मंगलवार, 17 जुलाई 2012

पूनम नहीं 'उत्तेजना पांडे' कहो प्यारे


पूनम पांडे तो बस पूनम पांडे हैं। एक दफा जो मन में ठान लेती हैं करके ही दम लेती हैं। 'दूसरे की सफलता' को अपना समझ हर वक्त, हर किसी के वास्ते 'न्यूड' होने को एकदम तैयार। अपने बदन के 'खुल्ले प्रदर्शन' का भाव उनके भीतर कूट-कूट कर भरा है। न्यूड होना पूनम पांडे के लिए खाना खाने जैसा है। जब भूख लगी खुद ही थाली परोसी और तृप्त होने बैठ गए। खुद को अपने ही द्वारा तृप्त कर लेना बड़ी बात है प्यारे। इस मामले में 'लोग क्या कहेंगे' कि परवाह तो वे करती ही नहीं। 'लोगों का काम है कहना' कह हंसकर टाल देती हैं। अपनी न्यूडिटी के प्रति उनके इरादे हर वक्त मजबूत बने रहते हैं। उन्हें बधाई।

सच्ची कहते हैं पूनम पांडे की इस 'बिंदास अदा' पर ही तो अपन मरते हैं। ऐसा समझ लीजिए कि अपन पूनम पांडे के तहे-दिल से मुरीद हैं। जहां जिक्र-ए-पूनम पांडे हो और अपनी उपस्थिति न हो ऐसा हो ही नहीं सकता! पूनम पांडे के भीतर एक 'आग' है अपन को उस आग में 'जलना' अच्छा लगता है। हालांकि परंपरावादियों को पूनम पांडे की आग अंदर तक 'झुलसा' जाती है मगर क्या करें थोड़ी-बहुत देर झुलस कर बेचारे खुद ही शांत पड़ जाते हैं। यूं भी इन दिनों तापमान इत्ता गर्म है कि दूसरी किसी गर्मी को सहन कर पाना हर किसी के बस की बात नहीं प्यारे।

गाहे-बगाहे पूनम पांडे का न्यूड होना अपन को उस स्त्री-विमर्श से कहीं बेहतर लगता है जहां स्त्री शरीर के नाम पर केवल 'बौद्धिकता की शाब्दिक जुगालियां' प्रगतिशीलों के बीच चलती रहती हैं। इत्ते बरस बीत जाने के बाद भी वहां बहस 'कमर से ऊपर' और 'कमर से नीचे' की स्त्री से एक इंच भी आगे-पीछे नहीं सरक पाई है। स्त्री के शरीर को लेकर वहां इच्छाएं तो सबकी 'रसीली' हैं लेकिन क्या करें उस 'उत्तर-आधुनिक प्रगतिशील विमर्श' का जहां किस्म-किस्म की 'वैचारिक मजबूरियां' बीच राह हैं। बेशक पूनम पांडे के कने 'वैचारिकता के बंधन' न हो मगर उनमें 'उत्तेजना' बहुत हैं। बस, यही उत्तेजना तो शुचितावादियों से लेकर प्रगतिवादियों तक के पेट का हजामा ढीला किए हुए है। सही मायने में तो वे पूनम नहीं बल्कि 'उत्तेजना पांडे' हैं। और अपनी उत्तेजना पर उन्हें खासा गर्व भी है।

पूनम पांडे वे हैं जिनकी उत्तेजनामय न्यूडिटी पर एक नहीं कई-कई महाग्रंथ लिखे जा सकते हैं। युगों-युगों से ऐसी उत्तेजनामय अप्सराएं धरती पर जन्म लेती रही हैं। जिनकी सुबह खुद को प्रदर्शित करने से होती है और रात भी इसी पर आन कर खत्म होती है। शर्म का जिनसे दूर-दूर तलक कोई आस्ता-वास्ता नहीं रहता। चंद पलों या दिनों की सफलता या सुर्खियां पाने की खातिर वे कुछ भी कह-कर-दिखा सकती हैं। उनके भीतर अपनी न्यूडिटी को लेकर कोई वैचारिक मंथन भले ही न हो मगर एक आग हमेशा रहती हैं, जिसे वो हर वक्त यहां-वहां जलाए रखना चाहती हैं। पूनम पांडे उसी आग, उसी उत्तेजना का एक मशहूर नाम है।

लेकिन प्यारे अपन को क्या मतलब इसकी-उसकी वैचारिका प्रतिबद्धता से। अपन तो मस्त हैं पूनम पांडे की अदा और उत्तेजना से। जिन्हें पूनम पांडे के न्यूड होने पर 'सख्त ऐतराज' हैं, वे अपने ऐतराज अपने कने रखें, अपन बे-ऐतराज ही ठीक हैं। अपन तो बस इत्ता मानकर चलते हैं कि जहां आग होगी वहां उत्तेजना के कुछ शोले तो भड़केंगे ही भड़केंगे। पूनम पांडे की उत्तेजना को अपन का सलाम।

पूनम पांडे पर पीएचडी


मैं पूनम पांडे पर 'पीएचडी' करना चाहता हूं। इस बहाने उन्हें और समझकर समाज को समझाना चाहता हूं। उनके बारे में स्थापित तमाम तरह की गलतफहमियों को दूर करना चाहता हूं। वे अपने खुले इरादों के प्रति कित्ती 'पारदर्शी' हैं इसे बताना चाहता हूं। उनके मन में बात-बात पर न्यूड होने की तमन्ना कैसे जागती है इसे जानना चाहता हूं। इसके अलावा मेरे मन में उनके प्रति और भी सद्-इच्छाएं हैं जिन्हें मैं उन तक रखना चाहता हूं।

पूनम पांडे पर पीएचडी करना मेरे तईं नई तरह का अनुभव रहेगा। मैं इस अनुभव की 'झनझनाहट' को समझ सकता हूं। मुझे उन अनुभवों को लेने में ज्यादा आनंद आता है जिसमें उत्तेजना अंत तक बनी रहे। और, पूनम पांडे में इस उत्तेजना को मैं साफ देख व महसूस कर सकता हूं। उनकी यही उत्तेजना मेरी पीएचडी में जान डाल सकती है। मुझे जीवन में वो सब पाने का मौका प्रदान कर सकती है, जिसकी कल्पना भी मैंने कभी नहीं की होगी।

जानता हूं..जानता हूं समाज के बहुत से सियाने केवल इस बात पर ही मुंह बिगाड़ लेंगे कि मैंने पीएचडी के लिए पूनम पांडे को चुना। वे इस कदर मुझसे नाराज रहेंगे कि मेरी पीएचडी को पढ़ना तो दूर उस पर बात तक करना पसंद नहीं करेंगे। मुझे वे उसी दोयम स्थान पर रखेंगे जहां पर पूनम पांडे को रखते हैं। अपनी मित्रमंडली और मेरे आजू-वाजू में किसिम-किसिम की नकारात्मक खबरें-अफवाहें फैलाएंगे। मैं अपनी सोच और लेखन में किस हद तक गिर चुका हूं फेसबुक पर लिख-लिख कर मुझे ताने मारेंगे।

मगर बताए देता हूं सब कान खोलकर सुन लो कि मैं किसी की परवाह नहीं करने वाला। मेरे इरादे पूनम पांडे के कपड़ों जित्ते पारदर्शी हैं। अगर वे लड़की होकर खुलेआम खुद को न्यूड कर सकती हैं तो क्या मैं लड़का होकर उनकी न्यूडिटी की प्रसांगिकता को पीएचडी के बहाने प्रसांगिक नहीं बना सकता? अवश्य बना सकता हूं और बनाकर ही दम लूंगा। और हां उन सियानों को मैं अच्छे से जानता हूं जो मुंह में बीवी का नाम और तकिए के नीचे पूनम पांडे की तस्वीर को रखकर सोते हैं।

मैं इसे पूनम पांडे की महानता मानता हूं कि वे दूसरे की खुशियों-सफलताओं में हिस्सेदारी करने के लिए खुद को न्यूड करने में रत्ती भर भी गुरेज नहीं करतीं। आज के 'शुष्क समय' में इत्ते त्याग की भावना भला किसी के अंदर मिलेगी? कपड़े उतारना या अपनी त्वचा का प्रदर्शन करना कोई बुरी बात नहीं। इससे नेम और फेम दोनों ही करीब रहते हैं। जब सलमान खान झट्ट से शर्ट उतारने में कोई शर्म महसूस नहीं करता तो फिर पूनम पांडे क्यों और किसलिए करें? यह भी उत्तर-आधुनिकता का एक हिस्सा है प्यारे।
बस, इन्हीं कुछ दिलचस्प खूबियों ने मुझे पूनम पांडे पर पीएचडी करने के लिए उत्तेजित किया है। इस उत्तेजना का अपना ही मजा है। पूनम पांडे जिस हद तक खुद को बोल्ड बनाती जाएंगी, मेरी पीएचडी के लेखन में उत्ते ही चार-चांद लगते जाएंगे।

फिलहाल, अभी काम बहुत है। पूनम पांडे से मिलकर उनसे उनकी 'वस्त्र-उतारू कला' के बारे में बहुत कुछ जानना-समझना-पूछना-खोजना है। जब रिसर्च वर्क पूरा हो जाएगा, उसके बाद पीएचडी लेखन का उत्साह ही गजब होगा। तब तलक आप सब धैर्य धरें।

सोमवार, 16 जुलाई 2012

मध्य वर्ग क्या जाने गेहूं-चावल का स्वाद!


अरे...अरे...अरे...चिदंबरम साहब तनिक सुनिए तो...आप जरा भी टेंशन मत लीजिए। आपने मध्य वर्ग की हैसियत पर जो टिप्पणी की है सौ फीसद उचित है। कोई करे या न करे मगर मैं आपकी कथित टिप्पणी का दिल से समर्थन करता हूं। आपके नैतिक दिव्य-ज्ञान पर कुर्बान जाता हूं। यूं भी सच हमेशा कड़वा होता है अगर उसे इस लहजे में बोला जाए। लेकिन आप परेशान न हों हमारा मध्य वर्ग इस टिप्पणी को खुशी-खुशी झेल जाएगा। उसकी झेलनशक्ति गजब की है।

एक मध्य वर्ग ही क्यों इस देश का हर वर्ग अपनी-अपनी तरह की झेलनशक्ति के वास्ते मशहूर है साहब। तब ही तो जब यहां-वहां विस्फोट आदि होते हैं, कुछ मध्य या निम्न वर्ग के लोग मारे जाते हैं, उस पर आपके वीररस पूर्ण बयान आते हैं, ये वर्ग उस सब को भी अपनी झेलनशक्ति में लपेटकर पी जाता है। और आप या किसी और से उर्फ तक नहीं करता। क्या करें चिदंबरम साहब ये सब अपनी-अपनी आदतों से मजबूर हैं। कई दफा मैंने इन्हें समझाया कि यूं नेताओं-मंत्रियों के दिव्य बयानों-टिप्पणियों पर खामोश मत रहा करो, तुरंत प्रतिवाद किया करो लेकिन साहब ये वर्ग सुनने-समझने को तैयार ही नहीं। कहता है, नेताओं-मंत्रियों के कुछ भी कहे को झेलने की अब आदत-सी हो गई है।
लेकिन...लेकिन चिदंबरम साहब आप नन्ही-सी भी टेंशन मत लें ये वर्ग आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। आपसे गुजारिश है कि आप अपने कथित बयान पर अक्षरशः कायम रहें। आखिर आप मंत्री हैं, आपका रुतबा किसी भी मध्य या निम्न वर्ग से कहीं ज्यादा ऊंचा है। आपकी जय हो।

