मंगलवार, 31 जनवरी 2012

जुबानी-क्रांति की जंग

यू नो, क्रांति शब्द से हमें खासा मोह है। बात-बात में क्रांति करने-कहने-लिखने से हम कभी पीछे नहीं हटते। जनता का जहां थोड़ा बहुत समर्थन मिलता दीखता है, हम तुरंत उसे क्रांति में परिभाषित करने बैठ जाते हैं। कभी अण्णा अपनी क्रांति का झंडा लेकर खड़े हो जाते हैं, तो कभी बाबा रामदेव। भ्रष्टाचार और काला धन के खिलाफ जिस क्रांति को करने का ये महापुरुष दावा करते हैं, उसे चू चू का मुरव्वा बनते अपन कई दफा देख चुके हैं। क्रांति शब्द को हाईजैक करके नाहक ही उसे बदनाम करते रहते हैं ये लोग। ऐसे छोटे-मोटे आंदोलनों-सत्याग्रहों से अगर क्रांतियां होनी लगीं तो चला गया देश! न न अपन यह नहीं कहते कि आप क्रांति न करें, खूब करें, दिन-रात करें मगर इस बहाने जनता को बहकाएं तो नहीं। सड़क या मैदान में भीड़ जुटा लेने से क्रांतियां नहीं होतीं प्यारे!

बहरहाल, चुनावों का बख्त आते ही क्रांति शब्द की डिमांड कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है। हर दल, हर नेता, हर कार्यकर्ता देश और जनता के बीच, अपने वायदों के सहारे, क्रांति करने को ऐसा बेताव-सा रहता है कि बस पूछिए मत। बेशक क्रांति शब्द का महत्व उसे मालूम न हो लेकिन खुद क्रांतिकारी बनने से कभी पीछे नहीं हटता। वो तो बेचारों का बस नहीं चलता, नहीं तो अपनी क्रांति के आगे दुनिया में अब तलक हुई क्रांतियों को वे सिरे से खारिज ही कर डालते!

इधर, नेताओं के बीच चल रही जुबानी-क्रांति निरंतर जोर पकड़ती जा रही है। कभी इस नेता की जुबान क्रांति करने लगती है तो कभी उस की। हर कोई हर किसी की पोल खोलने को तैयार बैठा है। चुनाव में विकास के मुद्दे तो हवा हो गए हैं, जुबान-जुबान के बीच गुल्ली-डंडे का खेल जारी है। और, मीडिया इस जुबानी-क्रांति का भरपूर लुत्फ ले-दिलवा रहा है। अपने-अपने चैनलों पर चार-पांच नेताओं को बुलाकर उनमें जुबानी बहस छिड़वाकर अपनी टीआरपी की चांदी काटने में लगा रहता है बस। अक्सर नेताओं के बीच जुबानी जंग इत्ती तीखी और तेज हो जाती है, लगता है कि सब्जी-मंडी में अपनी-अपनी सब्जियों को बेचने की परस्पर प्रतियोगिता चल रही हो जैसे! इस क्रांति का भी अपना ही आनंद है प्यारे।

अगर देखा जाए तो इसमें दोष सिर्फ नेताओं का ही नहीं है, चुनावों के दौरान फिजा ही कुछ ऐसी हो जाती है कि जुबान स्वयं ही क्रांति करना शुरू कर देती है। अब न पहले जैसा बख्त रहा न पहले जैसे नेता कि कुछ भी कह लिया और चुप्पी साध ली। आज का नेता बयान का जवाब जुबान से देना जानता है। बयान और जुबान के बीच चलने वाली यह जुगलबंदी कब क्रांति में तब्दील हो जाती है, पता ही नहीं चलता। उधर नेता लोग जुबानी-क्रांति में व्यस्त रहते हैं, इधर जनता का मन लगा रहता है। जानते-समझते सब हैं कि नेताओं की यह जुबानी-क्रांति 'पब्लिक स्टंड' से अधिक कुछ नहीं मगर फिर भी मजा लेने में क्या जाता है प्यारे। वैसे भी पांच बरस में थोड़े-बहुत दिन तो इस क्रांति का लुत्फ सबको ही उठाना चाहिए।

