शनिवार, 21 दिसंबर 2013

बहकने के बहाने

चित्र साभारः गूगल
प्यारे, बहकने की कोई उम्र नहीं होती। उम्र के किसी भी पड़ाव या मोड़ पर बहका जा सकता है। बहकने के लिए सेलिब्रिटी होना अवश्यक नहीं है। हां, बहक कर आप सेलिब्रिटी की श्रेणी में जरूर आ सकते हैं। बहका हुआ बंदा जब सेलिब्रिटी की श्रेणी में आता है तो वो मशहूर नहीं बल्कि महान हो जाता है। उसकी महानता के चर्चे जगह-जगह होते हैं। मीडिया से लेकर मार्केट तक में उसको हीरो बनाकर पेश किया जाता है। वो कैसे, क्यों और किस कारण बहका इस पर बहस होती है। इस बहस में सबसे अधिक प्रतिशत घोषित नैतिकतावादियों और शुचितावादियों का ही रहता है। रही-सही कसर संस्कृति-रक्षक पूरी कर देते हैं।

बहकना किसी एक निश्चित वस्तु, चीज या पदार्थ पर निर्भर नहीं करता। किसी भी क्षेत्र या चीज में बहकने की स्वतंत्रता आपके कने होती है। जैसे-जैसे समय बदलता है, बहकने के अंदाज भी बदलते रहते हैं। बदलना चाहिए भी। नहीं हो तो एक जैसा बहकना यथास्थितिवादी का प्रयाय बन जाएगा। ज्यादातर किस्से सुनाई व पढ़ाई में पीकर बहकने के ही सामने आते हैं। लेकिन ऊंचे या बुद्धिजीवि टाइप के लोग पीकर जब बहकते हैं, तो उसका रंग-ढंग ही कुछ और होता है। न न वे पीकर किसी नाली या नाले में नहीं लुढ़कते बल्कि 'दिललगी' का शिकार हो जाते हैं। यकायक जवानी उन्हें दीवाना बना देती है। जवानी पर बहकते वक्त वे उम्र का नहीं केवल खुमारी का ख्याल रखते हैं। खुमारी में की गईं हरकतें उन्हें जिंदगी का खूबसूरत एहसास-सा लगती हैं। लेकिन जब खुमारी के तेवर ढीले पड़ते हैं, तो मियां कोर्ट-कचहरी में उलझे नजर आते हैं।

मानना पड़ेगा कि बुढ़ापा बुरी चीज होती है। किसी को भी नहीं आना चाहिए। जिंदगी की रंगीनियत एवं रोमानियत बुढ़ापे के बीच कसमसा कर रह जाती हैं। मगर फिर भी बुढ़ापे में बंदा दांव खेलने से नहीं चूकता। अब तो मेडिकल सांइस ने इत्ती तरक्की कर ली है कि बुढ़ापे में भी बूढ़ेपन का एहसास नहीं होता। शरीर और सेहत हर वक्त उत्साहित व उत्तेजित ही रहते व दिखते हैं।

देखिए न, एक बाबा जी ने तो बुढ़ापे की काट के लिए तमाम प्रकार की पौरूष-बर्द्धक औषद्यियों का प्रयोग खुद पर ही किया। और भरे-पूरे बुढ़ापे में जो कमाल किए, हम सब के सामने हैं। हालांकि किए प्रयोगों की कीमत उन्हें जेल के भीतर रहकर चुकानी जरूर पड़ रही है लेकिन बुढ़ापे को धोखा तो दे ही दिया न। इस खेल में जित्ते बड़े खिलाड़ी बाप रहे, उत्ता ही उनका बेटा भी। फिलहाल, दोनों जेल के भीतर हैं।

न जाने ऐसा क्या हो गया है कि पचास साल पार लोग खूब बहक रहे हैं। न सिर्फ बहक रहे हैं बल्कि अपने बहकने को 'जस्टिफाई' भी कर रहे हैं। बाबा तो चलो भगवानत्त्व में बहके लेकिन संपादक महोदय और जज साहेब का क्या? आखिर ये दोनों तो बुद्धिजीवि वर्ग में आते हैं न! बताइए, जब बुद्धिजीवि ही ऐसे बहकेगा तो फिर साधारण वर्ग का क्या होगा प्यारे।
संपादक महोदय तो अब भी कह रहे हैं कि यह बहका-बहकी दोनों की सहमति से हुई। उन्हें राजनीति के तहत फंसाया गया है। खैर, जो हो। फिलहाल मियां बहकने की कीमत चुका रहे हैं।

कहिए कुछ भी पर बहकने के लाभ ही लाभ हैं। बहकना अब बदनामी की श्रेणी में नहीं आता। बदनाम होकर मिलने वाले नाम का मजा ही कुछ और होता है। बुढ़ापे में हासिल हुईं ये 'फौरी बदनामियां' हैं, पर इनका लाभ लंबा है। जो इन बदनामियों को झेल गया, समझो तर गया।

अंदर की बात बताऊं, कभी-कभी मेरा दिल भी करता है बहकने का, पर डरता हूं, कहीं इज्जत का फलूदा न बन जाए। बाबा और संपादक महोदय तो झेल गए मगर मैं कैसे झेल पाऊंगा। बहकने और बदनामी का स्वाद चखने के लिए कलेजा चाहिए होता है परंतु मैं तो छिपकली के नाम मात्र से ही डर जाता हूं। बहक कैसे सकूंगा। लेकिन फिर भी कोशिश करूंगा कि बहक जाऊं बाकी बाद में जो होगा देखा जाएगा प्यारे।

बादाम खाकर बुद्धिजीवि

चित्र साभारः गूगल
इन दिनों मैं बादाम खूब खा रहा हूं। न न दिमाग या सेहत बनाने के लिए बल्कि बुद्धिजीवि बनने के लिए। बाकी तो मैं सबकुछ हूं बस बुद्धिजीवि ही नहीं हूं। बीते पखवाड़े मुझको एक परम-ज्ञानी ने बतलाया था कि रोज सुबह-शाम पांच-सात बादाम खाओगे तो जल्द ही बुद्धिजीवि बन जाओगे। सो खा रहा हूं।

दरअसल, बुद्धजीवि बनना अब मेरे तईं बेहद जरूरी हो गया है। मैं बुद्धिजीवियों के मोहल्ले में रहता हूं। मेरे मोहल्ले में एक से बढ़कर एक शानदार किस्म के बुद्धिजीवि हैं। उनकी बुद्धिजीविता का जवाब नहीं। हर मामले में ऐसा बुद्धि-ज्ञान देते हैं, मानो उनकी बुद्धि केवल उनके ही इशारों पर नाचती हो। मैं अक्सर उनकी बुद्धिजीविता के आगे बौना साबित हुआ हूं। हालांकि मैं लेखक हूं, यह उन्हें मालूम है, मगर फिर भी वे मुझे बे-बुद्धि ही समझते हैं।

उनका मुझे दुत्कारना कुछ मायनों में सही भी है। क्योंकि मैंने देखा है, लेखन और साहित्य के क्षेत्र में परम-बुद्धिजीवियों की ही पूछ है। अगर वो बुद्धिजीवि वरिष्ठ है, तो फिर कहना ही क्या। वरिष्ठ बुद्धिजीवि यों भी अपनी बुद्धिजीविता को लेकर हर वक्त ऐंठा हुआ सा रहता है। उसे यकीन रहता कि इस संसार में उस जैसा काबिल बुद्धिजीवि कोई दूसरा हो ही नहीं सकता। साहित्य के क्षेत्र में वरिष्ठ बुद्धिजीवियों का दखल किसी गब्बर सिंह से कम नहीं होता। मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि वरिष्ठ बुद्धिजीवि न केवल बादाम खाता है बल्कि बादाम की मालिश भी करवाता है। इसीलिए वरिष्ठों के चेहरे चमकते-दमकते रहते हैं।

जीवन में मैंने कई बार कोशिशें की कि किसी वरिष्ठ की किरपा मुझ पर हो जाए। मेरा भी साहित्यिक भाग्य चमक जाए। मैं भी उनके साथ एक मंच पर आकर खड़ा हो सकूं। लेकिन ऐसा कहीं कुछ संभव नहीं हुआ। मुझे गले लाना तो दूर पास बैठालने तक को कोई राजी नहीं हुआ। जिसके मोहल्ले में इत्ते बुद्धिजीवि रहते हों, उसे ही बुद्धिजीवियों का स्नेह न मिले, है न दरिया में डूब मरने की बात। लेकिन मैं खामाखां दरिया में डूब भी नहीं सकता क्योंकि पत्नी का डर मेरे आगे आ जाता है।

मैं बादाम खाकर बुद्धिजीवि बनने की कोशिश भले ही कर लूं लेकिन पत्नी के डर को भगाने का कोई उपाय मेरे कने नहीं है।

इधर देखने-सुनने में आया है कि बुद्धिजीवि लोग अब दूसरे कामों में हाथ आजमाने लगे हैं। मसलन, कोई छेड़ा-छाड़ी की प्रक्टिस में लगा है, तो कोई बाबा के बचाव में। रात-दिन स्त्री-स्वतंत्रता का नारा बुलंद करने वाले भी बहती गंगा में हाथ धोने को उतावले हुए जा रहे हैं। मैं तो इन ऊंचे बुद्धिजीवियों का लाइफ-स्टाइल देखकर ही अक्सर अचंभे में पड़ जाता हूं। इन बुद्धिजीवियों के पास जाना तो दूर छूने में भी डर लगता है कि कहीं मैले न हो जाएं। देखते ही देखते बुद्धिजीवियों ने अपनी रंगत कित्ती बदल ली है।

जरूर ये ऊंचे बुद्धजीवि बादाम के साथ-साथ कुछ सेहत-बद्धक भी खाते होंगे।

हालांकि इनके टाइप जैसा बुद्धिजीवि मैं दस जन्म में भी नहीं बन सकता पर जो बन सकता हूं उसके प्रति तन-मन-धन से प्रयत्नरत हूं। मैं बस इत्ता चाहता हूं कि लोग मुझे बुद्धिजीवि कहकर बुलाएं-पुकारें। मेरे जाने के बाद मेरे नाम के साथ बुद्धिजीवि शब्द का प्रयोग करें। मेरे लिए बुद्धिजीवि बनना ठीक वैसा ही है, जैसे गधे के सिर पर सींग का उग आना।

परम-ज्ञानी महोदय की बात मानते हुए अब तलक कित्ते बादाम खा चुका हूं मैं खुद नहीं जानता। मगर बादाम खाने से पीछे नहीं हटूंगा। चाहे उधार लेकर ही क्यों न खाना पड़े। जब चचा गालिब उधार की पी सकते थे, तो फिर मैं क्यों नहीं...?

बादाम खाकर बुद्धिजीवि बना जा सकता है, इसे मैं साबित करके ही दम लूंगा। हरिबोल।

आप वालों के नाम एक खत

चित्र साभारः गूगल
प्रिय आप वालों,

माल करते हैं आप। एक जरा-सी सरकार नहीं बना पा रहे दिल्ली में। जब भी सरकार बनाने की बारी आती है, आप या तो ससुराल वालों की तरह शर्तें गिनाने बैठ जाते हो या फिर राय सहाबों की तरह जनता की राय लेने का बहाना बना देते हो। लेकिन सरकार बनाने की पहल फिर भी नहीं करते। साफ-साफ बताओ न क्या सरकार बनाने से डरते हो या फिर जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा जैसी उलझन में हो। क्यों...?

देखो मियां, मैंने अपनी जिंदगी में तमाम तरह के शेखचिल्लियों को ऊंची-ऊंची छोड़ते देखा-सुना है, क्या आप भी उन्हीं में से हो! क्योंकि जिस दिन से मैंने आपको देखा-सुना है, सिवाय ऊंची छोड़ने के आप ने कुछ खास नहीं किया है। जनलोकपाल पर आपने ऊंची छोड़ी। भ्रष्टाचार पर आपने ऊंची छोड़ी। बिजली-पानी-व्यवस्था पर आपने ऊंची छोड़ी। जीत के तुरंत बाद ऊंची छोड़ी कि न किसी दल को समर्थन देंगे, न लेंगे। साथ-साथ, अण्णा से असहमति जतलाते हुए ऊंची छोड़ी। ऐसे कब तलक ऊंची-ऊंची छोड़ते रहोगे मियां। अब जब जनता के वास्ते कुछ करने का मौका आया तो कह रहे हो कि पहले जनता की राय ले लें। कहीं ऐसा न हो राय लेते-लेते राय का रायता फैल जाए। और फिर सिमटाए न सिमट पाए।

जनता ने आपको अठ्ठाइस सीटें दिलवा कर अपनी राय बतला तो दी, अब राय लेने को क्या बचता है? उधर, कांग्रेस भी खुलकर समर्थन करने को तैयार है, फिर भी, आप आशिक की तरह कशमश में हो कि आइ लव यू कहूं या न कहूं। मियां, जब ओखली में सिर दिया है, तो मूसलों से क्या डरना?

