सोमवार, 26 दिसंबर 2011

अब तो रहम करो!

प्यारे सेंसेक्स, यह तुम्हें क्या हो गया है? और, क्यों हो गया है? इसे नहीं होना चाहिए। यह होता है, तो दिल में तकलीफ होती है। बेकार-बेकार से विचार मन में आते हैं। मेरे दिन के चैन और रात की नींद को स्थगित कर जाते हैं। तुम्हारा लगातार लुढ़कते रहना अब असहनीय-सा होता जा रहा है। तुम पर से विश्वास डगमगाने-सा लगा है। कभी मेरी आंख के तारे रहे तुम, अब आंख की करकिरी-सी बनते जा रहे हो। तुम्हारे प्रति मेरा जी इस किस कदर खट्टा-सा हो गया है, तुम्हें क्या मालूम! अब तो मन करता है कि तुम्हें तल्लाक ही दे दूं। अपने हर रिश्ते, हर बंधन को तुमसे अलग कर लूं। तुमसे दूर, इत्ती दूर जाकर रहूं कि तुम्हारा बिम्ब-प्रतिबिम्ब भी मुझ तक न पहुंच सके।

देखो प्यारे, मेरे कटू शब्दों का बुरा कतई न मानना क्योंकि तकलीफ में ही दिल से इस तरह की उन्मुक्त बददुआएं निकलती हैं। तुम अच्छी तरह से जानते हो मेरे नेचर को तुम्हारे प्रति लेकिन फिर भी हमारी दोस्ती को ताक पर रखते हुए, दर्द पर दर्द दिए चले जा रहे हो। कभी तीन सौ अंक खिसक लेते हो, तो कभी पांच सौ अंक। तुम्हारी इस खिसका-खिसकाई में अपनी तो दिल के साथ-साथ रकम भी खिसकते-खिसकते अंतिम छोर तलक जा पहुंची है। बीवी ताने देती है सो अलग। मोहल्ले वाले दीवाना समझ दुत्कारते हैं वो अलग। कहते हैं, यूंही सेंसेक्स के चक्कर में पड़े रहोगे, तो एक दिन दुनिया से ही खिसक लोगे! बताओ, कित्ती-कित्ती सुननी पड़ रही हैं प्यारे तुम्हारी खातिर मगर तुम पता नहीं किस गम में खुद को देवदास बनाए हुए हो?
तुम्हारे यूं लुढ़कते रहने पर अर्थव्यवस्था की बाट लगी हुई है। ससुरा रुपइया भी तुम्हारे नक्शे-कदम पर चल रहा है। औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े अलग परेशान किए हुए हैं। विकास दर में दरार आ चुकी है। महंगाई डायन भी कोई कम सितम नहीं ढाह रही है। पारा हर रोज नई गिरावट दर्ज करवा रहा है। आलम यह है कि जिधर निगाह डालो, उधर कुछ न कुछ खिसक-लुढ़क या फिर गिर रहा है। कभी-कभी महसूस-सा होता है कि हम लोकतांत्रिक नहीं बल्कि लुढ़काऊ देश में रह रहे हैं। मुझे डर है कि कहीं हम पर 'लुढ़कने में रिकार्ड' बनाने का ठप्पा न लग जाए!
मैं यह बात अच्छी तरह से जानता हूं कि संवेदनाएं तुम्हारे भीतर भी हैं। चोट तुम्हें भी पहुंचती है। आत्मा तुम्हारी भी दुखती है। समय-असमय इलाज की जरूरत तुम्हें भी होती है। लेकिन वक्त की नजाकत को समझते-जानते हुए तुम्हें अपनी संवेदना को काबू में रखना चाहिए। गुस्से के साथ-साथ समय-समय पर मुस्कुराते भी रहना चाहिए। एक अच्छी जिंदगी को जीने और अर्थव्यवस्था को गुलाबी बनाए रखने के वास्ते ये संवेदनशीलता बेहद जरूरी है।

यह बात तुम बेहतर जानते हो कि यहां कित्ते ही लोगों के हित तुमसे जुड़े हुए हैं। देश की अर्थव्यवस्था के सरोकार तुमसे कायम हैं। सिर्फ तुम्हारे ही कारण अब हम एक विकसित देश हैं। अपनी पिछली तेजी में तुमने इस देश की आर्थिक विकास दर को कहां से कहां पहुंचा दिया था। तब हर चेहर खिला और गुलाबी रंगत लिए हुआ था। मगर पता नहीं किस मुए की काली नजर लग गई तुमको कि तुम ऐसे धराशाही हुए जो अब तलक न संभल पाए हो। तुम्हारी गिरावट की जद में फंसकर कित्ते ही हमारा साथ छोड़ गए हैं, कोई हिसाब नहीं।

तुम्हारी सेहत की रिकवरी की खातिर अब मेरे कने बस एक ही उपाय बचा है कि कुछ हवन-यज्ञ करवाया जाए। दलाल पथ के साथ-साथ प्रत्येक आर्थिक क्षेत्र का शुद्धिकरण किया जाए। हो सकता है वहां कोई बुरी आत्मा अपने नाखून गढ़ाए बैठी हो! कहते है, जब डॉक्टरी इलाज से बात न बने तो कभी-कभार टोने-टोटके से भी काम चला लेना चाहिए। केवल तुम्हारी खातिर मैं अपनी अंधविश्वास-विरोधी आदत को बदलने को तैयार हूं। परंतु शर्त इत्ती है कि बदलना तुम्हें भी पड़ेगा प्यारे सेंसेक्स। तुम बदलोगे, तो बहुत कुछ बदलेगा। तुम सुधरोगे, तो बहुत कुछ सुधरेगा। एक मेरा लिए ही नहीं देश के आर्थिक विकास के वास्ते भी तुम्हारा चुस्त-दुरूस्त होना बेहद जरूरी है।

तो हे प्यारे सेंसेक्स महाराज! अब तो रहम करो। लुढ़कना बंद करो। साथ ही रुपइए को भी समझाओ कि वो भी अपने बर्ताव में सुधर लाए। दोनों मिल-जुलकर शातिर डॉलर का मुकाबला करो। बस हौसला रखो। जीत तुम्हारी ही होगी। हां, जज्बात में आकर अगर मैंने कुछ अल्लम-बल्लम कह दिया हो तो दिल पर मत लेना प्यारे सेंसेक्स! दोस्ती-यारी के बीच कभी-कभी ऐसी झिड़कियां जरूरत होती हैं। समझे।

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