दरअसल, चिदंबरम साहब यह मध्य वर्ग बड़ा एलिट किस्म का वर्ग है। यह हो-हल्ला अधिक काटता है, सोचता कम। कम से कम आपकी टिप्पणी पर ठंडे दिमाग से सोचने-विचारने की जहमत तो फरमाता। आखिर आपकी टिप्पणी में गलत ही क्या है कि 'मध्य वर्ग 15 रुपए में एक बोतल पानी और 20 रुपए में एक आइसक्रीम कोन खरीदने के लिए तो तैयार रहता है, लेकिन गेहूं-चावल पर एक रुपए की बढ़ोत्तरी का विरोध करता है।' वैसे भी एक रुपए की औकात ही क्या है आज के इत्ते महंगे समय में।

बात दूं चिदंबरम साहब यह मध्य वर्ग खुद भी गेहूं-चावल नहीं खाता। कुछ को तो गेहूं-चावल का टेस्ट तक पता नहीं है साहब। ये तो सिर्फ ठंडा मतलब कोको-कोला, पिज्जा-बर्गर, चाट-पकौड़ी, चिकन-कबाब आदि-आदि पर जिंदा रहता है। देखा नहीं था आपने अण्णा आंदोलन के दौरान किस तरह से यही मध्य वर्ग आइसक्रीम खा-खाकर सरकार और प्रधानमंत्री जी के खिलाफ नारे लगा रहा था। उस दौरान कित्ती फजीहत की थी इसी मध्य वर्ग ने सरकार की। और आज आपकी जरा-सी टिप्पणी को लेकर बुरा मान गया है।

किंतु चिदंबरम साहब आप छटांक भर भी टेंशन मत लीजिए। आरम से रहिए। आपने कुछ गलत नहीं कहा। आदत होती है कुछ लोगों की राई का पहाड़ बनाने की। मध्य वर्ग इसी कैटेगिरी में आता है। हकीकत तो यह है कि मध्य वर्ग हमारे नेताओं-मंत्रियों की भावनाओं को समझता ही नहीं। बेचारे नेता-मंत्री लोग किस संजीदगी के साथ देश के प्रत्येक वर्ग की बेहतरी के वास्ते दिनभर लगे रहते हैं। न रोटी की फिकर रहती है न खाने की चिंता रहती है उन्हें। जन-सेवा का भाव बड़ा गहरा होता है हमारे नेताओं-मंत्रियों के भीतर।

खैर, कोई नहीं चिदंबरम साहब आप सुई की नोंक के बराबर भी व्यथित न हों अब तक तो मध्य वर्ग आपके कहे को भूल भी गया होगा। आप बिल्कुल मस्त रहिए। ऐसे छोटे-मोटे बयान-टिप्पणियां तो राजनीति में चलती रहती हैं। आपकी जय हो।

बे-कण हुए भगवान


सुनो प्यारे भगवान विज्ञान ने तुम्हें कण-कण में से निकालकर बे-कण कर दिया है। तुम्हारे कण-कण में छिपे रहस्यों को भी खोज लिया गया है। महा-प्रयोग ने तुम्हारे महा-व्यक्तित्व को कित्ता आसान बना दिया है, इसे तुम भी जान लो। तुम्हारे कण-कण पर से उठे आवरण, हमें तुम्हें और नजदीक से जानने में सहायता कर रहे हैं।

मगर देख-पढ़ रहा हूं तुम्हारे प्रिय भक्तों को तुम्हारा यूं बे-कण होना रास नहीं आ रहा है। उनके पेट और आस्थाओं में बसी बेचैनी दि-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है। तुम्हारा बे-कण होना समझो उनकी अवैज्ञानिक विश्वासों पर टिकी दुनिया के उजड़ने जैसा प्रतीत हो रहा है। सुनो भगवान तुम्हारे पुजारी भक्तों की दुकानदारी खतरे में आ चुकी है। विज्ञान की ताकत ने वो कर दिखाया है, जिसकी कल्पना कभी तुमने भी अपने जीवन में नहीं की होगी प्यारे भगवान।

यूं भी विज्ञान ने तुम्हारे कण-कण को खोजकर गलत भी क्या किया है? आखिर एक-न-दिन तो यह होना ही था। कब तलक तुम विज्ञान की खोज और जिज्ञासा से बचकर रह सकते थे। तुम्हें बे-कण कर अब विज्ञान तुम्हारे बारे में सटीक जानकारी दुनिया के सामने रखेगा। तुम्हें पौराणिक अख्यानों व कल्पित मिथकों से बाहर निकालकर वैज्ञानिक तौर-तरीकों से समझा-जाना जाएगा। कण-कण में भगवान कैसे और क्यों रहते हैं, इसे जानना किसी रोमांच से कम नहीं।

अपन तो जाने कब से कहते चले आए हैं कि आस्थाओं पर हमेशा विज्ञान भारी रहा है। और हमेशा ही रहेगा। जहां से आस्थाओं की दीवारें दरकने लगती हैं, वहां से विज्ञान के ज्ञान की शुरूआत होती है। विज्ञान के ज्ञान का सुख बिना खोज नहीं उठाया जा सकता। लेकिन इस अति-आस्थावान दुनिया का क्या करें जिसने बिना भगवान को समझे उन पर अपना हक जतलाना शुरू कर दिया। कहीं मठ बने, कहीं काबे बने, कहीं चर्च बने पर उन सब में भगवान का अस्तित्व रहस्य ही बना रहा। भगवान अपने नाम पर हो रहे उलटे-सीधे कामों का हिसाब खुद ही रखता पर मौन रहता। मौन न रहता तो क्या करता क्योंकि बेमतलब की आस्थाओं पर कायम विश्वास ज्यादा दूर तलक नहीं चल पाते, इसे भगवान भी जानता है।

इसलिए तो भगवान इस महा-प्रयोग पर चुप है। चाहे भक्तों को न हो पर भगवान को अपने बे-कण होने की खुशी है। अगर खुशी न होती तो अब तलक भगवान विज्ञान के दावे को चुनौती दे चुका होता। दरअसल, भगवान खुद भी अपने कण-कण के रहस्य से परेशान हो गया था प्यारे।

इस खोज के बहाने विज्ञान ने खुद को साबित कर बता दिया कि दुनिया में जो कुछ भी है उसके पीछे कोई-न-कोई वैज्ञानिक तथ्य अवश्य मौजूद है। हो सकता है आगे चलकर इस महा-प्रयोग से भगवान के रहने-खाने-पीने, चलने-टलने-मचलने आदि का पता भी मिल सके। आखिर कण-कण का बे-कण होना कुछ तो कारण बतलाएगा ही।

इस तरह भगवान का आम होना कित्ता सुखद है इसे अपन समझ सकते हैं। विज्ञान की भगवान पर यह जीत बताती है कि यहां कुछ भी संभव नहीं। हां, जिन्हें इस जीत में ऐब नजर आते हैं, उनकी नजरें बंद हैं। और हमेशा बंद रहेंगी। जब भगवान को अपने बे-कण होने पर कोई ऐतराज नहीं तो भगवानवादी क्यों टेंशन लेते हैं! आइए, महा-प्रयोग की इस सफलता का आनंद लें और कण-कण में हैं भगवान को अपने करीब खुलता हुआ महसूस करें। यही तो भगवान पर विज्ञान की जीत है प्यारे।

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

बस, इंजॉय करो महंगाई को

प्यारे, महंगाई पर इत्ता रोना-धोना ठीक नहीं। महंगाई हमारे समय का सबसे 'उम्दा सच' है, अतः इसे केवल इंजॉय करो..केवल इंजॉय। महंगाई को जित्ता इंजॉय करोगे, यह तुम्हें उत्ता ही सुख देगी। व्यवस्थागत दुखों को हर कर, मैनीजिएवील सुख देना महंगाई की प्रवृति है। महंगाई हमें आर्थिक स्तर पर सशक्त और सहज बनाती है। उटपटांग खरजों को कम कर, चादर में रहना सिखलाती है। आमदनी अठ्ठनी, खरजा रुपइया की अवधारणा को धारणा बनाने से रोकती है। हद दरजे तक पेटू हो चुके लोगों को खाने का उचित सलीका समझाती है। बहानों-बहानों में ही महंगाई हमारे साथ वो सबकुछ कर जाती है, जिसकी कल्पना हमने सदियों पीछे भी नहीं की होगी।
इस उस तरह के खरचों या बढ़ती कीमतों के वास्ते महंगाई को दोष देना ठीक नहीं है। महंगाई कभी भी खुद ने नहीं बढ़ती। महंगाई को बढ़ाने और घटाने में सरकार और नेता ही जिम्मेदार होते हैं। महंगाई तो एक तरह से भैंस के समान है, उसे जहां मोड़ दोगे, वहां वो चलती चली जाएगी। इसीलिए महंगाई सामाजिक व आर्थिक मामलों में कभी भी अपनी अक्ल नहीं लगाती। महंगाई की अक्ल की चाबी तो सरकार और वित्तमंत्री के कने होवे है। जहां से जित्ती भर दी जाती है, वहां से वो उत्ता ही काम करना शुरू कर देती है।
बात भी वाजिब है कि महंगाई क्योंकर अपनी अक्ल लगाए! जब बिन अक्ल लगाए ही उसे तमाम लाभ मुफत में मिल रहे हैं, तो क्या फायदा अतिरिक्त बोझ को लेकर। महंगाई पर अक्ल वो खरजा करें, जिन्हें इससे किसी प्रकार की तकलीफ या मोहब्बत है। यूं भी मैंने ज्यादातर को महंगाई पर किस्म-किस्म की तकलीफें ही बयान करते सुना है। हाय! महंगाई, हाय! महंगाई की छाती पीट-पीटकर खुद का और सरकार का भी जीना मुहाल किए रहते हैं। जहां नन्हीं-सी कीमतें बढ़ीं सियाने टी.वी. चैनलों और सड़कों-चौराहों पर निकल पड़े अपनी-अपनी विद्वता और उद्दंडता का प्रदर्शन करने। बेशक उनकी कमाई का अलां से लेकर फलां तक कोई ओर-छोर न हो लेकिन जनता के कने हमदर्दी ऐसी जतलाएंगे, ऐसी जतलाएंगे कि बस कुछ पूछिए ही नहीं। लगेगी कि सारी दुनिया की महंगाई और गरीबी की चिंता का बोझ एक अकेले जै ही उठा रहे हैं। कैसी पागलपंती है! महंगाई से मोहब्बत तो सिर्फ मेरे जैसे बेफिक्र ही किया करते हैं।
महंगाई पर पुतले फूंकने वाले सियाने कभी इस बात पर अफसोस जतलाते हुए नहीं दीखते कि हाय! हमारी सैलरी में तो सरकार ने इजाफा कर दिया मगर गरीब और बेरोजगार तो अभी तलक वहीं के वहीं हैं। या अपनी बढ़ी सैलरी का आधा भाग हम गरीबों-बेरोजगारों में दान करेंगे। इस प्रकार के 'नैतिक फर्ज' के ताईं मैंने अभी तक किसी को पहल करते न तो सुना है न ही देखा। झंडे-बैनर थामे, क्रांतिकारी नारे लगाते हुए, दो-चार हैंडसम किस्म की गोष्ठियां करने सब के सब निकल पड़ते हैं। महंगाई और गरीबों पर चिंता पूर्णता वातानुकूलित कमरों में अभिव्यक्त करते हैं। सच कहूं मुझे तो सियानों का महंगाई विरोध ही 'ढोंग' सरीखा लगता है।
बेहद सहज और सरल तरीके से महंगाई को यूंही बढ़ते रहने दें। ध्यान रखें, जित्ता-जित्ता महंगाई का स्तर बढ़ेगा, उत्ती ही उत्ती किरपा आएगी। बस, किरपा आती रहनी चाहिए, ऐसा बाबा कहते हैं। अपनी हैसियत के मुताबिक खरचा नहीं करोगे, तो किरपा रूक जाएगी। वैसे भी आज के अति-अंधविश्वासी युग में कौन भक्त चाहेगा कि किरपा रूके! तो प्यारे महंगाई को दिन-ब-दिन निखरते रहने दो। इसके निखार को बस इंजॉय करो। महंगाई के इंजॉयमेंट में ही मेंटलरीलिफ का इलाज छिपा है। बाकी रहा-सहा बाबा की किरपा संभाल लेगी। जय हो।

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

एक खत वेलेंटाइन के नाम!

