सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

एक खत वेलेंटाइन के नाम!

प्यारे वेलेंटाइन,

तुम्हारा फिर से स्वागत है। तुम भी क्या खूब चीज़ हो। जब तुम्हारे आने की तारीख नजदीक आती है, तब ही हमारे दिलों में अपने-अपने प्रेम और तुम्हारे प्रति अपनत्व की भावना जाग्रत होती है। यह कहने में कोई शर्म नहीं कि हम तुम्हें साल में सिर्फ एक बार यानी 14 फरवरी को ही याद करते हैं। जहां 14 फरवरी बीती नहीं कि संत वेलेंटाइन भी सूखे और मुरझाए फूलों की मानिंद हमारे दिलों-जज्बातों से उतर जाते हैं। हां, यह बात सही है कि हम तुम्हें याद तो करते हैं परंतु अपनी-अपनी तमन्नाओं की खातिर। तुम हमारी तमन्ना का जरिया इसलिए हो क्योंकि हमें तुम्हारे रास्ते अपनी-अपनी तमन्नाओं का इजहार करना पड़ता है। हम प्रेम तो प्रेमिका से करते हैं मगर माध्यम तुम्हें बनाते हैं। अब यह तुम्हारी नेकदिली है कि तुम बहुत आसानी से हमारे-उनके माध्यम बन जाते हो। तुम अपना फर्ज निभाते हो हम अपना। इस फर्ज-आदायगी में अंतर बस इतना भर रहता है कि तुम्हारा फर्ज खालिस होता है और हमारा प्रदूषित। जी हां, प्रदूषित।

ऐसा कहा जाता है कि तुम प्यार के दूत हो। प्यार बांटते हो। प्यार करने व देने की नेक सलाह देते हो। प्यार को विश्वास के मानकों पर कसते व परखते हो। यकीनन तुम प्यार की बहुत बड़ी मिसाल हो हमारे बीच। लेकिन प्यारे वेलेंटाइन, मुझे अक्सर यह लगता है कि हम प्यार के मायनों को उस तरह से आत्मसात नहीं कर पाए हैं जैसाकि तुमने किया था। हम प्यार करते तो हैं मगर हमारा स्वार्थ भी संग-संग चलता है। हम प्यार को फू ल देने व लेने तक ही सीमित कर देना चाहते हैं। हम प्यार को रस्मों की तरह निभाते हैं। तारीखों में कैद रखते हैं। गिफ्ट के आदान-प्रदान को ही अपने प्यार की क्रांति मान-समझ बैठते हैं।

अब तुम्हीं बताओ प्यारे वेलेंटाइन, क्या प्यार गिफ्टों के भीतर कैद करने की चीज है, यानी उसे विश्वास और सहयोग के साथ आगे बढ़ाते रहने की? हम आधुनिकता की रौ में बहते-बहते इस कदर आगे निकलते जा रहे हैं, जहां प्यार हमें बस एक बहाना-सा लगने लगा है। अगर मैं गलत नहीं हूं तो क्यों तुम्हें केवल 14 फरवरी को ही याद किया जाता है? क्यों जगभर के प्रेमी-प्रेमिकाएं प्यार की क्रांति केवल इसी दिन कर लेना चाहते हैं? क्यों प्यार के एहसास की आस सिर्फ इसी दिन जागती है? यह किसी विडंबना से कम नहीं कि हमने प्यार जैसी खूबसूरत चीज को अपने-अपने हितों-स्वार्थों का गुलाम बना लिया है।

प्यारे वेलेंटाइन, तुम्हारे आने से सबसे ज्यादा परेशान वो हो उठते हैं, जिन्होंने प्यार करने और देने की तमीज को कभी सीखा ही नहीं। तुम्हारे बहाने उन्हें सहारा मिल जाता है अपनी ताकत को दिखाने का। वे तुम पर लाठी-भाले से वार करते हैं। तुम्हारी तस्वीरों को जलाते हैं। तुम्हें विदेशी कहकर पराया बताते हैं। मैं जानता हूं कि उनके इस विरोध से तुम्हारी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता। ऐसा कर वे केवल अपनी खीझ अपने फ्रस्टेशन को ही मिटा रहे होते हैं। उनका वार तुम पर नहीं प्यार की खूबसूरती पर होता है। बात सही भी है कि जिसने कभी प्यार के एहसास, उसकी खूबसूरती को न समझा हो वो भला क्या जानेगा प्यार के मायनों को! उन्हें तो बस बहाना चाहिए अपने पुरुष होने का।