ज्ञानी बतलाते हैं कि ज्यादा ज्ञान या ज्यादा राय समझिए बवाल-ए-जान। इस बवाल-ए-जान के चक्कर में न पड़िए, जनता को उसका हक दिलवाइए। और, दिल्ली के साथ-साथ पूरे देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कीजिए। सुना था कि आपने मात्र छह महीनों में ही तस्वीर बदल देने का दावा ठोंका था। लेकिन यहां तस्वीर बदलना तो दूर ठीक से आइना देखने-दिखाने में ही आप बिदक रहे हो।

आखिर आपकी पोलिटिक्स क्या है मियां।

मियां, राजनीति में रहकर तो बड़े-बड़े फैसले लेने पड़ते हैं। बड़े-बड़े लोगों से मिलना पड़ता है। बड़ी योजनाएं-परियोजनाएं बनानी पड़ती हैं। तो क्या इस सब के लिए भी आप बार-बार जनता की राय लेने उनके बीच जाएंगे? फिर तो बड़ी मुश्किल जाएगी। जनता का तो आधे से ज्यादा वक्त आपको राय देने में ही जाया हो जाएगा। फिर जनता कैसे खाना बना पाएगी। कैसे दफ्तर जा पाएगी। कैसे बच्चों को पढ़ा पाएगी। कैसे घर-परिवार चला पाएगी। क्यों खामखां जनता को डिस्टर्व कर रहे हैं। अपना फैसला आप ही लेने का हौसला लाइए। अब आप बच्चे थोड़े हैं!

क्या आपको नहीं लगता कि आपने शुद्धता और शुचितावाद का नारा कुछ ज्यादा ही बुलंद कर दिया है। दरअसल, आज के जमाने में शुद्धता और शुचिता का मिलना बड़ा कठिन हो गया है मियां। मैं अक्सर शुद्धता से दूर भागता हूं। न शुद्ध चीज खाता हूं न शुचितासंपन्न लोगों से मिलता हूं। जब तलक चीज या व्यक्ति में मिलावट न हो मुझे मजा ही नहीं आता। क्या करूं, मेरी जीभ और व्यवहार का स्वाद जो बदल गया है। इसलिए आप से भी कह रहा हूं, ज्यादा शुद्धता और ईमानदारी के चक्करों में न पड़िए आराम से दिल्ली में सरकार बनाइए। दिल्ली वालों को उनका हक उन्हें दिलवाइए। बात-बात में राय की बंदूक जनता के कंधों पर लादना छोड़कर इसे अब अपने कंधों पर ही रखिए। क्या समझे...।

शनिवार, 12 अक्तूबर 2013

अमेरिका में तालाबंदी बनाम प्रगतिशीलों की खुशी

चित्र साभारः गूगल
मेरे मोहल्ले के प्रगतिशील आजकल घी के दीए जला रहे हैं। दीवाली से पहले ही आतिशबाजी छोड़ रहे हैं। सबके चेहरों पर चमक है। दिल खोलकर सब एक-दूसरे को बधाईयां दे रहे हैं। न न ये बधाईयां या खुशियां मोहल्ले में 'लल्ला' होने की नहीं बल्कि अमेरिका में तालाबंदी की हैं। अब यह बतलाने की जरूरत नहीं कि अमेरिका और प्रगतिशीलों के बीच कित्ते का आंकड़ा है। अमेरिका में चाहे तालाबंदी हो या हदबंदी मेरे मोहल्ले के प्रगतिशील बेहद खुश होते हैं। इत्ता खुश कि उनकी खुशी सिमटाए नहीं सिमटती।

हालांकि मैं मोहल्ले के प्रगतिशीलों की मंडली से दूर ही रहता हूं मगर नजर पूरी रखता हूं। इसलिए नहीं कि मैं उनका 'भेदिया' हूं बल्कि इसलिए कि उनकी 'कथनी-करनी' की हकीकत से वाकिफ हो सकूं। एक मेरे मोहल्ले के ही नहीं, मैंने तो साहित्य-समाज-राजनीति के बीच न जाने ऐसे कित्ते वाम-प्रगतिशील देखे-सुने हैं, जो कथनी में कुछ और करनी में कुछ होते हैं। जिन्हें केवल अपना कहा, अपना बोला, अपना लिखा ही 'श्रेष्ठ' लगता है बाकी सब 'बकवास'।

आजकल मोहल्ले के प्रगतिशील लगभग हर रोज चौपाल जमा रहे हैं। चौपाल में जमकर अमेरिका की नीतियों को गरियाया जाता है और मार्क्स के सिद्धांतों को अपनाने की तकरीरें चलती हैं। अति-उत्साही प्रगतिशील लगे हाथ बाजारवाद पर भी हाथ साफ कर लेते हैं। कहते हैं, भारत में बाजारवाद का जन्म अमेरिका के कारण ही हुआ है। अतः अमेरिका दोषी है।

असल में, प्रगतिशील उत्ते भोले होते नहीं, जित्ता दिखने-बनने की कोशिश करते हैं। बेशक विरोध वे अमेरिका का कर लें लेकिन अमेरिका से मिलने वाले सम्मान-पुरस्कार को लेने उलटे पैर दौड़ पड़ते हैं। तब उन्हें न खराब अमेरिकी नीतियां नजर आती हैं, न बाजारवाद का प्रेत परेशान करता है। फिर मार्क्स की बातें-सिद्धांत सब धूल खाते नजर आते हैं।

मियां, जब घोषित वाम-प्रगतिशीलों ने ही मार्क्स को दर-किनार कर दिया फिर अमेरिका क्यों उन्हें मानें?

देखो प्यारे, अमेरिका में तालाबंदी की बहुत-सी वजहें हैं। जो वजहें हैं उनसे अमेरिकी सरकार निपटे या ओबामा, वाम-प्रगतिशील क्यों माथे पर बल डाले हुए हैं। लेकिन, अमेरिका के मामले में प्रगतिशीलों को अपने माथे पर बल डालने में मजा आता है। वे यह दिखाना चाहते हैं कि हम दुनिया की कित्ती फिकर करते हैं। बाजारवाद-पूंजीवाद-पश्चिमी-सभ्यता कैसा आर्थिक नुकसान कर रही है, ये मरोड़े हर वक्त उन्हें परेशान किए रहती हैं। यही वजह है कि ज्यादातर प्रगतिशीलों के पेट का हाजमा खराब रहता है। न सुख उनसे पचता है, न बाजार, न विकास, न पूंजी।

यह तो चलो अमेरिका है, प्रगतिशीलों को अपने देश में कौन-सा अच्छा लगता है। यहां भी वे रह-रहकर अपनी ढपली, अपना राग अलापते रहते हैं। अव्वल तो उन्हें मंच मिलता नहीं मगर जब मिलता है, तो सिवाय पूंजी, बाजार और अमेरिका की बुराई के उन्हें कुछ नहीं सूझता। मुझे याद नहीं पड़ता कि आज तलक किसी प्रगतिशील ने किसी बात या विकास को 'अच्छा' कहा हो। मुंह बिगाड़े रखने की आदत-सी पड़ गई है उन्हें।

बात चुभेगी किंतु है सत्य। वामवादियों ने ही मार्क्स को जन और विचार से दूर किया है।

फिलहाल, मेरे मोहल्ले के प्रगतिशील अपनी चौपालों में यही दुआ मना रहे हैं कि अमेरिकी तालाबंदी का असर देर तलक रहे ताकि दुनिया को सबक मिले। यह मैं नहीं जानता कि अमेरिकी तालाबंदी से दुनिया कित्ता सबक लेगी मगर हां प्रगतिशीलों को समझना चाहिए कि किसी की मजबूरी या तकलीफ में तालियां नहीं बजाते। कम से कम मार्क्स ने तो ऐसा नहीं बताया या लिखा होगा।

वैसे, प्रगतिशीलों को अमेरिका की चिंता छोड़, अपने देश की फिकर करनी चाहिए। क्या नहीं...?

गुरुवार, 10 अक्तूबर 2013

साहित्य के नोबेल की खातिर

चित्र साभारः गूगल
अपने मोहल्ले का मैं एक मात्र 'बड़ा लेखक' हूं। इस नाते मोहल्ले के प्रत्येक घर में मेरी खूब पूछ है। मोहल्ले वाले मेरा ही नाम लेकर जागते व सोते हैं। एक तरह से मैं उनका 'गॉडफादर' हूं। देखा-दाखी, आस-पड़ोस के मोहल्लों में भी मुझे आयोजन व गोष्ठियों में बुलाया जाता है। बेहद ध्यान से लोग मुझे सुनते हैं और तालियां बजाते हैं। केवल अपनी काबिलियत के दम पर ही मुझे साहित्य के तमाम बड़े-छोटे पुरस्कार मिल चुके हैं। बता दूं, मिलता हुआ सम्मान या पुरस्कार मैं कभी छोड़ता नहीं। सम्मान या पुरस्कार के वास्ते अगर 'जुगाड़' भी बैठानी पड़े, तो कभी पीछे नहीं हटता। न ही कभी यह देखता हूं कि सम्मान या पुरस्कार दे कौन रहा है।

दरअसल, मैं उन सियाने लेखकों में से नहीं हूं, जो पुरस्कार लेने के बाद लौटाने की नौटंकी करते हैं। या फिर विपरीत विचाराधारा वाले व्यक्ति से लेना पसंद नहीं करते। चूंकि मैं विचाराधारा या व्यक्ति को कतई तरजीह नहीं देता इसलिए ऐसे नाटक-नौटंकियों से बचा रहता हूं।

फिलहाल, मेरे मोहल्ले में से आवाज उठी है कि इस बार साहित्य का नोबेल मुझे ही मिलना चाहिए। साहित्य के नोबेल के वास्ते मैं एकदम 'परफैक्ट लेखक' हूं। मोहल्ले वालों ने मुझसे वायदा किया है, चाहे जमीन-आसमान एक क्यों न करना पड़े, इस दफा साहित्य का नोबेल मुझे दिलवाकर ही दम लेंगे। मैं मेरे मोहल्ले वालों की भावनाओं एवं दृढ़-इच्छाशक्ति का पूरा सम्मान करता हूं। साथ ही, मैं उन्हें यकीन दिलाता हूं कि साहित्य का नोबेल लेने के वास्ते 'जुगाड़' में कोई कसर बाकी नहीं रख छोड़ूंगा। चाहे नोबेल पुरस्कार बांटने वाली जूरी की जेब ही क्यों न गर्म करनी पड़े! हरिबोल।

अमां, लेखक-साहित्यकार टटपूंजिए से पुरस्कारों के वास्ते जाने क्या-क्या, कैसी-कैसी जोड़-जुगाड़ बैठा लेते हैं अगर मैं साहित्य के नोबेल लिए जुगाड़ में लगा हूं, तो क्या गलत कर रहा हूं? गलत से ही सही का रास्ता प्रशस्त होता है। क्या समझे...।

वैसे, मुझे अपनी तारीफ करने में कभी शर्म महसूस नहीं होती। इसलिए पुनः कह रहा हूं कि साहित्य का नोबेल मुझे ही मिलना चाहिए। इत्ता बड़ा लेखक हूं। दर्जनों के हिसाब से मेरी किताबें हैं। बोरी भरके सम्मान-पुरस्कार हैं। स्कूलों-कॉलेजों के कोर्स में मुझे पढ़ाया जाता है। देश के साहित्यिक हलकों के मध्य मेरी पूछ व पहुंच है। ऊंचे नेता से लेकर बड़े अफसर तक मेरा मिलना-जुलना है। तमाम पुरस्कार मेरे नाम पर चल रहे हैं। माता-पिता एवं अध्यापक बच्चों को मेरे जैसे बनने और मेरे बताए-समझाए रास्तों पर चलने को प्रेरित करते हैं। न केवल अपने मोहल्ले में बल्कि नाते-रिश्तेदारों के बीच मैं 'पूजा' जाता हूं।

अब आप ही बतलाइए कि मुझे जैसे इत्ते बड़े व महान लेखक को साहित्य का नोबेल क्यों नहीं मिलना चाहिए? साहित्य का नोबेल मुझे देकर नोबेल का ही मान बढ़ेगा। यों भी, मुझ जैसे ख्यातिलब्ध लेखक अब मिलते ही कहां हैं?

