सोमवार, 16 जुलाई 2012

मध्य वर्ग क्या जाने गेहूं-चावल का स्वाद!


अरे...अरे...अरे...चिदंबरम साहब तनिक सुनिए तो...आप जरा भी टेंशन मत लीजिए। आपने मध्य वर्ग की हैसियत पर जो टिप्पणी की है सौ फीसद उचित है। कोई करे या न करे मगर मैं आपकी कथित टिप्पणी का दिल से समर्थन करता हूं। आपके नैतिक दिव्य-ज्ञान पर कुर्बान जाता हूं। यूं भी सच हमेशा कड़वा होता है अगर उसे इस लहजे में बोला जाए। लेकिन आप परेशान न हों हमारा मध्य वर्ग इस टिप्पणी को खुशी-खुशी झेल जाएगा। उसकी झेलनशक्ति गजब की है।

एक मध्य वर्ग ही क्यों इस देश का हर वर्ग अपनी-अपनी तरह की झेलनशक्ति के वास्ते मशहूर है साहब। तब ही तो जब यहां-वहां विस्फोट आदि होते हैं, कुछ मध्य या निम्न वर्ग के लोग मारे जाते हैं, उस पर आपके वीररस पूर्ण बयान आते हैं, ये वर्ग उस सब को भी अपनी झेलनशक्ति में लपेटकर पी जाता है। और आप या किसी और से उर्फ तक नहीं करता। क्या करें चिदंबरम साहब ये सब अपनी-अपनी आदतों से मजबूर हैं। कई दफा मैंने इन्हें समझाया कि यूं नेताओं-मंत्रियों के दिव्य बयानों-टिप्पणियों पर खामोश मत रहा करो, तुरंत प्रतिवाद किया करो लेकिन साहब ये वर्ग सुनने-समझने को तैयार ही नहीं। कहता है, नेताओं-मंत्रियों के कुछ भी कहे को झेलने की अब आदत-सी हो गई है।
लेकिन...लेकिन चिदंबरम साहब आप नन्ही-सी भी टेंशन मत लें ये वर्ग आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। आपसे गुजारिश है कि आप अपने कथित बयान पर अक्षरशः कायम रहें। आखिर आप मंत्री हैं, आपका रुतबा किसी भी मध्य या निम्न वर्ग से कहीं ज्यादा ऊंचा है। आपकी जय हो।

दरअसल, चिदंबरम साहब यह मध्य वर्ग बड़ा एलिट किस्म का वर्ग है। यह हो-हल्ला अधिक काटता है, सोचता कम। कम से कम आपकी टिप्पणी पर ठंडे दिमाग से सोचने-विचारने की जहमत तो फरमाता। आखिर आपकी टिप्पणी में गलत ही क्या है कि 'मध्य वर्ग 15 रुपए में एक बोतल पानी और 20 रुपए में एक आइसक्रीम कोन खरीदने के लिए तो तैयार रहता है, लेकिन गेहूं-चावल पर एक रुपए की बढ़ोत्तरी का विरोध करता है।' वैसे भी एक रुपए की औकात ही क्या है आज के इत्ते महंगे समय में।

बात दूं चिदंबरम साहब यह मध्य वर्ग खुद भी गेहूं-चावल नहीं खाता। कुछ को तो गेहूं-चावल का टेस्ट तक पता नहीं है साहब। ये तो सिर्फ ठंडा मतलब कोको-कोला, पिज्जा-बर्गर, चाट-पकौड़ी, चिकन-कबाब आदि-आदि पर जिंदा रहता है। देखा नहीं था आपने अण्णा आंदोलन के दौरान किस तरह से यही मध्य वर्ग आइसक्रीम खा-खाकर सरकार और प्रधानमंत्री जी के खिलाफ नारे लगा रहा था। उस दौरान कित्ती फजीहत की थी इसी मध्य वर्ग ने सरकार की। और आज आपकी जरा-सी टिप्पणी को लेकर बुरा मान गया है।

किंतु चिदंबरम साहब आप छटांक भर भी टेंशन मत लीजिए। आरम से रहिए। आपने कुछ गलत नहीं कहा। आदत होती है कुछ लोगों की राई का पहाड़ बनाने की। मध्य वर्ग इसी कैटेगिरी में आता है। हकीकत तो यह है कि मध्य वर्ग हमारे नेताओं-मंत्रियों की भावनाओं को समझता ही नहीं। बेचारे नेता-मंत्री लोग किस संजीदगी के साथ देश के प्रत्येक वर्ग की बेहतरी के वास्ते दिनभर लगे रहते हैं। न रोटी की फिकर रहती है न खाने की चिंता रहती है उन्हें। जन-सेवा का भाव बड़ा गहरा होता है हमारे नेताओं-मंत्रियों के भीतर।

खैर, कोई नहीं चिदंबरम साहब आप सुई की नोंक के बराबर भी व्यथित न हों अब तक तो मध्य वर्ग आपके कहे को भूल भी गया होगा। आप बिल्कुल मस्त रहिए। ऐसे छोटे-मोटे बयान-टिप्पणियां तो राजनीति में चलती रहती हैं। आपकी जय हो।

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