प्यारे वेलेंटाइन,

तुम्हारा फिर से स्वागत है। तुम भी क्या खूब चीज़ हो। जब तुम्हारे आने की तारीख नजदीक आती है, तब ही हमारे दिलों में अपने-अपने प्रेम और तुम्हारे प्रति अपनत्व की भावना जाग्रत होती है। यह कहने में कोई शर्म नहीं कि हम तुम्हें साल में सिर्फ एक बार यानी 14 फरवरी को ही याद करते हैं। जहां 14 फरवरी बीती नहीं कि संत वेलेंटाइन भी सूखे और मुरझाए फूलों की मानिंद हमारे दिलों-जज्बातों से उतर जाते हैं। हां, यह बात सही है कि हम तुम्हें याद तो करते हैं परंतु अपनी-अपनी तमन्नाओं की खातिर। तुम हमारी तमन्ना का जरिया इसलिए हो क्योंकि हमें तुम्हारे रास्ते अपनी-अपनी तमन्नाओं का इजहार करना पड़ता है। हम प्रेम तो प्रेमिका से करते हैं मगर माध्यम तुम्हें बनाते हैं। अब यह तुम्हारी नेकदिली है कि तुम बहुत आसानी से हमारे-उनके माध्यम बन जाते हो। तुम अपना फर्ज निभाते हो हम अपना। इस फर्ज-आदायगी में अंतर बस इतना भर रहता है कि तुम्हारा फर्ज खालिस होता है और हमारा प्रदूषित। जी हां, प्रदूषित।

ऐसा कहा जाता है कि तुम प्यार के दूत हो। प्यार बांटते हो। प्यार करने व देने की नेक सलाह देते हो। प्यार को विश्वास के मानकों पर कसते व परखते हो। यकीनन तुम प्यार की बहुत बड़ी मिसाल हो हमारे बीच। लेकिन प्यारे वेलेंटाइन, मुझे अक्सर यह लगता है कि हम प्यार के मायनों को उस तरह से आत्मसात नहीं कर पाए हैं जैसाकि तुमने किया था। हम प्यार करते तो हैं मगर हमारा स्वार्थ भी संग-संग चलता है। हम प्यार को फू ल देने व लेने तक ही सीमित कर देना चाहते हैं। हम प्यार को रस्मों की तरह निभाते हैं। तारीखों में कैद रखते हैं। गिफ्ट के आदान-प्रदान को ही अपने प्यार की क्रांति मान-समझ बैठते हैं।

अब तुम्हीं बताओ प्यारे वेलेंटाइन, क्या प्यार गिफ्टों के भीतर कैद करने की चीज है, यानी उसे विश्वास और सहयोग के साथ आगे बढ़ाते रहने की? हम आधुनिकता की रौ में बहते-बहते इस कदर आगे निकलते जा रहे हैं, जहां प्यार हमें बस एक बहाना-सा लगने लगा है। अगर मैं गलत नहीं हूं तो क्यों तुम्हें केवल 14 फरवरी को ही याद किया जाता है? क्यों जगभर के प्रेमी-प्रेमिकाएं प्यार की क्रांति केवल इसी दिन कर लेना चाहते हैं? क्यों प्यार के एहसास की आस सिर्फ इसी दिन जागती है? यह किसी विडंबना से कम नहीं कि हमने प्यार जैसी खूबसूरत चीज को अपने-अपने हितों-स्वार्थों का गुलाम बना लिया है।

प्यारे वेलेंटाइन, तुम्हारे आने से सबसे ज्यादा परेशान वो हो उठते हैं, जिन्होंने प्यार करने और देने की तमीज को कभी सीखा ही नहीं। तुम्हारे बहाने उन्हें सहारा मिल जाता है अपनी ताकत को दिखाने का। वे तुम पर लाठी-भाले से वार करते हैं। तुम्हारी तस्वीरों को जलाते हैं। तुम्हें विदेशी कहकर पराया बताते हैं। मैं जानता हूं कि उनके इस विरोध से तुम्हारी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता। ऐसा कर वे केवल अपनी खीझ अपने फ्रस्टेशन को ही मिटा रहे होते हैं। उनका वार तुम पर नहीं प्यार की खूबसूरती पर होता है। बात सही भी है कि जिसने कभी प्यार के एहसास, उसकी खूबसूरती को न समझा हो वो भला क्या जानेगा प्यार के मायनों को! उन्हें तो बस बहाना चाहिए अपने पुरुष होने का।

वैसे प्यारे वेलेंटाइन, इस दफा तुम घनी महंगाई में हमारे बीच आए हो। पिछली दफा जब आए थे तब मंदी का आलम था। महंगाई और मंदी के बीच तुम्हारा आना उन गरीब प्रेमियों-प्रेमिकाओं के लिए बड़ा नागवार गुजरेगा जो प्यार से कहीं ज्यादा विश्वास गिफ्टों के लेने-देने में करते हैं। उनके लिए तो तुम विलेन सरीखे ही हो इस वक्त! प्यारे, हमारे बीच में आने से पहले जरा हमारे यहां के माहौल को भी देख-समझ लिया करो।
खैर, अब जब तुम आ ही गए हो तो क्यों न तुम हमें कु छ देकर जाओ। मैं जानता हूं कि तुम सिवाय प्यार के हमें कु छ नहीं दे सकते। यह हमारे लिए जरूरी भी बहुत है। बस इतना-सा और करो कि हमें प्यार का पाठ पढ़ाते वक्त एक पाठ आपसी संबंधों-रिश्तों को निभाने और साधने का भी पढ़ा दो, तो यह उन जोड़ों के लिए बहुत अच्छा रहेगा जो जरा-जरा सी बातों में आपस में लड़-झगड़कर प्यार, त्याग और विश्वास को सरेआम जलील करते रहते हैं। साथ ही, उन्हें यह भी सिखा-बता दो कि प्यार करने और निभाने वालों के लिए हर पल प्यार देना-लेना ही महत्वपूर्ण होता है, नफरत के बीच रहकर खुद को बरबाद करना नहीं।
बहरहाल, प्यारे वेलेंटाइन! तुम्हारा पुन: स्वागत है। तुम हमारे बीच यूंही प्यार और विश्वास लेकर आते रहो, हमेशा!

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

लो जी और करो विरोध!

प्यारे, सरकार की तो पूछो ही मत। इस बख्त बड़ी इठलाई-इठलाई-सी, मुस्कुराई-मुस्कुराई-सी डोल रही है। आखिर डोले भी क्यों न टूजी के गड़बड़ झाले से निकलने की क्लीन-चिट जो मिल गई है उसे और गृहमंत्री जी को। एक ही फैसले ने विपक्ष की बोलती जो बंद कर दी है। अपने सुब्रह्मण्यम स्वामी हैरान हैं तो पी. चिदंबरम प्रफुल्लित। फैसले के बाद से न जाने कित्ती दफा राहत की सांस ले-छोड़ चुके हैं। राहत की सांस को दिलवाने की हमारे खबरिया चैनलों की बहुत बड़ी भूमिका रही है। जिसे जहां देखो हर कोई अपना-अपना माइक नेता जी के मुंह में घुसाए उनकी राय लेने को बेताब-सा है। मजा देखिए, सरकार के नेताओं के कने फैसले पर बल्लियों उछलने के अनेकों कारन हैं परंतु विपक्ष के कने बस बची-खुची खिसियाहट ही है। बावजूद इसके बाबा रामदेव अब भी सत्य की जीत का बेसुरा राग अलापने में व्यस्त हैं। अलापें-अलापें जी खोलकर अलापें केवल इन्हीं अलापों के सहारे ही उनकी 'कुछ पूछ' विपक्ष और राजनीति में बची हुई है। यही काफी है उनके ताईं।

दरअसल, कुछ सियानों की आदत ही होती है विरोध-विरोध की ललकार लगाने की। जबकि जानते वे भी अच्छी तरह से हैं कि उनके विरोध को एक दिन ध्वस्त होना ही पड़ेगा। ज्यादा विरोध कभी-कभी ऊब भी पैदा करता है। साथ ही उससे निगेटिविटी की बू सी भी आने लगती है। अब खुद ही देख लीजिए टूजी पर क्या सरकार, क्या गृहमंत्री, क्या ए. राजा आदि-आदि का जिस कदर शोर-शराबे के साथ विरोध हुआ, उत्ता ही उसने बोर भी किया। प्यारे, विरोध की भी एक सीमा होती है। विरोध के साथ भी नैतिकताएं जुड़ी होती हैं। विरोध का मतलब यह थोड़े ही न होता है कि संसद न चलने दो, सड़कों को जाम करो या अनशन-सत्याग्रह करो। अमां, प्यार से भी तो अपना विरोध जतला सकते हो। हौले से सरकार और गृहमंत्री के कानों में कह सकते हो कि गर आप न मानें, तो हम आपसे रूठ जाएंगे। दोस्त दोस्त न रहा या हम आपके हैं कौन सरीखे गाने भी गा सकते हैं। ऐसे खूबसूरत विरोधों पर मजाल है कि सरकार या कोई और बुरा मान जाए! पूरे प्रसन्न मन से वे आपके विरोध को सुने व समझेंगे। बेफिकर रहिए।

देखो जी, साफ-सीधी और सच्ची बात यह है कि टूजी पर अब तलक जिन्होंने और जितनों ने भी हो-हंगामा काटा, एक तरह से अपने बख्त को ही बर्बाद किया। इस बीच कोई सार्थक काम ही कर लेते। अपने राजा जी को बाहर निकालने की जोड़-जुगाड़ ही कर लेते। भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए नकली आंदोलनों पर ही विरोध जतला लेते। अण्णा और रामदेव को सही राह दिखाने की कोशिश करते। लेकिन यह सब कैसे कर लेते, उन्हें तो टूजी पर सरकार को घेरने से ही फुर्सत नहीं थी। अपने भ्रष्टाचार पर मौन साधकर सरकार के भ्रष्टाचार की पोल खोलने में सब बिजी थे। सही भी है, बहती गंगा में हाथ मांजना किसे नहीं सुहाता भला!
बहरहाल, अब कहे या लिखे कोई कुछ भी पर जीत तो आखिरकार सरकार की ही हुई न। अब फैसले पर जिन्हें मुंह बिचकाना है बिचकाएं मगर इत्ता ध्यान रखें विपक्ष मैं बैठकर विरोध की रोटियां सेंकना सबसे आसान काम होता है। विरोध से ही अगर घपले-घोटाले या भ्रष्टाचार मिट या सिमट रहा होता, तो प्यारे आज अपने मुल्क की तस्वीर ही कुछ और होती। असल में, अपने यहां विरोध की परंपरा अपने गिरेबान को छिपाकर दूसरे के गिरेबान को पकड़ने की रही है। यही वजह है कि यहां सार्थक विरोध भी कभी-कभी सार्थक होते हुए नहीं जान पड़ते। जिन मुद्दों पर विरोध जतलाना चाहिए वहां कोई जतलाता नहीं, सब ऐवईं मौखिक और बौद्धिक क्रांति के तीर छोड़ते रहते हैं।     

