर चुके हैं, हर कोई इनसे बचने की सलाह दे रहा है। मगर लालची मन कहां मानने वाला है! आज सब सोने-चांदी की गिरावट पर मातम मना रहे हैं, कल को हो सकता है, बढ़त पर डांस भी करने लग जाएं। इसे ही इंसानी फितरत कहते हैं।

लेकिन यह ठीक ही हुआ। मैं देख करता था, जिनके कने ग्राम दो ग्राम सोना या किलो दो किलो चांदी थी, खुद को किसी धन-कुबेर से कम नहीं समझते थे। सड़क पर यों ऐंठ कर चलते थे मानो उनके सामने सब बौने हैं। रईसीयत उनके भीतर इस हद तक आ चुकी थी कि रुपए दो रुपए की वैल्यू ही नहीं समझते थे। कुछ बोलो तो कहते थे, 'हम सोने-चांदी में खेलने वाले लोग कहां रुपए दो रुपए के झंझट में पड़ें। हमारी औकत इनसे कहीं ज्यादा बड़ी है।' मगर अफसोस आज उन्हें अपनी औकात के भी लाले पड़ गए हैं।

प्यारे वक्त की मार देखो। सोना-चांदी के रईस आज सिर पर हाथ धरे अपनी किस्मत को रो रहे हैं। पीली धातु ने जो घुमकर पलटवार किया है, सब के सब चारों खाने चित्त हैं। मुझे तो डर है कहीं सदमें में न पहुंच जाएं।

कहते हैं, लत चाहे शराब-कबाब की हो या सोने-चांदी की बुरी ही होती है। कब, कौन, कहां पलटी मार जाए किसी का भरोसा नहीं रहता। लोग कहते नहीं थकते थे कि उन्हें खुद से ज्यादा सोने-चांदी की चमक पर भरोसा है। आज सोने-चांदी ने उसी भरोसे को धूल में मिला दिया है। न सिर्फ धूल में मिलाया बल्कि एक ऐसा शूल भी दे दिया जिसकी भरपाई इत्ती जल्दी संभव नहीं।

जो जित्ती तेजी से उठता है वो एक दिन उत्ती ही तेजी से धड़ाम भी होता है, यह नियम है। फिर प्यारे क्यों दुखी हो सोना-चांदी की इस गिरावट पर। अब तलक सोना-चांदी की बढ़त पर मजे लिए अब थोड़े दिन उसकी गिरावट का दर्द भी झेलो। ताकि पता तो चल सके गिरने का दर्द कैसा होता है।

सोने-चांदी की गिरावट पर जिन्हें दुखी होना है वे दुखी होएं या फिर जिन्हें मातम मनाना है वे मातम मनाएं किंतु मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं है। न मेरे कने सोने का भंडार है न चांदी की टकसाल। मेरे कने जो है वो न इनसे छिपा है न उनसे। मैं स्वतंत्र हूं अपनी खुशियों के संग-साथ। सोने-चांदी की चमक में पड़ना खामाखां की टेंशन मोल लेना है। यहां पहले ही टेंशने क्या कम हैं जो अतिरिक्त टेंशन पालूं।

सोने-चांदी से पाई रईसीयत भी क्या रईसीयत होती है। असली रईसीयत तो दिल की होती है। भाव चाहे कित्ता ही गिर जाए मगर दिल की मजबूती नहीं पिघलनी चाहिए।

ध्यान रखियो, सोना-चांदी तो हाथ का मैल हैं। इस मैल से हम जित्ता हो सके उत्ता दूर रहें तो ही अच्छा। वरना तो फिर खुद मालिक...।

जुबान की राजनीति


देखो प्यारे, जुबान और निगाह दोनों में ज्यादा फर्क नहीं होता। दोनों कभी भी, कहीं भी बहक सकती हैं। जुबान और निगाह का बहकना चरित्र में 'श्रीवृद्धि' करने में सहायक होता है। यह आपको दूसरों की निगाह में 'महान' बनाता है। निगाहों के बहकने का फलसफा जित्ता बेहतर आशिक समझते हैं, उत्ता कोई और नहीं समझ सकता। और, जुबान के बहकने का मजा तो राजनीति में रहकर नेता लोग उठा ही रहे हैं। वैसे, अब इसके छींटे साहित्य के दामन पर भी पड़ते नजर आने लगे हैं।

