सोमवार, 26 दिसंबर 2011

बेचारी सरकार! करे भी तो क्या?

पहले तो कभी-कभी आता था लेकिन अब तो हर रोज, हर क्षण आता है; जी हां सरकार पर मुझे बइंतहा 'तरस' आता है। बेचारी सरकार! क्या-क्या देखे और क्या-क्या न देखे? किसे-किसे सुने और किस-किस को सुनना छोड़ दे? हर वक्त अजीब-सी स्थिति में रहती है सरकार हमारी। न विपक्ष चैन लेते देता है न खुद के सहयोगी। कोई टांग खेंचने में लगा है, तो कोई लंगड़ी मारने में। इज्जत की तो कुछ पूछो ही मत प्यारे! जिसके हत्थे पल्लू चढ़ जाता है, वही ऊ ला ला करना शुरू कर देता है। सरकार पर तोहमतें लगाते वक्त कोई यह नहीं सोचता कि यह हमारी सरकार है। हमारे देश, हमारी जनता की सरकार है। हमारा वर्तमान, हमारा भविष्य है। हमारे तमाम तरह के हित इससे जुड़े हैं। लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ है यह। सरकार है तो उम्मीद है कि हम वैचारिक, व्यवहारिक और आर्थिक स्तर पर सुरक्षित हैं।

भले ही आप इस बात को न समझें मगर सरकार खूब समझती है। इसीलिए वो हर वक्त हमारी चिंता में रहती है। न दिन न रात, न जाड़ा न बरसात, न बाढ़ न भूकंप, न आंदोलन न सत्याग्रह हमारी सरकार कभी नहीं सोती। अपने स्तर पर चीजों को सुलटाने में जुटी रहती है। सरकार के तमाम सम्मानीय मंत्री, सोनियाजी के दिशा-निर्देश में, जनता को इस विश्वास में बांधे रखने में लगे रहते हैं कि चाहे खुशी हो या गम मगर हम साथ-साथ हैं। लेकिन इत्ते पर भी सरकार को हर तरफ से खरी-खोटी ही सुनने को मिलती है। सबसे ज्यादा दुंद काटता है विपक्ष! हर समय इस फिराक में लगा रहता है कि कब सरकार बोले और कब वो उसे घेरे!
इस बीच चार-पांच मुद्दे तो लगता है सरकार के 'घर-जमाई' ही बन गए हैं। भ्रष्टाचार, काला धन, महंगाई, एफडीआई और अब मंदी। भ्रष्टाचार पर सरकार के खिलाफ मोर्चा अण्णा संभाले हुए हैं। काला धन बाबा रामदेव का प्रिय विषय है। एफडीआई, महंगाई और मंदी पर विपक्ष हावी है। यानी यहां खाली कोई नहीं है! किसी न किसी के कने कोई न कोई मुद्दा है जरूर। जब दिल करता है कोई भी 'अपना वाला मुद्दा' लेकर कभी सड़क तो कभी जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने बैठ जाता है। कुछ बेचारे सरकार का पुतला फूंककर ही अपना विरोध जता लेते हैं। इस विरोधा-विरोधी में इस बात का खास ख्याल रखा जाता है कि उनका विरोध टी.वी. चैनलों और अखबारों में मय तस्वीर के दिखना जरूर चाहिए। सच कहूं, बिना मीडिया के मैंने अब तलक यहां किसी को न विरोध करते देखा है न सुना।

अब सरकारी भी बेचारी क्या करे? किसके विरोध पर जवाब दे और किसके पर नहीं! खुद सोचिए कित्ता कठिन है 121 करोड़ लोगों को व्यक्तिगत तौर संतुष्ट रख पाना! अब भ्रष्टाचार और महंगाई है तो है, इसमें बेचारी सरकार क्या करे? कोशिश कर तो रही है। वैसे भी सरकारों का काम केवल कोशिश करना ही होता है! कोशिश-कोशिश में ही दांव अगर लग गया, तो बात बन गई, नहीं तो आप करते रहिए विरोध, क्या फर्क पड़ता है।

अब अण्णा ने ही भ्रष्टाचार और सरकार के खिलाफ आंदोलन करके क्या कर लिया? लोकपाल बिल चू-चू का मुरब्बा बनकर रह गया। भ्रष्टाचार अपनी जगह मस्त है। आंदोलन में शामिल चेहरे कित्ते ईमानदार हैं, इसे वे ही अच्छे से जानते-समझते होंगे! कुछ नहीं, बस दोनों तरफ से बयान पर बयान आते रहते हैं। अण्णा अपनी राजनीति की जुगाड़ में लगे हैं, तो सरकार अपनी। इस रस्साकशी में 'मेन मुद्दे' का क्या हुआ, किसी को नहीं मालूम।

बेचारी सरकार अण्णा से बचने की कोशिश करती है, तो महंगाई और मंदी का भूत घेर लेता है। रुपइया है कि लुढ़के ही जा रहा है। सेंसेक्स अपनी संवेदना पर आंसू बहा रहा है। आईआईपी के आंकड़े अलग जुलम ढाह रहे हैं। ऊपर से खबरिया चैनल संभावित मंदी को कुछ तरह से पेश कर रहे हैं कि बस पूछिए मत! सरकार बेचारी इधर कुंआ, उधर खाई जैसी स्थिति में है। इत्ती कठिनाईयों के बीच भी विपक्ष कहता है कि यह सरकार सही से काम नहीं कर रही। प्यारे, सरकार तो सही से काम तब करेगी न, जब उसे दिमागी सुकून मिले। कुछ सोचने-समझने का वक्त मिले। निर्णय लेने का हौसला मिले। मंदी के संकट पर विपक्ष साथ आए। भ्रष्टाचार पर अण्णा अपनी नौटंकी बंद करें। लेकिन नहीं, अगर विरोधियों ने अपने विरोध को दबा दिया, तो सरेआम उनकी नाक कट जाएगी। अब नाक कटने का अर्थ-मतलब तो आप समझते ही हैं न!
बहरहाल, मैं तो सरकार पर केवल 'तरस' खाने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकता। भ्रष्टाचार पर अण्णा आंदोलन करें या महंगाई-एफडीआई पर विपक्ष हंगामा, मेरे तो सरोकार रुपइए से जुडे हैं प्यारे। सरकार रुपइए की इज्जत की खातिर अवश्य कुछ करे। रुपइए का लुढ़कना थमेगा, तभी मंदी को थामने का रास्ता निकलेगा। वरना तो जय हो प्यारे!

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