मंगलवार, 31 जनवरी 2012

अण्णा का थप्पड़

तो अण्णा हजारे अब भ्रष्टाचारियों को थप्पड़ रसीद करवाएगें! मतलब कि खुलेआम उनकी बेइज्जती करवाएगें! क्या हुआ जो वे भ्रष्टाचारी हैं, आखिर समाज में इज्जत तो वे भी रखते हैं! कभी किसी मौके या मोड़ पर अपनी सामाजिकता से पीछे नहीं हटते हैं। क्या भ्रष्टाचारी होना पाप है? अगर पाप है तो अब तलक सरकार द्वारा इसे बैन क्यों नहीं किया गया है? क्या वजह है कि भ्रष्टाचारी सरकार, समाज और व्यवस्था में जगह पाए हुए हैं? आखिर क्यों कोई आड़ा-तिरछा काम भ्रष्टाचारी के सहयोग बिना पूरा नहीं होता? अण्णा शायद जानते नहीं कि देश के आर्थिक विकास में कित्ता बड़ा कंट्रीव्यूशन केवल भ्रष्टाचारियों के रास्ते ही आता है! अब यह बात अलहदा है कि उन्होंने कभी अपने योगदान को गाया नहीं! कभी खुलकर इसे स्वीकार नहीं किया! और उन्हीं योगदानी महापुरुषों को अण्णा थप्पड़ मारने को कह रहे हैं। बताइए, कित्ती गलत विचारधारा रखते हैं अण्णा भ्रष्टाचारियों के प्रति!

यह भ्रष्टाचारियों का धैर्य ही है जो अण्णा के, उनके खिलाफ दिए गए, ऐसे घातक बयानों पर कभी टूटता नहीं। कभी वे अण्णा की बातों का बुरा नहीं मानते। कभी उनकी कोई शिकायत जनता से नहीं करते। न ही सरकार या राजनीति दलों को पत्र ही लिखते हैं। अण्णा को देखिए, बात-बात में बच्चों की तरह कभी सरकार तो कभी अन्य राजनीतिक दलों को पत्र लिखने बैठ जाते हैं। जब वहां से कोई सुनवाई नहीं होती तो जनता को अपने भ्रमित बयानों से बरगलाते हैं। अण्णा और उनकी टीम का बस एक ही उद्देश्य रहता है कि जनता उन्हें छोड़कर कहीं न जाए। हर बख्त उनके पल्लू से बंधी उनके संग-साथ चले। आप खुद ही बताएं क्या ऐसा संभव हो सकता है? जनता तो स्वतंत्र है किसी के भी साथ जाने के लिए। माना कि कुछ लोग अण्णा के साथ हैं, तो कुछ उनके खिलाफ भी हैं। यह न भूलिए।

कोई माने या न माने परंतु मुझे तो सरकार से कहीं ज्यादा सब्र भष्टाचारियों में नजर आता है। अपने अपमान के हर घूंट को वे ऐसे पी जाते हैं, जैसे कुछ हुआ ही न हो। यह बड़ी बात है। अण्णाओं के बयानों और आंदोलनों से बेफिकर वे दो का तीन, तीन का चार करने में निश्चितंता के साथ लगे हुए हैं। उन्हें मालूम है कि बयानों या आंदोलनों से पेट नहीं भरता, केवल सीना चौड़ा होता है। अब कौन कमबख्त यहां अपना सीना चौड़ा करने के लिए जीता है प्यारे!

मुझे लगता है कि अण्णा हजारे और उनकी ईमानदार टीम नाहक ही अपना बख्त बर्बाद कर रही है। भ्रष्टाचार की खाल बेहद मोटी है, इसे इत्ती आसानी से नहीं भेदा जा सकता। सबसे बड़ी बात तो यह है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने, बोलने और सत्याग्रह करने वाले जनता के दरबार में पहले खुद तो पाकसाफ होकर दिखाएं। लुत्फ देखिए जरा, आप अपने भ्रष्टाचार पर तो 'सफेद चादर' डाले हुए हैं और उनसे उनकी 'काली चादर' को हटाने के लिए कह रहे हैं। भला ऐसा भी होता है कहीं। वाह! मीठा-मीठा गप्प-गप्प, कड़वा-कड़वा थू थू।

जाहिर-सी बात है प्यारे केवल थप्पड़ मारने से न तो भ्रष्टाचार कम हो जाएगा न ही भ्रष्टाचारियों को अक्ल आएगी। भ्रष्टाचारियों को थप्पड़ मारना या पियक्कड़ों को खंभे से बांधकर कोड़े लगवाना अहिंसा का नहीं हिंसा का द्योतक है। यह गांधी का रास्ता हो ही नहीं सकता। न ही गांधी ने कभी किसी प्रकार की हिंसा का समर्थन किया था। लेकिन अण्णा तो सीधे हिंसा के रास्तों पर ही चलने लगे हैं, वो भी गांधीवाद की तख्ती अपने गले में लटकाए। ऐसा गांधीवाद भ्रामक है।

मैं तो कहता हूं बस बहुत हुआ...। भ्रष्टाचारियों को अब एकजुट हो ही जाना चाहिए। उन्हें अण्णा के प्रति अपने विरोध को दर्ज करवाना ही चाहिए ताकि बयान का जवाब एकजुटता से दिया जा सके।
फिलहाल, हमें भ्रष्टाचारियों के जवाब का बेसबरी से इंतजार है।

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