वैसे प्यारे वेलेंटाइन, इस दफा तुम घनी महंगाई में हमारे बीच आए हो। पिछली दफा जब आए थे तब मंदी का आलम था। महंगाई और मंदी के बीच तुम्हारा आना उन गरीब प्रेमियों-प्रेमिकाओं के लिए बड़ा नागवार गुजरेगा जो प्यार से कहीं ज्यादा विश्वास गिफ्टों के लेने-देने में करते हैं। उनके लिए तो तुम विलेन सरीखे ही हो इस वक्त! प्यारे, हमारे बीच में आने से पहले जरा हमारे यहां के माहौल को भी देख-समझ लिया करो।
खैर, अब जब तुम आ ही गए हो तो क्यों न तुम हमें कु छ देकर जाओ। मैं जानता हूं कि तुम सिवाय प्यार के हमें कु छ नहीं दे सकते। यह हमारे लिए जरूरी भी बहुत है। बस इतना-सा और करो कि हमें प्यार का पाठ पढ़ाते वक्त एक पाठ आपसी संबंधों-रिश्तों को निभाने और साधने का भी पढ़ा दो, तो यह उन जोड़ों के लिए बहुत अच्छा रहेगा जो जरा-जरा सी बातों में आपस में लड़-झगड़कर प्यार, त्याग और विश्वास को सरेआम जलील करते रहते हैं। साथ ही, उन्हें यह भी सिखा-बता दो कि प्यार करने और निभाने वालों के लिए हर पल प्यार देना-लेना ही महत्वपूर्ण होता है, नफरत के बीच रहकर खुद को बरबाद करना नहीं।
बहरहाल, प्यारे वेलेंटाइन! तुम्हारा पुन: स्वागत है। तुम हमारे बीच यूंही प्यार और विश्वास लेकर आते रहो, हमेशा!

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

लो जी और करो विरोध!

प्यारे, सरकार की तो पूछो ही मत। इस बख्त बड़ी इठलाई-इठलाई-सी, मुस्कुराई-मुस्कुराई-सी डोल रही है। आखिर डोले भी क्यों न टूजी के गड़बड़ झाले से निकलने की क्लीन-चिट जो मिल गई है उसे और गृहमंत्री जी को। एक ही फैसले ने विपक्ष की बोलती जो बंद कर दी है। अपने सुब्रह्मण्यम स्वामी हैरान हैं तो पी. चिदंबरम प्रफुल्लित। फैसले के बाद से न जाने कित्ती दफा राहत की सांस ले-छोड़ चुके हैं। राहत की सांस को दिलवाने की हमारे खबरिया चैनलों की बहुत बड़ी भूमिका रही है। जिसे जहां देखो हर कोई अपना-अपना माइक नेता जी के मुंह में घुसाए उनकी राय लेने को बेताब-सा है। मजा देखिए, सरकार के नेताओं के कने फैसले पर बल्लियों उछलने के अनेकों कारन हैं परंतु विपक्ष के कने बस बची-खुची खिसियाहट ही है। बावजूद इसके बाबा रामदेव अब भी सत्य की जीत का बेसुरा राग अलापने में व्यस्त हैं। अलापें-अलापें जी खोलकर अलापें केवल इन्हीं अलापों के सहारे ही उनकी 'कुछ पूछ' विपक्ष और राजनीति में बची हुई है। यही काफी है उनके ताईं।

दरअसल, कुछ सियानों की आदत ही होती है विरोध-विरोध की ललकार लगाने की। जबकि जानते वे भी अच्छी तरह से हैं कि उनके विरोध को एक दिन ध्वस्त होना ही पड़ेगा। ज्यादा विरोध कभी-कभी ऊब भी पैदा करता है। साथ ही उससे निगेटिविटी की बू सी भी आने लगती है। अब खुद ही देख लीजिए टूजी पर क्या सरकार, क्या गृहमंत्री, क्या ए. राजा आदि-आदि का जिस कदर शोर-शराबे के साथ विरोध हुआ, उत्ता ही उसने बोर भी किया। प्यारे, विरोध की भी एक सीमा होती है। विरोध के साथ भी नैतिकताएं जुड़ी होती हैं। विरोध का मतलब यह थोड़े ही न होता है कि संसद न चलने दो, सड़कों को जाम करो या अनशन-सत्याग्रह करो। अमां, प्यार से भी तो अपना विरोध जतला सकते हो। हौले से सरकार और गृहमंत्री के कानों में कह सकते हो कि गर आप न मानें, तो हम आपसे रूठ जाएंगे। दोस्त दोस्त न रहा या हम आपके हैं कौन सरीखे गाने भी गा सकते हैं। ऐसे खूबसूरत विरोधों पर मजाल है कि सरकार या कोई और बुरा मान जाए! पूरे प्रसन्न मन से वे आपके विरोध को सुने व समझेंगे। बेफिकर रहिए।