बहरहाल, पूरे जोश के साथ मेरी और मोहल्ले वालों की कोशिशें जारी हैं साहित्य के नोबेल के वास्ते। जाहे कैसे भी दंद-फंद इस्तेमाल क्यों न करने पड़ें पर साहित्य का नोबेल चाहिए ही चाहिए। एक दफा साहित्य का नोबेल मेरी झोली में आन गिरा न, तो मैं 'इंटरनेशनल लेखक' हो-बन जाऊंगा। अरब की खाड़ी से लेकर बंगाल की खाड़ी तलक मेरा नाम ही नाम होगा। साहित्य के जित्ते भी अरिष्ठ-वरिष्ठ-गरिष्ठ लेखक-साहित्यकार हैं, सब मेरे आगे पानी भरेंगे। फिर मेरा रूतबा ही कुछ और होगा प्यारे।

बस, इंतजार कीजिए मेरे नाम की घोषणा होने का। हरिबोल।

बुधवार, 9 अक्तूबर 2013

एक बीमार आदमी की व्यथा-कथा

चित्र साभारः गूगल
अमूमन मैं बीमार नहीं पड़ता। शायद बीमारी मेरे कने आने से घबराती है। लेकिन जब बीमार पड़ता हूं, तो बीमारी की खबर सिर्फ अपने तक ही सीमित रखता हूं। क्योंकि मुझे मालूम है नाते-रिश्तेदार बीमारी में भी मुझे चैन नहीं लेने देंगे। बीमारी पूछ-पूछकर, हाल-चाल ले-लेकर मेरा वो हाल करेंगे कि मैं ठीक होकर भी बीमारी ही लगूं-दिखूंगा।

बहरहाल, इस दफा यही हुआ। इत्ता एतियात रखने के बावजूद मेरी बीमारी की खबर लीक हो गई। लीक होते ही तुरंत ब्रेकिंग न्यूज बन गई। अभी मैं अपनी बीमारी को ठीक से जान-समझ भी न पाया था कि नाते-रिश्तेदारों के सांत्वना संदेशों की झड़ी लग गई। और, सांत्वना संदेश भी ऐसे-ऐसे कि अगर मुर्दा सुन ले तो उठकर बैठ जाए। सांत्वना संदेशों के साथ-साथ मिलती हिदायतों ने तो मेरी बीमारी को और भी पेचीदा बना दिया। कुछ समय तलक तो मैं यह ही तय नहीं कर पाया कि बीमारी को लेकर डॉक्टर कने जाऊं या फिर मिल रही हिदायतों से ही काम चलाऊं। हिदायतें भी ऐसी कि अक्सर सुनते-सुनते मेरे कान लाल हो जाया करते थे मगर वहां से हिदायतें आना बंद नहीं होती थीं।

ऐसा नहीं है कि मैं पहले कभी बीमार नहीं हुआ। बीमार होता था, ठीक हो जाता था। किसी को कानों-कान खबर तक नहीं होती थी। चैन से अपनी बीमारी को एन्जॉय करता था। दरअसल, तब मोबाइल का इत्ता बोल-बाला नहीं था। बात या बीमारी घर की चार-दीवारी में ही सिमटकर रह जाती थी। लेकिन इधर जब से आदमी के बीच मोबाइल का रूतबा बढ़ा है, फिर तो पल-पल बातें हैं, खबरें हैं, हाल-चाल हैं, यहां-वहां की लगाई-बुझाई है।

सच कह रहा हूं, मेरी आधे से ज्यादा बीमारी को मोबाइल ने ही बढ़ाया। एक फोन कट नहीं पाता था कि वेटिंग में दूसरा लगा रहता था। उस पर फोन करने वाले का तुर्रा यह कि बीमारी में बातें कम करनी चाहिए। अब उसे क्या बताऊं कि मुझे कहां शौक है ज्यादा बातें करने का। एक दो दफा अपना मोबाइल बंद करके भी देखा लेकिन फोन फिर पत्नी के मोबाइल पर आने लगे। आखिर मरता क्या नहीं करता प्यारे।

इस सब के बीच मैं मूल बीमारी से तो निजात पा गया किंतु हाल-चाल लेने से संबंधित बीमारी अब भी बनी हुई है। लोग जाने कहां-कहां से खोज-खोजकर फोन कर रहे हैं और खोद-खोदकर मेरी बीमारी पूछ रहे हैं। फिर भी हर किसी की शिकायत यही है कि पहले हमें क्यों नहीं बताया। उस दिन बात हुई, तब भी न बताया। कम से कम एक फोन ही कर देते। अब तो हर नंबर पर फ्री-टाकिंग की सुविधा मिल रही है। अच्छा, वो वाला प्लान ले लो, फ्री में बातें होगीं। हाल-चाल देते रहना। मोबाइल अपने कने ही रखना। ज्यादा बातें मत करना क्योंकि बीमारी अभी गई नहीं है। गेट वैल सून।

कुछ फोन तो ऐसे भी आए, जिसमें डॉक्टर का बायोडाटा तक पूछ लिया गया। कौन डॉक्टर है? कहां बैठता है? कित्ते मरीज दिनभर में देख लेता है? कित्ती फीस लेता है? टेस्ट बाहर से करवाता है या अपने यहां से? हस्पताल उसका खुद का है या फिर वहां नौकरी बजाता है? शादीशुदा या सिंगल? खुद बेचारा डॉक्टर ने नहीं जानता होगा कि उसके बायोडाटा का हिसाब-किताब बाहर भी रखा जाता है।

फिर भी, हिदायत कि फलां डॉक्टर को ही दिखाना, अलां को नहीं। और हां जब दिखा दो तो मोबाइल पर मेरी बात जरूर करवा देना।

अब आप ही बतलाओ मियां कि इत्ती हिदायतें-बातें सुनने के बाद कौन बीमार भला बीमार रह पाएगा! हालांकि कहा नहीं लेकिन बीमारी ने भी सोचा अवश्य होगा कि किस मूर्ख के पल्ले पड़ गई। ससुरे ने मुझे 'विलेन' बनाकर रख दिया।

खैर, अभी तलक यह पता नहीं चल पाया है कि मुझे बीमारी क्या थी? मगर अब ठीक हूं। साथ ही, एक गुजारिश कर रहा हूं कि अपनी बीमारी की खबर जहां तक हो सके अपने कने ही रखना। गलती से कहीं अगर बीमारी मोबाइल हो गई, तो फिर आपका खुदा ही मालिक। हरिबोल...।

सोमवार, 6 मई 2013

फेसबुक पर कविता


सुनो प्यारे, इन दिनों मैं गहरे अवसाद में हूं। यह अवसाद न पारिवारिक है न सामाजिक। यह कविता-संबंधित अवसाद है। न.. न.. ऐसा मत समझियो कि मैं कोई कविता लिखने की कोशिश कर रहा हूं। कविता-लेखन से तो मेरा न दूर का कोई रिश्ता है न पास का। कवि और कविता से जित्ता अधिक बचकर रहा जाए उत्ता ही दिमागी-स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।
लेकिन क्या करूं, दूरी बनाए रखने के बाद भी कवि और कविता मेरा पीछा नहीं छोड़ते।

दरअसल, कवि जब से फेसबुक पर अवतरित हुआ है, उसने कविता को आइटम-सांग जैसा बना दिया है। फेसबुक के कवि को तो कविता लिखने से मतलब। अब कविता का सिर-पैर-हाथ-कान-नाक-मुंह कहां और किधर जा रहे हैं, इससे उसे कोई सरोकार नहीं। फिर एक समस्या यह भी है कि फेसबुक के कवि से कविता के बाबत आप कुछ कह नहीं सकते। उसकी कविता में मीन-मेख नहीं निकाल सकते। उसे शब्दों की हेरा-फेरा पर राय नहीं दे सकते।

दरअसल, फेसबुक का कवि ऐंग्री-यंग से कम नहीं होता है। जहां जरा-सा टोक नहीं कि आपका खाना खराब। कविता पर आपके सामान्य-ज्ञान को वो पलभर में खारिज करने की क्षमता रखता है। बिना टोके, बिना चिढ़े आप बस उसकी कविता को पढ़िए। उसे बधाई दीजिए। उसे मुक्तिबोध, निराला से बड़ा और बेहतर कवि बतलाइए। फिर देखिए फेसबुक का कवि कैसे आपको टैग कर-करके आपके फेसबुक की दीवार की साना-पोती करता है।

हालांकि फेसबुक मित्रों के समक्ष कविता पर मैं अपनी राय जाहिर करता रहता हूं। कई दफा कह व लिख चुका हूं कि कविता की मुझे कतई तमीज नहीं। बावजूद इसके, फेसबुक के स्थापित कवि कहां मानने वाले हैं। आए दिन वे मेरे संदेश-बक्से में अपनी कविता पढ़ने और राय देने का लिंक डालते रहते हैं। आग्रह में उनके आग्रह कम दुराग्रह ज्यादा झलकता है। मतलब, कविता पढ़ो और तुरंत राय दो नहीं तो टैग होने को तैयार रहो।

अब मैं कविता का अज्ञानी भला क्या पढ़ूं और क्या राय दूं! यहां अपने लिखे पर कभी खुद की राय ले नहीं पाता। जित्ता लिखता हूं सब का सब छप-छपाकर अगले दिन तक रद्दी हो जाता है। ऊपर से पत्नी ताना मारती है कि तुम्हें लिखना नहीं आता।

फेसबुक के कवियों की कविताओं को झेल-झेलकर मैं अवसादग्रस्त-सा होने लगा हूं। रात को सोते वक्त भी कविता की चार लाइनें मुझे परेशान किए रहती हैं। ऐसा लगता है, कवि और कविता की दुनिया में मुझे जबरन ठेला जा रहा है।

कभी-कभी खुद पर गुस्सा भी बहुत आता है कि मैंने बेकार ही फेसबुक की दुनिया में कदम रखा। बेकार ही मैं लेखक हुआ। अगर इनमें से कुछ न होता तो आज चैन की बंसी बजा रहा होता। फेसबुक के कवि की कविता को न झेल रहा होता। यों फेसबुक पर रहने के कई फायदें हैं किंतु यहां के कवि की कविता को झेलना सबसे कर्रा काम है। पर क्या करूं फेसबुक पर कविता से पिंड छुड़ाना इत्ता आसान भी तो नहीं है।

वैसे फेसबुक के कवि स्वीकार तो नहीं करेंगे किंतु सच यही है कि फेसबुक पर कविताएं लिखी नहीं पेली और ठेली जाती हैं। यहां दिन भर कविताओं में शब्दों की बाजीगीरी चलती रहती है। यहां मौजूद हर कवि खुद को किसी वरिष्ठ लेखक-साहित्यकार से कम नहीं समझता। आए दिन किसी न किसी से लड़ता-भिड़ता ही रहता है। बस एक ही जिद, मेरी कविता पढ़ो और तुरंत राय दो।

खुदा बचाए फेसबुक के कवियों और उनकी ठेला-पेली युक्त कविताओं से। वो तो यह अच्छा है कि मैं खुद कवि नहीं हूं। नहीं तो मैं भी फेसबुक के कवियों की तरह इस-उस को टैग कर अपनी कविताएं यहां-वहां ठेल-पेल रहा होता।

रविवार, 5 मई 2013

सबकुछ तो ठीक चल रहा है...


