मंगलवार, 17 जुलाई 2012

पूनम पांडे पर पीएचडी


मैं पूनम पांडे पर 'पीएचडी' करना चाहता हूं। इस बहाने उन्हें और समझकर समाज को समझाना चाहता हूं। उनके बारे में स्थापित तमाम तरह की गलतफहमियों को दूर करना चाहता हूं। वे अपने खुले इरादों के प्रति कित्ती 'पारदर्शी' हैं इसे बताना चाहता हूं। उनके मन में बात-बात पर न्यूड होने की तमन्ना कैसे जागती है इसे जानना चाहता हूं। इसके अलावा मेरे मन में उनके प्रति और भी सद्-इच्छाएं हैं जिन्हें मैं उन तक रखना चाहता हूं।

पूनम पांडे पर पीएचडी करना मेरे तईं नई तरह का अनुभव रहेगा। मैं इस अनुभव की 'झनझनाहट' को समझ सकता हूं। मुझे उन अनुभवों को लेने में ज्यादा आनंद आता है जिसमें उत्तेजना अंत तक बनी रहे। और, पूनम पांडे में इस उत्तेजना को मैं साफ देख व महसूस कर सकता हूं। उनकी यही उत्तेजना मेरी पीएचडी में जान डाल सकती है। मुझे जीवन में वो सब पाने का मौका प्रदान कर सकती है, जिसकी कल्पना भी मैंने कभी नहीं की होगी।

जानता हूं..जानता हूं समाज के बहुत से सियाने केवल इस बात पर ही मुंह बिगाड़ लेंगे कि मैंने पीएचडी के लिए पूनम पांडे को चुना। वे इस कदर मुझसे नाराज रहेंगे कि मेरी पीएचडी को पढ़ना तो दूर उस पर बात तक करना पसंद नहीं करेंगे। मुझे वे उसी दोयम स्थान पर रखेंगे जहां पर पूनम पांडे को रखते हैं। अपनी मित्रमंडली और मेरे आजू-वाजू में किसिम-किसिम की नकारात्मक खबरें-अफवाहें फैलाएंगे। मैं अपनी सोच और लेखन में किस हद तक गिर चुका हूं फेसबुक पर लिख-लिख कर मुझे ताने मारेंगे।

मगर बताए देता हूं सब कान खोलकर सुन लो कि मैं किसी की परवाह नहीं करने वाला। मेरे इरादे पूनम पांडे के कपड़ों जित्ते पारदर्शी हैं। अगर वे लड़की होकर खुलेआम खुद को न्यूड कर सकती हैं तो क्या मैं लड़का होकर उनकी न्यूडिटी की प्रसांगिकता को पीएचडी के बहाने प्रसांगिक नहीं बना सकता? अवश्य बना सकता हूं और बनाकर ही दम लूंगा। और हां उन सियानों को मैं अच्छे से जानता हूं जो मुंह में बीवी का नाम और तकिए के नीचे पूनम पांडे की तस्वीर को रखकर सोते हैं।

मैं इसे पूनम पांडे की महानता मानता हूं कि वे दूसरे की खुशियों-सफलताओं में हिस्सेदारी करने के लिए खुद को न्यूड करने में रत्ती भर भी गुरेज नहीं करतीं। आज के 'शुष्क समय' में इत्ते त्याग की भावना भला किसी के अंदर मिलेगी? कपड़े उतारना या अपनी त्वचा का प्रदर्शन करना कोई बुरी बात नहीं। इससे नेम और फेम दोनों ही करीब रहते हैं। जब सलमान खान झट्ट से शर्ट उतारने में कोई शर्म महसूस नहीं करता तो फिर पूनम पांडे क्यों और किसलिए करें? यह भी उत्तर-आधुनिकता का एक हिस्सा है प्यारे।
बस, इन्हीं कुछ दिलचस्प खूबियों ने मुझे पूनम पांडे पर पीएचडी करने के लिए उत्तेजित किया है। इस उत्तेजना का अपना ही मजा है। पूनम पांडे जिस हद तक खुद को बोल्ड बनाती जाएंगी, मेरी पीएचडी के लेखन में उत्ते ही चार-चांद लगते जाएंगे।

फिलहाल, अभी काम बहुत है। पूनम पांडे से मिलकर उनसे उनकी 'वस्त्र-उतारू कला' के बारे में बहुत कुछ जानना-समझना-पूछना-खोजना है। जब रिसर्च वर्क पूरा हो जाएगा, उसके बाद पीएचडी लेखन का उत्साह ही गजब होगा। तब तलक आप सब धैर्य धरें।

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