खैर, जो भी हो अण्णा और बाबा रामदेव की क्रांतियों के ठंडा पड़ने के साथ इन दिनों अपने नेताओं की जुबानी-क्रांति अच्छा खासा रंग जमाए हुए है। साथ ही सोने पर सुहागा कर रहे हैं उनके अति-क्रांतिकारी घोषणापत्र। इससे जुबानी-क्रांति की जंग और तेज हो गई है। अमां होना दीजिए, इससे किसी को क्या फरक पड़ता है। देश आराम से चल ही रहा है। जनता बिना उफ्फ किए जिये ही चली जा रही है। बुद्धिजीवि सलमान रुशदी के बहाने अपने-अपने बौद्धिक जमा-खर्च को समेटने-बटोरने में लगे ही हुए हैं। हर तरफ बस जुबानी-क्रांति की जंग का ही जोर है। अगर अपन भी दो-चार हाथ इस क्रांति में आजमा लें, तो क्या हरज है प्यारे!

अण्णा का थप्पड़

तो अण्णा हजारे अब भ्रष्टाचारियों को थप्पड़ रसीद करवाएगें! मतलब कि खुलेआम उनकी बेइज्जती करवाएगें! क्या हुआ जो वे भ्रष्टाचारी हैं, आखिर समाज में इज्जत तो वे भी रखते हैं! कभी किसी मौके या मोड़ पर अपनी सामाजिकता से पीछे नहीं हटते हैं। क्या भ्रष्टाचारी होना पाप है? अगर पाप है तो अब तलक सरकार द्वारा इसे बैन क्यों नहीं किया गया है? क्या वजह है कि भ्रष्टाचारी सरकार, समाज और व्यवस्था में जगह पाए हुए हैं? आखिर क्यों कोई आड़ा-तिरछा काम भ्रष्टाचारी के सहयोग बिना पूरा नहीं होता? अण्णा शायद जानते नहीं कि देश के आर्थिक विकास में कित्ता बड़ा कंट्रीव्यूशन केवल भ्रष्टाचारियों के रास्ते ही आता है! अब यह बात अलहदा है कि उन्होंने कभी अपने योगदान को गाया नहीं! कभी खुलकर इसे स्वीकार नहीं किया! और उन्हीं योगदानी महापुरुषों को अण्णा थप्पड़ मारने को कह रहे हैं। बताइए, कित्ती गलत विचारधारा रखते हैं अण्णा भ्रष्टाचारियों के प्रति!

यह भ्रष्टाचारियों का धैर्य ही है जो अण्णा के, उनके खिलाफ दिए गए, ऐसे घातक बयानों पर कभी टूटता नहीं। कभी वे अण्णा की बातों का बुरा नहीं मानते। कभी उनकी कोई शिकायत जनता से नहीं करते। न ही सरकार या राजनीति दलों को पत्र ही लिखते हैं। अण्णा को देखिए, बात-बात में बच्चों की तरह कभी सरकार तो कभी अन्य राजनीतिक दलों को पत्र लिखने बैठ जाते हैं। जब वहां से कोई सुनवाई नहीं होती तो जनता को अपने भ्रमित बयानों से बरगलाते हैं। अण्णा और उनकी टीम का बस एक ही उद्देश्य रहता है कि जनता उन्हें छोड़कर कहीं न जाए। हर बख्त उनके पल्लू से बंधी उनके संग-साथ चले। आप खुद ही बताएं क्या ऐसा संभव हो सकता है? जनता तो स्वतंत्र है किसी के भी साथ जाने के लिए। माना कि कुछ लोग अण्णा के साथ हैं, तो कुछ उनके खिलाफ भी हैं। यह न भूलिए।

कोई माने या न माने परंतु मुझे तो सरकार से कहीं ज्यादा सब्र भष्टाचारियों में नजर आता है। अपने अपमान के हर घूंट को वे ऐसे पी जाते हैं, जैसे कुछ हुआ ही न हो। यह बड़ी बात है। अण्णाओं के बयानों और आंदोलनों से बेफिकर वे दो का तीन, तीन का चार करने में निश्चितंता के साथ लगे हुए हैं। उन्हें मालूम है कि बयानों या आंदोलनों से पेट नहीं भरता, केवल सीना चौड़ा होता है। अब कौन कमबख्त यहां अपना सीना चौड़ा करने के लिए जीता है प्यारे!