देखो जी, साफ-सीधी और सच्ची बात यह है कि टूजी पर अब तलक जिन्होंने और जितनों ने भी हो-हंगामा काटा, एक तरह से अपने बख्त को ही बर्बाद किया। इस बीच कोई सार्थक काम ही कर लेते। अपने राजा जी को बाहर निकालने की जोड़-जुगाड़ ही कर लेते। भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए नकली आंदोलनों पर ही विरोध जतला लेते। अण्णा और रामदेव को सही राह दिखाने की कोशिश करते। लेकिन यह सब कैसे कर लेते, उन्हें तो टूजी पर सरकार को घेरने से ही फुर्सत नहीं थी। अपने भ्रष्टाचार पर मौन साधकर सरकार के भ्रष्टाचार की पोल खोलने में सब बिजी थे। सही भी है, बहती गंगा में हाथ मांजना किसे नहीं सुहाता भला!
बहरहाल, अब कहे या लिखे कोई कुछ भी पर जीत तो आखिरकार सरकार की ही हुई न। अब फैसले पर जिन्हें मुंह बिचकाना है बिचकाएं मगर इत्ता ध्यान रखें विपक्ष मैं बैठकर विरोध की रोटियां सेंकना सबसे आसान काम होता है। विरोध से ही अगर घपले-घोटाले या भ्रष्टाचार मिट या सिमट रहा होता, तो प्यारे आज अपने मुल्क की तस्वीर ही कुछ और होती। असल में, अपने यहां विरोध की परंपरा अपने गिरेबान को छिपाकर दूसरे के गिरेबान को पकड़ने की रही है। यही वजह है कि यहां सार्थक विरोध भी कभी-कभी सार्थक होते हुए नहीं जान पड़ते। जिन मुद्दों पर विरोध जतलाना चाहिए वहां कोई जतलाता नहीं, सब ऐवईं मौखिक और बौद्धिक क्रांति के तीर छोड़ते रहते हैं।     

प्यारे, टूजी पर अब बेसुरा राग अलापना बंद करो और चुनावों के मनोरंजन का लुत्फ लो। पांच साल में चंद दिन ही ऐसे उम्दा किस्म के मनोरंजन नेताओं और पार्टियों के बीच देखने-सुनने को मिलते हैं। टूजी के फैसले का आदर करते हुए। बैर-भाव को किनारे रखते हुए। विरोध के क्रोध को थामते हुए अब बस चुनावी बातें ही कीजिए। नहीं तो फिर मत कहना कि आपने हमारा ख्याल नहीं रखा। समझे।

बधाईयां प्यारे फेसबुक

प्यारे फेसबुक, तुम्हें बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं आठ साल का होने पर। इन आठ सालों में तुमने वो कर दिखाया, जिसे करने में बरसों-बरस लग जाते हैं। महज आठ सालों में ही तुम हमारे बीच इस कदर फेमस हो गए कि आज हर किसी की जुबान पर बस तुम्हारा ही तुम्हारा नाम है। पता है लोग तुम्हें दीवानगी की हद तक चाहते हैं। दिन के चौबीस घंटे तुम्हारे ही दरबार में बीताते हैं। कुछ के लिए तो दिन में कई दफा तुम्हारे दरबार में हाजिरी लगाना बेहद आवश्यक होता है। वे तुम्हारे सबसे पक्के मुरीद हैं। भले ही हमारा बैंक में एकाउंट न हों पर फेसबुक पर जरूर होगा। फेसबुक पर एकाउंट रखना आज की तारीख में हर कोई अपनी शान समझता है। शान समझे भी क्यों नहीं क्योंकि तुमने हमें इस माध्यम के जरिए तरह-तरह के लोगों से ऑन-लाइन मिलने, बतियाने, संवाद और विवाद को साझा करने का महत्वपूर्ण मंच जो दिया है। इसके अतिरिक्त और चाहिए भी क्या हमें!

तुम्हारे मंच पर आकर हमारे बीच से न जाने कित्ते फेसबुकिए चर्चित कवि और कवित्री बन गए। न जाने कित्तों ने अपनी पहचान कहानीकार और विमर्शकार के रूप में करवा ली। आलम यह है कि उनके लिखे का अब स्थापित वरिष्ठ भी लोहा मानते हैं। लोहा मानेंगे भी क्यों नहीं क्योंकि अब वे यह अच्छे से जान-समझ चुके हैं कि नए लेखकों के आगे उनके दिन हवा हुए। उनकी ठहरी और पुरानी टाइप विचारधारा अब युवाओं के किसी काम नहीं रही। बदलते परिवेश के साथ-साथ फेसबुकिए युवाओं ने अपनी विचाराधारा, सोच और विमर्श को भी अच्छा-खासा बदल डाला है। यही बख्त की आवश्यकता भी है प्यारे।

