मंगलवार, 17 जनवरी 2012

नेता जी का रोना

प्यारे, आंसू बेशक नेता जी के निकले थे मगर उन्हें देखकर मन हमारा भी भर आया था। उनका साथ निभाने के वास्ते दो-चार आंसू हमने भी लुढ़का लिए थे। भरी सभा के बीच अच्छा नहीं लगता कि अकेले नेताजी रोएं, हम ठूंठ की तरह यूंही खड़े रहें। आखिर हमारा भी तो कोई फरज बनता है कि नहीं अपने नेताजी के प्रति! बेचारे नेताजी हमारे वास्ते पूरे पांच साल तलक इत्ती कठिनाईयां मोल लें और हम उनके आंसू के साथ अपने आंसू भी न बहा पाएं, तो प्यारे लानत है हम पर। इस नाते हमें जनता होने का कोई हक नहीं। यह भी कोई बात हुई भला, अपनी जुगाड़ लगवाने के लिए नेता जी और उनके आड़े बख्त में बाय-बाय नेता जी। न न ऐसा जुलम कम से कम हम तो नहीं कर सकते।

जरनली, हमारे देश के नेता बहुत स्ट्रांग होते हैं। हर बाधा को बड़ी खामोशी से पार कर जाते हैं। जनता को भले ही इमोसनल कर दें परंतु खुद कभी इमोसनल नहीं होते। लेकिन यहां तो मामला ही कुछ दूजे किस्म का था। एक तो नेता जी को पार्टी से बाहर कर दिया और ऊपर से उनका टिकट भी काट लिया। पता है, पार्टी और टिकट ही तो नेता जी की असली जान होवे है, उसी से उन्हें जुदा कर दो। यह ठीक नहीं है। ऐन चुनावों के बख्त इत्ता सदमा भला नेता जी कैसे बरदास कर पाते, सो रो दिए। नेता जी के रोने में पहली दफा हमने इमोसनल-कम-पोलिटिकल अत्याचार महसूस किया। ऐसा तो कोई अपने दुश्मन के साथ भी न करे है प्यारे।

ज्ञानियों ने ऐसा बताया है कि नेता का रोना देश और राजनीति के वास्ते शुभ संकेत नहीं होता। तमाम प्रकार के बिघ्न बीच में आते हैं। बात ठीक भी है, अपने जन-सेवक को यूं रूलाना भला कहां की अक्लमंदी है! हमें तो अपने नेता जी की हिफाजत व इज्जत हर हाल में करनी चाहिए। क्योंकि वो हैं, तो हम हैं। न जाने उनके कित्ते-कित्ते किस्म के एहसान हैं हम पर और देश पर। अरे भई नेता तो लोकतंत्र की नाक होता है। अपनी नाक का इस्तेमाल वो चुनावों के दौर ही करता है। ऐसे में नेता जी की नाक का गिला होना ठीक नहीं है।

चलो खैर यह भी सही रहा कि नेता जी का रोना फजूल नहीं गया। एक प्रमुख दल ने उन्हें सर छिपाने की जगह दे ही दी। साथ ही चुनाव लड़ने का टिकट भी। इसके अतिरिक्त हमारे नेता जी को और क्या चाहिए! पहले जी-जान से उन्होंने उस पार्टी की सेवा की थी, अब इसकी करेंगे। हमें हमारे नेता जी की राजनीतिक प्रतिबद्धता में कोई सक-सुभा नहीं है। राजनीतिक प्रतिबद्धता को स्थापित के ताईं तो हमारे नेता जाने क्या-क्या कर जाते हैं। कृपया, उनकी प्रतिबद्धता पर चुलहबाजी न करें।
हमारे नेता जी की खुसी में ही हमारी खुसी है। अब जाकर हमारे भी आंसू ठहर पाए हैं। सांस में काफी राहत महसूस कर रहे हैं। जनता का पूरा स्पोर्ट है नेता जी को। संघर्ष वो करेंगे, नारे लगाने के ताईं हम हैं ही। अरे, सरम किस बात की यह तो हमारा जनम-जात फरज है। केवल चुनावों के बख्त ही तो हमें देसी से विदेसी ठर्ररे का स्वाद मिलता है। इन्हीं दिनों नेता जी की खास किरपा रहती है हम पर। बताओ तो भला हम कैसे अपने नेता जी के दुख-सुख में साथ निभाना छोड़ दें!

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