मुझे लगता है कि अण्णा हजारे और उनकी ईमानदार टीम नाहक ही अपना बख्त बर्बाद कर रही है। भ्रष्टाचार की खाल बेहद मोटी है, इसे इत्ती आसानी से नहीं भेदा जा सकता। सबसे बड़ी बात तो यह है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने, बोलने और सत्याग्रह करने वाले जनता के दरबार में पहले खुद तो पाकसाफ होकर दिखाएं। लुत्फ देखिए जरा, आप अपने भ्रष्टाचार पर तो 'सफेद चादर' डाले हुए हैं और उनसे उनकी 'काली चादर' को हटाने के लिए कह रहे हैं। भला ऐसा भी होता है कहीं। वाह! मीठा-मीठा गप्प-गप्प, कड़वा-कड़वा थू थू।

जाहिर-सी बात है प्यारे केवल थप्पड़ मारने से न तो भ्रष्टाचार कम हो जाएगा न ही भ्रष्टाचारियों को अक्ल आएगी। भ्रष्टाचारियों को थप्पड़ मारना या पियक्कड़ों को खंभे से बांधकर कोड़े लगवाना अहिंसा का नहीं हिंसा का द्योतक है। यह गांधी का रास्ता हो ही नहीं सकता। न ही गांधी ने कभी किसी प्रकार की हिंसा का समर्थन किया था। लेकिन अण्णा तो सीधे हिंसा के रास्तों पर ही चलने लगे हैं, वो भी गांधीवाद की तख्ती अपने गले में लटकाए। ऐसा गांधीवाद भ्रामक है।

मैं तो कहता हूं बस बहुत हुआ...। भ्रष्टाचारियों को अब एकजुट हो ही जाना चाहिए। उन्हें अण्णा के प्रति अपने विरोध को दर्ज करवाना ही चाहिए ताकि बयान का जवाब एकजुटता से दिया जा सके।
फिलहाल, हमें भ्रष्टाचारियों के जवाब का बेसबरी से इंतजार है।

केवल लुत्फ लीजिए घोषणापत्रों की घोषणाओं का

प्यारे, अपन तो चाहते हैं कि हमारे यहां चुनाव हर महीने ही होया करें। दरअसल, चुनावों के सीजन में अपन को मिनट-मिनट में सुख के साथ लुत्फ का सा एहसास होता रहता है। चुनाव के दौरान न महंगाई पर बात होती है न भ्रष्टाचार पर तकरार न काले धन का ज्यादा जिकर। बहुत ही दबी जुबान के साथ नेता लोग ऐसे मुद्दों को अपने मुंह लगाते हैं। उसका कारन है न। क्योंकि हमाम में तो... सभी हैं न प्यारे! समझे।

पर अपन किसी भी दल की दुखती रग पर हाथ रखने के मूड में इस बख्त नहीं हैं। इस बख्त तो अपन चुनावी घोषणापत्रों में घोषित घोषणाओं का लुत्फ ले रहे हैं। क्या कमाल के घोषणापत्र हैं सब के सब! घोषणाएं भी ऐसी कि कान सुनते ही शरमा जाएं। जी हां ऐसे 'अद्भूत घोषणापत्रों' पर आंखें नहीं बल्कि कान शरमाते हैं प्यारे। फिलहाल, अपन के तो कान इस बख्त शरमाए से हुए हैं। कोशिश में लगे हैं कि ये अपनी शरम से थोड़ा तो बाहर कू आएं ताकि सुख के साथ लुत्फ के स्वाद को और मजेदार बनाया जा सके।

घोषणापत्रों में से आवाजें आ रही हैं कि छात्रों को कंप्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट आदि-आदि मुफत में दिया जाएगा। उनकी जिंदगियों को नए सिरे और तरीके से संवारा जाएगा। लड़कियों को मुफत में शिक्षा मिलेगी। बढ़िया है। बहुत बढ़िया है। लेकिन अब तलक किसी दल ने यह नहीं बताया कि यह सब जुगाड़ होगी कैसी? घोषणापत्रों की आकर्षक घोषणाएं हकीकत में तब्दील कैसे होंगी? पिछली दफा भी कुछ ऐसी ही घोषणाएं हुई थीं और चुनाव जीतते ही सब की सब हवा में उड़ा दी गईं थीं। कभी-कभी तो लगता है प्यारे कि अपने यहां चुनावी घोषणाएं शायद हवा में उड़ा देने के लिए ही होती हैं!