असल में, प्यारे फेसबुक तुम्हारे मंच का सबसे अधिक लाभ और आनंद उठाया है लवर्स ने। उनके रोमांस के वास्ते सबसे सशक्त माध्यम हो तुम। तुम्हें पता ही होगा कि प्यार करने वालों पर समाज किस-किस तरह की टेढ़ी-मेढ़ी निगाहें रखता है, जरा-जरा सी बातों के ताईं उन्हें रोकता-टोकता है, न दो दिलों को अकेले में मिलने देता है न ही दुख-सुख बांटने। दुनिया और समाज से तंग आकर अब वे तुम्हारे शांत आंगन में आ गए हैं। घंटों के घंटों वे तुम्हारे आंगन में एक-दुसरे से बतियाकर गुजार लेते हैं। ऐसे में बख्त का पता ही नहीं चलता उन्हें। एक-दूसरे से खुलकर एकदम बिंदास बात कहते-करते हैं। कोई अपने लैपटॉप पर लगा रहता है, तो कोई मोबाइल फोन पर। अपनी उपलब्धता को हर जगह उपलब्ध करवाकर तुमने उनका काम बेहद आसान कर दिया है प्यारे फेसबुक। तुम जानते नहीं कि कित्ती किस्म की दुआएं निकलती होंगी तुम्हारे प्रति उनके दिल से। वाकई।

बताइए हर किसी के साथ इत्ता सहयोग और आत्मीय होने के बावजूद कुछ लोग तुमसे जलते हैं। तुम पर तरह-तरह के बैन लादने की वकालत करते हैं। निरंतर तुम्हें आदेश देते रहते हैं कि ये बैन करो कि वो बैन करो। अभिव्यक्ति के बेहतरीन मंच पर इस तरह की बंदिशों को सुनकर मेरे दिल को खासा तकलीफ पहुंचती है। तकलीफ होना लाजिमी है। एक तुम ही तो जो हमारे स्वतंत्र विचारों का एक मात्र सहारा हो। तुम्हारे जैसे खुले विचारों वाले माध्यम ही तो हमारे संवादों को अब तलक जिंदा रखे हुए हैं। तुमने देखा-पढ़ा होगा कि सभी ने अपने-अपने स्तर से तुम पर बंदिशे थोपने का विरोध किया था। लगातार कर भी रहे हैं। तुम जरा भी घबराना मत प्यारे फेसबुक हमारा यह विरोध यूंही जारी रहेगा। तुम्हारे मंच से बिछड़ना अब हमारे बस का नहीं। एक तरह से हमारी ऑक्सीजन जैसे हो तुम प्यारे फेसबुक।

अरे हां सुना है कि तुम्हारा आईपीओ भी आने वाला है। सोशल नेटवर्किंग के रास्ते होते हुए अब तुम स्टॉक मार्केट में भी आ जाओगे। वाह! बधाई प्यारे। अब तो तुम और भी चर्चित हस्ती हो जाओगे। बढ़िया है। लगे रहो। जो हिट है बस वही फिट है। हम तहे-दिल से दुआ करते हैं कि तुम्हारी यह फिटनेस यूंही बरकार रहे। तुम्हारे मंच पर लोग यूंही आते-जाते रहें। तुम्हें अपनाते रहें। तुम्हें अपनी-अपनी अभिव्यक्ति को अभिव्यक्त करने का सहारा बनाते रहें।

तो प्यारे फेसबुक एक दफा तुम्हारे और मार्क जुबेरवर्क को लख-लख बधाईयां।

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

नेता जी का चुनाव कार्यालय

मोहल्ले में जब से नेता जी ने चुनाव कार्यालय खोला है, मोहल्लेवालों का तो रंग-ढंग ही बदल गया है। हर तरफ जश्न सरीखा माहौल रहता है। नुक्कड़ के पनबाड़ी और पड़ोस के हलवाई की तो निकल ही पड़ी है। उनकी दुकानों पर दिनभर तांता-सा लगा रहता है। मोहल्ले के प्रसिद्ध ठलुए भी बिजी से रहने लगे हैं। मजनूओं ने लड़कियों को छेड़ना काफी कम कर दिया है। इसीलिए लड़कियां भी थोड़ा उदास-सी रहने लगी हैं। आजकल उनका बन-संवर कर मोहल्ले में टलहना लगभग बेकार-सा ही जा रहा है। मेरी पत्नी भी अब घर में कम सहेलियों के साथ बाहर बख्त ज्यादा गुजारने लगी है। बात-बात पर क्रांति और नारे देने जैसा व्यवहार करने लगी है। आलम यह है कि अब मेरे घर में चुल्हा नहीं चढ़ता, नेता जी के कार्यालय से ही सीधी व्यवस्था हो जाती है।

