गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

नेजा जी बनाम चेला जी

इन दिनों चेला जी काफी मेहनत कर रहे हैं। नेता जी के चुनावी प्रचार-प्रसार में जी-जान से लगे हुए हैं। न दिन को दिन समझ रहे हैं न रात को रात। जुबान पर हर दम बस नेता जी का ही नाम है। नेता जी ने भी अपनी नैया चेला जीओं के हाथों में सौंप दी है। वो जानते हैं कि बिना चेलों के सहयोग के चुनाव लड़ना तो क्या भीड़ जुटाना तक संभव नहीं हो सकता। इसीलिए जो चेला जी कह देते हैं, नेता जी को करना पड़ता है। यह समय ही इत्ता नाजुक है कि आप चेला जी को नाराज कर ही नहीं सकते। चेला जी साथ हैं, तो प्रचार-प्रसार भी साथ-साथ है।

चुनावों में चेला जी का रोल बेहद अहम हो जाता है। जनता की नब्ज को जित्ता नेता जी नहीं जानते, चेला जी जानते हैं। उसका कारन है। चुनाव जितने के बाद नेता जी का जनता से कोई सीधा मतलब तो रहता नहीं। फिर तो उनकी माई-बाप बस कुर्सी हो जाती है। उनके पूरे पांच साल अपनी कुर्सी को सुरक्षित रखने की खातिर ही निकलते हैं। जनता के कने रोटी, कपड़ा, मकान, बिजली, पानी, दवा-दारू है या नहीं नेता जी को नहीं मालूम क्योंकि उनका सारा बख्त तो अपनी निजी जरूरतों को पूरा करने में ही निकल जाता है। ऐसे में जनता के करीब अगर कोई रहता है, तो चेला जी ही हैं। चेला जी को सब मालूम रहता है कि जनता कहां परेशान है, कहां आक्रोशित है और कहां खुश है। आखिर चेला जी भी तो जनता ही है न।!

आप नेता जी की निष्ठा पर बेशक अविश्वास जता सकते हैं परंतु चेला जी की निष्ठा पर नहीं। चेला जी नेता जी के प्रति हर स्तर पर पूर्ण-निष्ठावान रहते हैं। हकीकत तो यह है कि मंच पर नेता जी की केवल जुबान चलती है, उसे शब्द तो चेला जी ही देते हैं। अपने भाषण में जनता को कैसे इंप्रेस किया जाए, यह कला तो केवल चेला जी के कने ही है। अपने यहां बड़े-बड़े काबिल चेला जीओं की भरमार है प्यारे। राजनीति का जित्ता अनुभव नेता जी को होता है, उससे कहीं ज्यादा चेला जी को रहता है। आखिर वे दल-दल, नेता-नेता का नमक जो खाए होते हैं। मगर हां, विचार और विचारधारा से चेला जी की का कोई याराना नहीं होता। ऐसे बौद्धिक मामलों में वे न्यूट्रल रहना ही अधिक पसंद करते हैं। जब विचार और विचारधारा से नेताओं के साथ-साथ अब बौद्धिजीवियों ने भी किनारा कर लिया तो अकेले चेला जी का उसके प्रति प्रतिबद्ध होने से क्या होने-हवाने वाला है। उनका तो एक ही उद्देश्य है अपने नेता जी के ताईं जी-जान से चुनाव लड़वाना और फिर जीतवाना।

यह हमारे देश के नेताओं का सौभाग्य है कि उन्हें चेला जीओं का निरंतर सहयोग मिला रहता है। उनके हर संघर्ष में वे संग-साथ रहते हैं। विपक्षी दल को जवाब देने से लेकर चुनाव में भीड़ जुटाने तक के लिए हर बख्त तैयार रहते हैं। स्वयं भूखे-प्यासे रहकर नेता जी की सेवा में लगे रहना; निश्चित ही बड़ी बात है प्यारे। नेताओं के साथ-साथ हमें भी ऐसे निष्ठावान व प्रतिबद्ध चेला जीओं का सम्मान करना चाहिए। चुनावी राजनीति में दम आखिर उन्हीं के सहयोग से है।

देखते रहिए, इन चुनावों में भी नेता जी से कहीं अधिक तूती उनके चेला जीओं की ही बोलेगी। फिलहाल, तो नेता जी जनता के साथ-साथ अपने चेला जीओं के समक्ष भी नतमस्तक हैं। आखिर अटकी का सवाल जो है प्यारे!

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