मंगलवार, 31 जनवरी 2012

केवल लुत्फ लीजिए घोषणापत्रों की घोषणाओं का

प्यारे, अपन तो चाहते हैं कि हमारे यहां चुनाव हर महीने ही होया करें। दरअसल, चुनावों के सीजन में अपन को मिनट-मिनट में सुख के साथ लुत्फ का सा एहसास होता रहता है। चुनाव के दौरान न महंगाई पर बात होती है न भ्रष्टाचार पर तकरार न काले धन का ज्यादा जिकर। बहुत ही दबी जुबान के साथ नेता लोग ऐसे मुद्दों को अपने मुंह लगाते हैं। उसका कारन है न। क्योंकि हमाम में तो... सभी हैं न प्यारे! समझे।

पर अपन किसी भी दल की दुखती रग पर हाथ रखने के मूड में इस बख्त नहीं हैं। इस बख्त तो अपन चुनावी घोषणापत्रों में घोषित घोषणाओं का लुत्फ ले रहे हैं। क्या कमाल के घोषणापत्र हैं सब के सब! घोषणाएं भी ऐसी कि कान सुनते ही शरमा जाएं। जी हां ऐसे 'अद्भूत घोषणापत्रों' पर आंखें नहीं बल्कि कान शरमाते हैं प्यारे। फिलहाल, अपन के तो कान इस बख्त शरमाए से हुए हैं। कोशिश में लगे हैं कि ये अपनी शरम से थोड़ा तो बाहर कू आएं ताकि सुख के साथ लुत्फ के स्वाद को और मजेदार बनाया जा सके।

घोषणापत्रों में से आवाजें आ रही हैं कि छात्रों को कंप्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट आदि-आदि मुफत में दिया जाएगा। उनकी जिंदगियों को नए सिरे और तरीके से संवारा जाएगा। लड़कियों को मुफत में शिक्षा मिलेगी। बढ़िया है। बहुत बढ़िया है। लेकिन अब तलक किसी दल ने यह नहीं बताया कि यह सब जुगाड़ होगी कैसी? घोषणापत्रों की आकर्षक घोषणाएं हकीकत में तब्दील कैसे होंगी? पिछली दफा भी कुछ ऐसी ही घोषणाएं हुई थीं और चुनाव जीतते ही सब की सब हवा में उड़ा दी गईं थीं। कभी-कभी तो लगता है प्यारे कि अपने यहां चुनावी घोषणाएं शायद हवा में उड़ा देने के लिए ही होती हैं!

आलम यह है कि इस बख्त प्रत्येक राजनीतिक दल के भीतर जंग-सी छिड़ी है अपने-अपने घोषणापत्रों को अति-लुभावना बनाने की। सुनने में तो यहां तक आया कि कुछ दलों ने गाय देने का भी वायदा किया है। गनीमत है गाय का ही चुनाव किया शेर, चीते या हाथी का नहीं! नहीं तो बेचारे मतदाता को घणी मुसीबत हो जाती है। नेता जी की जीत के बदले में मिले 'घोषित जानवर' को बेचारा कहां-कहां संभालता फिरता।
सुन रहे हैं यह सब आकर्षक घोषणाएं युवा मतदाता को लुभाने-ललचाने के लिए ही की गई हैं। मगर प्यारे युवाओं का दिल बात-बात पर जैसे मचलता रहता है, उसे देखकर तो नहीं लगता कि वे ऐसी घोषणाओं के प्रति बहुत ज्यादा आकर्षित होंगे! वे तो अपने दम पर ही दुनिया को बदलने की चाह रखते हैं। पर उनकी चाह से मिलती-जुलती कोई खास बात तो अभी तलक नहीं दिखी है इन घोषणापत्रों में। अरे कंप्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट तो अब आम-सी चीजें बन चुकी हैं युवाओं के लिए।

बहरहाल, देखते हैं इस दफा कित्ते युवा घोषणापत्रों की घोषित घोषणाओं पर आकर्षित होते हैं या फिर अपने मन की करते हैं। बस थोड़ा-सा इंतजार और...।

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