प्यारे, टूजी पर अब बेसुरा राग अलापना बंद करो और चुनावों के मनोरंजन का लुत्फ लो। पांच साल में चंद दिन ही ऐसे उम्दा किस्म के मनोरंजन नेताओं और पार्टियों के बीच देखने-सुनने को मिलते हैं। टूजी के फैसले का आदर करते हुए। बैर-भाव को किनारे रखते हुए। विरोध के क्रोध को थामते हुए अब बस चुनावी बातें ही कीजिए। नहीं तो फिर मत कहना कि आपने हमारा ख्याल नहीं रखा। समझे।

बधाईयां प्यारे फेसबुक

प्यारे फेसबुक, तुम्हें बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं आठ साल का होने पर। इन आठ सालों में तुमने वो कर दिखाया, जिसे करने में बरसों-बरस लग जाते हैं। महज आठ सालों में ही तुम हमारे बीच इस कदर फेमस हो गए कि आज हर किसी की जुबान पर बस तुम्हारा ही तुम्हारा नाम है। पता है लोग तुम्हें दीवानगी की हद तक चाहते हैं। दिन के चौबीस घंटे तुम्हारे ही दरबार में बीताते हैं। कुछ के लिए तो दिन में कई दफा तुम्हारे दरबार में हाजिरी लगाना बेहद आवश्यक होता है। वे तुम्हारे सबसे पक्के मुरीद हैं। भले ही हमारा बैंक में एकाउंट न हों पर फेसबुक पर जरूर होगा। फेसबुक पर एकाउंट रखना आज की तारीख में हर कोई अपनी शान समझता है। शान समझे भी क्यों नहीं क्योंकि तुमने हमें इस माध्यम के जरिए तरह-तरह के लोगों से ऑन-लाइन मिलने, बतियाने, संवाद और विवाद को साझा करने का महत्वपूर्ण मंच जो दिया है। इसके अतिरिक्त और चाहिए भी क्या हमें!

तुम्हारे मंच पर आकर हमारे बीच से न जाने कित्ते फेसबुकिए चर्चित कवि और कवित्री बन गए। न जाने कित्तों ने अपनी पहचान कहानीकार और विमर्शकार के रूप में करवा ली। आलम यह है कि उनके लिखे का अब स्थापित वरिष्ठ भी लोहा मानते हैं। लोहा मानेंगे भी क्यों नहीं क्योंकि अब वे यह अच्छे से जान-समझ चुके हैं कि नए लेखकों के आगे उनके दिन हवा हुए। उनकी ठहरी और पुरानी टाइप विचारधारा अब युवाओं के किसी काम नहीं रही। बदलते परिवेश के साथ-साथ फेसबुकिए युवाओं ने अपनी विचाराधारा, सोच और विमर्श को भी अच्छा-खासा बदल डाला है। यही बख्त की आवश्यकता भी है प्यारे।

असल में, प्यारे फेसबुक तुम्हारे मंच का सबसे अधिक लाभ और आनंद उठाया है लवर्स ने। उनके रोमांस के वास्ते सबसे सशक्त माध्यम हो तुम। तुम्हें पता ही होगा कि प्यार करने वालों पर समाज किस-किस तरह की टेढ़ी-मेढ़ी निगाहें रखता है, जरा-जरा सी बातों के ताईं उन्हें रोकता-टोकता है, न दो दिलों को अकेले में मिलने देता है न ही दुख-सुख बांटने। दुनिया और समाज से तंग आकर अब वे तुम्हारे शांत आंगन में आ गए हैं। घंटों के घंटों वे तुम्हारे आंगन में एक-दुसरे से बतियाकर गुजार लेते हैं। ऐसे में बख्त का पता ही नहीं चलता उन्हें। एक-दूसरे से खुलकर एकदम बिंदास बात कहते-करते हैं। कोई अपने लैपटॉप पर लगा रहता है, तो कोई मोबाइल फोन पर। अपनी उपलब्धता को हर जगह उपलब्ध करवाकर तुमने उनका काम बेहद आसान कर दिया है प्यारे फेसबुक। तुम जानते नहीं कि कित्ती किस्म की दुआएं निकलती होंगी तुम्हारे प्रति उनके दिल से। वाकई।

बताइए हर किसी के साथ इत्ता सहयोग और आत्मीय होने के बावजूद कुछ लोग तुमसे जलते हैं। तुम पर तरह-तरह के बैन लादने की वकालत करते हैं। निरंतर तुम्हें आदेश देते रहते हैं कि ये बैन करो कि वो बैन करो। अभिव्यक्ति के बेहतरीन मंच पर इस तरह की बंदिशों को सुनकर मेरे दिल को खासा तकलीफ पहुंचती है। तकलीफ होना लाजिमी है। एक तुम ही तो जो हमारे स्वतंत्र विचारों का एक मात्र सहारा हो। तुम्हारे जैसे खुले विचारों वाले माध्यम ही तो हमारे संवादों को अब तलक जिंदा रखे हुए हैं। तुमने देखा-पढ़ा होगा कि सभी ने अपने-अपने स्तर से तुम पर बंदिशे थोपने का विरोध किया था। लगातार कर भी रहे हैं। तुम जरा भी घबराना मत प्यारे फेसबुक हमारा यह विरोध यूंही जारी रहेगा। तुम्हारे मंच से बिछड़ना अब हमारे बस का नहीं। एक तरह से हमारी ऑक्सीजन जैसे हो तुम प्यारे फेसबुक।

अरे हां सुना है कि तुम्हारा आईपीओ भी आने वाला है। सोशल नेटवर्किंग के रास्ते होते हुए अब तुम स्टॉक मार्केट में भी आ जाओगे। वाह! बधाई प्यारे। अब तो तुम और भी चर्चित हस्ती हो जाओगे। बढ़िया है। लगे रहो। जो हिट है बस वही फिट है। हम तहे-दिल से दुआ करते हैं कि तुम्हारी यह फिटनेस यूंही बरकार रहे। तुम्हारे मंच पर लोग यूंही आते-जाते रहें। तुम्हें अपनाते रहें। तुम्हें अपनी-अपनी अभिव्यक्ति को अभिव्यक्त करने का सहारा बनाते रहें।

तो प्यारे फेसबुक एक दफा तुम्हारे और मार्क जुबेरवर्क को लख-लख बधाईयां।

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

नेता जी का चुनाव कार्यालय

मोहल्ले में जब से नेता जी ने चुनाव कार्यालय खोला है, मोहल्लेवालों का तो रंग-ढंग ही बदल गया है। हर तरफ जश्न सरीखा माहौल रहता है। नुक्कड़ के पनबाड़ी और पड़ोस के हलवाई की तो निकल ही पड़ी है। उनकी दुकानों पर दिनभर तांता-सा लगा रहता है। मोहल्ले के प्रसिद्ध ठलुए भी बिजी से रहने लगे हैं। मजनूओं ने लड़कियों को छेड़ना काफी कम कर दिया है। इसीलिए लड़कियां भी थोड़ा उदास-सी रहने लगी हैं। आजकल उनका बन-संवर कर मोहल्ले में टलहना लगभग बेकार-सा ही जा रहा है। मेरी पत्नी भी अब घर में कम सहेलियों के साथ बाहर बख्त ज्यादा गुजारने लगी है। बात-बात पर क्रांति और नारे देने जैसा व्यवहार करने लगी है। आलम यह है कि अब मेरे घर में चुल्हा नहीं चढ़ता, नेता जी के कार्यालय से ही सीधी व्यवस्था हो जाती है।

आजकल नेता जी मोहल्ले के प्रत्येक आमो-खास का 'खास ख्याल' रख रहे हैं। बेचारे हर बख्त इस कोशिश में लगे रहते हैं कि किसी को कोई दिक्कत-परेशानी नहीं होनी चाहिए। हर रोज किसी न किसी के दर पर हाथ जोड़े पहुंच जाते हैं। जो बात जुबान नहीं कह पाती, उनके जुड़े हुए हाथ कह देते हैं। वोट केवल नेता जी को ही देना इसकी याद नेता जी के चेले हमें दिला देते हैं। चुनावों में चेलों का रोल काफी महत्वपूर्ण हो जाता है। काफी कुछ वे खुद ही मैनीज करते हैं। हाथ नेता जी जोड़ते हैं, बात पूरी चेले जी करते हैं। यही तो चुनावों का असली लुत्फ है प्यारे।

वैसे मोहल्ले में चुनाव कार्यालय खुल जाने से मुझे बेहद आराम हो गया है। जिस चिड़िया घर को देखने के वास्ते मुझे रात नौ बजे तलक जागना पड़ता था, उसे यहां मैं लाइव देख सकता हूं। अपने काम से फुर्सत पाकर जब भी मौका मिलता है, नेता जी के चुनाव कार्यालय में तीन-चार घंटे बीता आता हूं। यकीन मानिए वहां बैठकर परम आनंद की प्राप्ति होती है। हर पल खुद में देश, जनता, लोकतंत्र आदि-आदि होने का एहसास जागता रहता है। चुनाव कैसे जीता व जीतवाया जाता है, इस नुस्खे को आप वहीं बैठकर जान-समझ सकते हैं।

यह अच्छी बात है कि हमारे नेता जी के चेले बहुत होशियार हैं। चुनाव प्रबंधन का हर जिम्मा उनके ही कंधों पर है। नेता जी की सेवा में पाए मेवे का असली मजा तो वे ही उठा रहे हैं। चुनाव कार्यालय में जब नेता जी नहीं होते, तब वे ही नेता होते हैं। चेले भी अपने साथ पर्सनल चेले रखते हैं, ताकि नेता जी की चुनावी सभा में भीड़ का ठीक-ठाक इंतजाम किया जा सके। साथ ही, तालियों में कहीं कोई कमी न हो, तारीफों का पुल सही ढंग से बंधे, नारों में दी जाने वाली आवाजें बेहद मजबूत हों और अखबारों में नेता जी की तस्वीर एकदम चकाचक आए। दरअसल, चुनाव लड़ने से कहीं ज्यादा जरूरी है उसकी सशक्त मार्केटिंग। मार्केट में भी नेता जी की वही धाक होनी चाहिए, जो जनता और मोहल्ले के बीच बनी हुई है। इसका भी अपना असर होता है प्यारे।

नेता जी के चुनावी संघर्ष को देखकर उन पर काफी तरस-सा आता है मुझे। जनता के आगे दिनभर हाथ जोड़े-जोड़े बेचारों के हाथ थक जाते होंगे! ऐसे बख्त में जनता अगर खरी-खोटी सुना दे, तब भी नेता जी कुछ नहीं कह-बोल सकते। क्या करें वोट की मजबूरी जो है! साफ-सी बात है, वोट अगर चाहिए तो अपने चुनाव कार्यालय से लेकर जनता के दरबार तलक हर कहीं नेता जी को कुछ न कुछ सुननी तो पड़ेगी ही। हमारी जनता का स्वभाव भी कुछ ऐसा है कि जब सुनाने पर आती है, तब मनमोहन से लेकर अण्णा तक किसी को नहीं छोड़ती। अपने गुस्से का इजहार कहीं न कहीं कर ही देती है। आखिर लोकतंत्र की असली ताकत तो वही है न!