फिलहाल, यहां फोकस केवल जुबान की राजनीति पर रहेगा।

यह सुखद है कि हमारी राजनीति में जुबान के बहाने चर्चा में बने रहने के मामले लगतार बढ़ रहे हैं। हर नेता की यह तमन्ना रहती है कि वो बस जुबान की राजनीति करे। जुबान की राजनीति करने का राजनीतिक लाभ जहां संभव हो वहां उठाया जाए। देखिए, जुबान की राजनीति में नेता के कद का कोई महत्त्व नहीं रहता। कद चाहे जित्ता बड़ा या छोटा हो बस जुबान को बहकाने की प्रैक्टिस होनी चाहिए। जुबान का असर भी कुछ ऐसा रहे कि समाने वाला चारों खाने चित्त हो जाए। उसके साथ हमेशा काटो तो खून नहीं की स्थिति बनी रहे।

इन दिनों जिन नेता जी की जुबान जिस कायदे और लहजे में बहक रही है, उसका अपना ही मजा है। नेता जी जुबान हिला रहे हैं और मस्त सुर्खियां बटोर रहे हैं। हालांकि सियाने उनसे ऐसा न करने को कह रहे हैं पर नेता जी कहां मानने वाले हैं। उन्होंने तो सोच लिया है कि वे बस जुबान की राजनीति ही करेंगे।

यों भी राजनीति में रहकर जुबान की राजनीति करने में कोई बुराई भी नहीं है। यह नेताओं का राजनीतिक अधिकार है। सोचने वाली बात है कि नेता जुबान से राजनीति नहीं करेगा तो फिर भला किससे करेगा? कुछ नेताओं की कुर्सी ही जुबान के सहारे चल-फिर रही है। इसमें उन्हें परम-आनंद की अनुभूति होती है।

वैसे नेता जी जिन नेता जी पर जुबानी फिकरे कस रहे हैं, कभी वे उनके लंगोटिया यार हुआ करते थे। पर, राजनीति में कहां एक-दूसरे के लंगोट की फिक्र की जाती है। यहां तो हम दम हर किसी की यह कोशिश रहती है कि सामने वाले की लंगोट जित्ता जल्दी हो उत्ता जल्दी उतर या उतार ली जाए। इसमें शालीनता और अश्लीलता का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला हिसाब होता है यहां।

फिर भी अगर कोई राजनीति के बीच शुचिता या समानता के ख्वाब देखता है तो उसे मेरी सलाह कि वो यह न देखे क्योंकि राजनीति का स्तर अब जुबान केंद्रित हो चला है।

यही सब देख-सुनकर मैं हमारी राजनीति और हमारे नेताओं को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेता। बस उनके कहे-बोले का आनंद लेता रहता हूं। क्योंकि मुझे मालूम है कि वे सुधरेंगे नहीं और मैं उनको सुधरने के तईं बोलूंगा नहीं। तो फिर क्या फायदा ऐवईं अपने दिमाग को खोटी करने में! जहां, जिसकी, जैसी जुबान बहक रही है उसे बहकने दें और घर बैठे आनंद लें।

बस इत्ता ध्यान रखिए, जुबान की राजनीति में किसी का कोई सगा नहीं होता। दरअसल, अब यही राजनीति का 'वास्तविक तकाजा' भी है।

रविवार, 28 अप्रैल 2013

जियो प्यारे गेल

प्यारे क्रिस गेल, सचमूच तुम कमाल हो। क्या कमाल का धमाल मचाते हो। तुम्हारे इस धमाल पर मेरा दिल फिदा है। तुम्हारे करिशमाई खेल, तुम्हारे शांत व्यवहार को देखकर बेहद तसल्ली मिलती है। कित्ती सरलता से तुम खेलते हो। चाहे चौका जड़ो या छक्का रहते फिर भी कूल हो। बस हल्की-सी हंसी चेहरे पर लाकर अपनी खुशी का इजहार कर देते हो। तुम्हारी होठों पर हंसी के बीच तुम्हारे दांत मोतियों जैसी चमकते हैं।

