मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

साल 2011 भ्रष्टाचार के नाम

मेरे विचार में साल 2011 को भ्रष्टाचारी वर्ष घोषित किया जाना चाहिए। क्योंकि, इस साल सबसे अधिक बोलबाला भ्रष्टाचार का ही रहा है। हर किसी ने अपने हिसाब से भ्रष्टाचार के बहाने खुद को भुनाया है। भ्रष्टाचार को गरियाने की खातिर संसद से लेकर सड़क तक खूब हो-हंगामा हुआ है। भ्रष्टाचार से लड़ने की खातिर एक तरफ बाबा रामदेव रामलीला मैदान में डटे तो दूसरी तरफ अण्णा हजारे जेपी मैदान पर। श्री श्री रवि शंकर भी मौके की नजाकत को देख चौका मारने से नहीं चूके। सरकार अपने चरित्र को पवित्र बताती रही और विपक्ष सरकार के चरित्र-हनन में लगा रहा। मीडिया ने भी बहती गंगा में हाथ धोने से परहेज नहीं किया। अपनी-अपनी टीआरपीओं की खातिर उसने भ्रष्टाचार पर कित्ते जुलम किए, क्या बताएं? भ्रष्टाचार की छवि को इस तरह से पेश किया गया कि मानो सबसे बड़ा खलनायक वही है।

बावजूद हर तरह के जुलो-सितम के भ्रष्टाचार भी अपनी जगह पर डटा रहा। न किसी के कहे की चिंता की न किसी के आंदोलन-सत्याग्रह की। पूरे साल अकेले ही हर किसी से लोहा लेता रहा। लुत्फ देखिए, भ्रष्टाचार को जित्ता गरियाया गया उत्ता ही वो भिन्न-भिन्न रूपों में निखरकर सामने आता रहा। इस सुविधा का लाभ पाकर कभी चपरासी करोड़पति बन गया, तो कभी भिखारी अरबपति।

संसद में नोट उछले। हंगामा हुआ। टूजी पर जमकर तनातनी हुई। सजाएं हुईं। जाने-पहचाने चेहरे बेनाकाब हुए। लेकिन नतीजा क्या निकला? ढाक के वही तीन पात। एक-एक कर सबको जमानतें मिलती गईं और भ्रष्टाचार अपने दबदबे पर मस्त मुस्कुराता रहा। हां, मुस्कुरा वो अब भी रहा है लेकिन हमारी बेचारगियों को देखकर। भ्रष्टाचार के आगे बेचारा तो हमें अण्णा समुदाय ने बनाया है। प्यारे समाज और राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार से लड़ने तो चले हैं किंतु अपनी टीम के भ्रष्टाचार से अभी तलक नहीं निपट पाए हैं। उन्हें शौक तो बड़ा है दूसरों के घरों पर पत्थर फेंकने का लेकिन अपने घर से शुरूआत करने से डरते हैं। वाह जनाब! क्या कमाल की भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम है आपकी। दूसरों को डांटो और अपनों को बांटो!
खैर, भ्रष्टाचार ऐसे सियासतदां अण्णाओं की परवाह नहीं करता। वो केवल अपने काम से मतलब रखता है। न किसी का कुछ ले रहा है न किसी से कुछ कह रहा है। आप भरते-भरवाते रहिए भ्रष्टाचार के खिलाफ हुंकारें लेकिन उसकी सेहत पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं। क्योंकि वो किसी से नहीं डरता। जाड़ा-गर्मी-बरसात हर मौसम में अपने मिजाज के मुताबिक मस्त रहता है। न अधूरी क्रांति में विश्वास करता है न छद्म प्रगतिशीलता में। अब उसके बहाने जिसे जिस तरह की लफ्फबाजी करनी हो, वो करे।

हालांकि मैं यह बात अच्छी तरह से जानता हूं कि भ्रष्टाचार खुद कभी कोई क्रेडिट लेने का प्रयास नहीं करता। लेकिन फिर भी, नैतिकता की खातिर, हमें भ्रष्टाचार को साल 2011 का सबसे हिट आइटम घोषित करना चाहिए। मेरा दावा है, मुन्नी, शीला, जलेबी बाई, रजिया, राखी, विद्या, वीना और चिकनी चमेली से कहीं ज्यादा हिट भ्रष्टाचार ने ही बटोरे होंगे। जय हो भ्रष्टाचार की।

1 टिप्पणी:

Arbind Jha ने कहा…

agar ise baach kisi ka fieda huwa kisi ka toe wo hai Media Uska TRP bahut badha... Jai ho brastachariyo ki... Acha aalekh hai sir