बहरहाल, दिनभर इधर-उधर के चुनावी भ्रमण के बाद नेता जी अपने चुनाव कार्यालय में लौट आए हैं। चेले उनके इर्द-गिर्द है। मेवा बंटने का काम शुरू हो गया है। चुनावी बहसों-ठहाकों की आवाजें कान के पर्दे को चीरने लगी है। पड़ोस के घर में पत्नी का अपनी सहेलियों संग चुनाव-विमर्श चल रहा है। टी.वी. पर खबर सुनाती सुंदरी बता रही है कि अब तलक यहां-वहां से करोड़ों का कैश पकड़ा जा चुका है। इन सब के बीच मैं कुछ खास नहीं कर रहा, सिवाय आनंद लेने के। क्योंकि ऐसे आनंद लेने के मौके पांच साल में एक ही दफा मिलते हैं प्यारे।

नेजा जी बनाम चेला जी

इन दिनों चेला जी काफी मेहनत कर रहे हैं। नेता जी के चुनावी प्रचार-प्रसार में जी-जान से लगे हुए हैं। न दिन को दिन समझ रहे हैं न रात को रात। जुबान पर हर दम बस नेता जी का ही नाम है। नेता जी ने भी अपनी नैया चेला जीओं के हाथों में सौंप दी है। वो जानते हैं कि बिना चेलों के सहयोग के चुनाव लड़ना तो क्या भीड़ जुटाना तक संभव नहीं हो सकता। इसीलिए जो चेला जी कह देते हैं, नेता जी को करना पड़ता है। यह समय ही इत्ता नाजुक है कि आप चेला जी को नाराज कर ही नहीं सकते। चेला जी साथ हैं, तो प्रचार-प्रसार भी साथ-साथ है।

चुनावों में चेला जी का रोल बेहद अहम हो जाता है। जनता की नब्ज को जित्ता नेता जी नहीं जानते, चेला जी जानते हैं। उसका कारन है। चुनाव जितने के बाद नेता जी का जनता से कोई सीधा मतलब तो रहता नहीं। फिर तो उनकी माई-बाप बस कुर्सी हो जाती है। उनके पूरे पांच साल अपनी कुर्सी को सुरक्षित रखने की खातिर ही निकलते हैं। जनता के कने रोटी, कपड़ा, मकान, बिजली, पानी, दवा-दारू है या नहीं नेता जी को नहीं मालूम क्योंकि उनका सारा बख्त तो अपनी निजी जरूरतों को पूरा करने में ही निकल जाता है। ऐसे में जनता के करीब अगर कोई रहता है, तो चेला जी ही हैं। चेला जी को सब मालूम रहता है कि जनता कहां परेशान है, कहां आक्रोशित है और कहां खुश है। आखिर चेला जी भी तो जनता ही है न।!

आप नेता जी की निष्ठा पर बेशक अविश्वास जता सकते हैं परंतु चेला जी की निष्ठा पर नहीं। चेला जी नेता जी के प्रति हर स्तर पर पूर्ण-निष्ठावान रहते हैं। हकीकत तो यह है कि मंच पर नेता जी की केवल जुबान चलती है, उसे शब्द तो चेला जी ही देते हैं। अपने भाषण में जनता को कैसे इंप्रेस किया जाए, यह कला तो केवल चेला जी के कने ही है। अपने यहां बड़े-बड़े काबिल चेला जीओं की भरमार है प्यारे। राजनीति का जित्ता अनुभव नेता जी को होता है, उससे कहीं ज्यादा चेला जी को रहता है। आखिर वे दल-दल, नेता-नेता का नमक जो खाए होते हैं। मगर हां, विचार और विचारधारा से चेला जी की का कोई याराना नहीं होता। ऐसे बौद्धिक मामलों में वे न्यूट्रल रहना ही अधिक पसंद करते हैं। जब विचार और विचारधारा से नेताओं के साथ-साथ अब बौद्धिजीवियों ने भी किनारा कर लिया तो अकेले चेला जी का उसके प्रति प्रतिबद्ध होने से क्या होने-हवाने वाला है। उनका तो एक ही उद्देश्य है अपने नेता जी के ताईं जी-जान से चुनाव लड़वाना और फिर जीतवाना।

यह हमारे देश के नेताओं का सौभाग्य है कि उन्हें चेला जीओं का निरंतर सहयोग मिला रहता है। उनके हर संघर्ष में वे संग-साथ रहते हैं। विपक्षी दल को जवाब देने से लेकर चुनाव में भीड़ जुटाने तक के लिए हर बख्त तैयार रहते हैं। स्वयं भूखे-प्यासे रहकर नेता जी की सेवा में लगे रहना; निश्चित ही बड़ी बात है प्यारे। नेताओं के साथ-साथ हमें भी ऐसे निष्ठावान व प्रतिबद्ध चेला जीओं का सम्मान करना चाहिए। चुनावी राजनीति में दम आखिर उन्हीं के सहयोग से है।

देखते रहिए, इन चुनावों में भी नेता जी से कहीं अधिक तूती उनके चेला जीओं की ही बोलेगी। फिलहाल, तो नेता जी जनता के साथ-साथ अपने चेला जीओं के समक्ष भी नतमस्तक हैं। आखिर अटकी का सवाल जो है प्यारे!

अपना गणतंत्र

प्यारे, गणतंत्र तो अपना ही मस्त और महान है। हर हाल में हंसता-खिलखिलाता रहता है। न अधिक टेंसन लेता है न देता। बस अपने काम से मतलब रखता है। किसी की सरकार आए, किसी की जाए अपना गणतंत्र 'अवसरवादी राजनीति' से हमेशा दूर रहता है। हालांकि अपनी-अपनी ऊंची करने-करवाने के वास्ते तमाम नेता लोग गणतंत्र का जमकर उपयोग करते हैं लेकिन यह बुरा नहीं मानता। वैसे भी बुरा मानने या न मानने से क्या हासिल क्योंकि यहां हर कोई खुद को तीसमारखां से कम तो समझता नहीं! सबके कने अपने-अपने तर्क हैं। इन्हीं तर्कों पर तो उनकी राजनीतियां टिकी हुई हैं। तर्कों के ही सहारे वे गण को भी चला रहे हैं और तंत्र को भी। वैसे भी गणतंत्र में बस चलनी चाहिए। अब यह कैसे और कहां से चल रही है, इस पर ज्यादा दीदारेजी करना बेकार ही है प्यारे।

यूं तो नेता लोगों को अपने गणतंत्र की सेहत का ख्याल हर बख्त रहता है मगर इन दिनों वे इसके प्रति कुछ ज्यादा ही फिकरमंद से हो गए हैं। होता है.. होता है.. जब चुनाव नजदीक होते हैं, तब नेता लोग ऐसे ही अपने गणतंत्र के प्रति फिकरमंद से हो जाते हैं। फिर तो सांस से लेकर बयान तक वे गणतंत्र की छत्रछाया में ही रहकर लेते व देते हैं। लुत्फ तो यह है कि पिछले पांच बसर जित्ता उन्होंने गणतंत्र के बारे में न सोचा होगा, अपनी चुनावी सभाओं में वे उससे दोगुना-चौगुना सोच व कह लेते हैं। आखिर गणतंत्र के वे भी तो प्रतिबद्ध सिपाही ही हैं न! गणतंत्र के बारे में सोचने-समझने की जित्ती कुव्वत उनके कने हैं, इत्ती किसी के नहीं! इसीलिए उनकी बातों को सुनने में ही 'असली मजा' है।

अपन साफ देख रहे हैं कि आजकल नेता लोग गणतंत्र की कैसी-कैसी बटरिंग करने में लगे हैं। जनता के कने हाथ जोड़े खड़े हैं कि वोट उन्हें ही दें क्योंकि इस गणतंत्र के वे ही 'सशक्त नायक' हैं। सत्ता में आते ही गणतंत्र को और मजबूत बना देंगे। शायद इत्ता मजबूत की गण तो अपने तंत्र से मिलने के वास्ते अपनी मजबूरी तलक को गिरवी रखना पड़े। यूं राजनीति में गणतंत्र की मजबूती को मजबूरी में बदलते अपन ने कई दफा देखा-सुना है। इसीलिए नेता लोगों चाहते हैं कि चुनावों में गणतंत्र के सहारे ही सही पर उनकी कुर्सी को मजबूती मिले ताकि जनता को मजबूरी की डोज दी जा सके। जिसका असर अगले पांच बरस तलक ऐसे ही बना रह सके।

अब गणतंत्र भी बेचारा क्या करे! पानी में रहकर मगर से बैर भी तो ठीक नहीं। जहां सब चलने लगते हैं, गणतंत्र भी उन्हीं रास्तों पर चलना शुरू कर देता है। चलेगा नहीं तो पिछड़ जाएगा। अगर पिछड़ गया तो फिर कहीं नहीं मिल पाएगा। इसीलिए बख्त के हाथों गणतंत्र ने अपनी सत्ता को सौंप दिया है, अब इससे फायदा उठाओ या हानि सब तुम पर निर्भर। लेकिन अपना गणतंत्र अब भी हारा नहीं है। यह अपनी जीत के प्रति आशावान है। यही इसकी 'हेल्दी सेहत' का असली राज भी है।

अपने गणतंत्र के कने कमाल की सहन-शक्ति है। हर अच्छी-बुरी सत्ता और व्यक्तित्व को खुद में समेटकर कभी अपने गम का इजहार नहीं करता। गणतंत्र को मालूम है कि कित्ते किस्म के दाग उसके शरीर पर हैं, फिर भी वह इस कोशिश में है कि कैसे भी हो यह सूरत बदलनी चाहिए। और, इस सूरत को केवल जनता ही बदल सकती है। वो भी अपने वोट की ताकत के सहारे। पर, इत्ता ध्यान रहे कि यह वोट केवल उन्हें ही जाए, जिनमें खुद को बदलने के साथ-साथ देश को बदलने का भी जज्बा हो। लेकिन, उन्हें कतई न जाए जो कपड़े बदलने के जैसे अपना दिल और दल बदलते रहते हैं। केवल बदलाव के सहारे ही गणतंत्र की मजबूती संभव है। फिर भी अपना गणतंत्र सबसे मस्त है। इसे ऐसे ही मस्त बनाएं रखें। गणतंत्र की मस्ती में ही अपनी मस्ती के रास्ते निहित हैं। जय हो।

नेता अच्छे हैं!

नेताओं के प्रति हमने अपने मन में कई प्रकार की भ्रमित अवधारणाएं विकसित कर रखी हैं। हम हमेशा अपने नेताओं को शक की निगाह से ही देखते हैं। उनके वायदों पर यकीन नहीं करते हैं। उनकी बातों पर ज्यादा तव्वजो नहीं देते हैं। सड़क से संसद तलक पहुंचने के उनके संघर्ष पर किस्म-किस्म की उंगलियां उठाते हैं। घोटाला कोई करे, भ्रष्टाचार कोई करे लेकिन दोष सारा का सारा बेचारे नेताओं पर ही मढ़ देते हैं। जरा से शक की बिनाह पर उन्हें जेल में ठूंस देते हैं। जबकि उनकी निष्ठा हमारे प्रति कित्ती गहरी है, इसे हम कभी महसूस ही नहीं करना चाहते। आखिर वे हमारे नेता हैं। हमारे माईबाप हैं। देश, समाज, जनता और लोकतंत्र के चुने हुए प्रतिनिधि हैं। उन पर बात-बात पर शक करना या बुरा-भला कहना कायदे से गलत है! आखिर सामने वाले की इज्जत भी तो कोई चीज होती है कि नहीं।

आज हर कोई यह कह रहा है कि 'अच्छा नेता चुनें।' 'अच्छे नेता को वोट दें।' 'अच्छे नेता को राजनीति में लाएं।' मियां, नेता तो सभी अच्छे होते हैं! यह तो हमारे उन्हें देखने-परखने का नजरिया होता है कि कौन नेता अच्छा है, कौन खराब। और फिर नेता लोग कोई अपने-अपने माथे पर लिखवाकर थोड़े ही न घूमेंगे कि 'हम अच्छे हैं' इसीलिए केवल हमें चुनो। फिर यह भी कैसे संभव है कि जो खुद को अच्छा कहे वो सौ फीसद अच्छा ही होगा! देखे जी, आजकल के जमाने में 'शुद्ध अच्छा' मिलना न तो समाज में संभव है न राजनीति में। हर अच्छा अपने भीतर कुछ न कुछ बुराई लिए ही होता है। अपना काम तो केवल उसके बुरे को इग्नोर करना होना चाहिए बस।