अजीब लोग हैं यहां के। अजीबो-गरीब से सवाल पूछते हैं मुझसे। जबकि जानते हैं, मुझसे उनके किसी सवाल का संतोषप्रद उत्तर नहीं मिलेगा। लेकिन फिर भी...। पूछते हैं, 'यह देश किधर जा रहा है? देश की राजनीति और देश के नेता किधर जा रहे हैं? आखिर ऐसा कब तलक चलेगा?' बताइए, उक्त सवालों का मैं क्या उत्तर दे सकता हूं? मैं कोई त्रिकालदर्शी या ज्योतिषी तो हूं नहीं कि मंत्र फूंका या यहां-वहां की लकीरें देखीं और बतला दिया कि ये यहां और वो वहां तलक ही जाएगा बस। फिर सब अपने-अपने रास्तों पर आ जाएंगे।

खामाखां की बात पूछते हैं।

अरे भाई, मुझसे क्या मतलब कि यह देश, राजनीति और नेता लोग कहां और किधर जा रहे हैं। जहां भी जा रहे हैं ठीक ही जा रहे होंगे। इत्ते भोले तो वे भी नहीं हैं, कि चल दिए और रास्ता नहीं मालूम। आजकल के जमाने में हर कोई अपने-अपने हिसाब से होशियार है। कोई अपनी होशियार जतलाकर नंबर बटोर ले जाता है तो कोई चुप रहकर नंबर बटोरता रहता है। और फिर देश से जुड़ी राजनीति, राजनीति से जुड़े नेताओं की तो बात ही निराली है, उन्हें सब मालूम रहता है कि देश-समाज-राजनीति-व्यवस्था-नीति-नियम-सिद्धांत कहां और किधर जा रहे हैं।

देखिए, मैं देश का हिस्सा जरूर हूं किंतु राजनीति और नेता लोगों में मेरा कतई इंट्रस्ट नहीं है। लेकिन मैं यह मानता हूं कि देश हमारा चकाचक चल रहा है। देश का चलना-फिरना मुझे साफ दिखता है। देश निरंतर प्रगतिपथ पर अग्रसर है। मुद्रास्फीति की दर ठीक है। अर्थव्यवस्था शेयर बाजार के कंधों पर टिकी हुई है। देश के गरीब-किसान खूब खा-पी रहे हैं। इधर, सुनने में आया भी था कि किसानों-गरीबों की इटिंग हैविट पहले से बढ़ी है।

देश की बाकी चीजों-बातों को नेता लोग अपनी-अपनी राजनीति के सहारे संभाल ही रहे हैं, काफी है।

लेकिन फिर भी बताए देता हूं कि मैं जानता कुछ नहीं हूं। यह तो मुझे वो पता है, जो मैंने यहां-वहां के लोगों द्वारा कही गई बातों को सुन रखा है। यों भी मैं, अतिरिक्त दिमाग खोटी न करना पड़े, इसीलिए सुनी-सुनाई बातों को ज्यादा तव्वजो देना उचित समझता हूं। ले-देके एक दिमाग मिला है, उसे भी हर वक्त बे-फालतू की बातों में लगाए रहो। यह दिमाग के साथ ना-इंसाफी है प्यारे।

कुछ लोगों से सुनने में आया है कि देश पर चीनी संकट आन खड़ा हुआ है। सुना है, चीनी फौजी कुछ किलोमीटर तक भारतीय सीमा के अंदर घुस आए हैं। तो इसमें इत्ता संकटप्रद या गंभीर होने की क्या आवश्यकता है प्यारे। जैसे आए हैं, वैसे ही चले भी जाएंगे। अपने नेता लोग हैं न बातचीत कर मसले को सुलटा लेंगे। जैसे पाकिस्तान से बातचीत का दौर चलता रहा है, अब चीन से भी चलने लगेगा। यह कोई नई बात थोड़े है। यों भी, ऐसे मसले सिर्फ बातचीत से ही सुलट जाते हैं, पुतले फूंकने या क्रांति-क्रांति चिखने-चिल्लाने से नहीं।

फिर भी जिनके दिल-जिगर-मन में जोश की भावना हर वक्त उमड़ती-घुमड़ती रहती है, उन्हें सलाह है कि वे तुरंत सीमा पर चले जाएं। शांति मिलेगी।

यह देखिए, कुछ न जानते हुए भी मैं इत्ता कुछ बतला गया। अब मुझसे कुछ और मत पूछिएगा। मैं फिर कह रहा हूं देश, राजनीति और नेता लोग के बीच सबकुछ ठीक चल रहा है। फिर भी मेरी कही बात का यकीन न हो तो अपने दिमाग की एनर्जी जाया करें मगर मुझे बख्शें। मेरे कने और भी काम हैं देश-दुनिया-समाज-राजनीति-व्यवस्था की चिंता करने के सिवाय।

शनिवार, 4 मई 2013

तारीफ की कीमत


लीजिए जनाब, अब तारीफ करना भी 'गुनाह' की श्रेणी में आ गया है। इस गुनाह की कीमत एक मंत्री जी को मंत्रिमंडल से 'बर्खास्त' होकर चुकानी पड़ी है। बेचारे मंत्री जी का गुनाह बस इत्ता-सा था कि उन्होंने सड़कों को हेमा मालिनी और माधुरी दीक्षित के गालों जैसा बनवाने की बात कही थी। आखिर इसमें क्या गलत है अगर प्रदेश की सड़कें हेमा मालिनी और माधुरी दीक्षित के गालों सरीखी हो जाएं। सुंदरता की तारीफ करना कोई गुनाह तो नहीं प्यारे!

दुनिया भर में तमाम तरह के लोग अपने-अपने तरीके से अभिनेत्रियों की खूबसूरती की तारीफ करते रहते हैं, उनका तो कुछ नहीं बिगड़ता। एक बेचारे हमारे मंत्री जी ने तारीफ क्या कर दी, उनकी गर्दन पर बर्खास्तगी की तलवार चला दी गई। बहुत ना-इंसाफी है यह। इसका मतलब तो यह हुआ कि मंत्री स्तर के हर मंत्री को अब किसी अभिनेत्री की तारीफ करने से पहले सौ दफा सोचना पड़ेगा। कुछके तो अरमान दिल के दिल में ही रह जाएंगे।

अरे, हमें तो धन्यवाद देना चाहिए मंत्री जी को कि उन्होंने हेमा मालिनी और माधुरी दीक्षित के बहाने खूबसूरत सड़कों का एक बेहतरीन मॉडल प्रस्तुत किया। कित्ता अच्छा होता अगर मंत्री जी के मॉडल को संज्ञान में लाकर इस पर गंभीरता के काम किया जाता। सड़कों को निहायत ही खूबसूरत और चिकना बनाया जाता। उन पर से गड्ढेनुमा दागों को हटाया जाता। गड्ढे हर तरह से खूबसूरती में बाधक होते हैं। प्रदेश की ज्यादातर सड़कों पर गड्ढों का ही राज रहता है। सड़क-यात्रा के दौरान पिछले दिनों एक मंत्री जी की कमर में गड्ढों के कारण दर्द बैठ गया। मंत्री जी गड्ढों से कहीं ज्यादा उस सड़क को बनाने वालों पर नाराज हुए। मंत्री जी की नारजगी का मैं समर्थन करता हूं। दरअसल, सड़क पर चलकर ही पता लगाया जा सकता है कि सरकार के मंत्री कित्ता और कहां तक काम कर रहे हैं।

लेकिन यह मामला सड़क से कहीं ज्यादा खूबसूरती की तारीफ करने का बनता है। खूबसूरती के सिंबल को अभिनेत्रियों में ही खोजा व परखा जा सकता है।

मेरे ख्याल में जहां बात देश-प्रदेश-राज्य के विकास की हो वहां ऐसी खूबसूरतियों पर विचार के साथ-साथ तारीफ करने में भी कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। खूबसूरती होती ही तारीफ करने के लिए है।

मुझे दुख होता है, जो लोग खूबसूरती की तारीफ को पचा नहीं पाते। तारीफ को हीन भावना से देखते हैं। तारीफ पर पहरे बैठाते हैं। जरा सोचकर देखिए, बेचारे मंत्री जी के दिल पर क्या गुजरी होगी, जो उन्हें तारीफ इत्ती बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। इसमें बुरा भी क्या है अगर सड़कें अभिनेत्रियों के गालों जैसी हो जाएं तो। इत्ती खूबसूरत सड़कों पर चलने का आनंद ही कुछ और होगा।

तारीफ की कीमत अगर मंत्रियों को ऐसे ही चुकानी पड़ती रही तो विकास का मॉडल ही ध्वस्त हो जाएगा। फिर न कोई किसी की तारीफ करेगा न सुंदरता पर आहें भरेगा। फिर तो तारीफ के सारे विकल्प ही खत्म हो जाएंगे।

हमें इन विकल्पों को बचाना होगा। तारीफ की कीमत का एहसास हर किसी को करना होगा। कोशिश करनी होगी तारीफ के बहाने जैसा उन मंत्री जी के साथ हुआ किसी और के साथ न होए।

हे! विकीलीक्स, मेरी पोल भी खोल


विकीलीक्स के केबल का मैं मुरीद हूं। दिल से चाहता हूं कि विकीलीक्स एक केबल मेरे घर पर भी डाले। मैं भी विकीलीक्स के केबल में फंस जाऊं। किसी न किसी बहाने मेरी पोल भी खुल जाए। पोल खुलकर मैं बदनाम हो जाऊं। मीडिया से लेकर रिश्तेदारों के बीच मेरी बदनामी पर तरह-तरह की चर्चाएं हों। फैलते-फैलते मेरी बदनामी की बातें संसद के भीतर भी पहुंच जाएं। सांसद लोग मुझ पर जिरह करें। कोई मुझे दुत्कारे, कोई मुझे लताड़े। कोई मेरा हुक्का-पानी बंद करने का प्रस्ताव रखे। आह! कित्ता खुशनुमा होगा वो दिन जब विकीलीक्स मेरी ईमानदारी पर से बदनामी की पोल खोलेगा।

सच कहूं, जब भी मैं विकीलीक्स को अलां-फलां नेता लोगों की पोल खोलते सुनता-पढ़ता हूं, मेरे मन में उनके प्रति सम्मान का भाव जागता है। सम्मान के बहाने उनकी महानता पर कसीदे पढ़ने का दिल करता है। रात भर में ही वे लोग बदनाम होने के साथ-साथ नामवाले हो जाते हैं। जो लोग नहीं जानते, वे भी उनके नाम को जान-पहचान जाते हैं।

बस, ऐसा ही नाम मैं भी चाहता हूं। मुझे इस बात की रत्ती भर फिक्र नहीं कि बदनामी के कारण मेरा नाम होगा। आजकल जमाना ही बदनामी के सहारे नाम कमाने वालों का है। जिनका नाम होता है, उन्हें ही लोग-बाग हिम्मवाला कहते हैं। जी हां, मैं भी वैसा ही हिम्मतवाला बनना चाहता हूं। विकीलीक्स के बहाने पोल खुलकर बदनाम होने का सुख ही कुछ और है प्यारे।

न भूलें, विकीलीक्स की पोल खुलाई से अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि मिलती है।

पर मुझे यह समझ नहीं आता कि लोग विकीलीक्स को इत्ता बुरा-भला क्यों कहते हैं? जहां किसी की पोल खुली नहीं, बस चेले-चपाटे तैयार हो जाते हैं, अपने लोगों को डिफेंट करने और विकीलीक्स को उट-पटांग कहने के लिए। समझने का प्रयास ही नहीं करते कि विकीलीक्स के केबल हमेशा सच बोलते हैं, सच के सिवाय कुछ नहीं बोलते। मुफ्त में घर बैठे एक अंतरराष्ट्रीय पोल खोलू एजंसी से अगर अपने नाम पर बदनामी का ठप्पा लग रहा है, तो उसमें हर्ज ही क्या है! ऐसा सौभाग्य केवल नसीब वालों को ही नसीब होता है।

मैं तो इस प्रयास में हूं कि विकीलीक्स के बहाने ही सही मेरा नसीब भी जागे। खुद की पोल खुलने के एहसास को मैं मंजरे-आम पर देखना व महसूस करना चाहता हूं। किसी को हो या न हो मगर मुझे अपनी मुफ्त की बदनामी को कैश करने का बहुत शौक है। मैं चाहता हूं मेरे इस शौक में हर कोई भागीदार बने।

कहे कोई कुछ भी लेकिन इत्ता तो मानना ही पड़ेगा कि विकीलीक्स के पोल खोलू केबल हमारे यहां की जासूसी एजंसियों से कहीं ज्यादा मजबूत एवं चपल हैं। अब तलक विकीलीक्स ने जित्तों की पोल खोली है, सभी किसी न किसी मामले में फंसे नजर आए हैं। बावजूद इसके वे विकीलीक्स को बुरा-भला कहते हैं, वाकई यह बहुत ही दुखद है।

लेकिन मैं निश्चिंत कर देना चाहता हूं विकीलीक्स को कि मैं अपनी पोल खुलाई या बदनामी पर उसे जरा भी नहीं कोसूंगा। दिल से उसके खुलासे का समर्थन करूंगा। अगर संभव हुआ तो विकीलीक्स के संस्थापक जुलियन असांजे को रात्री भोज पर भी आमंत्रित करूंगा। मैं जुलियन अंसाजे का फैन हूं।

अब बस इंतजार है विकीलीक्स के बहाने खुद की पोल खुलाई का। बदनाम होने का। नाम कमाने का। नाम के सहारे हिम्मतवाला बनने का। और मीडियाई सुर्खियां बटोरने का।

महंगाई बढ़ाते गरीब!