अभी दो रोज पहले की ही तो बात है। क्या धांसू खेले तुम। तुम्हारे बल्ले ने चौकों-छक्कों से नीचे बात ही नहीं की। एक ही पारी में 17 छक्के और 13 चौके जड़कर तुमने क्रिकेट के धुरंधर वरिष्ठों को भी पीछे छोड़ दिया। नाबाद 175 रन ठोके, वो भी पूरी मस्ती के साथ। चेहरे पर कोई चिंता न लाए हुए।

तुम्हारे शांत चेहरे, शांत खेल को देखकर लगता है कि क्रिकेट ऐसे ही शांत मूड में खेला जाना चाहिए। पता नहीं खिलाड़ी लोग क्यों एक-दूसरे पर चौड़े या आक्रोशित होते रहते हैं।

प्यारे गेल, तुम्हारी खुश का इजहार करने का ढंग, डांस के साथ, मुझे बेहद पसंद आता है। मैदान पर तुम्हारा हल्का-फुल्का डांस कित्ता लाजवाब होता है। अक्सर मन करता है तुम्हारे अद्भूत डांसिंग स्टेप्स को फोलो करने का। खेल के साथ-साथ डांस का लुत्फ तुम्हीं ने लेना सिखाया है।

जिनके बल्ले में होगी आग वे अपनी आग अपने पास रखें मगर तुम्हारे बल्ले में आग नहीं तूफान है। एक मीठा तूफान। जिसकी गिरफ्त में आकर हर कोई तृप्त हो जाना चाहता है। ऐसा तृप्त करने का हुनर बहुत कम खिलाड़ियों में होता है।

तुम्हारे खेल को देखकर अक्सर मुझे महसूस होता है कि खेल ऐसा ही होना चाहिए। क्रीज पर खड़े-खड़े ही तुम आतिशी कमाल कर देते हो। फिर यह कमाल धमाल में बदल जाता है। उस दिन क्या मैदान, क्या घर, क्या दफ्तर हर कोई तुम्हारी आतिशी बल्लेबाजी के संगीत में डूबा जा रहा था। केवल बल्ले से संगीत तुम बजा रहे थे और मगन हम हुए जा रहे थे। गेंदबाज तो लग रहा था कि तुम्हारे बल्ले का मुरीद ही हो गया हो जैसे। गेंद फेंकने के बाद देख ही नहीं पा रहा था कि गेंद जा किधर रही है। कई दफा तो तुमने गेंद को मैदान ही लांघवा दिया था। उस दिन तो बेचारी गेंद भी तुमसे पनाह मांग गई होगी प्यारे गेल।

मैदान पर आज तलक धोनी ने भी इत्ता नहीं धोया होगा, जित्ता प्यार से तुम धोते हो। धोते हो तो बस धोते ही चले जाते हो। सामने वाले को मौका भी नहीं देते धुलाई के बाद सुस्ताने का। इत्ती मस्त ऐनर्जी कहां से पाई है तुमने प्यारे गेल।

सोचा रहा हूं, एक दफा तुम्हें अपने शहर में बुलाऊं। तुम्हारा आदर-सत्कार करवाऊं। युवाओं को बताऊं कि अगर खेलना है तो क्रिस गेल के जैसा खोलो वरना मत खेलो। खेल में पेशेंस का दामन कभी न छोड़ो, जैसाकि गेल में है।

प्यारे गेल, तुम्हारे खेल के आगे हर आग फेल है। तुम तो फुल इंटरटेनर हो।

मेरी दुआ है, तुम ऐसे ही खेल के सहारे धमाल मचाते रहो। तुम्हारे धमाल के साथ शायद क्रिकेट का रंग-ढंग कुछ और बदले; ऐसी मुझे उम्मीद है।

जियो प्यारे क्रिस गेल।

भाग मुशर्रफ भाग

भागना कोई बुरी बात नहीं। दुनिया में हर कोई किसी न किसी कारण भाग ही रहा है। कोई दर्द से मुक्ति पाने के लिए भाग रहा है, कोई पत्नी से बचने के लिए भाग रहा है, कोई पैसा कमाने के लिए भाग रहा है, कोई नेता बनने के लिए भाग रहा है, कोई पुरस्कार पाने के लिए भाग रहा है तो कोई सिर्फ इसीलिए भाग रहा है क्योंकि भागना उसकी नियति है। 

