गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

अपना गणतंत्र

प्यारे, गणतंत्र तो अपना ही मस्त और महान है। हर हाल में हंसता-खिलखिलाता रहता है। न अधिक टेंसन लेता है न देता। बस अपने काम से मतलब रखता है। किसी की सरकार आए, किसी की जाए अपना गणतंत्र 'अवसरवादी राजनीति' से हमेशा दूर रहता है। हालांकि अपनी-अपनी ऊंची करने-करवाने के वास्ते तमाम नेता लोग गणतंत्र का जमकर उपयोग करते हैं लेकिन यह बुरा नहीं मानता। वैसे भी बुरा मानने या न मानने से क्या हासिल क्योंकि यहां हर कोई खुद को तीसमारखां से कम तो समझता नहीं! सबके कने अपने-अपने तर्क हैं। इन्हीं तर्कों पर तो उनकी राजनीतियां टिकी हुई हैं। तर्कों के ही सहारे वे गण को भी चला रहे हैं और तंत्र को भी। वैसे भी गणतंत्र में बस चलनी चाहिए। अब यह कैसे और कहां से चल रही है, इस पर ज्यादा दीदारेजी करना बेकार ही है प्यारे।

यूं तो नेता लोगों को अपने गणतंत्र की सेहत का ख्याल हर बख्त रहता है मगर इन दिनों वे इसके प्रति कुछ ज्यादा ही फिकरमंद से हो गए हैं। होता है.. होता है.. जब चुनाव नजदीक होते हैं, तब नेता लोग ऐसे ही अपने गणतंत्र के प्रति फिकरमंद से हो जाते हैं। फिर तो सांस से लेकर बयान तक वे गणतंत्र की छत्रछाया में ही रहकर लेते व देते हैं। लुत्फ तो यह है कि पिछले पांच बसर जित्ता उन्होंने गणतंत्र के बारे में न सोचा होगा, अपनी चुनावी सभाओं में वे उससे दोगुना-चौगुना सोच व कह लेते हैं। आखिर गणतंत्र के वे भी तो प्रतिबद्ध सिपाही ही हैं न! गणतंत्र के बारे में सोचने-समझने की जित्ती कुव्वत उनके कने हैं, इत्ती किसी के नहीं! इसीलिए उनकी बातों को सुनने में ही 'असली मजा' है।

अपन साफ देख रहे हैं कि आजकल नेता लोग गणतंत्र की कैसी-कैसी बटरिंग करने में लगे हैं। जनता के कने हाथ जोड़े खड़े हैं कि वोट उन्हें ही दें क्योंकि इस गणतंत्र के वे ही 'सशक्त नायक' हैं। सत्ता में आते ही गणतंत्र को और मजबूत बना देंगे। शायद इत्ता मजबूत की गण तो अपने तंत्र से मिलने के वास्ते अपनी मजबूरी तलक को गिरवी रखना पड़े। यूं राजनीति में गणतंत्र की मजबूती को मजबूरी में बदलते अपन ने कई दफा देखा-सुना है। इसीलिए नेता लोगों चाहते हैं कि चुनावों में गणतंत्र के सहारे ही सही पर उनकी कुर्सी को मजबूती मिले ताकि जनता को मजबूरी की डोज दी जा सके। जिसका असर अगले पांच बरस तलक ऐसे ही बना रह सके।

अब गणतंत्र भी बेचारा क्या करे! पानी में रहकर मगर से बैर भी तो ठीक नहीं। जहां सब चलने लगते हैं, गणतंत्र भी उन्हीं रास्तों पर चलना शुरू कर देता है। चलेगा नहीं तो पिछड़ जाएगा। अगर पिछड़ गया तो फिर कहीं नहीं मिल पाएगा। इसीलिए बख्त के हाथों गणतंत्र ने अपनी सत्ता को सौंप दिया है, अब इससे फायदा उठाओ या हानि सब तुम पर निर्भर। लेकिन अपना गणतंत्र अब भी हारा नहीं है। यह अपनी जीत के प्रति आशावान है। यही इसकी 'हेल्दी सेहत' का असली राज भी है।

अपने गणतंत्र के कने कमाल की सहन-शक्ति है। हर अच्छी-बुरी सत्ता और व्यक्तित्व को खुद में समेटकर कभी अपने गम का इजहार नहीं करता। गणतंत्र को मालूम है कि कित्ते किस्म के दाग उसके शरीर पर हैं, फिर भी वह इस कोशिश में है कि कैसे भी हो यह सूरत बदलनी चाहिए। और, इस सूरत को केवल जनता ही बदल सकती है। वो भी अपने वोट की ताकत के सहारे। पर, इत्ता ध्यान रहे कि यह वोट केवल उन्हें ही जाए, जिनमें खुद को बदलने के साथ-साथ देश को बदलने का भी जज्बा हो। लेकिन, उन्हें कतई न जाए जो कपड़े बदलने के जैसे अपना दिल और दल बदलते रहते हैं। केवल बदलाव के सहारे ही गणतंत्र की मजबूती संभव है। फिर भी अपना गणतंत्र सबसे मस्त है। इसे ऐसे ही मस्त बनाएं रखें। गणतंत्र की मस्ती में ही अपनी मस्ती के रास्ते निहित हैं। जय हो।

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