आलम यह है कि इस बख्त प्रत्येक राजनीतिक दल के भीतर जंग-सी छिड़ी है अपने-अपने घोषणापत्रों को अति-लुभावना बनाने की। सुनने में तो यहां तक आया कि कुछ दलों ने गाय देने का भी वायदा किया है। गनीमत है गाय का ही चुनाव किया शेर, चीते या हाथी का नहीं! नहीं तो बेचारे मतदाता को घणी मुसीबत हो जाती है। नेता जी की जीत के बदले में मिले 'घोषित जानवर' को बेचारा कहां-कहां संभालता फिरता।
सुन रहे हैं यह सब आकर्षक घोषणाएं युवा मतदाता को लुभाने-ललचाने के लिए ही की गई हैं। मगर प्यारे युवाओं का दिल बात-बात पर जैसे मचलता रहता है, उसे देखकर तो नहीं लगता कि वे ऐसी घोषणाओं के प्रति बहुत ज्यादा आकर्षित होंगे! वे तो अपने दम पर ही दुनिया को बदलने की चाह रखते हैं। पर उनकी चाह से मिलती-जुलती कोई खास बात तो अभी तलक नहीं दिखी है इन घोषणापत्रों में। अरे कंप्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट तो अब आम-सी चीजें बन चुकी हैं युवाओं के लिए।

बहरहाल, देखते हैं इस दफा कित्ते युवा घोषणापत्रों की घोषित घोषणाओं पर आकर्षित होते हैं या फिर अपने मन की करते हैं। बस थोड़ा-सा इंतजार और...।

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

पर्दा है पर्दा

चुनाव आयोग के आदेश पर मूर्तियां सकते में हैं। क्या करें क्या न करें कुछ समझ नहीं पा रहीं! चुनावी घमासान के बीच पीसे जा रही हैं। अपनी स्वतंत्र व प्ररेणास्पद इमेज के ताईं पहचानी जाने वाली मूर्तियां, ठूंठ-सी बनकर रह गई हैं। पर्दों के बीच रहना मूर्तियों को गंवारा नहीं। पर्दा मूर्तियों के वास्ते किसी अभिशाप से कम नहीं। मूर्तियों पर पर्दा डालना अगले के चरित्र पर पर्दा डालने जैसा है। यहां-वहां खड़ीं लंबी-महंगी मूर्तियां बताती हैं कि अगले का राजनीतिक व सामाजिक वर्चस्व केवल उन्हीं पर टिका है। खुद को स्थापित करने-करवाने का उत्तम माध्यम हैं मूर्तियां।

राजनीति में मूर्तियां बहुत जरूरी हैं। इससे अगले के कद का पता चलता है। विपक्ष पर दवाब बनाया और जनता को इंप्रेस किया जाता है। चौराहे या पार्क में स्थापित अगले की मूर्ति चुप रहकर ही बहुत कुछ कह जाती है। देश या प्रदेश का विकास हो या न हो परंतु मूर्तियों के विस्तार में कहीं कोई कमी नहीं आनी चाहिए। अगले की मूर्तियों की ऐतिहासिकता को जब इतिहास में दर्ज किया जाएगा, तब उसकी बात ही कुछ और होगी। और, राजनीति में आनकर, नेता बनकर अगर अगले ने जगह-जगह अपनी मूर्तियां नहीं खड़ी करवाईं, तो किसी काम की नहीं उसकी राजनीतिक हनक।

दरअसल, चुनाव आयोग को समझना चाहिए कि मूर्तियों पर पर्दा डलवा लेने से, चीजें नहीं बदलने वालीं। मूर्तियां प्रचार-प्रसार का नहीं, नयन-सुख का प्रतिबिम्ब होती हैं। सूड़ उठाए, दांत फैलाए, हल्का-सा मुस्कुराए मस्त हाथी को आप मूर्ति की शक्ल में तो आराम से देख व छू भी सकते हैं, किंतु साक्षात उसके साथ ऐसा नहीं कर सकते। प्यारे, वो हाथी है, कब में बिदक जाए! कब में उठाकर तुम्हें शहर के बाहर फेंक दे। मूर्तियों में खड़ा हाथी अपने हर प्रकार के एहसास से हमें परिचित करवाता रहता है। यूं हाथी की मूर्ति पर पर्दा डालना, उसके विशाल शरीर ही नहीं, उसकी प्यारी सूड़ के साथ भी 'इमोशनल अत्याचार' है।

