गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

नेता जी का चुनाव कार्यालय

मोहल्ले में जब से नेता जी ने चुनाव कार्यालय खोला है, मोहल्लेवालों का तो रंग-ढंग ही बदल गया है। हर तरफ जश्न सरीखा माहौल रहता है। नुक्कड़ के पनबाड़ी और पड़ोस के हलवाई की तो निकल ही पड़ी है। उनकी दुकानों पर दिनभर तांता-सा लगा रहता है। मोहल्ले के प्रसिद्ध ठलुए भी बिजी से रहने लगे हैं। मजनूओं ने लड़कियों को छेड़ना काफी कम कर दिया है। इसीलिए लड़कियां भी थोड़ा उदास-सी रहने लगी हैं। आजकल उनका बन-संवर कर मोहल्ले में टलहना लगभग बेकार-सा ही जा रहा है। मेरी पत्नी भी अब घर में कम सहेलियों के साथ बाहर बख्त ज्यादा गुजारने लगी है। बात-बात पर क्रांति और नारे देने जैसा व्यवहार करने लगी है। आलम यह है कि अब मेरे घर में चुल्हा नहीं चढ़ता, नेता जी के कार्यालय से ही सीधी व्यवस्था हो जाती है।

आजकल नेता जी मोहल्ले के प्रत्येक आमो-खास का 'खास ख्याल' रख रहे हैं। बेचारे हर बख्त इस कोशिश में लगे रहते हैं कि किसी को कोई दिक्कत-परेशानी नहीं होनी चाहिए। हर रोज किसी न किसी के दर पर हाथ जोड़े पहुंच जाते हैं। जो बात जुबान नहीं कह पाती, उनके जुड़े हुए हाथ कह देते हैं। वोट केवल नेता जी को ही देना इसकी याद नेता जी के चेले हमें दिला देते हैं। चुनावों में चेलों का रोल काफी महत्वपूर्ण हो जाता है। काफी कुछ वे खुद ही मैनीज करते हैं। हाथ नेता जी जोड़ते हैं, बात पूरी चेले जी करते हैं। यही तो चुनावों का असली लुत्फ है प्यारे।

वैसे मोहल्ले में चुनाव कार्यालय खुल जाने से मुझे बेहद आराम हो गया है। जिस चिड़िया घर को देखने के वास्ते मुझे रात नौ बजे तलक जागना पड़ता था, उसे यहां मैं लाइव देख सकता हूं। अपने काम से फुर्सत पाकर जब भी मौका मिलता है, नेता जी के चुनाव कार्यालय में तीन-चार घंटे बीता आता हूं। यकीन मानिए वहां बैठकर परम आनंद की प्राप्ति होती है। हर पल खुद में देश, जनता, लोकतंत्र आदि-आदि होने का एहसास जागता रहता है। चुनाव कैसे जीता व जीतवाया जाता है, इस नुस्खे को आप वहीं बैठकर जान-समझ सकते हैं।

यह अच्छी बात है कि हमारे नेता जी के चेले बहुत होशियार हैं। चुनाव प्रबंधन का हर जिम्मा उनके ही कंधों पर है। नेता जी की सेवा में पाए मेवे का असली मजा तो वे ही उठा रहे हैं। चुनाव कार्यालय में जब नेता जी नहीं होते, तब वे ही नेता होते हैं। चेले भी अपने साथ पर्सनल चेले रखते हैं, ताकि नेता जी की चुनावी सभा में भीड़ का ठीक-ठाक इंतजाम किया जा सके। साथ ही, तालियों में कहीं कोई कमी न हो, तारीफों का पुल सही ढंग से बंधे, नारों में दी जाने वाली आवाजें बेहद मजबूत हों और अखबारों में नेता जी की तस्वीर एकदम चकाचक आए। दरअसल, चुनाव लड़ने से कहीं ज्यादा जरूरी है उसकी सशक्त मार्केटिंग। मार्केट में भी नेता जी की वही धाक होनी चाहिए, जो जनता और मोहल्ले के बीच बनी हुई है। इसका भी अपना असर होता है प्यारे।

नेता जी के चुनावी संघर्ष को देखकर उन पर काफी तरस-सा आता है मुझे। जनता के आगे दिनभर हाथ जोड़े-जोड़े बेचारों के हाथ थक जाते होंगे! ऐसे बख्त में जनता अगर खरी-खोटी सुना दे, तब भी नेता जी कुछ नहीं कह-बोल सकते। क्या करें वोट की मजबूरी जो है! साफ-सी बात है, वोट अगर चाहिए तो अपने चुनाव कार्यालय से लेकर जनता के दरबार तलक हर कहीं नेता जी को कुछ न कुछ सुननी तो पड़ेगी ही। हमारी जनता का स्वभाव भी कुछ ऐसा है कि जब सुनाने पर आती है, तब मनमोहन से लेकर अण्णा तक किसी को नहीं छोड़ती। अपने गुस्से का इजहार कहीं न कहीं कर ही देती है। आखिर लोकतंत्र की असली ताकत तो वही है न!

बहरहाल, दिनभर इधर-उधर के चुनावी भ्रमण के बाद नेता जी अपने चुनाव कार्यालय में लौट आए हैं। चेले उनके इर्द-गिर्द है। मेवा बंटने का काम शुरू हो गया है। चुनावी बहसों-ठहाकों की आवाजें कान के पर्दे को चीरने लगी है। पड़ोस के घर में पत्नी का अपनी सहेलियों संग चुनाव-विमर्श चल रहा है। टी.वी. पर खबर सुनाती सुंदरी बता रही है कि अब तलक यहां-वहां से करोड़ों का कैश पकड़ा जा चुका है। इन सब के बीच मैं कुछ खास नहीं कर रहा, सिवाय आनंद लेने के। क्योंकि ऐसे आनंद लेने के मौके पांच साल में एक ही दफा मिलते हैं प्यारे।

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