सोमवार, 9 जनवरी 2012

अपन भी चुनाव लड़ेंगे

प्यारे, इस दफा अपन का भी चुनाव लड़ना लगभग तय है। पार्टी का चुनाव कर लिया है, बस नेता जी की मोहर लगना शेष है। वो लग ही जाएगी क्योंकि नेता जी से अपन के ताल्लुकात बहुत पुराने हैं। नेता जी व्यवहारकुशल तो बहुत हैं परंतु ईमानदारी में जरा कम विश्वास करते हैं। दल-बदल के प्रति उनका खास रूझान रहता है। जिस दल में नेता जी की दाल नहीं गल पाती, वहां से तुरंत कट लेते हैं। इस मामले में वे किसी की नहीं सुनते।

अपनी महत्ता को भुनना उन्हें अच्छे से आता है। जहां से खड़े हो जाते हैं, जनता भी वहीं चली आती है। जनता के हितों के वास्ते वे हर तरह का सौदा व समझौता करने की तमन्ना रखते हैं। सिर्फ जन-हित के वास्ते उन्होंने अपना प्राइवेट दल भी बनाया हुआ है। जब भी कभी चुनाव में किसी दल से उन्हें टिकट नहीं मिल पाता, अपने प्राइवेट दल का ही उपयोग करते हैं। जीताऊ दल की सरकार बनने के बाद, उसी में शामिल हो जाते हैं। अब तलक वे कित्ते दलों के बीच अपनी अदला-बदली दर्ज करवा चुके हैं, खुद उन्हें भी नहीं मालूम।

नेता जी की इन्हीं खूबियों को देखते-समझते हुए ही अपन ने उन्हीं के साथ होने का डिसाइड किया है। साफ बात कहते हैं अपन को ऐसे नेता ही भाते हैं। ज्यादा बौद्धिक, ज्यादा चिंताग्रस्त, ज्यादा प्रगतिशील, ज्यादा हितकारी नेता अपन के पल्ले नहीं पड़ते। ऐसे नेता लोग राजनीति कम करते हैं, प्रतिबद्धताएं ज्यादा गिनाते हैं। मुद्दा-दर-मुद्दा बाल की खाल निकालते हैं। कभी उदारीकरण का विरोध करते हैं, तो कभी विदेशी निवेश पर आंसू बहाते हैं। चुनावों के बख्त न खुद कुछ लेते हैं, न ही दूसरे को लेने देते हैं। भला ऐसे राजनीति थोड़े ही होवे है प्यारे। लेने-देन तो राजनीति का प्रमुख आयाम है। इसे त्यागना महा-पाप है।

इस मामले में हमारे नेता जी हमेशा चौकस रहते हैं। उनका कहना है, राजनीति बौद्धिकता के दम पर नहीं लेने-देन के दम पर ही करी जाती है। आखिर इत्ता महंगा चुनाव लड़ना कोई हंसी-खेल थोड़े ही है। चुनाव लड़ने, जनता को मनाने, सदस्यों को जुटाने में टांके खुल जाते हैं। इस जनता के मूड का कोई भरोसा नहीं। कब में बदल जाए और कब में अकड़ जाए। भीड़ जुटाकर एक दफा अण्णा हजारे ने भी हुंकार भरी थी मगर दूसरी दफा उनकी सारे हुंकारें पानी मांगती जान पड़ीं। इसलिए प्यारे जनता की राजनीति को कुछ इस अंदाज से अंजाम दो कि सांप भी रहे और लाठी भी न टूटे।

अपन नेता जी के दल में आए ही इसलिए हैं ताकि अपनी अति-बौद्धिकता से मुक्ति पा सकें। बात-बात में क्रांति का नारा देने से बच सकें। ठाठ से चुनाव लड़ें और ठाठ से जीतें, बाकी के जन-हित के ताईं तो पूरे पांच साल हैं ही। अपने ने देखा है कि सीट निकलते ही सब कुछ बहुत आसान हो जाता है। और फिर जब अपन नेता जी के नक्शे-कदम पर चलेंगे, तब सब कुछ आसान ही आसान समझिए प्यारे।

अपन को विश्वास है, जित्ता अपन अब तलक पन्ने रंगकर नहीं जुटा पाए, नेता बनकर तो जुटा ही लेंगे। कमाई के मामले में तो अपने देश की राजनीति का कोई जवाब ही नहीं है। यहां तो रेगिस्तान में भी पानी निकल ही आता है।

तो साथियों, इस दफा वोट अपन को ही दें। गर आप अपना हित चाहते हैं, तो केवल अपन को ही जितवाएं। नेता जी के मार्ग-दर्शन की कसम, आपका संपूर्ण ख्याल रखेंगे। अरे..अरे..अरे.. बताना तो भूल ही गए अपन का चुनाव चिह्न गिरगिट है। तो गिरगिट का ही बटन दबाएं और अपन को विजयी बनाएं।

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