आजकल नेता जी मोहल्ले के प्रत्येक आमो-खास का 'खास ख्याल' रख रहे हैं। बेचारे हर बख्त इस कोशिश में लगे रहते हैं कि किसी को कोई दिक्कत-परेशानी नहीं होनी चाहिए। हर रोज किसी न किसी के दर पर हाथ जोड़े पहुंच जाते हैं। जो बात जुबान नहीं कह पाती, उनके जुड़े हुए हाथ कह देते हैं। वोट केवल नेता जी को ही देना इसकी याद नेता जी के चेले हमें दिला देते हैं। चुनावों में चेलों का रोल काफी महत्वपूर्ण हो जाता है। काफी कुछ वे खुद ही मैनीज करते हैं। हाथ नेता जी जोड़ते हैं, बात पूरी चेले जी करते हैं। यही तो चुनावों का असली लुत्फ है प्यारे।

वैसे मोहल्ले में चुनाव कार्यालय खुल जाने से मुझे बेहद आराम हो गया है। जिस चिड़िया घर को देखने के वास्ते मुझे रात नौ बजे तलक जागना पड़ता था, उसे यहां मैं लाइव देख सकता हूं। अपने काम से फुर्सत पाकर जब भी मौका मिलता है, नेता जी के चुनाव कार्यालय में तीन-चार घंटे बीता आता हूं। यकीन मानिए वहां बैठकर परम आनंद की प्राप्ति होती है। हर पल खुद में देश, जनता, लोकतंत्र आदि-आदि होने का एहसास जागता रहता है। चुनाव कैसे जीता व जीतवाया जाता है, इस नुस्खे को आप वहीं बैठकर जान-समझ सकते हैं।

यह अच्छी बात है कि हमारे नेता जी के चेले बहुत होशियार हैं। चुनाव प्रबंधन का हर जिम्मा उनके ही कंधों पर है। नेता जी की सेवा में पाए मेवे का असली मजा तो वे ही उठा रहे हैं। चुनाव कार्यालय में जब नेता जी नहीं होते, तब वे ही नेता होते हैं। चेले भी अपने साथ पर्सनल चेले रखते हैं, ताकि नेता जी की चुनावी सभा में भीड़ का ठीक-ठाक इंतजाम किया जा सके। साथ ही, तालियों में कहीं कोई कमी न हो, तारीफों का पुल सही ढंग से बंधे, नारों में दी जाने वाली आवाजें बेहद मजबूत हों और अखबारों में नेता जी की तस्वीर एकदम चकाचक आए। दरअसल, चुनाव लड़ने से कहीं ज्यादा जरूरी है उसकी सशक्त मार्केटिंग। मार्केट में भी नेता जी की वही धाक होनी चाहिए, जो जनता और मोहल्ले के बीच बनी हुई है। इसका भी अपना असर होता है प्यारे।

नेता जी के चुनावी संघर्ष को देखकर उन पर काफी तरस-सा आता है मुझे। जनता के आगे दिनभर हाथ जोड़े-जोड़े बेचारों के हाथ थक जाते होंगे! ऐसे बख्त में जनता अगर खरी-खोटी सुना दे, तब भी नेता जी कुछ नहीं कह-बोल सकते। क्या करें वोट की मजबूरी जो है! साफ-सी बात है, वोट अगर चाहिए तो अपने चुनाव कार्यालय से लेकर जनता के दरबार तलक हर कहीं नेता जी को कुछ न कुछ सुननी तो पड़ेगी ही। हमारी जनता का स्वभाव भी कुछ ऐसा है कि जब सुनाने पर आती है, तब मनमोहन से लेकर अण्णा तक किसी को नहीं छोड़ती। अपने गुस्से का इजहार कहीं न कहीं कर ही देती है। आखिर लोकतंत्र की असली ताकत तो वही है न!

