गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

लो जी और करो विरोध!

प्यारे, सरकार की तो पूछो ही मत। इस बख्त बड़ी इठलाई-इठलाई-सी, मुस्कुराई-मुस्कुराई-सी डोल रही है। आखिर डोले भी क्यों न टूजी के गड़बड़ झाले से निकलने की क्लीन-चिट जो मिल गई है उसे और गृहमंत्री जी को। एक ही फैसले ने विपक्ष की बोलती जो बंद कर दी है। अपने सुब्रह्मण्यम स्वामी हैरान हैं तो पी. चिदंबरम प्रफुल्लित। फैसले के बाद से न जाने कित्ती दफा राहत की सांस ले-छोड़ चुके हैं। राहत की सांस को दिलवाने की हमारे खबरिया चैनलों की बहुत बड़ी भूमिका रही है। जिसे जहां देखो हर कोई अपना-अपना माइक नेता जी के मुंह में घुसाए उनकी राय लेने को बेताब-सा है। मजा देखिए, सरकार के नेताओं के कने फैसले पर बल्लियों उछलने के अनेकों कारन हैं परंतु विपक्ष के कने बस बची-खुची खिसियाहट ही है। बावजूद इसके बाबा रामदेव अब भी सत्य की जीत का बेसुरा राग अलापने में व्यस्त हैं। अलापें-अलापें जी खोलकर अलापें केवल इन्हीं अलापों के सहारे ही उनकी 'कुछ पूछ' विपक्ष और राजनीति में बची हुई है। यही काफी है उनके ताईं।

दरअसल, कुछ सियानों की आदत ही होती है विरोध-विरोध की ललकार लगाने की। जबकि जानते वे भी अच्छी तरह से हैं कि उनके विरोध को एक दिन ध्वस्त होना ही पड़ेगा। ज्यादा विरोध कभी-कभी ऊब भी पैदा करता है। साथ ही उससे निगेटिविटी की बू सी भी आने लगती है। अब खुद ही देख लीजिए टूजी पर क्या सरकार, क्या गृहमंत्री, क्या ए. राजा आदि-आदि का जिस कदर शोर-शराबे के साथ विरोध हुआ, उत्ता ही उसने बोर भी किया। प्यारे, विरोध की भी एक सीमा होती है। विरोध के साथ भी नैतिकताएं जुड़ी होती हैं। विरोध का मतलब यह थोड़े ही न होता है कि संसद न चलने दो, सड़कों को जाम करो या अनशन-सत्याग्रह करो। अमां, प्यार से भी तो अपना विरोध जतला सकते हो। हौले से सरकार और गृहमंत्री के कानों में कह सकते हो कि गर आप न मानें, तो हम आपसे रूठ जाएंगे। दोस्त दोस्त न रहा या हम आपके हैं कौन सरीखे गाने भी गा सकते हैं। ऐसे खूबसूरत विरोधों पर मजाल है कि सरकार या कोई और बुरा मान जाए! पूरे प्रसन्न मन से वे आपके विरोध को सुने व समझेंगे। बेफिकर रहिए।

देखो जी, साफ-सीधी और सच्ची बात यह है कि टूजी पर अब तलक जिन्होंने और जितनों ने भी हो-हंगामा काटा, एक तरह से अपने बख्त को ही बर्बाद किया। इस बीच कोई सार्थक काम ही कर लेते। अपने राजा जी को बाहर निकालने की जोड़-जुगाड़ ही कर लेते। भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए नकली आंदोलनों पर ही विरोध जतला लेते। अण्णा और रामदेव को सही राह दिखाने की कोशिश करते। लेकिन यह सब कैसे कर लेते, उन्हें तो टूजी पर सरकार को घेरने से ही फुर्सत नहीं थी। अपने भ्रष्टाचार पर मौन साधकर सरकार के भ्रष्टाचार की पोल खोलने में सब बिजी थे। सही भी है, बहती गंगा में हाथ मांजना किसे नहीं सुहाता भला!
बहरहाल, अब कहे या लिखे कोई कुछ भी पर जीत तो आखिरकार सरकार की ही हुई न। अब फैसले पर जिन्हें मुंह बिचकाना है बिचकाएं मगर इत्ता ध्यान रखें विपक्ष मैं बैठकर विरोध की रोटियां सेंकना सबसे आसान काम होता है। विरोध से ही अगर घपले-घोटाले या भ्रष्टाचार मिट या सिमट रहा होता, तो प्यारे आज अपने मुल्क की तस्वीर ही कुछ और होती। असल में, अपने यहां विरोध की परंपरा अपने गिरेबान को छिपाकर दूसरे के गिरेबान को पकड़ने की रही है। यही वजह है कि यहां सार्थक विरोध भी कभी-कभी सार्थक होते हुए नहीं जान पड़ते। जिन मुद्दों पर विरोध जतलाना चाहिए वहां कोई जतलाता नहीं, सब ऐवईं मौखिक और बौद्धिक क्रांति के तीर छोड़ते रहते हैं।     

प्यारे, टूजी पर अब बेसुरा राग अलापना बंद करो और चुनावों के मनोरंजन का लुत्फ लो। पांच साल में चंद दिन ही ऐसे उम्दा किस्म के मनोरंजन नेताओं और पार्टियों के बीच देखने-सुनने को मिलते हैं। टूजी के फैसले का आदर करते हुए। बैर-भाव को किनारे रखते हुए। विरोध के क्रोध को थामते हुए अब बस चुनावी बातें ही कीजिए। नहीं तो फिर मत कहना कि आपने हमारा ख्याल नहीं रखा। समझे।

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