मंगलवार, 17 जुलाई 2012

पूनम नहीं 'उत्तेजना पांडे' कहो प्यारे


पूनम पांडे तो बस पूनम पांडे हैं। एक दफा जो मन में ठान लेती हैं करके ही दम लेती हैं। 'दूसरे की सफलता' को अपना समझ हर वक्त, हर किसी के वास्ते 'न्यूड' होने को एकदम तैयार। अपने बदन के 'खुल्ले प्रदर्शन' का भाव उनके भीतर कूट-कूट कर भरा है। न्यूड होना पूनम पांडे के लिए खाना खाने जैसा है। जब भूख लगी खुद ही थाली परोसी और तृप्त होने बैठ गए। खुद को अपने ही द्वारा तृप्त कर लेना बड़ी बात है प्यारे। इस मामले में 'लोग क्या कहेंगे' कि परवाह तो वे करती ही नहीं। 'लोगों का काम है कहना' कह हंसकर टाल देती हैं। अपनी न्यूडिटी के प्रति उनके इरादे हर वक्त मजबूत बने रहते हैं। उन्हें बधाई।

सच्ची कहते हैं पूनम पांडे की इस 'बिंदास अदा' पर ही तो अपन मरते हैं। ऐसा समझ लीजिए कि अपन पूनम पांडे के तहे-दिल से मुरीद हैं। जहां जिक्र-ए-पूनम पांडे हो और अपनी उपस्थिति न हो ऐसा हो ही नहीं सकता! पूनम पांडे के भीतर एक 'आग' है अपन को उस आग में 'जलना' अच्छा लगता है। हालांकि परंपरावादियों को पूनम पांडे की आग अंदर तक 'झुलसा' जाती है मगर क्या करें थोड़ी-बहुत देर झुलस कर बेचारे खुद ही शांत पड़ जाते हैं। यूं भी इन दिनों तापमान इत्ता गर्म है कि दूसरी किसी गर्मी को सहन कर पाना हर किसी के बस की बात नहीं प्यारे।

गाहे-बगाहे पूनम पांडे का न्यूड होना अपन को उस स्त्री-विमर्श से कहीं बेहतर लगता है जहां स्त्री शरीर के नाम पर केवल 'बौद्धिकता की शाब्दिक जुगालियां' प्रगतिशीलों के बीच चलती रहती हैं। इत्ते बरस बीत जाने के बाद भी वहां बहस 'कमर से ऊपर' और 'कमर से नीचे' की स्त्री से एक इंच भी आगे-पीछे नहीं सरक पाई है। स्त्री के शरीर को लेकर वहां इच्छाएं तो सबकी 'रसीली' हैं लेकिन क्या करें उस 'उत्तर-आधुनिक प्रगतिशील विमर्श' का जहां किस्म-किस्म की 'वैचारिक मजबूरियां' बीच राह हैं। बेशक पूनम पांडे के कने 'वैचारिकता के बंधन' न हो मगर उनमें 'उत्तेजना' बहुत हैं। बस, यही उत्तेजना तो शुचितावादियों से लेकर प्रगतिवादियों तक के पेट का हजामा ढीला किए हुए है। सही मायने में तो वे पूनम नहीं बल्कि 'उत्तेजना पांडे' हैं। और अपनी उत्तेजना पर उन्हें खासा गर्व भी है।

पूनम पांडे वे हैं जिनकी उत्तेजनामय न्यूडिटी पर एक नहीं कई-कई महाग्रंथ लिखे जा सकते हैं। युगों-युगों से ऐसी उत्तेजनामय अप्सराएं धरती पर जन्म लेती रही हैं। जिनकी सुबह खुद को प्रदर्शित करने से होती है और रात भी इसी पर आन कर खत्म होती है। शर्म का जिनसे दूर-दूर तलक कोई आस्ता-वास्ता नहीं रहता। चंद पलों या दिनों की सफलता या सुर्खियां पाने की खातिर वे कुछ भी कह-कर-दिखा सकती हैं। उनके भीतर अपनी न्यूडिटी को लेकर कोई वैचारिक मंथन भले ही न हो मगर एक आग हमेशा रहती हैं, जिसे वो हर वक्त यहां-वहां जलाए रखना चाहती हैं। पूनम पांडे उसी आग, उसी उत्तेजना का एक मशहूर नाम है।

लेकिन प्यारे अपन को क्या मतलब इसकी-उसकी वैचारिका प्रतिबद्धता से। अपन तो मस्त हैं पूनम पांडे की अदा और उत्तेजना से। जिन्हें पूनम पांडे के न्यूड होने पर 'सख्त ऐतराज' हैं, वे अपने ऐतराज अपने कने रखें, अपन बे-ऐतराज ही ठीक हैं। अपन तो बस इत्ता मानकर चलते हैं कि जहां आग होगी वहां उत्तेजना के कुछ शोले तो भड़केंगे ही भड़केंगे। पूनम पांडे की उत्तेजना को अपन का सलाम।