बहरहाल, दिनभर इधर-उधर के चुनावी भ्रमण के बाद नेता जी अपने चुनाव कार्यालय में लौट आए हैं। चेले उनके इर्द-गिर्द है। मेवा बंटने का काम शुरू हो गया है। चुनावी बहसों-ठहाकों की आवाजें कान के पर्दे को चीरने लगी है। पड़ोस के घर में पत्नी का अपनी सहेलियों संग चुनाव-विमर्श चल रहा है। टी.वी. पर खबर सुनाती सुंदरी बता रही है कि अब तलक यहां-वहां से करोड़ों का कैश पकड़ा जा चुका है। इन सब के बीच मैं कुछ खास नहीं कर रहा, सिवाय आनंद लेने के। क्योंकि ऐसे आनंद लेने के मौके पांच साल में एक ही दफा मिलते हैं प्यारे।

नेजा जी बनाम चेला जी

इन दिनों चेला जी काफी मेहनत कर रहे हैं। नेता जी के चुनावी प्रचार-प्रसार में जी-जान से लगे हुए हैं। न दिन को दिन समझ रहे हैं न रात को रात। जुबान पर हर दम बस नेता जी का ही नाम है। नेता जी ने भी अपनी नैया चेला जीओं के हाथों में सौंप दी है। वो जानते हैं कि बिना चेलों के सहयोग के चुनाव लड़ना तो क्या भीड़ जुटाना तक संभव नहीं हो सकता। इसीलिए जो चेला जी कह देते हैं, नेता जी को करना पड़ता है। यह समय ही इत्ता नाजुक है कि आप चेला जी को नाराज कर ही नहीं सकते। चेला जी साथ हैं, तो प्रचार-प्रसार भी साथ-साथ है।

चुनावों में चेला जी का रोल बेहद अहम हो जाता है। जनता की नब्ज को जित्ता नेता जी नहीं जानते, चेला जी जानते हैं। उसका कारन है। चुनाव जितने के बाद नेता जी का जनता से कोई सीधा मतलब तो रहता नहीं। फिर तो उनकी माई-बाप बस कुर्सी हो जाती है। उनके पूरे पांच साल अपनी कुर्सी को सुरक्षित रखने की खातिर ही निकलते हैं। जनता के कने रोटी, कपड़ा, मकान, बिजली, पानी, दवा-दारू है या नहीं नेता जी को नहीं मालूम क्योंकि उनका सारा बख्त तो अपनी निजी जरूरतों को पूरा करने में ही निकल जाता है। ऐसे में जनता के करीब अगर कोई रहता है, तो चेला जी ही हैं। चेला जी को सब मालूम रहता है कि जनता कहां परेशान है, कहां आक्रोशित है और कहां खुश है। आखिर चेला जी भी तो जनता ही है न।!

आप नेता जी की निष्ठा पर बेशक अविश्वास जता सकते हैं परंतु चेला जी की निष्ठा पर नहीं। चेला जी नेता जी के प्रति हर स्तर पर पूर्ण-निष्ठावान रहते हैं। हकीकत तो यह है कि मंच पर नेता जी की केवल जुबान चलती है, उसे शब्द तो चेला जी ही देते हैं। अपने भाषण में जनता को कैसे इंप्रेस किया जाए, यह कला तो केवल चेला जी के कने ही है। अपने यहां बड़े-बड़े काबिल चेला जीओं की भरमार है प्यारे। राजनीति का जित्ता अनुभव नेता जी को होता है, उससे कहीं ज्यादा चेला जी को रहता है। आखिर वे दल-दल, नेता-नेता का नमक जो खाए होते हैं। मगर हां, विचार और विचारधारा से चेला जी की का कोई याराना नहीं होता। ऐसे बौद्धिक मामलों में वे न्यूट्रल रहना ही अधिक पसंद करते हैं। जब विचार और विचारधारा से नेताओं के साथ-साथ अब बौद्धिजीवियों ने भी किनारा कर लिया तो अकेले चेला जी का उसके प्रति प्रतिबद्ध होने से क्या होने-हवाने वाला है। उनका तो एक ही उद्देश्य है अपने नेता जी के ताईं जी-जान से चुनाव लड़वाना और फिर जीतवाना।

यह हमारे देश के नेताओं का सौभाग्य है कि उन्हें चेला जीओं का निरंतर सहयोग मिला रहता है। उनके हर संघर्ष में वे संग-साथ रहते हैं। विपक्षी दल को जवाब देने से लेकर चुनाव में भीड़ जुटाने तक के लिए हर बख्त तैयार रहते हैं। स्वयं भूखे-प्यासे रहकर नेता जी की सेवा में लगे रहना; निश्चित ही बड़ी बात है प्यारे। नेताओं के साथ-साथ हमें भी ऐसे निष्ठावान व प्रतिबद्ध चेला जीओं का सम्मान करना चाहिए। चुनावी राजनीति में दम आखिर उन्हीं के सहयोग से है।

देखते रहिए, इन चुनावों में भी नेता जी से कहीं अधिक तूती उनके चेला जीओं की ही बोलेगी। फिलहाल, तो नेता जी जनता के साथ-साथ अपने चेला जीओं के समक्ष भी नतमस्तक हैं। आखिर अटकी का सवाल जो है प्यारे!