अब उस दिन अगर मियां मुशर्रफ गिरफ्तारी के डर से भागे तो क्या गलत भागे! न भागते तो तुरंत गिरफ्तार होकर अपनी बदनामी ही कराते। न भागते तो पूरी दुनिया को पता कैसे चलता कि मियां जनरल मुशर्रफ भाग भी सकते हैं। भागना तो मियां मुशर्रफ की आदत में शुमार है।

हालांकि मियां मुशर्रफ का भागना उन्हें ज्यादा राहत नहीं दे पाया। बाद में वे धर ही लिए गए लेकिन एक मिसाल तो कायम हो गई न जरनल के भागने की। मियां मुशर्रफ का भागना फिलहाल इतिहास में दर्जा पा गया है। अब दुनिया-समाज-विपक्ष-दुश्मन चाहे कुछ कहते, चाहे कुछ समझते रहें।

मियां मुशर्रफ को भागने की पुरानी प्रेक्टिस है। हालांकि जब तलक वे पाकिस्तान के राष्ट्रपति बनकर रहे, तब तलक उनने लोगों को खूब भगाया। भगा-भगाकर खूब परेशान किया। लेकिन जैसे ही उनके नीचे से राष्ट्रपति की कुर्सी सरकी, वैसे ही वे यहां-वहां भागते नजर आए। भागकर तकरीबन चार साल बाहर रहे। मगर वतन लौटते ही गिरफ्तारी के डर से फिर से भागना पड़ा। लेकिन यह भागना भी कोई भागना था। भागकर जाते कहां अपने ही फार्म हाउस में नजरबंद कर लिए गए मियां मुशर्रफ। हाय...।

कहते हैं, बड़े नसीब वाले होते हैं भागने वाले। भागने वालों का भाग्य बहुत तेजी से बदलता। प्रसिद्धि उन्हें बहुत जल्दी मिलती है। दुनिया उन्हें तुरंत पहचान लेती है। भागने वालों के नाम के आगे 'भगोड़ा' लग जाए फिर तो बात ही क्या है। सुना है, एक मामले में मियां मुशर्रफ भी 'भगोड़ा' शब्द से नवाजे जा चुके हैं। कोई नहीं..कोई नहीं.. 'भगोड़ा' कोई गाली थोड़े होता है। 'भगोड़ा' तो उसे कहते हैं, जो भागने में उस्ताद हो, जैसे मियां मुशर्रफ।

मेरा दवा है, मियां मुशर्रफ ने अगर पाकिस्तान में भागने-भगाने का ट्रेनिंग सेंटर खोला होता तो बहुत चलता। यों भी, आजकल के आदमी की पहली चाहत भागकर सबकुछ पाने की रहती है। और मियां मुशर्रफ ठहरे पुराने 'भगोड़े'। पाकिस्तानी आवाम को कम से कम यह हुनर तो मियां मुशर्रफ से सिखना ही चाहिए था।

सुना है, मियां मुशर्रफ काफी परेशान हैं। दीवारों के बीच कैद होकर रह गए हैं। जिस राजनीतिक खेल को खेलने वे वापस पाकिस्तान लौटे थे, उसमें पलीता लग चुका है। अब न उनके हाथ सत्ता की हनक रही न जरलन की पदवी। उनका गुरूर सिमटकर नजरबंदी में तब्दील हो गया है। अब तो यहां-वहां भागने से भी कुछ हासिल नहीं।

मियां मुशर्रफ के साथ हुआ तो जैसे को तैसा ही है। बे-कारण मुल्क और आवाम को भगाने वाला आज खुद ही भागने के इल्जाम में अंदर है। वैसे मियां मुशर्रफ ने भारत के अंदर भी उछल-कूद कुछ कम नहीं की है। इसके लिए उन्हें मुंह की भी खानी पड़ी है। बची-कुची अब अपनी जेल के अंदर खा रहे हैं।

नजरबंद मियां मुशर्रफ अब देखते हैं भागकर कहां जाते हैं। खबर है, उनके भागने पर अब सख्त पाबंदी लग चुकी है। बढ़िया है। चलो कुछ दिन तो मियां मुशर्रफ अपने भागने की थकान को जेल के भीतर मिटा सकेंगे। बाकी उनके खुदा पर निर्भर।