हमेशा ध्यान रखियो प्यारे राजनीति कभी केवल अच्छे होकर या केवल अच्छाई के रास्ते नहीं चल सकती। इसे साधने व चलाने के लिए उंगली को कुछ टेढ़ा-मेढ़ा करना ही पड़ता है। सीधे-सच्चे-अच्छे को तो कोई भी मूर्ख बना जाएगा। नेता वही अच्छा जिसकी बैक अच्छी हो। अच्छी बैक वाले नेता ही चुनाव लड़ने की हिम्मत कर पाते हैं। अपनी अच्छी बैक के दम पर ही कुर्सी पा जाते हैं। जनहित के साथ-साथ अपने निज-हित भी साधते रहते हैं। आखिर चुनाव में खरचे की भरपाई कहीं न कहीं से तो करनी ही होती है प्यारे!
खैर, आपकी तो नहीं कह सकता परंतु मेरे मन में प्रत्येक नेता के प्रति हमेशा ही अच्छे विचार रहते हैं। उनके अच्छे को मैं अपना अच्छा मानता हूं। उनकी अच्छाई के बल पर ही देश का संबल टिका हुआ है। हमेशा टिका भी रहेगा। वे हमारे अच्छे लोकतंत्र के अच्छे रखवाले हैं। उनकी बेपनाह अच्छाईयों पर अक्सर कुर्बान हो जाने को जी चाहता है मेरा। नेताओं के प्रति हम सबको अपने मन की अवधारणाओं को अच्छा रखना होगा ताकि उनकी बुराई भी हमें अच्छी जैसी ही लगे! जब दाग अच्छे हो सकते हैं, तो फिर नेता क्यों नहीं!

तो प्यारे अबसे हमेशा ध्यान रखियो 'अच्छा नेता चुने' जैसा घिसा-पिटा जुमला बोलने से पहले।

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

जुबानी-क्रांति की जंग

यू नो, क्रांति शब्द से हमें खासा मोह है। बात-बात में क्रांति करने-कहने-लिखने से हम कभी पीछे नहीं हटते। जनता का जहां थोड़ा बहुत समर्थन मिलता दीखता है, हम तुरंत उसे क्रांति में परिभाषित करने बैठ जाते हैं। कभी अण्णा अपनी क्रांति का झंडा लेकर खड़े हो जाते हैं, तो कभी बाबा रामदेव। भ्रष्टाचार और काला धन के खिलाफ जिस क्रांति को करने का ये महापुरुष दावा करते हैं, उसे चू चू का मुरव्वा बनते अपन कई दफा देख चुके हैं। क्रांति शब्द को हाईजैक करके नाहक ही उसे बदनाम करते रहते हैं ये लोग। ऐसे छोटे-मोटे आंदोलनों-सत्याग्रहों से अगर क्रांतियां होनी लगीं तो चला गया देश! न न अपन यह नहीं कहते कि आप क्रांति न करें, खूब करें, दिन-रात करें मगर इस बहाने जनता को बहकाएं तो नहीं। सड़क या मैदान में भीड़ जुटा लेने से क्रांतियां नहीं होतीं प्यारे!

बहरहाल, चुनावों का बख्त आते ही क्रांति शब्द की डिमांड कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है। हर दल, हर नेता, हर कार्यकर्ता देश और जनता के बीच, अपने वायदों के सहारे, क्रांति करने को ऐसा बेताव-सा रहता है कि बस पूछिए मत। बेशक क्रांति शब्द का महत्व उसे मालूम न हो लेकिन खुद क्रांतिकारी बनने से कभी पीछे नहीं हटता। वो तो बेचारों का बस नहीं चलता, नहीं तो अपनी क्रांति के आगे दुनिया में अब तलक हुई क्रांतियों को वे सिरे से खारिज ही कर डालते!

इधर, नेताओं के बीच चल रही जुबानी-क्रांति निरंतर जोर पकड़ती जा रही है। कभी इस नेता की जुबान क्रांति करने लगती है तो कभी उस की। हर कोई हर किसी की पोल खोलने को तैयार बैठा है। चुनाव में विकास के मुद्दे तो हवा हो गए हैं, जुबान-जुबान के बीच गुल्ली-डंडे का खेल जारी है। और, मीडिया इस जुबानी-क्रांति का भरपूर लुत्फ ले-दिलवा रहा है। अपने-अपने चैनलों पर चार-पांच नेताओं को बुलाकर उनमें जुबानी बहस छिड़वाकर अपनी टीआरपी की चांदी काटने में लगा रहता है बस। अक्सर नेताओं के बीच जुबानी जंग इत्ती तीखी और तेज हो जाती है, लगता है कि सब्जी-मंडी में अपनी-अपनी सब्जियों को बेचने की परस्पर प्रतियोगिता चल रही हो जैसे! इस क्रांति का भी अपना ही आनंद है प्यारे।

अगर देखा जाए तो इसमें दोष सिर्फ नेताओं का ही नहीं है, चुनावों के दौरान फिजा ही कुछ ऐसी हो जाती है कि जुबान स्वयं ही क्रांति करना शुरू कर देती है। अब न पहले जैसा बख्त रहा न पहले जैसे नेता कि कुछ भी कह लिया और चुप्पी साध ली। आज का नेता बयान का जवाब जुबान से देना जानता है। बयान और जुबान के बीच चलने वाली यह जुगलबंदी कब क्रांति में तब्दील हो जाती है, पता ही नहीं चलता। उधर नेता लोग जुबानी-क्रांति में व्यस्त रहते हैं, इधर जनता का मन लगा रहता है। जानते-समझते सब हैं कि नेताओं की यह जुबानी-क्रांति 'पब्लिक स्टंड' से अधिक कुछ नहीं मगर फिर भी मजा लेने में क्या जाता है प्यारे। वैसे भी पांच बरस में थोड़े-बहुत दिन तो इस क्रांति का लुत्फ सबको ही उठाना चाहिए।

खैर, जो भी हो अण्णा और बाबा रामदेव की क्रांतियों के ठंडा पड़ने के साथ इन दिनों अपने नेताओं की जुबानी-क्रांति अच्छा खासा रंग जमाए हुए है। साथ ही सोने पर सुहागा कर रहे हैं उनके अति-क्रांतिकारी घोषणापत्र। इससे जुबानी-क्रांति की जंग और तेज हो गई है। अमां होना दीजिए, इससे किसी को क्या फरक पड़ता है। देश आराम से चल ही रहा है। जनता बिना उफ्फ किए जिये ही चली जा रही है। बुद्धिजीवि सलमान रुशदी के बहाने अपने-अपने बौद्धिक जमा-खर्च को समेटने-बटोरने में लगे ही हुए हैं। हर तरफ बस जुबानी-क्रांति की जंग का ही जोर है। अगर अपन भी दो-चार हाथ इस क्रांति में आजमा लें, तो क्या हरज है प्यारे!

अण्णा का थप्पड़

तो अण्णा हजारे अब भ्रष्टाचारियों को थप्पड़ रसीद करवाएगें! मतलब कि खुलेआम उनकी बेइज्जती करवाएगें! क्या हुआ जो वे भ्रष्टाचारी हैं, आखिर समाज में इज्जत तो वे भी रखते हैं! कभी किसी मौके या मोड़ पर अपनी सामाजिकता से पीछे नहीं हटते हैं। क्या भ्रष्टाचारी होना पाप है? अगर पाप है तो अब तलक सरकार द्वारा इसे बैन क्यों नहीं किया गया है? क्या वजह है कि भ्रष्टाचारी सरकार, समाज और व्यवस्था में जगह पाए हुए हैं? आखिर क्यों कोई आड़ा-तिरछा काम भ्रष्टाचारी के सहयोग बिना पूरा नहीं होता? अण्णा शायद जानते नहीं कि देश के आर्थिक विकास में कित्ता बड़ा कंट्रीव्यूशन केवल भ्रष्टाचारियों के रास्ते ही आता है! अब यह बात अलहदा है कि उन्होंने कभी अपने योगदान को गाया नहीं! कभी खुलकर इसे स्वीकार नहीं किया! और उन्हीं योगदानी महापुरुषों को अण्णा थप्पड़ मारने को कह रहे हैं। बताइए, कित्ती गलत विचारधारा रखते हैं अण्णा भ्रष्टाचारियों के प्रति!

यह भ्रष्टाचारियों का धैर्य ही है जो अण्णा के, उनके खिलाफ दिए गए, ऐसे घातक बयानों पर कभी टूटता नहीं। कभी वे अण्णा की बातों का बुरा नहीं मानते। कभी उनकी कोई शिकायत जनता से नहीं करते। न ही सरकार या राजनीति दलों को पत्र ही लिखते हैं। अण्णा को देखिए, बात-बात में बच्चों की तरह कभी सरकार तो कभी अन्य राजनीतिक दलों को पत्र लिखने बैठ जाते हैं। जब वहां से कोई सुनवाई नहीं होती तो जनता को अपने भ्रमित बयानों से बरगलाते हैं। अण्णा और उनकी टीम का बस एक ही उद्देश्य रहता है कि जनता उन्हें छोड़कर कहीं न जाए। हर बख्त उनके पल्लू से बंधी उनके संग-साथ चले। आप खुद ही बताएं क्या ऐसा संभव हो सकता है? जनता तो स्वतंत्र है किसी के भी साथ जाने के लिए। माना कि कुछ लोग अण्णा के साथ हैं, तो कुछ उनके खिलाफ भी हैं। यह न भूलिए।

कोई माने या न माने परंतु मुझे तो सरकार से कहीं ज्यादा सब्र भष्टाचारियों में नजर आता है। अपने अपमान के हर घूंट को वे ऐसे पी जाते हैं, जैसे कुछ हुआ ही न हो। यह बड़ी बात है। अण्णाओं के बयानों और आंदोलनों से बेफिकर वे दो का तीन, तीन का चार करने में निश्चितंता के साथ लगे हुए हैं। उन्हें मालूम है कि बयानों या आंदोलनों से पेट नहीं भरता, केवल सीना चौड़ा होता है। अब कौन कमबख्त यहां अपना सीना चौड़ा करने के लिए जीता है प्यारे!