सुब्बा जी ने कुछ गलत नहीं कहा। सौ फीसद सच कहा। मैं उनके कहे का दिल से समर्थन करता हूं। बे-वजह ही लोग-बाग अमीरों को महंगाई और खान-पान के लिए गरियाते रहते हैं। जबकि महंगाई बढ़ाने में सबसे बड़ा हाथ देश के गरीबों का है। देश के गरीब अब गरीब नहीं रहे। वे गरीब बने रहकर अमीरों की बराबरी करने लगे हैं। अमीरों की तरह खाने, अमीरों की तरह रहने, अमीरों की तरह हंसने-बोलने, अमीरों की तरह मुटियाने लगे हैं।

बताइए, दूध-धी-मक्खन-अंडा यह सब क्या गरीबों के खाने की चीजें हैं! लेकिन फिर भी देश के गरीब इन्हें मजे से खा रहे हैं। अमीरों का खाना गरीब खाएं, भला कौन बर्दाशत करेगा? कम से कम सुब्बा जी तो कतई नहीं करेंगे। इसीलिए उनने साफ कह दिया कि गरीब ही देश में महंगाई बढ़ा रहे हैं।

मेरी कम-अक्ली देखिए, मैं अब तलक सरकार और अमीरों को ही महंगाई के लिए जिम्मेदार ठहराता रहा। जब भी खाने-पीने के दामों में बढ़ोत्तरी होती, सरकार पर मेरा खून जरूर खौलता। 'आरओ' का पानी पी-पीकर उन्हें कोसता। हाय! मैं कित्ता मूर्ख था। सरकार व अमीरों के प्रति कित्ती दुष्ट सोच रखता था। वो तो भला हो सुब्बा जी का जो उनने सही समय पर बतला दिया कि महंगाई और मोटापा गरीबों के कारण ही तो बढ़ रहा है।

मुझे लगता है, देश के गरीब अक्सर भूखे होने की नौटंकी करते हैं। अपने शरीर को कंकालनुमा दिखलाकर सरकार व अमीरों की हमदर्दी बटोरना चाहते हैं। पेट में अन्न के तमाम दाने पड़े रहने के बावजूद झूठ बोलते हैं कि उनने कई दिनों से कुछ खाया नहीं। खाने के वास्ते हाथ फैलाना गरीब की पुरानी आदत है। लेकिन हमारी सरकार भी अजीब है गरीब की नौटंकी को सच मान लेती है। उसके तईं आनाज सस्ता कर देती है। और तो और चुनावों के वक्त उसके पैर तक पकड़ लेती है। मेरे विचार में देश के गरीबों को इत्ता भाव देना ठीक नहीं।

खुद ही देख लीजिए, हमारा देश कित्ती तेजी से प्रगति कर रहा है। हमारी प्रगतिशील सरकार विकास दर को हमेशा ऊंचा बनाए रखने में लगी रहती है। सुब्बा जी समय-समय पर ब्याज दरों में कटौती कर देश की जनता पर लोन का बोझ कम करने का प्रयास करते रहते हैं। सरकार और सुब्बा जी के प्रयासों का असर गरीबों पर साफ मालूम चल रहा है। गरीब भी अब अमीरों के बराबर प्रगति कर रहे हैं। गरीबों की प्रगति अगर देखना है तो दिल्ली में देखिए, गुजरात में देखिए, बिहार में देखिए, मध्य-प्रदेश में देखिए और कुछ-कुछ उत्तर प्रदेश में भी देख सकते हैं। आजकल गुजरात की प्रगति की तो खूब चरचाएं हैं यहां-वहां।

दरअसल, प्रगति कर-करके गरीब ही देश के भीतर महंगाई को बढ़ा रहे हैं। प्रगति करना ठीक बात है परंतु खान-पान पर भी तो कंट्रोल रखना चाहिए देश के गरीबों को। लेकिन अच्छा खाना खाने बगैर मानते ही नहीं। अरे, यह क्या तुक है कि जो अमीर खाएं वो गरीब भी खाएं! खाने की यह जिद्द ही तो महंगाई को बढ़ा रही है। बिल्कुल सही फरमाया सुब्बा जी।

आगे से आप भी कान खोलकर सुन लें महंगाई के लिए अमीरों को कतई दोष न दें। हमेशा ध्यान रखें कि देश के गरीब ही महंगाई को बढ़ा रहे हैं, अच्छा खा-पीकर। फिर भी अगर देश का गरीब खुद को गरीब कहता है तो साफ झूठ बोलता है। आप गरीब की भूख पर न जाएं। अपनी अक्ल लगाएं और सुब्बा जी के कहे पर गौर फरमाएं।

गुरुवार, 2 मई 2013

नियंत्रण-मुक्त चीनी


सरकार का 'धन्यवाद' कि उसने चीनी पर से खुद का नियंत्रण हटा लिया। चीनी अबसे बाजार के हवाले हैं। बाजार जैसा चाहेगा, चीनी वैसी ही बिकेगी। दरअसल, सरकार को यह काम बहुत पहले ही कर लेना चाहिए था। सरकार खुद पर से जित्ता हो सके, उत्ता बोझ तो कम करे ही। आखिर सरकार कब तलक चीनी, चावल, आटे-दाल, तेल आदि के भाव को संभालती रहेगी। सरकार कने और भी जरूरी काम हैं। और फिर सरकार एक अरब लोगों को संभाल रही है, यह क्या कम है!

आजकल का जमाना 'बाजार' का है। समाज-देश-राजनीति में चीजें बाजार के हिसाब से ही तय हो रही हैं। जैसा बाजार चाहता है, वैसा होता है। इसमें कोई बुराई भी नहीं। बाजार की गिरफ्त में आते ही हर चीज का हुलिया बदल जाता है। देखिए न, फैशन से लेकर राशन तक धीरे-धीरे कर सबको बाजार ने बदल डाला है। अब न कंट्रोल की दुकानों पर भीड़ लगती है न खरीददारी के लिए सड़कों पर मारा-मारी रहती है। सब अब 'ऑन-लाइन' है। बाजार ने खरीददारी को इत्ता सरल बना दिया है कि आप चीनी से लेकर कपड़े तक सब ऑन-लाइन खरीद सकते हैं। न नकद का झंझट न मोल-भाव तय करने का लफड़ा।

बाजार हमेशा लाभ की बात करता है। यह बात सरकार भी जानती है। सरकार के इस कदम से शुगर इंडस्ट्री को खासा लाभ मिलने की उम्मीद है। अब चीनी ज्यादा स्मार्ट होकर बिका करेगी। बढ़िया है, बाजार के सहारे अगर चीनी की स्मार्टनेस में इजाफा हो रहा है, तो क्या बुराई है!

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि चीनी ने हम इंसानों पर जुलम भी बहुत ढाहे हैं। आज हर घर में एक न एक बंदा तो शुगर का मारा मिलेगा ही। शुगर की बीमारी ने रहन-सहन के साथ-साथ खाने-पीने तक के हाजमे को बिगाड़ कर रख दिया है। यह वजह है कि लोगों के बीच शुगर-फ्री का चलन तेजी से बढ़ रहा है। मैंने तमाम लोग ऐसे देखे हैं, जिन्हें चीनी का नाम सुनते ही शुगर का दौरा पड़ना शुरू हो जाता है।

तो फिर सरकार ने क्या गलत किया जो चीनी को बाजार के हवाले कर दिया। बाजार अपने ढंग से चीनी की कीमत बढ़ाए-घटाएगा। इस बहाने कम से कम चीनी के प्रति लोगों का नजरिया तो बदलेगा।

बहरहाल, सरकार के फैसले का स्वागत करते हुए मैंने भी चाय में चीनी की मात्रा को कम कर दिया है। चीनी का हिसाब भी पेट्रोल की तरह रखा है। दाम के बढ़ने-घटने को उसी हिसाब से मैनेज करता हूं। इस महंगाई में कुछ तो ऐसा किया जाए ताकि बोझ का दवाब कहीं तो कम हो। वरना सरकार तो मानने वाली नहीं। उसने तो ठान ली है जब तलक सत्ता में रहेगी महंगाई का साथ नहीं छोडेगी।

गुजारिश सबों से यही है कि अपनी-अपनी जीभ पर नियंत्रण रखें। उसे ज्यादा मीठी न बनाएं। शुगर-फ्री की आदत डाल लें। सरकार जैसा चलने को कहे, ठीक वैसा ही चलते रहें। अभी चीनी को सरकार ने नियंत्रण-मुक्त किया, हो सकता है कल को वो गेंहू-आटे को भी नियंत्रण-मुक्त कर दे। आखिर वो सरकार है, कुछ भी कर सकती है। इसीलिए सरकार के फैसलों पर बहस न करें। बस, खुद को उसके सांचे में ढालने का प्रयास करते रहें।

आइपीएल है तो तरक्की है!


होते हैं कुछ लोग जिन्हें देश की तरक्की को देखकर हर समय जलन-सी होती है। उन्हें हर तरक्की के पीछे बाजारवाद-पूंजीवाद की बू आती है। अब देखिए न, हमारा देश कित्ती तरक्की कर रहा है! देश से प्रत्येक छोटी-मोटी समस्या-दिक्कत गायब हो चुकी है। गरीब भी अब गरीब कहां रहे हैं। न यहां कोई भूखा है न नंगा। न महंगाई है न भ्रष्टाचार। सब मस्त होकर जंपिंग-जपांग की धुन पर उदबिलाऊ नृत्य कर रहे हैं। टी.वी. पर विज्ञापन चीख-चीखकर कह रहे हैं, अब हर कोई नाचेगा, कोई नहीं बचेगा। तो प्यारे आइपीएल की इस अलबेली घड़ी में हर कोई नाच और बजा ही रहा है।

यह आइपीएल की तरक्की है। और, आइपीएल की तरक्की देश की तरक्की है। मुझे आइपीएल और देश की तरक्की पर नाज है।

मैं जानता हूं मेरी इस सोच से प्रगतिशील सहमत न होंगे। उन्हें मेरी सोच और विचार में से बाजारवाद-पूंजीवाद की बू आ रही होगी। मेरी सोच के साथ, अब तलक वे मुझे खारिज भी कर चुके होंगे। किंतु मैं परवाह नहीं करता। मैं समय के साथ चलने-संवरने वाला प्राणी हूं। बाजार मेरी आत्मा और पूंजी मेरा शरीर है।

क्या आपने देखा नहीं कि आइपीएल के शुरू होते ही देश-समाज में से हर समस्या विलुप्त-सी हो गई। खबरिया चैनलस अब महंगाई-गरीबी पर कम और आइपीएल की तड़क-भड़क पर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं। आइपीएल की खबरों में जो मस्ती है, वो देश से जुड़ी खबरों में कहां। देश का हाल नेता जानें। खेल का हाल बताने को खबरिया चैनलस हैं ही।

जी हां, इसे ही तो कहते हैं तरक्की का असली मुकाम।

क्यों भूलते हैं, केवल आइपीएल के सहारे ही देश में करोड़ों रुपया आएगा। खिलाड़ियों को लाखों रुपए बांटे जाएंगे। विज्ञापन एजंसियां और अमीर बनेंगी सो अलग। खबरिया चैनलों की टीआरपी बढ़ेगी। क्या इससे हमारे देश, हमारे खेल का नाम ऊंचा न होगा! देखिए, पूंजी से ही पूंजी बढ़ती है और बाजार से ही बाजार बढ़ता है। फिर इस तरक्की पर प्रगतिशीलों को क्यों और किसलिए आपत्ति होनी चाहिए?

यह सब पहचान को नया आकार देने के लिए जरूरी है।

हमें एहसानमंद होना चाहिए आइपीएल का कि इसने कुछ दिनों के लिए ही सही मगर बेफालतू की चिंताओं से मुक्त तो किया। नहीं तो हर समय यहां-वहां कांय-कांय ही लगी रहती थी। पर अब काफी राहत है।

मैं तो कहता हूं, मस्त होकर आइपीएल देखिए। चियरलिडर्स के ठुमकों पर मदहोश होइए। पानी तरह पैसे को बहने दीजिए। जिसे जो कहना है, उसे कहने दीजिए, आप तो बस यह मानकर चलिए कि देश तरक्की कर रहा है, भले ही आएपीएल के बहाने सही।

आईपीएल और चियरलिडर्स


लीजिए, आईपीएल-6 भी शुरू हो गया। अब अगले 54 दिनों तलक मस्ती ही मस्ती, रोमांच ही रोमांच तारी रहेगा। क्रिकेट-प्रेमी तो दिनभर टी.वी. में मुंह घुसेड़े बैठे रहेंगे। खबरिया चैनल अपने-अपने तरीके से आईपीएल का मजा दर्शकों को दिखाएंगे और टीआरपी का ग्राफ बढ़ाएंगे। थोड़े दिनों के लिए देश-समाज के बीच से समस्त समस्याएं विलुप्त हो जाएंगी। न महंगाई पर बात होगी, न भ्रष्टाचार का जिक्र होगा, न पानी का रोना रोया जाएगा, न राजनीतिक स्थिरिता-अस्थिरिता पर बहस छिड़ेगी। केंद्र में अगर कुछ होगा तो बस आईपीएल, आईपीएल और आईपीएल ही होगा। बढ़िया है, इस बहाने कम से कम देश-समाज बेतुके झंझटों से मुक्ति तो पाएगा।

साथ ही साथ आईपीएल के बहाने मुझे भी सुनहरा मौका मिल जाएगा चियरलीडर्स को ताड़ने-घूरने का। कुछ हद तक आईपीएल की मस्ती का दारोमदार चियरलिडर्स की अदाओं पर भी निर्भर करता है। चौक्का पड़े या छक्का चियरलिडर्स का जलवा देखने लायक होता है वहां। चियरलिडर्स की मस्तियों को देखकर अक्सर मन करता है, उनके साथ नाचने-कूदने का। मनोरंजन का पूरा टॉनिक उनमें समाहित रहता है।