पूनम पांडे पर पीएचडी


मैं पूनम पांडे पर 'पीएचडी' करना चाहता हूं। इस बहाने उन्हें और समझकर समाज को समझाना चाहता हूं। उनके बारे में स्थापित तमाम तरह की गलतफहमियों को दूर करना चाहता हूं। वे अपने खुले इरादों के प्रति कित्ती 'पारदर्शी' हैं इसे बताना चाहता हूं। उनके मन में बात-बात पर न्यूड होने की तमन्ना कैसे जागती है इसे जानना चाहता हूं। इसके अलावा मेरे मन में उनके प्रति और भी सद्-इच्छाएं हैं जिन्हें मैं उन तक रखना चाहता हूं।

पूनम पांडे पर पीएचडी करना मेरे तईं नई तरह का अनुभव रहेगा। मैं इस अनुभव की 'झनझनाहट' को समझ सकता हूं। मुझे उन अनुभवों को लेने में ज्यादा आनंद आता है जिसमें उत्तेजना अंत तक बनी रहे। और, पूनम पांडे में इस उत्तेजना को मैं साफ देख व महसूस कर सकता हूं। उनकी यही उत्तेजना मेरी पीएचडी में जान डाल सकती है। मुझे जीवन में वो सब पाने का मौका प्रदान कर सकती है, जिसकी कल्पना भी मैंने कभी नहीं की होगी।

जानता हूं..जानता हूं समाज के बहुत से सियाने केवल इस बात पर ही मुंह बिगाड़ लेंगे कि मैंने पीएचडी के लिए पूनम पांडे को चुना। वे इस कदर मुझसे नाराज रहेंगे कि मेरी पीएचडी को पढ़ना तो दूर उस पर बात तक करना पसंद नहीं करेंगे। मुझे वे उसी दोयम स्थान पर रखेंगे जहां पर पूनम पांडे को रखते हैं। अपनी मित्रमंडली और मेरे आजू-वाजू में किसिम-किसिम की नकारात्मक खबरें-अफवाहें फैलाएंगे। मैं अपनी सोच और लेखन में किस हद तक गिर चुका हूं फेसबुक पर लिख-लिख कर मुझे ताने मारेंगे।

मगर बताए देता हूं सब कान खोलकर सुन लो कि मैं किसी की परवाह नहीं करने वाला। मेरे इरादे पूनम पांडे के कपड़ों जित्ते पारदर्शी हैं। अगर वे लड़की होकर खुलेआम खुद को न्यूड कर सकती हैं तो क्या मैं लड़का होकर उनकी न्यूडिटी की प्रसांगिकता को पीएचडी के बहाने प्रसांगिक नहीं बना सकता? अवश्य बना सकता हूं और बनाकर ही दम लूंगा। और हां उन सियानों को मैं अच्छे से जानता हूं जो मुंह में बीवी का नाम और तकिए के नीचे पूनम पांडे की तस्वीर को रखकर सोते हैं।

मैं इसे पूनम पांडे की महानता मानता हूं कि वे दूसरे की खुशियों-सफलताओं में हिस्सेदारी करने के लिए खुद को न्यूड करने में रत्ती भर भी गुरेज नहीं करतीं। आज के 'शुष्क समय' में इत्ते त्याग की भावना भला किसी के अंदर मिलेगी? कपड़े उतारना या अपनी त्वचा का प्रदर्शन करना कोई बुरी बात नहीं। इससे नेम और फेम दोनों ही करीब रहते हैं। जब सलमान खान झट्ट से शर्ट उतारने में कोई शर्म महसूस नहीं करता तो फिर पूनम पांडे क्यों और किसलिए करें? यह भी उत्तर-आधुनिकता का एक हिस्सा है प्यारे।
बस, इन्हीं कुछ दिलचस्प खूबियों ने मुझे पूनम पांडे पर पीएचडी करने के लिए उत्तेजित किया है। इस उत्तेजना का अपना ही मजा है। पूनम पांडे जिस हद तक खुद को बोल्ड बनाती जाएंगी, मेरी पीएचडी के लेखन में उत्ते ही चार-चांद लगते जाएंगे।

फिलहाल, अभी काम बहुत है। पूनम पांडे से मिलकर उनसे उनकी 'वस्त्र-उतारू कला' के बारे में बहुत कुछ जानना-समझना-पूछना-खोजना है। जब रिसर्च वर्क पूरा हो जाएगा, उसके बाद पीएचडी लेखन का उत्साह ही गजब होगा। तब तलक आप सब धैर्य धरें।

सोमवार, 16 जुलाई 2012

मध्य वर्ग क्या जाने गेहूं-चावल का स्वाद!


अरे...अरे...अरे...चिदंबरम साहब तनिक सुनिए तो...आप जरा भी टेंशन मत लीजिए। आपने मध्य वर्ग की हैसियत पर जो टिप्पणी की है सौ फीसद उचित है। कोई करे या न करे मगर मैं आपकी कथित टिप्पणी का दिल से समर्थन करता हूं। आपके नैतिक दिव्य-ज्ञान पर कुर्बान जाता हूं। यूं भी सच हमेशा कड़वा होता है अगर उसे इस लहजे में बोला जाए। लेकिन आप परेशान न हों हमारा मध्य वर्ग इस टिप्पणी को खुशी-खुशी झेल जाएगा। उसकी झेलनशक्ति गजब की है।

एक मध्य वर्ग ही क्यों इस देश का हर वर्ग अपनी-अपनी तरह की झेलनशक्ति के वास्ते मशहूर है साहब। तब ही तो जब यहां-वहां विस्फोट आदि होते हैं, कुछ मध्य या निम्न वर्ग के लोग मारे जाते हैं, उस पर आपके वीररस पूर्ण बयान आते हैं, ये वर्ग उस सब को भी अपनी झेलनशक्ति में लपेटकर पी जाता है। और आप या किसी और से उर्फ तक नहीं करता। क्या करें चिदंबरम साहब ये सब अपनी-अपनी आदतों से मजबूर हैं। कई दफा मैंने इन्हें समझाया कि यूं नेताओं-मंत्रियों के दिव्य बयानों-टिप्पणियों पर खामोश मत रहा करो, तुरंत प्रतिवाद किया करो लेकिन साहब ये वर्ग सुनने-समझने को तैयार ही नहीं। कहता है, नेताओं-मंत्रियों के कुछ भी कहे को झेलने की अब आदत-सी हो गई है।
लेकिन...लेकिन चिदंबरम साहब आप नन्ही-सी भी टेंशन मत लें ये वर्ग आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। आपसे गुजारिश है कि आप अपने कथित बयान पर अक्षरशः कायम रहें। आखिर आप मंत्री हैं, आपका रुतबा किसी भी मध्य या निम्न वर्ग से कहीं ज्यादा ऊंचा है। आपकी जय हो।

दरअसल, चिदंबरम साहब यह मध्य वर्ग बड़ा एलिट किस्म का वर्ग है। यह हो-हल्ला अधिक काटता है, सोचता कम। कम से कम आपकी टिप्पणी पर ठंडे दिमाग से सोचने-विचारने की जहमत तो फरमाता। आखिर आपकी टिप्पणी में गलत ही क्या है कि 'मध्य वर्ग 15 रुपए में एक बोतल पानी और 20 रुपए में एक आइसक्रीम कोन खरीदने के लिए तो तैयार रहता है, लेकिन गेहूं-चावल पर एक रुपए की बढ़ोत्तरी का विरोध करता है।' वैसे भी एक रुपए की औकात ही क्या है आज के इत्ते महंगे समय में।

बात दूं चिदंबरम साहब यह मध्य वर्ग खुद भी गेहूं-चावल नहीं खाता। कुछ को तो गेहूं-चावल का टेस्ट तक पता नहीं है साहब। ये तो सिर्फ ठंडा मतलब कोको-कोला, पिज्जा-बर्गर, चाट-पकौड़ी, चिकन-कबाब आदि-आदि पर जिंदा रहता है। देखा नहीं था आपने अण्णा आंदोलन के दौरान किस तरह से यही मध्य वर्ग आइसक्रीम खा-खाकर सरकार और प्रधानमंत्री जी के खिलाफ नारे लगा रहा था। उस दौरान कित्ती फजीहत की थी इसी मध्य वर्ग ने सरकार की। और आज आपकी जरा-सी टिप्पणी को लेकर बुरा मान गया है।

किंतु चिदंबरम साहब आप छटांक भर भी टेंशन मत लीजिए। आरम से रहिए। आपने कुछ गलत नहीं कहा। आदत होती है कुछ लोगों की राई का पहाड़ बनाने की। मध्य वर्ग इसी कैटेगिरी में आता है। हकीकत तो यह है कि मध्य वर्ग हमारे नेताओं-मंत्रियों की भावनाओं को समझता ही नहीं। बेचारे नेता-मंत्री लोग किस संजीदगी के साथ देश के प्रत्येक वर्ग की बेहतरी के वास्ते दिनभर लगे रहते हैं। न रोटी की फिकर रहती है न खाने की चिंता रहती है उन्हें। जन-सेवा का भाव बड़ा गहरा होता है हमारे नेताओं-मंत्रियों के भीतर।

