बुधवार, 4 जनवरी 2012

नए साल का संकल्प

प्यारे, नए साल पर अपन ने भ्रष्टाचार का साथ निभाने का संकल्प लिया है। अब इस संकल्प पर कोई ऐतराज जताए या मुस्कुराए, अपन नहीं सुनने वाले। और सुनने भी क्यों? यह भी कोई बात होवे है, जब जिसके मूड में आता है भ्रष्टाचार को गरियाने निकल पड़ता है। कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन-आंदोलन कर रहा है तो कोई सत्याग्रह। मंच से जमकर भ्रष्टों को कोसा-कोसवाया जा रहा है। सियाने कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार देश की प्रगति में बाधक है। अगर वाकई बाधक होता तो हमारे देश का शुमार श्रेष्ठ विकासशील देशों में न होता! ओबामा ऐवईं हमारे देश की तरक्की की तारीफ नहीं कर जाते! और तो और हमारे देश में नेता से लेकर मंत्री, क्लर्क से लेकर चपरासी तक करोड़पति नहीं होते! पता है, भ्रष्टाचार के मामले में हमारे देश की तूती बोलती है। केवल इसी मामले में हमारा पड़ोसी हमसे भय खाता है! हुं.. इन सियानों को क्या मालूम कि देश की प्रगति के ताईं भ्रष्टाचार का साथ कित्ता आवश्यक है? न जाते कित्ते बरसों से हम इसकी सेवा में तन-मन-धन से रत हैं। हम इसे नहीं छोड़ सकते।

देश और समाज के भीतर-बाहर हलचल मचाने के वास्ते कुछ तो ऐसा होना चाहिए कि जिसके बहाने हमारा दिल बहल सके। अण्णा हजारे जैसों की नौटंकियों का सच जनता के सामने आ सके। विपक्ष की कथित सदाशयता का पता लग सके। समाज के कथित ईमानदारों की गिनती हो सके। इस सब के ताईं भ्रष्टाचार से उपयुक्त और कोई युक्ति नहीं हो सकती। भ्रष्टाचार के बहाने सत्ता और रचनात्मकता की रोटियां सकेने वालों की असलीयत अपन बहुत अच्छे से जाने हैं प्यारे। जबान पर क्रांति और विचार में भ्रांति ही उनका उद्देश्य रहा है।

भ्रष्ट अगर कुछ कहता नहीं तो यह न समझा जाए कि वो गूंगा है। भ्रष्ट के कने बहुत लंबी जबान होती है, अगर खुदा--खास्ता खुल गई तो स्विस बैंक से लेकर पेड न्यूज तलक का राज फाश करने की ताकत रखती है। और हां ऊपर से ईमानदार अंदर से कित्ते ईमानदार हैं, इसे भ्रष्ट से बेहतर कोई नहीं जानता।

अपन बहुत अच्छे से जानते-समझते हैं कि अपन का संकल्प बेहद मुश्किल है। भ्रष्टाचार के समर्थन में, वो भी संकल्प के साथ आना, हर किसी के बूते की बात नहीं। इसको लेकर लोग तरह-तरह की बातें करने और मुंह बनाने लग जाते हैं। अपन ने बहुत दफा देखा है समाज के कथित ईमानदार ठेकेदारों को दूसरे के भ्रष्टाचार को कोसते और अपनी ईमानदारी की बढ़ाई करते हुए। लेकिन कोई नहीं अपन ने एक दफा जो संकल्प ले लिया तो अपन खुद की भी नहीं सुनते।

सब देखभाल और सोच-समझकर अपन ने तय किया है कि अब से भ्रष्ट और भ्रष्टाचार की भलाई के वास्ते ही अपन संघर्ष करेंगे। भ्रष्टों तुम न घबराना अपन का तुम्हें भरा-पूरा समर्थन है। जब तलक अपन की जान में जान है, यह बस तुम्हीं पर कुर्बान है। हमारे पुरखों द्वारा स्थापित व्यवस्था को अपन इत्ती आसानी से नहीं त्याग सकते। भ्रष्ट व्यवस्था को त्यागना एक तरह से हमारे पुरखों को अपमान होगा। आखिर उनकी भी तो कोई इज्जत है कि नहीं!
जिन्हें यह संकल्प रास आए, अपन के साथ आ सकता है। किसी प्रकार की कोई जोर-जबरदस्ती नहीं है। अपन अण्णा हजारे नहीं हैं कि भोले-भाले लोगों को अपने नाटकिए अनशन-आंदोलनों से भरमाएं-बरगलाएं। उन्हें सरकार, संसद और नेता के खिलाफ तीखा बोलने की छूट दें। मीडिया में अपना चेहरे चमकाने के वास्ते खुद को दूसरा गांधी घोषित करवाएं। दूसरे के भ्रष्टाचार के खिलाफ हल्ला बोलें और अपने भ्रष्टाचार पर कान दबा जाएं। साफ सुन लें, अपन ऐसी दोगली बातें करने के आदी नहीं। अपन बेहद साफ-दिल आदमी हैं। उनकी तरह अपन को खोखली-क्रांति करने का शौक नहीं। अपना एक ही उद्देश्य है; खुद भी खाओ, दूसरे को भी खिलाओ और भ्रष्टाचार की समद्धि में हाथ बंटाओ। दरअसल, मेरी-तेरी, उसकी-इसकी तरक्की का रास्ता बिना भ्रष्टाचार का साथ पाए तय नहीं किया जा सकता। इसलिए दूसरों की बातों में न आएं कृपया केवल अपनी ही अक्ल लगाएं।

1 टिप्पणी:

गिरीन्द्र नाथ झा ने कहा…

संघर्ष करते रहिए सरजी