सोमवार, 26 दिसंबर 2011

कोलावेरी के बहाने

मैं तहे-दिल से प्यारे धनुष को शुक्रिया कहना चाहता हूं कि उन्होंने हमें कोलावेरी जैसा अद्भूत सांग दिया। आजकल हर कहीं बस कोलावेरी कोलावेरी सांग ही छाया हुआ है। यूथ की खास पसंद है यह सांग। इस सांग पर वो भी फिदा हैं, जो खुद को बेहद परंपरावादी कहते-बताते हैं। लेकिन इस सांग के बजते ही उनका परंपरावाद क्षणभर में ध्वस्त हो जाता है। यह अच्छी बात है कि वे समय के संग-साथ चलने की कोशिश कर रहे हैं।

कोलावेरी ने हमारे बीच भाषा और तुक्कात्मकता का नायाब विमर्श प्रस्तुत किया है। और, संदेश के रूप में यह बताया है कि सूप ब्वॉज का प्यार में विफल हो जाने का मतलब अब जिंदगी का अंत नहीं होता। उस फिलिंग के मोशन को इस सूप सॉग के जरिए निपटाया जा सकता है। लद गए वो जमाने जब प्यार में हुए ब्रेकअप शराब के पानी में गर्त हुआ करते थे, अब ये हिसाब-किताब कोलावेरी से तय होते हैं। मतलब ये कि यह गीत असफल प्रेमी को देवदास होने-बनने से साफ बचाता है। शायद यही वजह है कि हमारे आसपास, यहां तक कि फिल्मों में भी, देवदास अब कम ही नजर आते हैं।

कोलावेरी हमारे समय का यर्थाथ है। एक ऐसा कातिलाना गुस्सा है, जिसे अभिव्यक्त करने के वास्ते हमारी भाषा रेज में ढलकर कभी हिंदी, कभी अंग्रेजी तो कभी तमिल में भी बदल जाती है। कोलावेरी के असर को हम प्यार के साथ-साथ देश की राजनीति, भ्रष्टाचार, घपले-घोटालों या फिर आपसी तू तू, मैं मैं में भी साफ देख व महसूस कर सकते हैं। सोशल नेटवर्किंग साइटस पर तो कोलावेरी आम है। लेकिन, सुना है कि अब सरकार ने भी सोशल नेटवर्किंग साइटस के खिलाफ कोलावेरी कोलावेरी कहना-बोलना शुरू कर दिया है। उसे सख्त कानून के दायरे में लाया जा रहा है।

जो हो, कोलावेरी के असली अर्थ और मकसद को साइड में रखते हुए, यूथ को यह संग इत्ता भा रहा है कि उनके दिल लगाने और बहलाने का यह दिलकश माध्यम-सा बन गया है। एक करोड़ से कहीं ज्यादा के हिट का सम्मान पा चुका है कोलावेरी। बस, इसकी टिंग्लिश-सी खूबसूरत भाषा पर ज्यादा दिमाग मत खर्च कीजिए। क्योंकि इस गाने के बोल, तमिल और अंग्रेजी के होते हुए भी, बेहद सहज हैं। आसानी से गाए व गुनगुनाए जा सकते हैं। फिर आज की बिजी लाइफ में किसके कने इत्ती फुर्सत है कि वो भाषा की सहजता-असहजता पर दिमाग खोटी करे। जो जुबान पर आसानी से चढ़ जाए बस वही हिट है। हिट होने का सीधा सा फंडा है, खुद को आज के वक्त में ढाल लीजिए।

बाजार ने कोलावेरी पर सबसे पहले हाथ मारा। बाजार जानता है कि किसे बेचने से लाभ को भुनाया जा सकता है। फिर चाहे वो सांग हो या बीना मलिक। बाजार की जद में एक बारी जो आ गया, समझो कि मास पर छा गया। असर देखिए, जिन्हें कोलावेरी का अर्थ तलक सही से नहीं मालूम वे भी इस सूप सांग के दीवाने से बने हुए हैं। और तो और, कोलावेरी ने तो ऊ ला ला की मादकता के असर को भी कम-सा कर दिया है।

कह सकते हैं कि कोलावेरी हमारी बोरियत को खत्म करने का एक बेहतरीन सांग है। न भाषा का बोझ, न शब्दों की गंभीरता, न अर्थ का झंझट सबकुछ बहुत आसान और सहज। सीधे जुबान पर तैरने वाला सांग। इसके अलावा और चाहिए भी क्या यूथ को प्यारे!
बस, धनुष को धन्यवाद कहें और साथ में यह भी ध्यान रखें कि बी डॉन्ट हैव च्वाइस, सो दिस कोलावेरी..कोलावेरी डी।

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