आप बेशक न सुन पा रहे हों लेकिन मैं पर्दे के भीतर सिमटी मूर्तियों के क्रंदन को साफ सुन पा रहा हूं। मूर्तियां रो-रोकर कह रही हैं कि आखिर हमारा कुसूर क्या है? क्या मूर्ति होना ही हमारा एकमात्र पाप है? मूर्तियां तो कलात्मकता का आईना होती हैं, आखिर हमारे आईनों को क्यों ढंका जा रहा है? मूर्तियों के सवाल अपनी जगह वाजिब हैं प्यारे। और, यह भी सुन लो मूर्तियों का यूं रोना न राजनीति, न चुनाव, न नेता, न मंत्री के वास्ते ठीक नहीं है। ज्ञानी बताते हैं कि मूर्तियां जब रोती हैं, तो प्रलय आती है। क्या यह किसी राजनीतिक प्रलय के आने का संकेत तो नहीं? अभी तो हम 2012 में प्रलय की भविष्यवाणी से ही नहीं उबर पाए हैं।

पर्दे के बीच रह रही मूर्तियों का यूं रोना अब मुझसे नहीं देखा-सुना जाता। दिल खासा द्रवित हो जाता है। मैं नहीं चाहता कि मूर्तियां गुस्से में आकर ऐवईं कोई श्राप दे दें। किसी को बेकारण सताना भी ठीक नहीं है। अतः मेरी चुनाव आयोग से गुजारिश है कि मूर्तियों को पर्देदारी से मुक्त किया जाए। हाथी को खुली हवा में सांस लेने व सूड़ लहराने की छूट दी जाए। ताकि मूर्तियों का पर्दों के पीछे छिपा सम्मान पुनः वापस आ सके।

नेता जी का रोना

प्यारे, आंसू बेशक नेता जी के निकले थे मगर उन्हें देखकर मन हमारा भी भर आया था। उनका साथ निभाने के वास्ते दो-चार आंसू हमने भी लुढ़का लिए थे। भरी सभा के बीच अच्छा नहीं लगता कि अकेले नेताजी रोएं, हम ठूंठ की तरह यूंही खड़े रहें। आखिर हमारा भी तो कोई फरज बनता है कि नहीं अपने नेताजी के प्रति! बेचारे नेताजी हमारे वास्ते पूरे पांच साल तलक इत्ती कठिनाईयां मोल लें और हम उनके आंसू के साथ अपने आंसू भी न बहा पाएं, तो प्यारे लानत है हम पर। इस नाते हमें जनता होने का कोई हक नहीं। यह भी कोई बात हुई भला, अपनी जुगाड़ लगवाने के लिए नेता जी और उनके आड़े बख्त में बाय-बाय नेता जी। न न ऐसा जुलम कम से कम हम तो नहीं कर सकते।

जरनली, हमारे देश के नेता बहुत स्ट्रांग होते हैं। हर बाधा को बड़ी खामोशी से पार कर जाते हैं। जनता को भले ही इमोसनल कर दें परंतु खुद कभी इमोसनल नहीं होते। लेकिन यहां तो मामला ही कुछ दूजे किस्म का था। एक तो नेता जी को पार्टी से बाहर कर दिया और ऊपर से उनका टिकट भी काट लिया। पता है, पार्टी और टिकट ही तो नेता जी की असली जान होवे है, उसी से उन्हें जुदा कर दो। यह ठीक नहीं है। ऐन चुनावों के बख्त इत्ता सदमा भला नेता जी कैसे बरदास कर पाते, सो रो दिए। नेता जी के रोने में पहली दफा हमने इमोसनल-कम-पोलिटिकल अत्याचार महसूस किया। ऐसा तो कोई अपने दुश्मन के साथ भी न करे है प्यारे।