मेरे विचार में चियरलिडर्स की भूमिका केवल आईपीएल में ही नहीं बल्कि वन-डे और टेस्ट क्रिकेट में भी समान रूप से होनी चाहिए। यानी खेल का खेल और मनोरंजन का मनोरंजन।

चियरलिडर्स में जाने क्या कशिश-सी होती है कि उन्हें देखते ही मेरे सारे गम, सारी दिक्कतें पलभर में रफूचक्कर हो जाती हैं। उनकी कमर की थिरकन खेल के रोमांच को दूना कर देती है। जिस स्त्री-विमर्श के वास्ते हम यहां-वहां भागते-फिरते हैं, वो पूरा का पूरा उनके भीतर मौजूद रहता है। बावजूद इसके, कुछ लोग चियरलिडर्स को अश्लील और उनके नृत्य को अश्लीलता करार देते हैं। नादान हैं लोग जो शील-अश्लील में फर्क नहीं समझते। उन्हें पता ही नहीं कि सिर्फ चियरलिडर्स के कारण ही तो आईपीएल का रोमांच बरकरार है।

चियरलिडर्स की यह बात मुझे बेहद भाती है कि वे घूरने या तांकने का बुरा नहीं मानतीं। आप आराम से उन्हें देखकर अपनी आंखों को शीतल कर सकते हैं। आपके कने दोनों विकल्प हैं, चाहे तो उन्हें मैदान में घूरें या फिर अपने टी. वी. चैनल पर। कहीं किसी किस्म की कोई रोक-टोक नहीं। सचमुच चियरलिडर्स का दिल बड़ा होता है।

मेरा तो सभी से यह कहना है कि सब लोग चियरलिडर्स के संग-साथ अपने-अपने दिलों को लगाए रखें। उनमें अश्लीलता नहीं मनोरंजन को खोजें। अश्लीलता पर आधारित तमाम दकियानूसी स्थापनाओं से बाहर आकर केवल चियरलिडर्स पर ध्यान केंद्रित रखें। फिर देखिएगा कि दिल-दिमाग कित्ता सुकून पता है।

फिलहाल, मैंने पत्नी से कह दिया है कि अगले 54 दिनों तक उसे न देखकर मैं सिर्फ चियरलिडर्स को ही देखूंगा। उनकी दिलकश मस्ती में डूबा रहूंगा। उनके नृत्य, उनकी कमर, उनकी अदाओं का भरपूर मनोरंजन उठाऊंगा। फिर भी अगर पत्नी को बुरा मानना है तो मना जाए चियरलिडर्स की खातिर हर खतरा उठाने को मैं तैयार हूं!

मैं चाहता हूं आईपीएल की मस्ती का जुनून ऐसे ही सब पर तारी रहे। दीन-दुनिया को भूल सब बस आईपीएल की रोमानियत में ही डूबे रहें। क्रिकेट के साथ-साथ चियरलिडर्स के जलबों को एनजॉय करें। और जो जो कुछ भी कह रहा है, उस पर खाक डालें। बस इत्ता ध्यान रखें, अगर आईपीएल का मनोरंजन पास है तो सबकुछ पास है प्यारे।

बुधवार, 1 मई 2013

क्योंकि मैं मूर्ख हूं


हां, मैं मूर्ख हूं! ऐसा-वैसा नहीं, बहुत बड़ा वाला मूर्ख हूं। अपनी मूर्खता का ‘प्रमाणपत्र‘ जेब में लिए घूमता हूं। मूर्खता के सहारे कई दफा पागलखाने के चक्कर भी लगा आया हूं। खुद को पागलों के बीच पाकर मुझे असीम खुशी मिलती है। मैं पागलों की वैचारिकता एवं बुद्धिजीविता का कायल हूं।

खुद मूर्ख होकर ही मैं मूर्खता के मर्म को समझ-जान पाया हूं। दुनिया में मूर्खता से बड़ी न कोई विचारधारा है न प्रगतिशीलता। जो लोग खुद को दुनिया-समाज का सबसे बड़ा बुद्धिजीवि घोषित करते-करवाते हैं, दरअसल, वे खुशफहमी का शिकार होते हैं। सच का सामना करने से घबराते हैं। हालांकि बुद्धिजीवि बिरादरी मानेगी नहीं लेकिन दस-बीस ग्राम की मूर्खता उनमें भी घुली रहती है। गाहे-बगाहे अपनी मूर्खता का प्रदर्शन वे भी करते रहते हैं फिर भी खुद को किसी तुर्रामखां से कम नहीं समझते।

लेकिन मुझे इससे क्या वे खुद को चाहे जो समझें मगर मैं खुद को मूर्ख ही मानता व समझता हूं।

दरअसल, मेरे भीतर मूर्खता वाले लक्षणों को सबसे पहले मेरी पत्नी ने पहचाना। मुझे भिन्न-भिन्न कोणों व दृष्टिकोणों से जांचा-परखा। मेरी विचारधारा और मूर्ख की विचाराधारा को एक समान रखकर देखा। मेरी बौद्धिक एवं वैचारिक प्रगतिशीलता को जमीनी स्तर पर आजमाया। मेरी शाब्दिक लफ्फबाजियों का सरेआम प्रदर्शन किया। मेरी दिमागी संरचना का पोस्टमार्टम करके पत्नी ने पाया कि मेरे अंदर सिर्फ आधा ग्राम बुद्धि को छोड़कर बाकी सब मूर्खता ही मूर्खता भरी हुई है। स्पष्ट शब्दों में कह सकते हैं कि मेरे दिमाग में आत्याधिक मात्रा में भूसा भरा है।

लेकिन मुझे खुद के मूर्ख होने पर जरा भी रंज नहीं, पत्नी को भी नहीं है। पत्नी का साफ कहना है कि उसे मूर्खों को बाहर देखने जाने की जरूरत नहीं, यहां तो घर में ही मौजूद है। पत्नी ने बाकायदा मेरी मूर्खता के प्रमाणपत्र छपवाएं हैं। जिन्हें सभी रिश्तेदारों और मिलने-जुलने वालों के बीच बांटा हैय जिनमें से एक मैं हमेशा अपनी जेब में रखता हूं। ताकि भूल-चूक होने पर माफी मिल सके।

संभवता, मैं ऐसा पहला खुशनसीब पति होऊंगा जिसे पत्नी से मूर्ख होने का प्रमाणपत्र हासिल है। नहीं तो मैंने देखा-सुना है कि पति लोग मूर्ख होते हुए भी खुद को मूर्ख नहीं मानते। मगर मैं केवल सच्चाई में विश्वास करता हूं।

जानता हूं, मूर्ख को लोग-बाग बेहद ‘हेय‘ दृष्टि देखते हैं। मूर्ख कहकर उनका मजाक उड़ाते हैं। वैचारिक स्तर पर उन्हें अल्प-बुद्धि समझते हैं। चलते-फिरते कहीं भी उन्हें दुत्कार देते हैं। दरअसल, नादान होते हैं लोग। जानते ही नहीं कि वे क्या कर और कह रहे हैं। मूर्ख होना कतई हेय नहीं बल्कि बेहद सम्मान की बात है। मूर्ख लोग बुद्धिजीवियों-प्रगतिशीलों की तरह शब्दों का आडंबर नहीं रचते, जो जैसा होता है उसे वैसा ही कहते हैं। खामाखां के विवादों-बहसों से हट-बचकर चलते हैं। और, खुद को भीड़ में अंतिम पायदान पर रखते हैं। इसे मैं मूर्ख बिरादरी की श्रेष्ठता मानता हूं। यही कारण है कि मैं एक ‘सर्वश्रेष्ठ मूर्ख‘ हूं।

मुझे बुद्धि की दरकार नहीं। मूर्खों के लिए तो मूर्खता ही उनकी बुद्धि होती है। मूर्ख बने रहकर जित्ती सरलता से चीजों को देखा-समझा जा सकता है, उत्ता बुद्धिजीवि बने रहकर नहीं। मूर्ख बने रहकर मस्त बने रहना किसी उपलब्धि से कम नहीं है मेरे तईं।

फिलहाल, खुश हूं कि मैं मूर्ख हूं। इसमें पत्नी की भागीदारी को चाहकर भी नहीं भूला सकता। अगर आप मूर्ख नहीं है, तो जल्द से जल्द बनने का कष्ट करें। फिर देखिएगा कि यह दुनिया, यह समाज कित्ता रंगीन और मस्त नजर आएगा।

चीन पर कविता


मैं चीन पर एक कविता लिखना चाहता हूं। एक ऐसी कविता जिसे पढ़कर जोश आए और क्रांति का माहौल बने। चीन पर लिखी कविता के बहाने मैं दुनिया-जहान में जाना-पहचाना जाऊं। क्या प्रगतिशील, क्या वामपंथी, क्या जनवादी सब के सब मेरी कविता के आगे फीके पड़ जाएं। अखबार से लेकर फेसबुक व ट्विटर तक पर बस मेरी कविता की ही बात हो। बात ही बात में बात इत्ती दूर तलक निकल जाए कि चीन को अपने तंबू उखाड़ने पड़ें। चीनी सैनिक जमीन पर कब्जा जतलाने का इरादा छोड़ मेरी कविता को कब्जे में लेने की बात सोचने लगें।
चीन पर लिखी जाने वाली अपनी कविता के प्रभाव एवं प्रसिद्धि की कल्पना मैं सहज ही कर सकता हूं। लेकिन समस्या बस एक ही आड़े आ रही है कि मैं कविता कैसे और किस मूड के हिसाब से लिखूं।

दरअसल, मैं कवि नहीं हूं। और, कविता के लिए कवि होना अति-आवश्यक है। साथ-साथ जोशीले और क्रांतिकारी शब्दों पर एकाधिकार होना भी जरूरी है। चीन पर कविता ऐसी लिखी जाए कि चीनी भी पानी मांगने लगें। मगर पानी मांगने वाली ऐसी प्रभावी कविता को मैं चाहकर भी नहीं लिख पा रहा हूं।

लिखने ‘चीन पर कविता‘ बैठता हूं लेकिन बन वो व्यंग्य जाता है। न चाहते हुए भी शब्दों की अभिव्यक्ति एकदम से व्यंग्य में तब्दील हो जाती है। आप यकीन नहीं करेंगे, चीन पर कविता लिखने के वास्ते मैं पिछले दो हफ्ते से छुट्टी पर हूं। लगभग एक हफ्ते से पत्नी से बात तक नहीं की है। मेरे फेसबुक की दीवार सुनी पड़ी है और ट्विटर के ट्व्टि बंद हैं। क्या करूं, दिल-दिमाग में तो बस चीन पर कविता लिखने का जोश भरा हुआ है। अफसोस... जोश कागज तलक आ नहीं पा रहा।

कभी-कभी तो खुद के व्यंग्य-लेखक होने पर ही बहुत गुस्सा आता है। मन करता है, अपने लिखे सारे व्यंग्य रद्दी की टोकरी में डाल कहीं डूबा आऊं या फिर अपने व्यंग्य-लेखक को ही गोली मार दूं। हर वक्त व्यंग्य की बात सूझना मेरे तईं अब परेशानी का सबब बनता चला जा रहा है। व्यंग्य-लेखन न हुआ जी का जंजाल हो गया।

अभी अगर मेरी जगह कोई वरिष्ठ या फिर फेसबुक कवि होता तो झण भर में चीन पर कविता लिख अपने हाथ झाड़ चुका होता। और ऐसी धांसू, जोशीली व क्रांतिकारी कविता लिखी होती कि चीन तो क्या पाकिस्तान भी भारत पर आंखें तरेरने से भय खाता। कविता लिख और फेसबुक पर डालकर कवि अब तलक न जाने कित्तों के कमेंट पा चुका होता और न जाने कित्तों को टैग कर उनका प्यारा बन चुका होता। यही होता है फेसबुक के कवि का कविता लिखने का कमाल।

मुझे लगता है, चीन पर कविता लिखने की इच्छा मेरे मन में ही दफन होकर रह जाएगी। मगर मैं प्रयासरत हूं कि ऐसा न हो। बहुत लंबी न सही पर कुछ लाइनों की ही मैं चीन पर कविता लिखूं जरूर।

व्यंग्य की धारा को छोड़ मैंने पुनः चीन पर कविता लिखने का मन बनाया है। जरा दो-चार वरिष्ठ किस्म के कवियों को पढ़कर अपने मन में थोड़ी-बहुत प्रेरणा का संचार कर लूं। या फिर कुछ फेसबुक के कवियों को पढ़ लूं। ताकि चीन पर मेरी लिखी कविता कविता ही लगे। वैसे, चीन पर लिखी मेरी कविता का लुत्फ कुछ और ही होगा, ऐसी मुझको उम्मीद है।

