शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

अच्छा तो अलविदा 2011...

प्यारे साल 2011,
तुम्हें कोई याद रखे न रखे परंतु मैं हमेशा याद रखूंगा। कोशिश करूंगा कि इतिहास में तुम्हारा उल्लेख स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करवा सकूं। यह मैं तुमसे इसलिए कह रहा हूं क्योंकि तुम महंगाई और जनलोकपाल बिल जैसे प्रमुख मुद्दों के गवाह रहे हो। हालांकि और भी कई मुद्दे सालभर हवा में तैरते रहे लेकिन इन दो मुद्दों ने तो हमें जीने और दिल लगाने का उत्तम बहाना ही दे दिया। असर देखो, हर आदमी के कने बात और बहस करने के ताईं बस दो ही मुद्दे रहे; महंगाई और जनलोकपाल बिल। अगला जब महंगाई का दुखड़ा रोते-रोते थक जाता है, तो जनलोकपाल बिल पर अपनी राय अपने हिसाब से देने लग जाता है। और यह बात तो तुम भली-भांति जानते ही हो कि हमारे यहां मुफ्त की राय देना और मुफ्त की चाय गटकना कोई नहीं छोड़ता। कभी-कभी तो सियाने लोग व्यक्ति के मरने तक पर राय देने के बहाने चाय की चुस्की मारना नहीं छोड़ते। क्या करें वे राय के हाथों मजबूर हैं!
खैर, छोड़ो। हमें क्या! उनकी राय, वे जानें। हम अपनी अनकही राय के साथ ही ठीक हैं।

तो प्यारे, मैं कह रहा था कि तुम सालभर महंगाई और जनलोकपाल बिल का रंग जमाए रहे। मुझे तो लगता है कि सरकार के मुख्य हितैषियों से एक तुम भी हो। बड़े ही खास अंदाज से उसकी नीतियों का पालन करते हो। महंगाई बढ़ती है तो ताली बजाते हो, जनलोकपाल बिल लटकता है तो ढोल बजाते हो। लेकिन फिर भी हमारा आम आदमी प्रसन्न है। उसकी बला से महंगाई बढ़े या जनलोकपाल बिल टले, उसे तो कुछ मिलने से रहा। क्या करे उसकी तकदीर में छेद की इत्ते किस्म के हैं कि वो न महंगाई के घटने से कम हो सकते हैं न जनलोकपाल बिल के लागू होने से। वो बेचारा तो कभी खाद्य सुरक्षा की खुशबू सूंघ लेता है, तो कभी मनरेगा का राग सुन लेता है। जैसा वो साल के शुरू में था, ठीक वैसा ही साल के अंत में दिखाई देता है।

अरे हां तुमने अण्णा हजारे के रूप में हमें साल का हीरो भी तो दिया है। और तो और टाइम मैगजीन ने भी उनका लोहा मान उन्हें कवर पेज पर लिया है। लेकिन यह भी सुन लो यह लोहा इस भीषण ठंड में सिकुड़ गया है इसीलिए अनशन करने दिल्ली न आकर रालेगण सिद्धि चला गया है। वाहजी.. वाह.. यहां जनता ठंड में संघर्ष करे और आप वहां खुशनुमा मौसम का मजा लें। तिस पर भी जिद यह है कि दूसरा गांधी अण्णा को ही माना जाए। कोई नहीं, हमारे गांधी बाबा मंगल पर बैठे सब देख रहे हैं। दूध का दूध, पानी का पानी सब हिसाब-किताब यहीं होना है।

तो प्यारे 2011, तुम्हें अलविदा कहने का वक्त अब आ गया है। मगर अलविदा कहने से पहले मैं तुम्हारा इस मायने में भी शुक्रगुजार रहूंगा कि तुमने हमें मुन्नी, शीला, जलेबी बाई, रजिया, राखी, विद्या, वीना, सन्नी लियोन और अब चिकनी चमेली जैसी मस्त हसीनाएं मौलिक चिंतन, बेतरतीब बहस और अनलिमिटेड मनोरंजन करने के वास्ते दीं। इन सबोने हमारी समस्त चिंताओं-समस्याओं को बाखूबी दूर किया। दिल के खुश रखने को इनका ख्याल सालभर हमें लरजाए रहा। साथ ही साथ शुक्रिया इनका भी।

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