ज्ञानियों ने ऐसा बताया है कि नेता का रोना देश और राजनीति के वास्ते शुभ संकेत नहीं होता। तमाम प्रकार के बिघ्न बीच में आते हैं। बात ठीक भी है, अपने जन-सेवक को यूं रूलाना भला कहां की अक्लमंदी है! हमें तो अपने नेता जी की हिफाजत व इज्जत हर हाल में करनी चाहिए। क्योंकि वो हैं, तो हम हैं। न जाने उनके कित्ते-कित्ते किस्म के एहसान हैं हम पर और देश पर। अरे भई नेता तो लोकतंत्र की नाक होता है। अपनी नाक का इस्तेमाल वो चुनावों के दौर ही करता है। ऐसे में नेता जी की नाक का गिला होना ठीक नहीं है।

चलो खैर यह भी सही रहा कि नेता जी का रोना फजूल नहीं गया। एक प्रमुख दल ने उन्हें सर छिपाने की जगह दे ही दी। साथ ही चुनाव लड़ने का टिकट भी। इसके अतिरिक्त हमारे नेता जी को और क्या चाहिए! पहले जी-जान से उन्होंने उस पार्टी की सेवा की थी, अब इसकी करेंगे। हमें हमारे नेता जी की राजनीतिक प्रतिबद्धता में कोई सक-सुभा नहीं है। राजनीतिक प्रतिबद्धता को स्थापित के ताईं तो हमारे नेता जाने क्या-क्या कर जाते हैं। कृपया, उनकी प्रतिबद्धता पर चुलहबाजी न करें।
हमारे नेता जी की खुसी में ही हमारी खुसी है। अब जाकर हमारे भी आंसू ठहर पाए हैं। सांस में काफी राहत महसूस कर रहे हैं। जनता का पूरा स्पोर्ट है नेता जी को। संघर्ष वो करेंगे, नारे लगाने के ताईं हम हैं ही। अरे, सरम किस बात की यह तो हमारा जनम-जात फरज है। केवल चुनावों के बख्त ही तो हमें देसी से विदेसी ठर्ररे का स्वाद मिलता है। इन्हीं दिनों नेता जी की खास किरपा रहती है हम पर। बताओ तो भला हम कैसे अपने नेता जी के दुख-सुख में साथ निभाना छोड़ दें!

सोमवार, 9 जनवरी 2012

अपन भी चुनाव लड़ेंगे

प्यारे, इस दफा अपन का भी चुनाव लड़ना लगभग तय है। पार्टी का चुनाव कर लिया है, बस नेता जी की मोहर लगना शेष है। वो लग ही जाएगी क्योंकि नेता जी से अपन के ताल्लुकात बहुत पुराने हैं। नेता जी व्यवहारकुशल तो बहुत हैं परंतु ईमानदारी में जरा कम विश्वास करते हैं। दल-बदल के प्रति उनका खास रूझान रहता है। जिस दल में नेता जी की दाल नहीं गल पाती, वहां से तुरंत कट लेते हैं। इस मामले में वे किसी की नहीं सुनते।

अपनी महत्ता को भुनना उन्हें अच्छे से आता है। जहां से खड़े हो जाते हैं, जनता भी वहीं चली आती है। जनता के हितों के वास्ते वे हर तरह का सौदा व समझौता करने की तमन्ना रखते हैं। सिर्फ जन-हित के वास्ते उन्होंने अपना प्राइवेट दल भी बनाया हुआ है। जब भी कभी चुनाव में किसी दल से उन्हें टिकट नहीं मिल पाता, अपने प्राइवेट दल का ही उपयोग करते हैं। जीताऊ दल की सरकार बनने के बाद, उसी में शामिल हो जाते हैं। अब तलक वे कित्ते दलों के बीच अपनी अदला-बदली दर्ज करवा चुके हैं, खुद उन्हें भी नहीं मालूम।

