मंगलवार, 31 जनवरी 2012

जुबानी-क्रांति की जंग

यू नो, क्रांति शब्द से हमें खासा मोह है। बात-बात में क्रांति करने-कहने-लिखने से हम कभी पीछे नहीं हटते। जनता का जहां थोड़ा बहुत समर्थन मिलता दीखता है, हम तुरंत उसे क्रांति में परिभाषित करने बैठ जाते हैं। कभी अण्णा अपनी क्रांति का झंडा लेकर खड़े हो जाते हैं, तो कभी बाबा रामदेव। भ्रष्टाचार और काला धन के खिलाफ जिस क्रांति को करने का ये महापुरुष दावा करते हैं, उसे चू चू का मुरव्वा बनते अपन कई दफा देख चुके हैं। क्रांति शब्द को हाईजैक करके नाहक ही उसे बदनाम करते रहते हैं ये लोग। ऐसे छोटे-मोटे आंदोलनों-सत्याग्रहों से अगर क्रांतियां होनी लगीं तो चला गया देश! न न अपन यह नहीं कहते कि आप क्रांति न करें, खूब करें, दिन-रात करें मगर इस बहाने जनता को बहकाएं तो नहीं। सड़क या मैदान में भीड़ जुटा लेने से क्रांतियां नहीं होतीं प्यारे!

बहरहाल, चुनावों का बख्त आते ही क्रांति शब्द की डिमांड कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है। हर दल, हर नेता, हर कार्यकर्ता देश और जनता के बीच, अपने वायदों के सहारे, क्रांति करने को ऐसा बेताव-सा रहता है कि बस पूछिए मत। बेशक क्रांति शब्द का महत्व उसे मालूम न हो लेकिन खुद क्रांतिकारी बनने से कभी पीछे नहीं हटता। वो तो बेचारों का बस नहीं चलता, नहीं तो अपनी क्रांति के आगे दुनिया में अब तलक हुई क्रांतियों को वे सिरे से खारिज ही कर डालते!

इधर, नेताओं के बीच चल रही जुबानी-क्रांति निरंतर जोर पकड़ती जा रही है। कभी इस नेता की जुबान क्रांति करने लगती है तो कभी उस की। हर कोई हर किसी की पोल खोलने को तैयार बैठा है। चुनाव में विकास के मुद्दे तो हवा हो गए हैं, जुबान-जुबान के बीच गुल्ली-डंडे का खेल जारी है। और, मीडिया इस जुबानी-क्रांति का भरपूर लुत्फ ले-दिलवा रहा है। अपने-अपने चैनलों पर चार-पांच नेताओं को बुलाकर उनमें जुबानी बहस छिड़वाकर अपनी टीआरपी की चांदी काटने में लगा रहता है बस। अक्सर नेताओं के बीच जुबानी जंग इत्ती तीखी और तेज हो जाती है, लगता है कि सब्जी-मंडी में अपनी-अपनी सब्जियों को बेचने की परस्पर प्रतियोगिता चल रही हो जैसे! इस क्रांति का भी अपना ही आनंद है प्यारे।

अगर देखा जाए तो इसमें दोष सिर्फ नेताओं का ही नहीं है, चुनावों के दौरान फिजा ही कुछ ऐसी हो जाती है कि जुबान स्वयं ही क्रांति करना शुरू कर देती है। अब न पहले जैसा बख्त रहा न पहले जैसे नेता कि कुछ भी कह लिया और चुप्पी साध ली। आज का नेता बयान का जवाब जुबान से देना जानता है। बयान और जुबान के बीच चलने वाली यह जुगलबंदी कब क्रांति में तब्दील हो जाती है, पता ही नहीं चलता। उधर नेता लोग जुबानी-क्रांति में व्यस्त रहते हैं, इधर जनता का मन लगा रहता है। जानते-समझते सब हैं कि नेताओं की यह जुबानी-क्रांति 'पब्लिक स्टंड' से अधिक कुछ नहीं मगर फिर भी मजा लेने में क्या जाता है प्यारे। वैसे भी पांच बरस में थोड़े-बहुत दिन तो इस क्रांति का लुत्फ सबको ही उठाना चाहिए।

खैर, जो भी हो अण्णा और बाबा रामदेव की क्रांतियों के ठंडा पड़ने के साथ इन दिनों अपने नेताओं की जुबानी-क्रांति अच्छा खासा रंग जमाए हुए है। साथ ही सोने पर सुहागा कर रहे हैं उनके अति-क्रांतिकारी घोषणापत्र। इससे जुबानी-क्रांति की जंग और तेज हो गई है। अमां होना दीजिए, इससे किसी को क्या फरक पड़ता है। देश आराम से चल ही रहा है। जनता बिना उफ्फ किए जिये ही चली जा रही है। बुद्धिजीवि सलमान रुशदी के बहाने अपने-अपने बौद्धिक जमा-खर्च को समेटने-बटोरने में लगे ही हुए हैं। हर तरफ बस जुबानी-क्रांति की जंग का ही जोर है। अगर अपन भी दो-चार हाथ इस क्रांति में आजमा लें, तो क्या हरज है प्यारे!

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