सोमवार, 29 अप्रैल 2013

धर्मनिरपेक्षता का स्वाद


सुनो प्यारे, मैं धर्मनिरपेक्ष बनना चाहता हूं। भले ही थोड़े दिन के लिए पर धर्मनिरपेक्षता का स्वाद चखना चाहता हूं। देखना चाहता हूं, धर्मनिरपेक्ष होकर आईने के बीच मेरी सूरत कैसी नजर आती है।

मैंने धर्मनिरपेक्षता के बारे में काफी कुछ सुन-पढ़ रखा है। बताते हैं, धर्मनिरपेक्षता बड़ी गजब की चीज होती है। एक दफा जिसे धर्मनिरपेक्षता स्वाद लग जाता है, आसानी छुटता नहीं। धर्मनिरपेक्षता का स्वाद चखने को राजनीति से बेहतर दूसरी कोई जगह नहीं।

धर्मनिरपेक्षता का स्वाद चखने के लिए मैं राजनीति में भी आ सकता हूं। राजनीति में आकर धर्मनिरपेक्षता के साथ-साथ कई और निरपेक्षताओं के स्वाद भी आसानी से चखे जा सकते हैं।
मैंने देख लिया है, लेखक बने रहने का कोई फायदा नहीं है। लेखक बने रहकर न आप राजनीति न धर्मनिरपेक्षता किसी का स्वाद नहीं चख सकते। लेखक को निष्पक्ष होना चाहिए सो यह मेरे बस की बात नहीं। वैसे भी लेखक लेखन के बीच राजनीति तो कर सकता है किंतु जनतांत्रिक राजनीति करने का हुनर उसे खास राजनीति में आकर ही आ पाता है। कौन-सी जुगाड़ कब और कहां साधनी है, यह राजनीति में रहकर ही सीखा व समझा जा सकता है।

वैसे धर्मनिरपेक्ष बनना कोई बहुत कठिन बात नहीं। आप किसी भी धर्म, समुदाय या संप्रदाय के प्रति धर्मनिरपेक्ष बन सकते हैं। धर्मनिरपेक्षता का चोला पहन लेने से वोट और कुर्सी का लाभ यथावत बना रहता है। जनता के बीच आपकी छवि एक उम्दा धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति की बनती है। इसका सबसे बड़ा फायदा आपको समाजवाद-मार्क्सवाद-राष्ट्रवाद के बीच आसानी से मिलता रहता है। अगला तो यही समझता है कि आप धर्मनिरपेक्ष हैं लेकिन अंदर से क्या हैं यह कोई नहीं जान-समझ पाता।

राजनीति के बीच, इन दिनों, धर्मनिरपेक्ष नेताओं का ही बोल-बाला है। अपनी-अपनी धर्मनिरपेक्षताओं को भुनाने के लिए वे हर संभव प्रयास में जुटे हुए हैं। गुजरात से लेकर बिहार तलक धर्मनिरपेक्षता खूब जोर मार रही है।

बढ़िया है, धर्मनिरपेक्ष भी बने रहो और फायदे की राजनीति भी करते रहो।

उनकी धर्मनिरपेक्ष छवियों (!) को देखकर मेरे मन में भी लड्डू फूटते हैं। मन करता है, धर्मनिरपेक्षता का लड्डू खुद भी खाऊं और अपने चाहने वालों को भी खिलाऊं। एक दफा धर्मनिरपेक्ष छवि बनने के बाद फिर आपके चरित्र पर कोई उंगली नहीं उठा सकता। मैं, दरअसल, ऐसी ही छवि गढ़ना चाहता हूं।

अगर सब ठीक रहा तो जल्द ही कोई 'धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक' दल देखकर मैं खुद की छवि पर धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति का ठप्पा लगाऊंगा। एक दफा धर्मनिरपेक्ष बन गया तो बाकी की चीजें बेहद आसान हो जाएंगी मेरे लिए। साथ ही, लेखक और लेखन की फॉरमेंलटी से भी मुक्ति पा जाऊंगा। धर्मनिरपेक्षता का स्वाद अन्य स्वादों से कहीं अधिक लजीज होगा, ऐसा मैं मानता हूं।

फिर क्यों न धर्मनिरपेक्ष बनकर धर्मनिरपेक्षता का स्वाद चखा जाए।

भूकंप आया और हिला गया


सुना कि दिल्ली और आसपास भूकंप के झटके आए। काफी लोग, काफी चीजें हिलीं। कुछ को खबरिया चैनलों ने हिलाया तो कुछ खुद ही हिल लिए। आखिर बात ही हिलने और झटका खाने वाली थी। भूकंप के झटकों और लोगों के हिलने को मैंने बरेली में भी महसूस किया। कहीं-कहीं, कुछ-कुछ बरेली के लोग भी हिले। हिलना लाजिमी था क्योंकि दिल्ली बरेली के बीच दूरी ही कित्ती है!

वैसे भूकंप के झटके तो अब आए हैं किंतु दिल्ली में काफी समय से कुछ-न-कुछ हिल-डुल ही रहा है। खासकर, राजनीति के बीच तो काफी कुछ हिल रहा है। नेता लोग निरंतर एक-दूसरे को झटके दे रहे हैं। कभी बयानबाजी से तो कभी टोपी-तिलक के बहाने। मेरे ख्याल में भूकंप के झटकों का असर नेताओं पर ज्यादा नहीं हुआ। अगर होता तो अब तलक एक-दूसरे के खिलाफ राजनीति शुरू हो गई होती। विरोध की राजनीति करने का एक भी मौका हमारे नेता लोग जाने नहीं देते।

मुझे लगता है, यह समय ही झटकों का है। हर दूसरे-तीसरे दिन कोई-न-कोई अटका-झटका लग ही जाता है। कमाल देखिए, सारे झटकों की मार झेलती जनता ही है। नेता लोग तो बस संसद में बैठकर झटकों पर बहस करते हैं।

महंगाई ने तो झटका देने को अपनी आदत बना लिया है। हर दिन वो कोई-न-कोई झटका देती ही रहती है। कभी आटे के दाम बढ़ जाते हैं तो कभी चीनी के। हां, तेल की कीमतों के कम होने से झटकों में नन्ही-सी राहत जरूर मिली है। मगर यह ऊंट के मुंह में जीरा समान है।

अभी दो रोज पहले सोना-चांदी ने जबरदस्त झटका दिया। ऐसा झटका दिया कि हर कोई चारों खाने चित्त हो गया। जिन्होंने कभी सोचा नहीं था कि सोना-चांदी इत्ता तगड़ा झटका मार सकते हैं, वे भी माथे पर बल डाले उदास बैठे हैं। सोना-चांदी के झटकों ने तो उनकी सोचने-समझने-विचारे की शक्ति तक को क्षीण कर दिया है। पर, क्या कर सकते हैं सब समय-समय की बात है।

वैसे आप मानें या न मानें पर जीवन में झटके जरूरी हैं। ताकि जीवन से जुड़ी कड़वी सच्चाईयों को झटकों के बहाने समझा-जाना जा सके। भूकंप जो झटके देता है, उससे नुकसान तो होता है, पर सीख भी मिलती है कि हम प्रकृति का किस हद तक दोहन करते चले जा रहे हैं। भूकंप के झटके दरअसल प्रकृति का मनुष्य जाति के खिलाफ रिएक्शन है। पर रिएक्शन पर एक्शन हम कम ही ले पाते हैं।

भूकंप के झटकों पर हो-हंगामा दो-चार दिन खूब चलेगा। फिर सब भूल-भाल जाएंगे। सब अपने-अपने काम-धंधों पर लौटकर किसी और झटके को झेलने में लग चुके होंगे। क्या किया जाए यहां हर आदमी कने एक से ज्यादा झटके हैं। उसकी पूरी जिंदगी ही झटकों से ऊबरने में खप जाती है। इसीलिए देख रहा हूं लोग-बाग भूकंप के झटकों पर उस तरह से हैरान-परेशान नहीं हैं, जैसाकि होना चाहिए। शायद उन्हें लगा था कि कुछ हिला है और हिलकर खुद ही ठहर गया। भूकंप बेचारे ने भी सोचा होगा कि बेकार ही उसने यहां लोगों को झटके दिए, इन्हें तो पहले से ही तमाम तरह के झटकों को झेलने की आदत है।

गिरावट के मारे सोना-चांदी बेचारे


गिरने की भी एक हद होती है प्यारे। लेकिन सोने-चांदी ने तो गिरावट की हर हद को ही पार कर दिया। इत्ता गिरे, इत्ता गिरे कि गिर-गिरकर अपना नाम और दाम दोनों को ही डूबो दिया। सोना-चांदी खुद तो डूबे ही साथ में न जाने कित्ते निवेशकों, व्यापरियों, कारीगरों को ले डूबे। देख रहा हूं सब डूब-डाबकर मातम मना रहे हैं। क्यों नहीं मनाएंगे मातम...। मातम तो उन्हें मनाना ही होगा। आखिर सोने-चांदी की चमक ने उनका दिमाग जो सातवें आसमान पर चढ़ाकर रख दिया था। अब जब दोनों खूब-खूब गिर चुके हैं, हर कोई इनसे बचने की सलाह दे रहा है। मगर लालची मन कहां मानने वाला है! आज सब सोने-चांदी की गिरावट पर मातम मना रहे हैं, कल को हो सकता है, बढ़त पर डांस भी करने लग जाएं। इसे ही इंसानी फितरत कहते हैं।

लेकिन यह ठीक ही हुआ। मैं देख करता था, जिनके कने ग्राम दो ग्राम सोना या किलो दो किलो चांदी थी, खुद को किसी धन-कुबेर से कम नहीं समझते थे। सड़क पर यों ऐंठ कर चलते थे मानो उनके सामने सब बौने हैं। रईसीयत उनके भीतर इस हद तक आ चुकी थी कि रुपए दो रुपए की वैल्यू ही नहीं समझते थे। कुछ बोलो तो कहते थे, 'हम सोने-चांदी में खेलने वाले लोग कहां रुपए दो रुपए के झंझट में पड़ें। हमारी औकत इनसे कहीं ज्यादा बड़ी है।' मगर अफसोस आज उन्हें अपनी औकात के भी लाले पड़ गए हैं।

प्यारे वक्त की मार देखो। सोना-चांदी के रईस आज सिर पर हाथ धरे अपनी किस्मत को रो रहे हैं। पीली धातु ने जो घुमकर पलटवार किया है, सब के सब चारों खाने चित्त हैं। मुझे तो डर है कहीं सदमें में न पहुंच जाएं।

कहते हैं, लत चाहे शराब-कबाब की हो या सोने-चांदी की बुरी ही होती है। कब, कौन, कहां पलटी मार जाए किसी का भरोसा नहीं रहता। लोग कहते नहीं थकते थे कि उन्हें खुद से ज्यादा सोने-चांदी की चमक पर भरोसा है। आज सोने-चांदी ने उसी भरोसे को धूल में मिला दिया है। न सिर्फ धूल में मिलाया बल्कि एक ऐसा शूल भी दे दिया जिसकी भरपाई इत्ती जल्दी संभव नहीं।

जो जित्ती तेजी से उठता है वो एक दिन उत्ती ही तेजी से धड़ाम भी होता है, यह नियम है। फिर प्यारे क्यों दुखी हो सोना-चांदी की इस गिरावट पर। अब तलक सोना-चांदी की बढ़त पर मजे लिए अब थोड़े दिन उसकी गिरावट का दर्द भी झेलो। ताकि पता तो चल सके गिरने का दर्द कैसा होता है।

सोने-चांदी की गिरावट पर जिन्हें दुखी होना है वे दुखी होएं या फिर जिन्हें मातम मनाना है वे मातम मनाएं किंतु मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं है। न मेरे कने सोने का भंडार है न चांदी की टकसाल। मेरे कने जो है वो न इनसे छिपा है न उनसे। मैं स्वतंत्र हूं अपनी खुशियों के संग-साथ। सोने-चांदी की चमक में पड़ना खामाखां की टेंशन मोल लेना है। यहां पहले ही टेंशने क्या कम हैं जो अतिरिक्त टेंशन पालूं।

सोने-चांदी से पाई रईसीयत भी क्या रईसीयत होती है। असली रईसीयत तो दिल की होती है। भाव चाहे कित्ता ही गिर जाए मगर दिल की मजबूती नहीं पिघलनी चाहिए।

ध्यान रखियो, सोना-चांदी तो हाथ का मैल हैं। इस मैल से हम जित्ता हो सके उत्ता दूर रहें तो ही अच्छा। वरना तो फिर खुद मालिक...।