नेता जी की इन्हीं खूबियों को देखते-समझते हुए ही अपन ने उन्हीं के साथ होने का डिसाइड किया है। साफ बात कहते हैं अपन को ऐसे नेता ही भाते हैं। ज्यादा बौद्धिक, ज्यादा चिंताग्रस्त, ज्यादा प्रगतिशील, ज्यादा हितकारी नेता अपन के पल्ले नहीं पड़ते। ऐसे नेता लोग राजनीति कम करते हैं, प्रतिबद्धताएं ज्यादा गिनाते हैं। मुद्दा-दर-मुद्दा बाल की खाल निकालते हैं। कभी उदारीकरण का विरोध करते हैं, तो कभी विदेशी निवेश पर आंसू बहाते हैं। चुनावों के बख्त न खुद कुछ लेते हैं, न ही दूसरे को लेने देते हैं। भला ऐसे राजनीति थोड़े ही होवे है प्यारे। लेने-देन तो राजनीति का प्रमुख आयाम है। इसे त्यागना महा-पाप है।

इस मामले में हमारे नेता जी हमेशा चौकस रहते हैं। उनका कहना है, राजनीति बौद्धिकता के दम पर नहीं लेने-देन के दम पर ही करी जाती है। आखिर इत्ता महंगा चुनाव लड़ना कोई हंसी-खेल थोड़े ही है। चुनाव लड़ने, जनता को मनाने, सदस्यों को जुटाने में टांके खुल जाते हैं। इस जनता के मूड का कोई भरोसा नहीं। कब में बदल जाए और कब में अकड़ जाए। भीड़ जुटाकर एक दफा अण्णा हजारे ने भी हुंकार भरी थी मगर दूसरी दफा उनकी सारे हुंकारें पानी मांगती जान पड़ीं। इसलिए प्यारे जनता की राजनीति को कुछ इस अंदाज से अंजाम दो कि सांप भी रहे और लाठी भी न टूटे।

अपन नेता जी के दल में आए ही इसलिए हैं ताकि अपनी अति-बौद्धिकता से मुक्ति पा सकें। बात-बात में क्रांति का नारा देने से बच सकें। ठाठ से चुनाव लड़ें और ठाठ से जीतें, बाकी के जन-हित के ताईं तो पूरे पांच साल हैं ही। अपने ने देखा है कि सीट निकलते ही सब कुछ बहुत आसान हो जाता है। और फिर जब अपन नेता जी के नक्शे-कदम पर चलेंगे, तब सब कुछ आसान ही आसान समझिए प्यारे।

अपन को विश्वास है, जित्ता अपन अब तलक पन्ने रंगकर नहीं जुटा पाए, नेता बनकर तो जुटा ही लेंगे। कमाई के मामले में तो अपने देश की राजनीति का कोई जवाब ही नहीं है। यहां तो रेगिस्तान में भी पानी निकल ही आता है।

तो साथियों, इस दफा वोट अपन को ही दें। गर आप अपना हित चाहते हैं, तो केवल अपन को ही जितवाएं। नेता जी के मार्ग-दर्शन की कसम, आपका संपूर्ण ख्याल रखेंगे। अरे..अरे..अरे.. बताना तो भूल ही गए अपन का चुनाव चिह्न गिरगिट है। तो गिरगिट का ही बटन दबाएं और अपन को विजयी बनाएं।

बुधवार, 4 जनवरी 2012

नए साल का संकल्प

प्यारे, नए साल पर अपन ने भ्रष्टाचार का साथ निभाने का संकल्प लिया है। अब इस संकल्प पर कोई ऐतराज जताए या मुस्कुराए, अपन नहीं सुनने वाले। और सुनने भी क्यों? यह भी कोई बात होवे है, जब जिसके मूड में आता है भ्रष्टाचार को गरियाने निकल पड़ता है। कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन-आंदोलन कर रहा है तो कोई सत्याग्रह। मंच से जमकर भ्रष्टों को कोसा-कोसवाया जा रहा है। सियाने कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार देश की प्रगति में बाधक है। अगर वाकई बाधक होता तो हमारे देश का शुमार श्रेष्ठ विकासशील देशों में न होता! ओबामा ऐवईं हमारे देश की तरक्की की तारीफ नहीं कर जाते! और तो और हमारे देश में नेता से लेकर मंत्री, क्लर्क से लेकर चपरासी तक करोड़पति नहीं होते! पता है, भ्रष्टाचार के मामले में हमारे देश की तूती बोलती है। केवल इसी मामले में हमारा पड़ोसी हमसे भय खाता है! हुं.. इन सियानों को क्या मालूम कि देश की प्रगति के ताईं भ्रष्टाचार का साथ कित्ता आवश्यक है? न जाते कित्ते बरसों से हम इसकी सेवा में तन-मन-धन से रत हैं। हम इसे नहीं छोड़ सकते।

