सोमवार, 16 जुलाई 2012

बे-कण हुए भगवान


सुनो प्यारे भगवान विज्ञान ने तुम्हें कण-कण में से निकालकर बे-कण कर दिया है। तुम्हारे कण-कण में छिपे रहस्यों को भी खोज लिया गया है। महा-प्रयोग ने तुम्हारे महा-व्यक्तित्व को कित्ता आसान बना दिया है, इसे तुम भी जान लो। तुम्हारे कण-कण पर से उठे आवरण, हमें तुम्हें और नजदीक से जानने में सहायता कर रहे हैं।

मगर देख-पढ़ रहा हूं तुम्हारे प्रिय भक्तों को तुम्हारा यूं बे-कण होना रास नहीं आ रहा है। उनके पेट और आस्थाओं में बसी बेचैनी दि-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है। तुम्हारा बे-कण होना समझो उनकी अवैज्ञानिक विश्वासों पर टिकी दुनिया के उजड़ने जैसा प्रतीत हो रहा है। सुनो भगवान तुम्हारे पुजारी भक्तों की दुकानदारी खतरे में आ चुकी है। विज्ञान की ताकत ने वो कर दिखाया है, जिसकी कल्पना कभी तुमने भी अपने जीवन में नहीं की होगी प्यारे भगवान।

यूं भी विज्ञान ने तुम्हारे कण-कण को खोजकर गलत भी क्या किया है? आखिर एक-न-दिन तो यह होना ही था। कब तलक तुम विज्ञान की खोज और जिज्ञासा से बचकर रह सकते थे। तुम्हें बे-कण कर अब विज्ञान तुम्हारे बारे में सटीक जानकारी दुनिया के सामने रखेगा। तुम्हें पौराणिक अख्यानों व कल्पित मिथकों से बाहर निकालकर वैज्ञानिक तौर-तरीकों से समझा-जाना जाएगा। कण-कण में भगवान कैसे और क्यों रहते हैं, इसे जानना किसी रोमांच से कम नहीं।

अपन तो जाने कब से कहते चले आए हैं कि आस्थाओं पर हमेशा विज्ञान भारी रहा है। और हमेशा ही रहेगा। जहां से आस्थाओं की दीवारें दरकने लगती हैं, वहां से विज्ञान के ज्ञान की शुरूआत होती है। विज्ञान के ज्ञान का सुख बिना खोज नहीं उठाया जा सकता। लेकिन इस अति-आस्थावान दुनिया का क्या करें जिसने बिना भगवान को समझे उन पर अपना हक जतलाना शुरू कर दिया। कहीं मठ बने, कहीं काबे बने, कहीं चर्च बने पर उन सब में भगवान का अस्तित्व रहस्य ही बना रहा। भगवान अपने नाम पर हो रहे उलटे-सीधे कामों का हिसाब खुद ही रखता पर मौन रहता। मौन न रहता तो क्या करता क्योंकि बेमतलब की आस्थाओं पर कायम विश्वास ज्यादा दूर तलक नहीं चल पाते, इसे भगवान भी जानता है।

इसलिए तो भगवान इस महा-प्रयोग पर चुप है। चाहे भक्तों को न हो पर भगवान को अपने बे-कण होने की खुशी है। अगर खुशी न होती तो अब तलक भगवान विज्ञान के दावे को चुनौती दे चुका होता। दरअसल, भगवान खुद भी अपने कण-कण के रहस्य से परेशान हो गया था प्यारे।

इस खोज के बहाने विज्ञान ने खुद को साबित कर बता दिया कि दुनिया में जो कुछ भी है उसके पीछे कोई-न-कोई वैज्ञानिक तथ्य अवश्य मौजूद है। हो सकता है आगे चलकर इस महा-प्रयोग से भगवान के रहने-खाने-पीने, चलने-टलने-मचलने आदि का पता भी मिल सके। आखिर कण-कण का बे-कण होना कुछ तो कारण बतलाएगा ही।

इस तरह भगवान का आम होना कित्ता सुखद है इसे अपन समझ सकते हैं। विज्ञान की भगवान पर यह जीत बताती है कि यहां कुछ भी संभव नहीं। हां, जिन्हें इस जीत में ऐब नजर आते हैं, उनकी नजरें बंद हैं। और हमेशा बंद रहेंगी। जब भगवान को अपने बे-कण होने पर कोई ऐतराज नहीं तो भगवानवादी क्यों टेंशन लेते हैं! आइए, महा-प्रयोग की इस सफलता का आनंद लें और कण-कण में हैं भगवान को अपने करीब खुलता हुआ महसूस करें। यही तो भगवान पर विज्ञान की जीत है प्यारे।

कोई टिप्पणी नहीं: