गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

बस, इंजॉय करो महंगाई को

प्यारे, महंगाई पर इत्ता रोना-धोना ठीक नहीं। महंगाई हमारे समय का सबसे 'उम्दा सच' है, अतः इसे केवल इंजॉय करो..केवल इंजॉय। महंगाई को जित्ता इंजॉय करोगे, यह तुम्हें उत्ता ही सुख देगी। व्यवस्थागत दुखों को हर कर, मैनीजिएवील सुख देना महंगाई की प्रवृति है। महंगाई हमें आर्थिक स्तर पर सशक्त और सहज बनाती है। उटपटांग खरजों को कम कर, चादर में रहना सिखलाती है। आमदनी अठ्ठनी, खरजा रुपइया की अवधारणा को धारणा बनाने से रोकती है। हद दरजे तक पेटू हो चुके लोगों को खाने का उचित सलीका समझाती है। बहानों-बहानों में ही महंगाई हमारे साथ वो सबकुछ कर जाती है, जिसकी कल्पना हमने सदियों पीछे भी नहीं की होगी।
इस उस तरह के खरचों या बढ़ती कीमतों के वास्ते महंगाई को दोष देना ठीक नहीं है। महंगाई कभी भी खुद ने नहीं बढ़ती। महंगाई को बढ़ाने और घटाने में सरकार और नेता ही जिम्मेदार होते हैं। महंगाई तो एक तरह से भैंस के समान है, उसे जहां मोड़ दोगे, वहां वो चलती चली जाएगी। इसीलिए महंगाई सामाजिक व आर्थिक मामलों में कभी भी अपनी अक्ल नहीं लगाती। महंगाई की अक्ल की चाबी तो सरकार और वित्तमंत्री के कने होवे है। जहां से जित्ती भर दी जाती है, वहां से वो उत्ता ही काम करना शुरू कर देती है।
बात भी वाजिब है कि महंगाई क्योंकर अपनी अक्ल लगाए! जब बिन अक्ल लगाए ही उसे तमाम लाभ मुफत में मिल रहे हैं, तो क्या फायदा अतिरिक्त बोझ को लेकर। महंगाई पर अक्ल वो खरजा करें, जिन्हें इससे किसी प्रकार की तकलीफ या मोहब्बत है। यूं भी मैंने ज्यादातर को महंगाई पर किस्म-किस्म की तकलीफें ही बयान करते सुना है। हाय! महंगाई, हाय! महंगाई की छाती पीट-पीटकर खुद का और सरकार का भी जीना मुहाल किए रहते हैं। जहां नन्हीं-सी कीमतें बढ़ीं सियाने टी.वी. चैनलों और सड़कों-चौराहों पर निकल पड़े अपनी-अपनी विद्वता और उद्दंडता का प्रदर्शन करने। बेशक उनकी कमाई का अलां से लेकर फलां तक कोई ओर-छोर न हो लेकिन जनता के कने हमदर्दी ऐसी जतलाएंगे, ऐसी जतलाएंगे कि बस कुछ पूछिए ही नहीं। लगेगी कि सारी दुनिया की महंगाई और गरीबी की चिंता का बोझ एक अकेले जै ही उठा रहे हैं। कैसी पागलपंती है! महंगाई से मोहब्बत तो सिर्फ मेरे जैसे बेफिक्र ही किया करते हैं।
महंगाई पर पुतले फूंकने वाले सियाने कभी इस बात पर अफसोस जतलाते हुए नहीं दीखते कि हाय! हमारी सैलरी में तो सरकार ने इजाफा कर दिया मगर गरीब और बेरोजगार तो अभी तलक वहीं के वहीं हैं। या अपनी बढ़ी सैलरी का आधा भाग हम गरीबों-बेरोजगारों में दान करेंगे। इस प्रकार के 'नैतिक फर्ज' के ताईं मैंने अभी तक किसी को पहल करते न तो सुना है न ही देखा। झंडे-बैनर थामे, क्रांतिकारी नारे लगाते हुए, दो-चार हैंडसम किस्म की गोष्ठियां करने सब के सब निकल पड़ते हैं। महंगाई और गरीबों पर चिंता पूर्णता वातानुकूलित कमरों में अभिव्यक्त करते हैं। सच कहूं मुझे तो सियानों का महंगाई विरोध ही 'ढोंग' सरीखा लगता है।
बेहद सहज और सरल तरीके से महंगाई को यूंही बढ़ते रहने दें। ध्यान रखें, जित्ता-जित्ता महंगाई का स्तर बढ़ेगा, उत्ती ही उत्ती किरपा आएगी। बस, किरपा आती रहनी चाहिए, ऐसा बाबा कहते हैं। अपनी हैसियत के मुताबिक खरचा नहीं करोगे, तो किरपा रूक जाएगी। वैसे भी आज के अति-अंधविश्वासी युग में कौन भक्त चाहेगा कि किरपा रूके! तो प्यारे महंगाई को दिन-ब-दिन निखरते रहने दो। इसके निखार को बस इंजॉय करो। महंगाई के इंजॉयमेंट में ही मेंटलरीलिफ का इलाज छिपा है। बाकी रहा-सहा बाबा की किरपा संभाल लेगी। जय हो।