मुझे लगता है कि अण्णा हजारे और उनकी ईमानदार टीम नाहक ही अपना बख्त बर्बाद कर रही है। भ्रष्टाचार की खाल बेहद मोटी है, इसे इत्ती आसानी से नहीं भेदा जा सकता। सबसे बड़ी बात तो यह है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने, बोलने और सत्याग्रह करने वाले जनता के दरबार में पहले खुद तो पाकसाफ होकर दिखाएं। लुत्फ देखिए जरा, आप अपने भ्रष्टाचार पर तो 'सफेद चादर' डाले हुए हैं और उनसे उनकी 'काली चादर' को हटाने के लिए कह रहे हैं। भला ऐसा भी होता है कहीं। वाह! मीठा-मीठा गप्प-गप्प, कड़वा-कड़वा थू थू।

जाहिर-सी बात है प्यारे केवल थप्पड़ मारने से न तो भ्रष्टाचार कम हो जाएगा न ही भ्रष्टाचारियों को अक्ल आएगी। भ्रष्टाचारियों को थप्पड़ मारना या पियक्कड़ों को खंभे से बांधकर कोड़े लगवाना अहिंसा का नहीं हिंसा का द्योतक है। यह गांधी का रास्ता हो ही नहीं सकता। न ही गांधी ने कभी किसी प्रकार की हिंसा का समर्थन किया था। लेकिन अण्णा तो सीधे हिंसा के रास्तों पर ही चलने लगे हैं, वो भी गांधीवाद की तख्ती अपने गले में लटकाए। ऐसा गांधीवाद भ्रामक है।

मैं तो कहता हूं बस बहुत हुआ...। भ्रष्टाचारियों को अब एकजुट हो ही जाना चाहिए। उन्हें अण्णा के प्रति अपने विरोध को दर्ज करवाना ही चाहिए ताकि बयान का जवाब एकजुटता से दिया जा सके।
फिलहाल, हमें भ्रष्टाचारियों के जवाब का बेसबरी से इंतजार है।

केवल लुत्फ लीजिए घोषणापत्रों की घोषणाओं का

प्यारे, अपन तो चाहते हैं कि हमारे यहां चुनाव हर महीने ही होया करें। दरअसल, चुनावों के सीजन में अपन को मिनट-मिनट में सुख के साथ लुत्फ का सा एहसास होता रहता है। चुनाव के दौरान न महंगाई पर बात होती है न भ्रष्टाचार पर तकरार न काले धन का ज्यादा जिकर। बहुत ही दबी जुबान के साथ नेता लोग ऐसे मुद्दों को अपने मुंह लगाते हैं। उसका कारन है न। क्योंकि हमाम में तो... सभी हैं न प्यारे! समझे।

पर अपन किसी भी दल की दुखती रग पर हाथ रखने के मूड में इस बख्त नहीं हैं। इस बख्त तो अपन चुनावी घोषणापत्रों में घोषित घोषणाओं का लुत्फ ले रहे हैं। क्या कमाल के घोषणापत्र हैं सब के सब! घोषणाएं भी ऐसी कि कान सुनते ही शरमा जाएं। जी हां ऐसे 'अद्भूत घोषणापत्रों' पर आंखें नहीं बल्कि कान शरमाते हैं प्यारे। फिलहाल, अपन के तो कान इस बख्त शरमाए से हुए हैं। कोशिश में लगे हैं कि ये अपनी शरम से थोड़ा तो बाहर कू आएं ताकि सुख के साथ लुत्फ के स्वाद को और मजेदार बनाया जा सके।

घोषणापत्रों में से आवाजें आ रही हैं कि छात्रों को कंप्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट आदि-आदि मुफत में दिया जाएगा। उनकी जिंदगियों को नए सिरे और तरीके से संवारा जाएगा। लड़कियों को मुफत में शिक्षा मिलेगी। बढ़िया है। बहुत बढ़िया है। लेकिन अब तलक किसी दल ने यह नहीं बताया कि यह सब जुगाड़ होगी कैसी? घोषणापत्रों की आकर्षक घोषणाएं हकीकत में तब्दील कैसे होंगी? पिछली दफा भी कुछ ऐसी ही घोषणाएं हुई थीं और चुनाव जीतते ही सब की सब हवा में उड़ा दी गईं थीं। कभी-कभी तो लगता है प्यारे कि अपने यहां चुनावी घोषणाएं शायद हवा में उड़ा देने के लिए ही होती हैं!

आलम यह है कि इस बख्त प्रत्येक राजनीतिक दल के भीतर जंग-सी छिड़ी है अपने-अपने घोषणापत्रों को अति-लुभावना बनाने की। सुनने में तो यहां तक आया कि कुछ दलों ने गाय देने का भी वायदा किया है। गनीमत है गाय का ही चुनाव किया शेर, चीते या हाथी का नहीं! नहीं तो बेचारे मतदाता को घणी मुसीबत हो जाती है। नेता जी की जीत के बदले में मिले 'घोषित जानवर' को बेचारा कहां-कहां संभालता फिरता।
सुन रहे हैं यह सब आकर्षक घोषणाएं युवा मतदाता को लुभाने-ललचाने के लिए ही की गई हैं। मगर प्यारे युवाओं का दिल बात-बात पर जैसे मचलता रहता है, उसे देखकर तो नहीं लगता कि वे ऐसी घोषणाओं के प्रति बहुत ज्यादा आकर्षित होंगे! वे तो अपने दम पर ही दुनिया को बदलने की चाह रखते हैं। पर उनकी चाह से मिलती-जुलती कोई खास बात तो अभी तलक नहीं दिखी है इन घोषणापत्रों में। अरे कंप्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट तो अब आम-सी चीजें बन चुकी हैं युवाओं के लिए।

बहरहाल, देखते हैं इस दफा कित्ते युवा घोषणापत्रों की घोषित घोषणाओं पर आकर्षित होते हैं या फिर अपने मन की करते हैं। बस थोड़ा-सा इंतजार और...।

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

पर्दा है पर्दा

चुनाव आयोग के आदेश पर मूर्तियां सकते में हैं। क्या करें क्या न करें कुछ समझ नहीं पा रहीं! चुनावी घमासान के बीच पीसे जा रही हैं। अपनी स्वतंत्र व प्ररेणास्पद इमेज के ताईं पहचानी जाने वाली मूर्तियां, ठूंठ-सी बनकर रह गई हैं। पर्दों के बीच रहना मूर्तियों को गंवारा नहीं। पर्दा मूर्तियों के वास्ते किसी अभिशाप से कम नहीं। मूर्तियों पर पर्दा डालना अगले के चरित्र पर पर्दा डालने जैसा है। यहां-वहां खड़ीं लंबी-महंगी मूर्तियां बताती हैं कि अगले का राजनीतिक व सामाजिक वर्चस्व केवल उन्हीं पर टिका है। खुद को स्थापित करने-करवाने का उत्तम माध्यम हैं मूर्तियां।

राजनीति में मूर्तियां बहुत जरूरी हैं। इससे अगले के कद का पता चलता है। विपक्ष पर दवाब बनाया और जनता को इंप्रेस किया जाता है। चौराहे या पार्क में स्थापित अगले की मूर्ति चुप रहकर ही बहुत कुछ कह जाती है। देश या प्रदेश का विकास हो या न हो परंतु मूर्तियों के विस्तार में कहीं कोई कमी नहीं आनी चाहिए। अगले की मूर्तियों की ऐतिहासिकता को जब इतिहास में दर्ज किया जाएगा, तब उसकी बात ही कुछ और होगी। और, राजनीति में आनकर, नेता बनकर अगर अगले ने जगह-जगह अपनी मूर्तियां नहीं खड़ी करवाईं, तो किसी काम की नहीं उसकी राजनीतिक हनक।

दरअसल, चुनाव आयोग को समझना चाहिए कि मूर्तियों पर पर्दा डलवा लेने से, चीजें नहीं बदलने वालीं। मूर्तियां प्रचार-प्रसार का नहीं, नयन-सुख का प्रतिबिम्ब होती हैं। सूड़ उठाए, दांत फैलाए, हल्का-सा मुस्कुराए मस्त हाथी को आप मूर्ति की शक्ल में तो आराम से देख व छू भी सकते हैं, किंतु साक्षात उसके साथ ऐसा नहीं कर सकते। प्यारे, वो हाथी है, कब में बिदक जाए! कब में उठाकर तुम्हें शहर के बाहर फेंक दे। मूर्तियों में खड़ा हाथी अपने हर प्रकार के एहसास से हमें परिचित करवाता रहता है। यूं हाथी की मूर्ति पर पर्दा डालना, उसके विशाल शरीर ही नहीं, उसकी प्यारी सूड़ के साथ भी 'इमोशनल अत्याचार' है।

आप बेशक न सुन पा रहे हों लेकिन मैं पर्दे के भीतर सिमटी मूर्तियों के क्रंदन को साफ सुन पा रहा हूं। मूर्तियां रो-रोकर कह रही हैं कि आखिर हमारा कुसूर क्या है? क्या मूर्ति होना ही हमारा एकमात्र पाप है? मूर्तियां तो कलात्मकता का आईना होती हैं, आखिर हमारे आईनों को क्यों ढंका जा रहा है? मूर्तियों के सवाल अपनी जगह वाजिब हैं प्यारे। और, यह भी सुन लो मूर्तियों का यूं रोना न राजनीति, न चुनाव, न नेता, न मंत्री के वास्ते ठीक नहीं है। ज्ञानी बताते हैं कि मूर्तियां जब रोती हैं, तो प्रलय आती है। क्या यह किसी राजनीतिक प्रलय के आने का संकेत तो नहीं? अभी तो हम 2012 में प्रलय की भविष्यवाणी से ही नहीं उबर पाए हैं।

पर्दे के बीच रह रही मूर्तियों का यूं रोना अब मुझसे नहीं देखा-सुना जाता। दिल खासा द्रवित हो जाता है। मैं नहीं चाहता कि मूर्तियां गुस्से में आकर ऐवईं कोई श्राप दे दें। किसी को बेकारण सताना भी ठीक नहीं है। अतः मेरी चुनाव आयोग से गुजारिश है कि मूर्तियों को पर्देदारी से मुक्त किया जाए। हाथी को खुली हवा में सांस लेने व सूड़ लहराने की छूट दी जाए। ताकि मूर्तियों का पर्दों के पीछे छिपा सम्मान पुनः वापस आ सके।

नेता जी का रोना

प्यारे, आंसू बेशक नेता जी के निकले थे मगर उन्हें देखकर मन हमारा भी भर आया था। उनका साथ निभाने के वास्ते दो-चार आंसू हमने भी लुढ़का लिए थे। भरी सभा के बीच अच्छा नहीं लगता कि अकेले नेताजी रोएं, हम ठूंठ की तरह यूंही खड़े रहें। आखिर हमारा भी तो कोई फरज बनता है कि नहीं अपने नेताजी के प्रति! बेचारे नेताजी हमारे वास्ते पूरे पांच साल तलक इत्ती कठिनाईयां मोल लें और हम उनके आंसू के साथ अपने आंसू भी न बहा पाएं, तो प्यारे लानत है हम पर। इस नाते हमें जनता होने का कोई हक नहीं। यह भी कोई बात हुई भला, अपनी जुगाड़ लगवाने के लिए नेता जी और उनके आड़े बख्त में बाय-बाय नेता जी। न न ऐसा जुलम कम से कम हम तो नहीं कर सकते।

जरनली, हमारे देश के नेता बहुत स्ट्रांग होते हैं। हर बाधा को बड़ी खामोशी से पार कर जाते हैं। जनता को भले ही इमोसनल कर दें परंतु खुद कभी इमोसनल नहीं होते। लेकिन यहां तो मामला ही कुछ दूजे किस्म का था। एक तो नेता जी को पार्टी से बाहर कर दिया और ऊपर से उनका टिकट भी काट लिया। पता है, पार्टी और टिकट ही तो नेता जी की असली जान होवे है, उसी से उन्हें जुदा कर दो। यह ठीक नहीं है। ऐन चुनावों के बख्त इत्ता सदमा भला नेता जी कैसे बरदास कर पाते, सो रो दिए। नेता जी के रोने में पहली दफा हमने इमोसनल-कम-पोलिटिकल अत्याचार महसूस किया। ऐसा तो कोई अपने दुश्मन के साथ भी न करे है प्यारे।

ज्ञानियों ने ऐसा बताया है कि नेता का रोना देश और राजनीति के वास्ते शुभ संकेत नहीं होता। तमाम प्रकार के बिघ्न बीच में आते हैं। बात ठीक भी है, अपने जन-सेवक को यूं रूलाना भला कहां की अक्लमंदी है! हमें तो अपने नेता जी की हिफाजत व इज्जत हर हाल में करनी चाहिए। क्योंकि वो हैं, तो हम हैं। न जाने उनके कित्ते-कित्ते किस्म के एहसान हैं हम पर और देश पर। अरे भई नेता तो लोकतंत्र की नाक होता है। अपनी नाक का इस्तेमाल वो चुनावों के दौर ही करता है। ऐसे में नेता जी की नाक का गिला होना ठीक नहीं है।

चलो खैर यह भी सही रहा कि नेता जी का रोना फजूल नहीं गया। एक प्रमुख दल ने उन्हें सर छिपाने की जगह दे ही दी। साथ ही चुनाव लड़ने का टिकट भी। इसके अतिरिक्त हमारे नेता जी को और क्या चाहिए! पहले जी-जान से उन्होंने उस पार्टी की सेवा की थी, अब इसकी करेंगे। हमें हमारे नेता जी की राजनीतिक प्रतिबद्धता में कोई सक-सुभा नहीं है। राजनीतिक प्रतिबद्धता को स्थापित के ताईं तो हमारे नेता जाने क्या-क्या कर जाते हैं। कृपया, उनकी प्रतिबद्धता पर चुलहबाजी न करें।
हमारे नेता जी की खुसी में ही हमारी खुसी है। अब जाकर हमारे भी आंसू ठहर पाए हैं। सांस में काफी राहत महसूस कर रहे हैं। जनता का पूरा स्पोर्ट है नेता जी को। संघर्ष वो करेंगे, नारे लगाने के ताईं हम हैं ही। अरे, सरम किस बात की यह तो हमारा जनम-जात फरज है। केवल चुनावों के बख्त ही तो हमें देसी से विदेसी ठर्ररे का स्वाद मिलता है। इन्हीं दिनों नेता जी की खास किरपा रहती है हम पर। बताओ तो भला हम कैसे अपने नेता जी के दुख-सुख में साथ निभाना छोड़ दें!