अपना गणतंत्र

प्यारे, गणतंत्र तो अपना ही मस्त और महान है। हर हाल में हंसता-खिलखिलाता रहता है। न अधिक टेंसन लेता है न देता। बस अपने काम से मतलब रखता है। किसी की सरकार आए, किसी की जाए अपना गणतंत्र 'अवसरवादी राजनीति' से हमेशा दूर रहता है। हालांकि अपनी-अपनी ऊंची करने-करवाने के वास्ते तमाम नेता लोग गणतंत्र का जमकर उपयोग करते हैं लेकिन यह बुरा नहीं मानता। वैसे भी बुरा मानने या न मानने से क्या हासिल क्योंकि यहां हर कोई खुद को तीसमारखां से कम तो समझता नहीं! सबके कने अपने-अपने तर्क हैं। इन्हीं तर्कों पर तो उनकी राजनीतियां टिकी हुई हैं। तर्कों के ही सहारे वे गण को भी चला रहे हैं और तंत्र को भी। वैसे भी गणतंत्र में बस चलनी चाहिए। अब यह कैसे और कहां से चल रही है, इस पर ज्यादा दीदारेजी करना बेकार ही है प्यारे।

यूं तो नेता लोगों को अपने गणतंत्र की सेहत का ख्याल हर बख्त रहता है मगर इन दिनों वे इसके प्रति कुछ ज्यादा ही फिकरमंद से हो गए हैं। होता है.. होता है.. जब चुनाव नजदीक होते हैं, तब नेता लोग ऐसे ही अपने गणतंत्र के प्रति फिकरमंद से हो जाते हैं। फिर तो सांस से लेकर बयान तक वे गणतंत्र की छत्रछाया में ही रहकर लेते व देते हैं। लुत्फ तो यह है कि पिछले पांच बसर जित्ता उन्होंने गणतंत्र के बारे में न सोचा होगा, अपनी चुनावी सभाओं में वे उससे दोगुना-चौगुना सोच व कह लेते हैं। आखिर गणतंत्र के वे भी तो प्रतिबद्ध सिपाही ही हैं न! गणतंत्र के बारे में सोचने-समझने की जित्ती कुव्वत उनके कने हैं, इत्ती किसी के नहीं! इसीलिए उनकी बातों को सुनने में ही 'असली मजा' है।

अपन साफ देख रहे हैं कि आजकल नेता लोग गणतंत्र की कैसी-कैसी बटरिंग करने में लगे हैं। जनता के कने हाथ जोड़े खड़े हैं कि वोट उन्हें ही दें क्योंकि इस गणतंत्र के वे ही 'सशक्त नायक' हैं। सत्ता में आते ही गणतंत्र को और मजबूत बना देंगे। शायद इत्ता मजबूत की गण तो अपने तंत्र से मिलने के वास्ते अपनी मजबूरी तलक को गिरवी रखना पड़े। यूं राजनीति में गणतंत्र की मजबूती को मजबूरी में बदलते अपन ने कई दफा देखा-सुना है। इसीलिए नेता लोगों चाहते हैं कि चुनावों में गणतंत्र के सहारे ही सही पर उनकी कुर्सी को मजबूती मिले ताकि जनता को मजबूरी की डोज दी जा सके। जिसका असर अगले पांच बरस तलक ऐसे ही बना रह सके।

अब गणतंत्र भी बेचारा क्या करे! पानी में रहकर मगर से बैर भी तो ठीक नहीं। जहां सब चलने लगते हैं, गणतंत्र भी उन्हीं रास्तों पर चलना शुरू कर देता है। चलेगा नहीं तो पिछड़ जाएगा। अगर पिछड़ गया तो फिर कहीं नहीं मिल पाएगा। इसीलिए बख्त के हाथों गणतंत्र ने अपनी सत्ता को सौंप दिया है, अब इससे फायदा उठाओ या हानि सब तुम पर निर्भर। लेकिन अपना गणतंत्र अब भी हारा नहीं है। यह अपनी जीत के प्रति आशावान है। यही इसकी 'हेल्दी सेहत' का असली राज भी है।

अपने गणतंत्र के कने कमाल की सहन-शक्ति है। हर अच्छी-बुरी सत्ता और व्यक्तित्व को खुद में समेटकर कभी अपने गम का इजहार नहीं करता। गणतंत्र को मालूम है कि कित्ते किस्म के दाग उसके शरीर पर हैं, फिर भी वह इस कोशिश में है कि कैसे भी हो यह सूरत बदलनी चाहिए। और, इस सूरत को केवल जनता ही बदल सकती है। वो भी अपने वोट की ताकत के सहारे। पर, इत्ता ध्यान रहे कि यह वोट केवल उन्हें ही जाए, जिनमें खुद को बदलने के साथ-साथ देश को बदलने का भी जज्बा हो। लेकिन, उन्हें कतई न जाए जो कपड़े बदलने के जैसे अपना दिल और दल बदलते रहते हैं। केवल बदलाव के सहारे ही गणतंत्र की मजबूती संभव है। फिर भी अपना गणतंत्र सबसे मस्त है। इसे ऐसे ही मस्त बनाएं रखें। गणतंत्र की मस्ती में ही अपनी मस्ती के रास्ते निहित हैं। जय हो।

नेता अच्छे हैं!