खैर, कोई नहीं चिदंबरम साहब आप सुई की नोंक के बराबर भी व्यथित न हों अब तक तो मध्य वर्ग आपके कहे को भूल भी गया होगा। आप बिल्कुल मस्त रहिए। ऐसे छोटे-मोटे बयान-टिप्पणियां तो राजनीति में चलती रहती हैं। आपकी जय हो।

बे-कण हुए भगवान


सुनो प्यारे भगवान विज्ञान ने तुम्हें कण-कण में से निकालकर बे-कण कर दिया है। तुम्हारे कण-कण में छिपे रहस्यों को भी खोज लिया गया है। महा-प्रयोग ने तुम्हारे महा-व्यक्तित्व को कित्ता आसान बना दिया है, इसे तुम भी जान लो। तुम्हारे कण-कण पर से उठे आवरण, हमें तुम्हें और नजदीक से जानने में सहायता कर रहे हैं।

मगर देख-पढ़ रहा हूं तुम्हारे प्रिय भक्तों को तुम्हारा यूं बे-कण होना रास नहीं आ रहा है। उनके पेट और आस्थाओं में बसी बेचैनी दि-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है। तुम्हारा बे-कण होना समझो उनकी अवैज्ञानिक विश्वासों पर टिकी दुनिया के उजड़ने जैसा प्रतीत हो रहा है। सुनो भगवान तुम्हारे पुजारी भक्तों की दुकानदारी खतरे में आ चुकी है। विज्ञान की ताकत ने वो कर दिखाया है, जिसकी कल्पना कभी तुमने भी अपने जीवन में नहीं की होगी प्यारे भगवान।

यूं भी विज्ञान ने तुम्हारे कण-कण को खोजकर गलत भी क्या किया है? आखिर एक-न-दिन तो यह होना ही था। कब तलक तुम विज्ञान की खोज और जिज्ञासा से बचकर रह सकते थे। तुम्हें बे-कण कर अब विज्ञान तुम्हारे बारे में सटीक जानकारी दुनिया के सामने रखेगा। तुम्हें पौराणिक अख्यानों व कल्पित मिथकों से बाहर निकालकर वैज्ञानिक तौर-तरीकों से समझा-जाना जाएगा। कण-कण में भगवान कैसे और क्यों रहते हैं, इसे जानना किसी रोमांच से कम नहीं।

अपन तो जाने कब से कहते चले आए हैं कि आस्थाओं पर हमेशा विज्ञान भारी रहा है। और हमेशा ही रहेगा। जहां से आस्थाओं की दीवारें दरकने लगती हैं, वहां से विज्ञान के ज्ञान की शुरूआत होती है। विज्ञान के ज्ञान का सुख बिना खोज नहीं उठाया जा सकता। लेकिन इस अति-आस्थावान दुनिया का क्या करें जिसने बिना भगवान को समझे उन पर अपना हक जतलाना शुरू कर दिया। कहीं मठ बने, कहीं काबे बने, कहीं चर्च बने पर उन सब में भगवान का अस्तित्व रहस्य ही बना रहा। भगवान अपने नाम पर हो रहे उलटे-सीधे कामों का हिसाब खुद ही रखता पर मौन रहता। मौन न रहता तो क्या करता क्योंकि बेमतलब की आस्थाओं पर कायम विश्वास ज्यादा दूर तलक नहीं चल पाते, इसे भगवान भी जानता है।

इसलिए तो भगवान इस महा-प्रयोग पर चुप है। चाहे भक्तों को न हो पर भगवान को अपने बे-कण होने की खुशी है। अगर खुशी न होती तो अब तलक भगवान विज्ञान के दावे को चुनौती दे चुका होता। दरअसल, भगवान खुद भी अपने कण-कण के रहस्य से परेशान हो गया था प्यारे।

इस खोज के बहाने विज्ञान ने खुद को साबित कर बता दिया कि दुनिया में जो कुछ भी है उसके पीछे कोई-न-कोई वैज्ञानिक तथ्य अवश्य मौजूद है। हो सकता है आगे चलकर इस महा-प्रयोग से भगवान के रहने-खाने-पीने, चलने-टलने-मचलने आदि का पता भी मिल सके। आखिर कण-कण का बे-कण होना कुछ तो कारण बतलाएगा ही।

इस तरह भगवान का आम होना कित्ता सुखद है इसे अपन समझ सकते हैं। विज्ञान की भगवान पर यह जीत बताती है कि यहां कुछ भी संभव नहीं। हां, जिन्हें इस जीत में ऐब नजर आते हैं, उनकी नजरें बंद हैं। और हमेशा बंद रहेंगी। जब भगवान को अपने बे-कण होने पर कोई ऐतराज नहीं तो भगवानवादी क्यों टेंशन लेते हैं! आइए, महा-प्रयोग की इस सफलता का आनंद लें और कण-कण में हैं भगवान को अपने करीब खुलता हुआ महसूस करें। यही तो भगवान पर विज्ञान की जीत है प्यारे।