सोमवार, 9 जनवरी 2012

अपन भी चुनाव लड़ेंगे

प्यारे, इस दफा अपन का भी चुनाव लड़ना लगभग तय है। पार्टी का चुनाव कर लिया है, बस नेता जी की मोहर लगना शेष है। वो लग ही जाएगी क्योंकि नेता जी से अपन के ताल्लुकात बहुत पुराने हैं। नेता जी व्यवहारकुशल तो बहुत हैं परंतु ईमानदारी में जरा कम विश्वास करते हैं। दल-बदल के प्रति उनका खास रूझान रहता है। जिस दल में नेता जी की दाल नहीं गल पाती, वहां से तुरंत कट लेते हैं। इस मामले में वे किसी की नहीं सुनते।

अपनी महत्ता को भुनना उन्हें अच्छे से आता है। जहां से खड़े हो जाते हैं, जनता भी वहीं चली आती है। जनता के हितों के वास्ते वे हर तरह का सौदा व समझौता करने की तमन्ना रखते हैं। सिर्फ जन-हित के वास्ते उन्होंने अपना प्राइवेट दल भी बनाया हुआ है। जब भी कभी चुनाव में किसी दल से उन्हें टिकट नहीं मिल पाता, अपने प्राइवेट दल का ही उपयोग करते हैं। जीताऊ दल की सरकार बनने के बाद, उसी में शामिल हो जाते हैं। अब तलक वे कित्ते दलों के बीच अपनी अदला-बदली दर्ज करवा चुके हैं, खुद उन्हें भी नहीं मालूम।

नेता जी की इन्हीं खूबियों को देखते-समझते हुए ही अपन ने उन्हीं के साथ होने का डिसाइड किया है। साफ बात कहते हैं अपन को ऐसे नेता ही भाते हैं। ज्यादा बौद्धिक, ज्यादा चिंताग्रस्त, ज्यादा प्रगतिशील, ज्यादा हितकारी नेता अपन के पल्ले नहीं पड़ते। ऐसे नेता लोग राजनीति कम करते हैं, प्रतिबद्धताएं ज्यादा गिनाते हैं। मुद्दा-दर-मुद्दा बाल की खाल निकालते हैं। कभी उदारीकरण का विरोध करते हैं, तो कभी विदेशी निवेश पर आंसू बहाते हैं। चुनावों के बख्त न खुद कुछ लेते हैं, न ही दूसरे को लेने देते हैं। भला ऐसे राजनीति थोड़े ही होवे है प्यारे। लेने-देन तो राजनीति का प्रमुख आयाम है। इसे त्यागना महा-पाप है।

इस मामले में हमारे नेता जी हमेशा चौकस रहते हैं। उनका कहना है, राजनीति बौद्धिकता के दम पर नहीं लेने-देन के दम पर ही करी जाती है। आखिर इत्ता महंगा चुनाव लड़ना कोई हंसी-खेल थोड़े ही है। चुनाव लड़ने, जनता को मनाने, सदस्यों को जुटाने में टांके खुल जाते हैं। इस जनता के मूड का कोई भरोसा नहीं। कब में बदल जाए और कब में अकड़ जाए। भीड़ जुटाकर एक दफा अण्णा हजारे ने भी हुंकार भरी थी मगर दूसरी दफा उनकी सारे हुंकारें पानी मांगती जान पड़ीं। इसलिए प्यारे जनता की राजनीति को कुछ इस अंदाज से अंजाम दो कि सांप भी रहे और लाठी भी न टूटे।

अपन नेता जी के दल में आए ही इसलिए हैं ताकि अपनी अति-बौद्धिकता से मुक्ति पा सकें। बात-बात में क्रांति का नारा देने से बच सकें। ठाठ से चुनाव लड़ें और ठाठ से जीतें, बाकी के जन-हित के ताईं तो पूरे पांच साल हैं ही। अपने ने देखा है कि सीट निकलते ही सब कुछ बहुत आसान हो जाता है। और फिर जब अपन नेता जी के नक्शे-कदम पर चलेंगे, तब सब कुछ आसान ही आसान समझिए प्यारे।

अपन को विश्वास है, जित्ता अपन अब तलक पन्ने रंगकर नहीं जुटा पाए, नेता बनकर तो जुटा ही लेंगे। कमाई के मामले में तो अपने देश की राजनीति का कोई जवाब ही नहीं है। यहां तो रेगिस्तान में भी पानी निकल ही आता है।

तो साथियों, इस दफा वोट अपन को ही दें। गर आप अपना हित चाहते हैं, तो केवल अपन को ही जितवाएं। नेता जी के मार्ग-दर्शन की कसम, आपका संपूर्ण ख्याल रखेंगे। अरे..अरे..अरे.. बताना तो भूल ही गए अपन का चुनाव चिह्न गिरगिट है। तो गिरगिट का ही बटन दबाएं और अपन को विजयी बनाएं।

बुधवार, 4 जनवरी 2012

नए साल का संकल्प

प्यारे, नए साल पर अपन ने भ्रष्टाचार का साथ निभाने का संकल्प लिया है। अब इस संकल्प पर कोई ऐतराज जताए या मुस्कुराए, अपन नहीं सुनने वाले। और सुनने भी क्यों? यह भी कोई बात होवे है, जब जिसके मूड में आता है भ्रष्टाचार को गरियाने निकल पड़ता है। कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन-आंदोलन कर रहा है तो कोई सत्याग्रह। मंच से जमकर भ्रष्टों को कोसा-कोसवाया जा रहा है। सियाने कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार देश की प्रगति में बाधक है। अगर वाकई बाधक होता तो हमारे देश का शुमार श्रेष्ठ विकासशील देशों में न होता! ओबामा ऐवईं हमारे देश की तरक्की की तारीफ नहीं कर जाते! और तो और हमारे देश में नेता से लेकर मंत्री, क्लर्क से लेकर चपरासी तक करोड़पति नहीं होते! पता है, भ्रष्टाचार के मामले में हमारे देश की तूती बोलती है। केवल इसी मामले में हमारा पड़ोसी हमसे भय खाता है! हुं.. इन सियानों को क्या मालूम कि देश की प्रगति के ताईं भ्रष्टाचार का साथ कित्ता आवश्यक है? न जाते कित्ते बरसों से हम इसकी सेवा में तन-मन-धन से रत हैं। हम इसे नहीं छोड़ सकते।

देश और समाज के भीतर-बाहर हलचल मचाने के वास्ते कुछ तो ऐसा होना चाहिए कि जिसके बहाने हमारा दिल बहल सके। अण्णा हजारे जैसों की नौटंकियों का सच जनता के सामने आ सके। विपक्ष की कथित सदाशयता का पता लग सके। समाज के कथित ईमानदारों की गिनती हो सके। इस सब के ताईं भ्रष्टाचार से उपयुक्त और कोई युक्ति नहीं हो सकती। भ्रष्टाचार के बहाने सत्ता और रचनात्मकता की रोटियां सकेने वालों की असलीयत अपन बहुत अच्छे से जाने हैं प्यारे। जबान पर क्रांति और विचार में भ्रांति ही उनका उद्देश्य रहा है।

भ्रष्ट अगर कुछ कहता नहीं तो यह न समझा जाए कि वो गूंगा है। भ्रष्ट के कने बहुत लंबी जबान होती है, अगर खुदा--खास्ता खुल गई तो स्विस बैंक से लेकर पेड न्यूज तलक का राज फाश करने की ताकत रखती है। और हां ऊपर से ईमानदार अंदर से कित्ते ईमानदार हैं, इसे भ्रष्ट से बेहतर कोई नहीं जानता।

अपन बहुत अच्छे से जानते-समझते हैं कि अपन का संकल्प बेहद मुश्किल है। भ्रष्टाचार के समर्थन में, वो भी संकल्प के साथ आना, हर किसी के बूते की बात नहीं। इसको लेकर लोग तरह-तरह की बातें करने और मुंह बनाने लग जाते हैं। अपन ने बहुत दफा देखा है समाज के कथित ईमानदार ठेकेदारों को दूसरे के भ्रष्टाचार को कोसते और अपनी ईमानदारी की बढ़ाई करते हुए। लेकिन कोई नहीं अपन ने एक दफा जो संकल्प ले लिया तो अपन खुद की भी नहीं सुनते।

सब देखभाल और सोच-समझकर अपन ने तय किया है कि अब से भ्रष्ट और भ्रष्टाचार की भलाई के वास्ते ही अपन संघर्ष करेंगे। भ्रष्टों तुम न घबराना अपन का तुम्हें भरा-पूरा समर्थन है। जब तलक अपन की जान में जान है, यह बस तुम्हीं पर कुर्बान है। हमारे पुरखों द्वारा स्थापित व्यवस्था को अपन इत्ती आसानी से नहीं त्याग सकते। भ्रष्ट व्यवस्था को त्यागना एक तरह से हमारे पुरखों को अपमान होगा। आखिर उनकी भी तो कोई इज्जत है कि नहीं!
जिन्हें यह संकल्प रास आए, अपन के साथ आ सकता है। किसी प्रकार की कोई जोर-जबरदस्ती नहीं है। अपन अण्णा हजारे नहीं हैं कि भोले-भाले लोगों को अपने नाटकिए अनशन-आंदोलनों से भरमाएं-बरगलाएं। उन्हें सरकार, संसद और नेता के खिलाफ तीखा बोलने की छूट दें। मीडिया में अपना चेहरे चमकाने के वास्ते खुद को दूसरा गांधी घोषित करवाएं। दूसरे के भ्रष्टाचार के खिलाफ हल्ला बोलें और अपने भ्रष्टाचार पर कान दबा जाएं। साफ सुन लें, अपन ऐसी दोगली बातें करने के आदी नहीं। अपन बेहद साफ-दिल आदमी हैं। उनकी तरह अपन को खोखली-क्रांति करने का शौक नहीं। अपना एक ही उद्देश्य है; खुद भी खाओ, दूसरे को भी खिलाओ और भ्रष्टाचार की समद्धि में हाथ बंटाओ। दरअसल, मेरी-तेरी, उसकी-इसकी तरक्की का रास्ता बिना भ्रष्टाचार का साथ पाए तय नहीं किया जा सकता। इसलिए दूसरों की बातों में न आएं कृपया केवल अपनी ही अक्ल लगाएं।