देश और समाज के भीतर-बाहर हलचल मचाने के वास्ते कुछ तो ऐसा होना चाहिए कि जिसके बहाने हमारा दिल बहल सके। अण्णा हजारे जैसों की नौटंकियों का सच जनता के सामने आ सके। विपक्ष की कथित सदाशयता का पता लग सके। समाज के कथित ईमानदारों की गिनती हो सके। इस सब के ताईं भ्रष्टाचार से उपयुक्त और कोई युक्ति नहीं हो सकती। भ्रष्टाचार के बहाने सत्ता और रचनात्मकता की रोटियां सकेने वालों की असलीयत अपन बहुत अच्छे से जाने हैं प्यारे। जबान पर क्रांति और विचार में भ्रांति ही उनका उद्देश्य रहा है।

भ्रष्ट अगर कुछ कहता नहीं तो यह न समझा जाए कि वो गूंगा है। भ्रष्ट के कने बहुत लंबी जबान होती है, अगर खुदा--खास्ता खुल गई तो स्विस बैंक से लेकर पेड न्यूज तलक का राज फाश करने की ताकत रखती है। और हां ऊपर से ईमानदार अंदर से कित्ते ईमानदार हैं, इसे भ्रष्ट से बेहतर कोई नहीं जानता।

अपन बहुत अच्छे से जानते-समझते हैं कि अपन का संकल्प बेहद मुश्किल है। भ्रष्टाचार के समर्थन में, वो भी संकल्प के साथ आना, हर किसी के बूते की बात नहीं। इसको लेकर लोग तरह-तरह की बातें करने और मुंह बनाने लग जाते हैं। अपन ने बहुत दफा देखा है समाज के कथित ईमानदार ठेकेदारों को दूसरे के भ्रष्टाचार को कोसते और अपनी ईमानदारी की बढ़ाई करते हुए। लेकिन कोई नहीं अपन ने एक दफा जो संकल्प ले लिया तो अपन खुद की भी नहीं सुनते।

सब देखभाल और सोच-समझकर अपन ने तय किया है कि अब से भ्रष्ट और भ्रष्टाचार की भलाई के वास्ते ही अपन संघर्ष करेंगे। भ्रष्टों तुम न घबराना अपन का तुम्हें भरा-पूरा समर्थन है। जब तलक अपन की जान में जान है, यह बस तुम्हीं पर कुर्बान है। हमारे पुरखों द्वारा स्थापित व्यवस्था को अपन इत्ती आसानी से नहीं त्याग सकते। भ्रष्ट व्यवस्था को त्यागना एक तरह से हमारे पुरखों को अपमान होगा। आखिर उनकी भी तो कोई इज्जत है कि नहीं!
जिन्हें यह संकल्प रास आए, अपन के साथ आ सकता है। किसी प्रकार की कोई जोर-जबरदस्ती नहीं है। अपन अण्णा हजारे नहीं हैं कि भोले-भाले लोगों को अपने नाटकिए अनशन-आंदोलनों से भरमाएं-बरगलाएं। उन्हें सरकार, संसद और नेता के खिलाफ तीखा बोलने की छूट दें। मीडिया में अपना चेहरे चमकाने के वास्ते खुद को दूसरा गांधी घोषित करवाएं। दूसरे के भ्रष्टाचार के खिलाफ हल्ला बोलें और अपने भ्रष्टाचार पर कान दबा जाएं। साफ सुन लें, अपन ऐसी दोगली बातें करने के आदी नहीं। अपन बेहद साफ-दिल आदमी हैं। उनकी तरह अपन को खोखली-क्रांति करने का शौक नहीं। अपना एक ही उद्देश्य है; खुद भी खाओ, दूसरे को भी खिलाओ और भ्रष्टाचार की समद्धि में हाथ बंटाओ। दरअसल, मेरी-तेरी, उसकी-इसकी तरक्की का रास्ता बिना भ्रष्टाचार का साथ पाए तय नहीं किया जा सकता। इसलिए दूसरों की बातों में न आएं कृपया केवल अपनी ही अक्ल लगाएं।