सोमवार, 26 दिसंबर 2011

भारत रत्न से कम कुछ नहीं!

प्यारे, अब बस टंकी पर चढ़ना बाकी है। बहुत सहन कर लिया। हर तरह से कह और लिखकर देख लिया। लेकिन अब और नहीं। सरकार ऐसे सुने-मानेगी भी नहीं। अब मुझे वीरू की राह पर ही चलना होगा। कब से गुहार लगा रहा हूं कि भारत रत्न मुझे भी चाहिए। मेरा भी भारत रत्न पर उत्ता ही हक बनता है, जित्ता कि सचिन तेंदूलकर का! अगर सचिन महान बल्लेबाज है, तो मैं भी उससे कम थोड़े ही हूं! महानता का पुट मेरे अंदर भी है। मैं भी किसी महान लेखक से कम नहीं। दुनिया अगर सचिन की दीवानी है, तो मेरी भी है! जब सचिन को भारत रत्न देने के वास्ते नियम-कानून में बदलाव हो सकता है, तो फिर मेरे वास्ते क्यों नहीं?
मैंने इस दफा पक्के मन से ठान ली है कि भारत रत्न लेकर ही दम लूंगा। चाहे कैसे भी जुगाड़ करनी या करवानी पड़े। संसद के भीतर इस मुद्दे को उठवाऊंगा। अगर वहां बात नहीं बनी तो सड़क पर आऊंगा। फिलहाल, कोशिश में लगा हूं अण्णा हजारे से संपर्क साधने की। अगर वे इस मुद्दे पर मेरे साथ आ जाते हैं, तो फिर देखना भारत रत्न मुझे ही मिलेगा! क्योंकि सरकार आजकल केवल अण्णा हजारे से ही डरती है। यही सही मौका है प्यारे, अण्णा के बहाने, सरकार के डर को झट से भुना लेने का।

और हां आप लोग ये मत समझना कि मैं पुरस्कार का भूखा हूं! पुरस्कार पाने के लिए इस-उस की जी-हुजूरी करता हूं!.. .. ऐसा कतई नहीं है। मेरे अंदर पुरस्कार को लेकर कोई भूख या तमन्ना नहीं है। अब तलक मैं खुद नहीं जानता कि कित्ते किस्म के पुरस्कार-सम्मान ठुकरा चुका हूं। मेरा स्पष्ट मानना है कि पुरस्कार लेना किसी लोचे से कम नहीं है। पहले पुरस्कार लो और बाद में इस-उस के ताने सुनो। दरअसल, भारत रत्न लेने की जिद तो मैंने केवल इसीलिए पाल रखी है क्योंकि इसमें सचिन तेंदुलकर का नाम आया है। जब सचिन को भारत रत्न देने की जुगाड़ फिट हो सकती है, तो फिर मुझे क्यों नहीं? बस, इसी एक बात पर मेरा भत्था भन्नाया हुआ है। अगर ये सम्मान मेजर ध्यानचंद या मिर्जा गालिब को दिया जाता, तो मैं बिल्कुल बीच में नहीं पड़ता। मगर सचिन को भारत रत्न देने की बात जहां आएगी, मैं ऐसे ही बीच में टांग घुसेडूंगा।

असल में, मैं इस बात का स्वाद लेकर देखना चाहता हूं कि जब लेखक सीधे सरकार से खुद को पुरस्कार देने की गुहार लगाए, तब सरकार का क्या रिएक्शन होता है? समाज क्या कहता है? लेखक बिरादरी क्या कहती है? सगे-संबंधी क्या कहते हैं? वैसे भी इत्ते बड़े पुरस्कार के ताईं सीधे अपने मुंह से दावेदारी ठोंकना हर किसी के बस की बात नहीं है प्यारे! वो तो मैं हूं जो यह कर पा रहा हूं, वरना यहां लफ्फबाजों की कमी कहां है। और फिर किसी के कंधे पर रखकर बंदूक चलाने से क्या हासिल? खुद चलाओ और खुद झेलो, इसका लुत्फ ही कुछ और है।

खैर, भारत रत्न तो मुझको चाहिए ही चाहिए। नहीं मिला तो किस टंकी पर चढ़ना है यह भी मैने देख ली है। लेकिन अपनी सहुलियत के हिसाब से। उत्ती ऊंची भी नहीं है, जिस पर वीरू चढ़ा था। उसे तो टंकी पर चढ़कर बसंती का प्यार मिल गया, देखते हैं मुझे भारत रत्न मिलता है कि नहीं? फिलहाल, लगा हुआ हूं।

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