मंगलवार, 17 जनवरी 2012

पर्दा है पर्दा

चुनाव आयोग के आदेश पर मूर्तियां सकते में हैं। क्या करें क्या न करें कुछ समझ नहीं पा रहीं! चुनावी घमासान के बीच पीसे जा रही हैं। अपनी स्वतंत्र व प्ररेणास्पद इमेज के ताईं पहचानी जाने वाली मूर्तियां, ठूंठ-सी बनकर रह गई हैं। पर्दों के बीच रहना मूर्तियों को गंवारा नहीं। पर्दा मूर्तियों के वास्ते किसी अभिशाप से कम नहीं। मूर्तियों पर पर्दा डालना अगले के चरित्र पर पर्दा डालने जैसा है। यहां-वहां खड़ीं लंबी-महंगी मूर्तियां बताती हैं कि अगले का राजनीतिक व सामाजिक वर्चस्व केवल उन्हीं पर टिका है। खुद को स्थापित करने-करवाने का उत्तम माध्यम हैं मूर्तियां।

राजनीति में मूर्तियां बहुत जरूरी हैं। इससे अगले के कद का पता चलता है। विपक्ष पर दवाब बनाया और जनता को इंप्रेस किया जाता है। चौराहे या पार्क में स्थापित अगले की मूर्ति चुप रहकर ही बहुत कुछ कह जाती है। देश या प्रदेश का विकास हो या न हो परंतु मूर्तियों के विस्तार में कहीं कोई कमी नहीं आनी चाहिए। अगले की मूर्तियों की ऐतिहासिकता को जब इतिहास में दर्ज किया जाएगा, तब उसकी बात ही कुछ और होगी। और, राजनीति में आनकर, नेता बनकर अगर अगले ने जगह-जगह अपनी मूर्तियां नहीं खड़ी करवाईं, तो किसी काम की नहीं उसकी राजनीतिक हनक।

दरअसल, चुनाव आयोग को समझना चाहिए कि मूर्तियों पर पर्दा डलवा लेने से, चीजें नहीं बदलने वालीं। मूर्तियां प्रचार-प्रसार का नहीं, नयन-सुख का प्रतिबिम्ब होती हैं। सूड़ उठाए, दांत फैलाए, हल्का-सा मुस्कुराए मस्त हाथी को आप मूर्ति की शक्ल में तो आराम से देख व छू भी सकते हैं, किंतु साक्षात उसके साथ ऐसा नहीं कर सकते। प्यारे, वो हाथी है, कब में बिदक जाए! कब में उठाकर तुम्हें शहर के बाहर फेंक दे। मूर्तियों में खड़ा हाथी अपने हर प्रकार के एहसास से हमें परिचित करवाता रहता है। यूं हाथी की मूर्ति पर पर्दा डालना, उसके विशाल शरीर ही नहीं, उसकी प्यारी सूड़ के साथ भी 'इमोशनल अत्याचार' है।

आप बेशक न सुन पा रहे हों लेकिन मैं पर्दे के भीतर सिमटी मूर्तियों के क्रंदन को साफ सुन पा रहा हूं। मूर्तियां रो-रोकर कह रही हैं कि आखिर हमारा कुसूर क्या है? क्या मूर्ति होना ही हमारा एकमात्र पाप है? मूर्तियां तो कलात्मकता का आईना होती हैं, आखिर हमारे आईनों को क्यों ढंका जा रहा है? मूर्तियों के सवाल अपनी जगह वाजिब हैं प्यारे। और, यह भी सुन लो मूर्तियों का यूं रोना न राजनीति, न चुनाव, न नेता, न मंत्री के वास्ते ठीक नहीं है। ज्ञानी बताते हैं कि मूर्तियां जब रोती हैं, तो प्रलय आती है। क्या यह किसी राजनीतिक प्रलय के आने का संकेत तो नहीं? अभी तो हम 2012 में प्रलय की भविष्यवाणी से ही नहीं उबर पाए हैं।

पर्दे के बीच रह रही मूर्तियों का यूं रोना अब मुझसे नहीं देखा-सुना जाता। दिल खासा द्रवित हो जाता है। मैं नहीं चाहता कि मूर्तियां गुस्से में आकर ऐवईं कोई श्राप दे दें। किसी को बेकारण सताना भी ठीक नहीं है। अतः मेरी चुनाव आयोग से गुजारिश है कि मूर्तियों को पर्देदारी से मुक्त किया जाए। हाथी को खुली हवा में सांस लेने व सूड़ लहराने की छूट दी जाए। ताकि मूर्तियों का पर्दों के पीछे छिपा सम्मान पुनः वापस आ सके।

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