सोमवार, 26 दिसंबर 2011

ऊ ला ला पर एक ललित निबंध

तमाम लीलाओं की तरह ऊ ला ला भी एक मस्त किस्म की लीला है। यह लीला अभी हाल द डर्टी पिक्चर के बहाने अस्तित्व में आई है। हालांकि ज्ञानी बताते हैं कि यह अस्तित्व में तो पहले से ही थी, परंतु इस पर उस तरह से गौर नहीं किया गया था। वो तो भला हो हमारी एकता कपूर जी का कि उन्होंने ऊ ला ला की महत्ता को समझा और विद्या बालन जी के माध्यम से हमारे समक्ष प्रस्तुत किया।

इधर देखने व सुनने में आया है कि ऊ ला ला की जरूरत हमारे जीवन में लगातार बढ़ती ही चली जा रही है। कुछ ऊ ला ला प्रेमियों ने तो यहां तक कहना शुरू कर दिया है कि बिना इसके हमारे जीवन का उत्सव अधूरा-सा है। ठीक भी तो है, इस दौड़ती-भागती जिंदगी में अगर कुछ क्षण राहत के मिल जाएं, तो क्या बुरा है! आखिर दिल को बहलाने का कोई--कोई बहाना तो हमें चाहिए ही न। फिर ऊ ला ला ही सही।

एक दौर था, जब हम इलू इलू कहकर तमाम तरह की प्रेरणाएं व संतुष्टियां पाया करते थे। उस वक्त इलू इलू लड़कियों को पटाने का उत्तम माध्यम बनकर उभरा था। जो इलू इलू की भावनाओं को समझ लेती थीं, उनके साथ अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती थी और जो नहीं समझ पाती थीं, वे इस शब्द को बेहद हिकारत भरी निगाहों से देखा करती थीं। गाहे-बगाहे बात मां-बाप तलक पहुंच जाया करती थी, फिर जो दूसरे किस्म का इलू इलू होता था, अब उसका जिक्र यहां क्या करना।

खैर, इत्ते बरसों बाद अब तो इलू इलू का पैटर्न ही चेंज हो चुका है। अब शायद ही कोई किसी को इलू इलू कहता-बोलता हो। असल में, इलू इलू की जगह अब ऊ ला ला ने ले ली है। पहले बात इलू इलू से आगे व पीछे बहुत ही कम बढ़ा करती थी परंतु अब ऊ ला ला से भी आगे निकल जाती है। कभी-कभार तो इत्ता आगे निकल जाती है कि अंत में हमें लल्ला या लल्ली के होने का ही शोर सुनाई देता है। किया भी क्या जाए, आजकल के यूथ पर इमरान हाशमी का असर कुछ ज्यादा ही तारी है प्यारे। फिल्मों में ऊ ला ला को स्थापित करने-करवाने में इमरान हाशमी साहब के योगदान को हम चाहकर भी भूला नहीं सकते। कुछ समय पहले एक फिल्म में मल्लिका शेरावत और इमरान हाशमी के बीच ऊ ला ला का खेल तमाम हदों को पार कर गया था। अब आप ही बताएं, ऐसी मादक हद को देखकर भला कौन कमबख्त अपनी ऊ ला ला की हदों पर नियंत्रण रख पाएगा!
हालांकि अभी द डर्टी पिक्चर को आने में थोड़ा-सा टाइम है मगर विद्या बालन जी का ऊ ला ला कुछ अजब प्रकार का गजब ढाने लगा है। उनका पल्लू सरकता देखते ही मनचलों के मुंह से स्वतः ही ऊ ला ला निकल जाता है। मैं जब भी उनके सरकते हुए पल्लू को देखता हूं, मुझे मार्लिन मूनरो की याद आ जाती है। उनकी स्कर्ट का उठना और इनके पल्लू का सरकना में कमाल की जुगलबंदी है। इसी जुगलबंदी ने हमारे जीवन में ऊ ला ला की महत्ता को बढ़ाया है। तहे-दिल से शुक्रिया है उनको।
ऊ ला ला ने जिस तरह से हमारे मध्य उम्र की बंदिशों को तोड़ा है, यह काबिले-गौर है। क्या बच्चा, क्या जवान और क्या बूढ़ा हर कोई ऊ ला ला ऊ ला ला कहने-करने में अपनी तरह से व्यस्त है। सड़कों पर मजनूंओं के बीच ऊ ला ला शब्द की डिमांड बढ़ गई है। आलम यह है कि मेरे मोहल्ले में हर दूसरे घर से किस्म-किस्म की ऊ ला ला, ऊ ला ला की आवाजें दिन-रात आती रहती हैं। कई बिछड़े व बिगड़े दिल ऊ ला ला के असर के बाद से सुधरने व संवरने लगे हैं। यह ऊ ला ला की बड़ी कामयाबी है।

द डर्टी पिक्चर, एकता कपूर, इमरान हाशमी व विद्या बालन को धन्यवाद है कि उन्होंने हमें ऊ ला ला की मस्ती से यूं खुलकर रू--रू करवाया। तमाम यथास्थितिवादी मान्यताओं-स्थापनाओं को तोड़ा। हमें बोल्ड रहना व देखना सीखाया। ऊ ला ला की जरूरत को सीधे फिल्माकर बताया। आलम यह है कि मुंह से अब जय हो की जगह ऊ ला ला ही निकलता है। ऊ ला ला सदा सहाय।

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