जुबान की राजनीति


देखो प्यारे, जुबान और निगाह दोनों में ज्यादा फर्क नहीं होता। दोनों कभी भी, कहीं भी बहक सकती हैं। जुबान और निगाह का बहकना चरित्र में 'श्रीवृद्धि' करने में सहायक होता है। यह आपको दूसरों की निगाह में 'महान' बनाता है। निगाहों के बहकने का फलसफा जित्ता बेहतर आशिक समझते हैं, उत्ता कोई और नहीं समझ सकता। और, जुबान के बहकने का मजा तो राजनीति में रहकर नेता लोग उठा ही रहे हैं। वैसे, अब इसके छींटे साहित्य के दामन पर भी पड़ते नजर आने लगे हैं।

फिलहाल, यहां फोकस केवल जुबान की राजनीति पर रहेगा।

यह सुखद है कि हमारी राजनीति में जुबान के बहाने चर्चा में बने रहने के मामले लगतार बढ़ रहे हैं। हर नेता की यह तमन्ना रहती है कि वो बस जुबान की राजनीति करे। जुबान की राजनीति करने का राजनीतिक लाभ जहां संभव हो वहां उठाया जाए। देखिए, जुबान की राजनीति में नेता के कद का कोई महत्त्व नहीं रहता। कद चाहे जित्ता बड़ा या छोटा हो बस जुबान को बहकाने की प्रैक्टिस होनी चाहिए। जुबान का असर भी कुछ ऐसा रहे कि समाने वाला चारों खाने चित्त हो जाए। उसके साथ हमेशा काटो तो खून नहीं की स्थिति बनी रहे।

इन दिनों जिन नेता जी की जुबान जिस कायदे और लहजे में बहक रही है, उसका अपना ही मजा है। नेता जी जुबान हिला रहे हैं और मस्त सुर्खियां बटोर रहे हैं। हालांकि सियाने उनसे ऐसा न करने को कह रहे हैं पर नेता जी कहां मानने वाले हैं। उन्होंने तो सोच लिया है कि वे बस जुबान की राजनीति ही करेंगे।

यों भी राजनीति में रहकर जुबान की राजनीति करने में कोई बुराई भी नहीं है। यह नेताओं का राजनीतिक अधिकार है। सोचने वाली बात है कि नेता जुबान से राजनीति नहीं करेगा तो फिर भला किससे करेगा? कुछ नेताओं की कुर्सी ही जुबान के सहारे चल-फिर रही है। इसमें उन्हें परम-आनंद की अनुभूति होती है।

वैसे नेता जी जिन नेता जी पर जुबानी फिकरे कस रहे हैं, कभी वे उनके लंगोटिया यार हुआ करते थे। पर, राजनीति में कहां एक-दूसरे के लंगोट की फिक्र की जाती है। यहां तो हम दम हर किसी की यह कोशिश रहती है कि सामने वाले की लंगोट जित्ता जल्दी हो उत्ता जल्दी उतर या उतार ली जाए। इसमें शालीनता और अश्लीलता का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला हिसाब होता है यहां।

फिर भी अगर कोई राजनीति के बीच शुचिता या समानता के ख्वाब देखता है तो उसे मेरी सलाह कि वो यह न देखे क्योंकि राजनीति का स्तर अब जुबान केंद्रित हो चला है।

यही सब देख-सुनकर मैं हमारी राजनीति और हमारे नेताओं को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेता। बस उनके कहे-बोले का आनंद लेता रहता हूं। क्योंकि मुझे मालूम है कि वे सुधरेंगे नहीं और मैं उनको सुधरने के तईं बोलूंगा नहीं। तो फिर क्या फायदा ऐवईं अपने दिमाग को खोटी करने में! जहां, जिसकी, जैसी जुबान बहक रही है उसे बहकने दें और घर बैठे आनंद लें।

बस इत्ता ध्यान रखिए, जुबान की राजनीति में किसी का कोई सगा नहीं होता। दरअसल, अब यही राजनीति का 'वास्तविक तकाजा' भी है।

रविवार, 28 अप्रैल 2013

जियो प्यारे गेल

प्यारे क्रिस गेल, सचमूच तुम कमाल हो। क्या कमाल का धमाल मचाते हो। तुम्हारे इस धमाल पर मेरा दिल फिदा है। तुम्हारे करिशमाई खेल, तुम्हारे शांत व्यवहार को देखकर बेहद तसल्ली मिलती है। कित्ती सरलता से तुम खेलते हो। चाहे चौका जड़ो या छक्का रहते फिर भी कूल हो। बस हल्की-सी हंसी चेहरे पर लाकर अपनी खुशी का इजहार कर देते हो। तुम्हारी होठों पर हंसी के बीच तुम्हारे दांत मोतियों जैसी चमकते हैं।

अभी दो रोज पहले की ही तो बात है। क्या धांसू खेले तुम। तुम्हारे बल्ले ने चौकों-छक्कों से नीचे बात ही नहीं की। एक ही पारी में 17 छक्के और 13 चौके जड़कर तुमने क्रिकेट के धुरंधर वरिष्ठों को भी पीछे छोड़ दिया। नाबाद 175 रन ठोके, वो भी पूरी मस्ती के साथ। चेहरे पर कोई चिंता न लाए हुए।

तुम्हारे शांत चेहरे, शांत खेल को देखकर लगता है कि क्रिकेट ऐसे ही शांत मूड में खेला जाना चाहिए। पता नहीं खिलाड़ी लोग क्यों एक-दूसरे पर चौड़े या आक्रोशित होते रहते हैं।

प्यारे गेल, तुम्हारी खुश का इजहार करने का ढंग, डांस के साथ, मुझे बेहद पसंद आता है। मैदान पर तुम्हारा हल्का-फुल्का डांस कित्ता लाजवाब होता है। अक्सर मन करता है तुम्हारे अद्भूत डांसिंग स्टेप्स को फोलो करने का। खेल के साथ-साथ डांस का लुत्फ तुम्हीं ने लेना सिखाया है।

जिनके बल्ले में होगी आग वे अपनी आग अपने पास रखें मगर तुम्हारे बल्ले में आग नहीं तूफान है। एक मीठा तूफान। जिसकी गिरफ्त में आकर हर कोई तृप्त हो जाना चाहता है। ऐसा तृप्त करने का हुनर बहुत कम खिलाड़ियों में होता है।

तुम्हारे खेल को देखकर अक्सर मुझे महसूस होता है कि खेल ऐसा ही होना चाहिए। क्रीज पर खड़े-खड़े ही तुम आतिशी कमाल कर देते हो। फिर यह कमाल धमाल में बदल जाता है। उस दिन क्या मैदान, क्या घर, क्या दफ्तर हर कोई तुम्हारी आतिशी बल्लेबाजी के संगीत में डूबा जा रहा था। केवल बल्ले से संगीत तुम बजा रहे थे और मगन हम हुए जा रहे थे। गेंदबाज तो लग रहा था कि तुम्हारे बल्ले का मुरीद ही हो गया हो जैसे। गेंद फेंकने के बाद देख ही नहीं पा रहा था कि गेंद जा किधर रही है। कई दफा तो तुमने गेंद को मैदान ही लांघवा दिया था। उस दिन तो बेचारी गेंद भी तुमसे पनाह मांग गई होगी प्यारे गेल।

मैदान पर आज तलक धोनी ने भी इत्ता नहीं धोया होगा, जित्ता प्यार से तुम धोते हो। धोते हो तो बस धोते ही चले जाते हो। सामने वाले को मौका भी नहीं देते धुलाई के बाद सुस्ताने का। इत्ती मस्त ऐनर्जी कहां से पाई है तुमने प्यारे गेल।

सोचा रहा हूं, एक दफा तुम्हें अपने शहर में बुलाऊं। तुम्हारा आदर-सत्कार करवाऊं। युवाओं को बताऊं कि अगर खेलना है तो क्रिस गेल के जैसा खोलो वरना मत खेलो। खेल में पेशेंस का दामन कभी न छोड़ो, जैसाकि गेल में है।

प्यारे गेल, तुम्हारे खेल के आगे हर आग फेल है। तुम तो फुल इंटरटेनर हो।

मेरी दुआ है, तुम ऐसे ही खेल के सहारे धमाल मचाते रहो। तुम्हारे धमाल के साथ शायद क्रिकेट का रंग-ढंग कुछ और बदले; ऐसी मुझे उम्मीद है।

जियो प्यारे क्रिस गेल।

भाग मुशर्रफ भाग

भागना कोई बुरी बात नहीं। दुनिया में हर कोई किसी न किसी कारण भाग ही रहा है। कोई दर्द से मुक्ति पाने के लिए भाग रहा है, कोई पत्नी से बचने के लिए भाग रहा है, कोई पैसा कमाने के लिए भाग रहा है, कोई नेता बनने के लिए भाग रहा है, कोई पुरस्कार पाने के लिए भाग रहा है तो कोई सिर्फ इसीलिए भाग रहा है क्योंकि भागना उसकी नियति है। 

अब उस दिन अगर मियां मुशर्रफ गिरफ्तारी के डर से भागे तो क्या गलत भागे! न भागते तो तुरंत गिरफ्तार होकर अपनी बदनामी ही कराते। न भागते तो पूरी दुनिया को पता कैसे चलता कि मियां जनरल मुशर्रफ भाग भी सकते हैं। भागना तो मियां मुशर्रफ की आदत में शुमार है।

हालांकि मियां मुशर्रफ का भागना उन्हें ज्यादा राहत नहीं दे पाया। बाद में वे धर ही लिए गए लेकिन एक मिसाल तो कायम हो गई न जरनल के भागने की। मियां मुशर्रफ का भागना फिलहाल इतिहास में दर्जा पा गया है। अब दुनिया-समाज-विपक्ष-दुश्मन चाहे कुछ कहते, चाहे कुछ समझते रहें।

मियां मुशर्रफ को भागने की पुरानी प्रेक्टिस है। हालांकि जब तलक वे पाकिस्तान के राष्ट्रपति बनकर रहे, तब तलक उनने लोगों को खूब भगाया। भगा-भगाकर खूब परेशान किया। लेकिन जैसे ही उनके नीचे से राष्ट्रपति की कुर्सी सरकी, वैसे ही वे यहां-वहां भागते नजर आए। भागकर तकरीबन चार साल बाहर रहे। मगर वतन लौटते ही गिरफ्तारी के डर से फिर से भागना पड़ा। लेकिन यह भागना भी कोई भागना था। भागकर जाते कहां अपने ही फार्म हाउस में नजरबंद कर लिए गए मियां मुशर्रफ। हाय...।

कहते हैं, बड़े नसीब वाले होते हैं भागने वाले। भागने वालों का भाग्य बहुत तेजी से बदलता। प्रसिद्धि उन्हें बहुत जल्दी मिलती है। दुनिया उन्हें तुरंत पहचान लेती है। भागने वालों के नाम के आगे 'भगोड़ा' लग जाए फिर तो बात ही क्या है। सुना है, एक मामले में मियां मुशर्रफ भी 'भगोड़ा' शब्द से नवाजे जा चुके हैं। कोई नहीं..कोई नहीं.. 'भगोड़ा' कोई गाली थोड़े होता है। 'भगोड़ा' तो उसे कहते हैं, जो भागने में उस्ताद हो, जैसे मियां मुशर्रफ।

मेरा दवा है, मियां मुशर्रफ ने अगर पाकिस्तान में भागने-भगाने का ट्रेनिंग सेंटर खोला होता तो बहुत चलता। यों भी, आजकल के आदमी की पहली चाहत भागकर सबकुछ पाने की रहती है। और मियां मुशर्रफ ठहरे पुराने 'भगोड़े'। पाकिस्तानी आवाम को कम से कम यह हुनर तो मियां मुशर्रफ से सिखना ही चाहिए था।

सुना है, मियां मुशर्रफ काफी परेशान हैं। दीवारों के बीच कैद होकर रह गए हैं। जिस राजनीतिक खेल को खेलने वे वापस पाकिस्तान लौटे थे, उसमें पलीता लग चुका है। अब न उनके हाथ सत्ता की हनक रही न जरलन की पदवी। उनका गुरूर सिमटकर नजरबंदी में तब्दील हो गया है। अब तो यहां-वहां भागने से भी कुछ हासिल नहीं।

मियां मुशर्रफ के साथ हुआ तो जैसे को तैसा ही है। बे-कारण मुल्क और आवाम को भगाने वाला आज खुद ही भागने के इल्जाम में अंदर है। वैसे मियां मुशर्रफ ने भारत के अंदर भी उछल-कूद कुछ कम नहीं की है। इसके लिए उन्हें मुंह की भी खानी पड़ी है। बची-कुची अब अपनी जेल के अंदर खा रहे हैं।

नजरबंद मियां मुशर्रफ अब देखते हैं भागकर कहां जाते हैं। खबर है, उनके भागने पर अब सख्त पाबंदी लग चुकी है। बढ़िया है। चलो कुछ दिन तो मियां मुशर्रफ अपने भागने की थकान को जेल के भीतर मिटा सकेंगे। बाकी उनके खुदा पर निर्भर।