बुधवार, 28 दिसंबर 2011

भ्रष्ट का पत्र अण्णा के नाम

तरह-तरह के आरोप-प्रत्यारोप से उक्ताकर एक भ्रष्ट ने अण्णा हजारे को 'उन्मुक्त पत्र' लिखा है। यह पत्र ज्यों का त्यों आपके समक्ष प्रस्तुत है।
सियाने अण्णा,असल में, इस 'उन्मुक्त पत्र' को लिखने की आवश्यकता केवल इसलिए आन पड़ी क्योंकि पानी अब सर से ऊपर बहने लगा है। बहते पानी में हाथ धोने का सिलसिला थम ही नहीं रहा। जिसे देखो वो खुद पर ईमानदारी का ठप्पा लगाए मुझे गरियाये चला जा रहा है। ताज्जुब इस बात पर अधिक है कि कल तलक बेईमानी की रोटी खाने-खिलाने वाले भी मुझे और भ्रष्टाचार को यूं जुतिया रहे हैं, मानो स्वच्छ चरित्र के एक अकेले बादशाह केवल वही हों! ऊपर से आप उन्हें गलत-सलत नसीहतें दे रहे हैं कि बेटा भ्रष्ट और भ्रष्टाचार से नफरत और सिर्फ मुझसे व मेरी टीम से प्यार करो। वाह! समाज और राजनीति के बीच घुसपैठ करने का यह बढ़िया तरीका चुना है आपने।

अण्णा, जिन रास्तों पर आप चल-फिर रहे हैं, ये रास्ते आपके ताईं ठीक नहीं हैं। दरअसल, ये चोर रास्ते हैं। दूसरे के हक को मारकर अपना उल्लू सीधा करना, न तो श्रेष्ठ इंसानियत की निशानी है न ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह उचित है। कायदा यह कहता है कि मिल-बांट कर खाओ। मिल-बांटकर खाने में ही स्वस्थ समाज का हित है। लेकिन नहीं..आपने तो भ्रष्ट और भ्रष्टाचार का खात्मा करने की ठान रखी है। अपनी ठान को सिद्ध करने के वास्ते आप कभी दिल्ली में नौटंकी शुरू कर देते हो तो कभी बंबई में। और अल्टीमेटम भी देते हो कि अगर सरकार ने बात नहीं मानी तो मैं राहुल और सोनिया गांधी के घर पर धरना दूंगा। वहां से नहीं हटूंगा। आखिरी दम तलक यूंही लड़ता-झगड़ता रहूंगा। मजबूत जनलोकपाल बिल ही मेरा असली मकसद है।

यार, समझ नहीं आता कि आप खामाखां इत्ती टेंसन क्यों ले रहे हो? कुछ नहीं तो अपनी सेहत का ही ख्याल करो। सेहत से बढ़कर थोड़े ही है जनलोकपाल बिल! जब भी आप आंदोलन सरीखी नौटंकी करने में जुट जाते हो, मुझे व्यक्तिगत तौर पर आपकी सेहत की चिंता होने लगती है। हालांकि मैं जानता हूं कि आपने कभी मुझसे मेरी सेहत के बारे में कुछ नहीं पूछा लेकिन मैं इंसानी फर्ज को निभाना बाखूबी जानता-समझता हूं। क्या हुआ जो मैं भ्रष्ट हूं परंतु कठोर-दिल नहीं!
मैं फिर कह रहा हूं कि एक अकेले जनलोकपाल बिल के बन जाने से हम भ्रष्टन का कुछ होने-हवाने वाला नहीं! हमारी जड़ें बहुत गहरी हैं। हमारे हाथ बहुत लंबे हैं। जहां तलक रवि और कवि पहुंचने की केवल 'शाब्दिक कल्पना' ही कर पाते हैं, हम वहां तलक 'बे-कल्पना' ही पहुंच जाते हैं। भ्रष्ट या भ्रष्टाचार को मिटाना इत्ता आसान थोड़े ही है, जित्ता की आप समझते हैं! हमें मिटाने की अब तलक जित्तो ने कोशिश की बेचारे खुद ही मिट लिए। इसलिए मैं फिर कह रहा हूं कि हमें बेहद सहजता और सरलता के साथ लें। खामोशी से हमें अपना काम करने दें और आप रालेगण सिद्धि में चैन की बंसी बजाएं। क्या हरज है?
साथ ही यह भी सुन लें कि भ्रष्ट कभी किसी को बरगलाता नहीं, जिस तरह आप और आपके सहयोगी कर रहे हैं। क्या ऐसे बरगलाने से मजबूत जनलोकपाल बन जाएगा? सड़क पर हाय-तौबा मचाने और मंच से मैं भी अण्णा, तू भी अण्णा चीखने-चिल्लाने से सब अण्णा हो जाएंगे? या अण्णा टोपी पहन लेने से ईमानदार हो जाएंगे? और अगर सब ईमानदार हो भी गए तो इत्ते ईमानदारों की ईमानदारी को कहां-कहां खपाएंगे? क्या ईमानदारों के माथे पर लिखा होगा कि मैं ईमानदार हूं। मान्यवर, दाल में ज्यादा नमक दाल को कढ़वा ही करता है। स्वस्थ व्यवस्था के वास्ते भ्रष्ट और ईमानदार का रेशो बराबर होना बेहद जरूरी है, समझे।

अण्णा, आपसे गुजारिश है कि यह अनशन-आंदोलन की नौटंकियों को बंदकर, संसद का सम्मान करते हुए, अपनी सेहत की फिकर करें। हमारा देश बहुत जोर का चल रहा है। सरकार हमारी प्रगतिशील है। व्यवस्था हमारी लचीली है। अर्थव्यवस्था हमारी गुलाबी है। जनता हमारी बेहद काबिल है। बुद्धिजीवि अपने में मस्त हैं। जनवादी अपने जनवाद में व्यस्त हैं। गरीब सस्ते अनाज का सुख भोग रहा है। संचार-क्रांति अपने बूम पर है। कुछ भ्रष्ट जेल का मजा ले रहे हैं, तो कुछ बाहर आकर चैन की सांस। और हां, विधानसभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है। बस, थोड़े ही दिनों में नेता मतदाता के घर पर होंगे। आगे अभी बहुत प्रकार की नौटंकियां देखना शेष है, इसलिए आप जनलोकपाल की जिद को छोड़कर दूसरों को भी नौटंकी करने का मौका दें।

आपका परम-हितैषी
एक भ्रष्ट

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