नेताओं के प्रति हमने अपने मन में कई प्रकार की भ्रमित अवधारणाएं विकसित कर रखी हैं। हम हमेशा अपने नेताओं को शक की निगाह से ही देखते हैं। उनके वायदों पर यकीन नहीं करते हैं। उनकी बातों पर ज्यादा तव्वजो नहीं देते हैं। सड़क से संसद तलक पहुंचने के उनके संघर्ष पर किस्म-किस्म की उंगलियां उठाते हैं। घोटाला कोई करे, भ्रष्टाचार कोई करे लेकिन दोष सारा का सारा बेचारे नेताओं पर ही मढ़ देते हैं। जरा से शक की बिनाह पर उन्हें जेल में ठूंस देते हैं। जबकि उनकी निष्ठा हमारे प्रति कित्ती गहरी है, इसे हम कभी महसूस ही नहीं करना चाहते। आखिर वे हमारे नेता हैं। हमारे माईबाप हैं। देश, समाज, जनता और लोकतंत्र के चुने हुए प्रतिनिधि हैं। उन पर बात-बात पर शक करना या बुरा-भला कहना कायदे से गलत है! आखिर सामने वाले की इज्जत भी तो कोई चीज होती है कि नहीं।

आज हर कोई यह कह रहा है कि 'अच्छा नेता चुनें।' 'अच्छे नेता को वोट दें।' 'अच्छे नेता को राजनीति में लाएं।' मियां, नेता तो सभी अच्छे होते हैं! यह तो हमारे उन्हें देखने-परखने का नजरिया होता है कि कौन नेता अच्छा है, कौन खराब। और फिर नेता लोग कोई अपने-अपने माथे पर लिखवाकर थोड़े ही न घूमेंगे कि 'हम अच्छे हैं' इसीलिए केवल हमें चुनो। फिर यह भी कैसे संभव है कि जो खुद को अच्छा कहे वो सौ फीसद अच्छा ही होगा! देखे जी, आजकल के जमाने में 'शुद्ध अच्छा' मिलना न तो समाज में संभव है न राजनीति में। हर अच्छा अपने भीतर कुछ न कुछ बुराई लिए ही होता है। अपना काम तो केवल उसके बुरे को इग्नोर करना होना चाहिए बस।

हमेशा ध्यान रखियो प्यारे राजनीति कभी केवल अच्छे होकर या केवल अच्छाई के रास्ते नहीं चल सकती। इसे साधने व चलाने के लिए उंगली को कुछ टेढ़ा-मेढ़ा करना ही पड़ता है। सीधे-सच्चे-अच्छे को तो कोई भी मूर्ख बना जाएगा। नेता वही अच्छा जिसकी बैक अच्छी हो। अच्छी बैक वाले नेता ही चुनाव लड़ने की हिम्मत कर पाते हैं। अपनी अच्छी बैक के दम पर ही कुर्सी पा जाते हैं। जनहित के साथ-साथ अपने निज-हित भी साधते रहते हैं। आखिर चुनाव में खरचे की भरपाई कहीं न कहीं से तो करनी ही होती है प्यारे!
खैर, आपकी तो नहीं कह सकता परंतु मेरे मन में प्रत्येक नेता के प्रति हमेशा ही अच्छे विचार रहते हैं। उनके अच्छे को मैं अपना अच्छा मानता हूं। उनकी अच्छाई के बल पर ही देश का संबल टिका हुआ है। हमेशा टिका भी रहेगा। वे हमारे अच्छे लोकतंत्र के अच्छे रखवाले हैं। उनकी बेपनाह अच्छाईयों पर अक्सर कुर्बान हो जाने को जी चाहता है मेरा। नेताओं के प्रति हम सबको अपने मन की अवधारणाओं को अच्छा रखना होगा ताकि उनकी बुराई भी हमें अच्छी जैसी ही लगे! जब दाग अच्छे हो सकते हैं, तो फिर नेता क्यों नहीं!

तो प्यारे अबसे हमेशा ध्यान रखियो 'अच्छा नेता चुने' जैसा घिसा-पिटा जुमला बोलने से पहले।