रविवार, 27 नवंबर 2011

डर्टी पिक्चर के बहाने

हालांकि डर्टी पिक्चर को अभी आने में वक्त है, परंतु किस्म-किस्म की चर्चाओं की गर्म हवाएं बहने लगी हैं। चूंकि पिक्चर का नाम डर्टी है, तो जाहिर है हमें अपनी भारतीय सभ्यता-संस्कृति की याद तो अवश्य आएगी ही। इस बहाने विरोध-प्रदर्शन अभी तो नहीं हुए हैं, लेकिन अगर हो भी जाएं, तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। अक्सर, पिक्चर को हिट कराने-बनाने में ये कारक बेहद काम आते हैं। इस बात का इतिहास गवाह है।

डर्टी पिक्चर पर अभी तलक हुई खुसुर-पुसुर में सुनाई यही दिया है पिक्चर गंदी है। गाने गंदी हैं। डांस गंदा है। अदाएं गंदी हैं। विद्या बालन के वस्त्र गंदे हैं। संवाद गंदे हैं। साथ ही ज्ञानियों ने यह भी बताया है कि पिक्चर में चुम्मा-चाटी भी अधिक है। मतलब यह कि पिक्चर मां-बहन-बेटी-बीवी के साथ देखने की नहीं, केवल अकेले ही देखने की है। गौरतलब है कि पिक्चर को अकेले ही देखना पसंद करने वालों की संख्या अधिक है, ऐसा भरोसेमंद सूत्र बताते हैं। बताइए, इत्ते दिन हो गए हमें इक्कीसवीं सदी कदम रखे हुए लेकिन गंदी पिक्चरों को अब भी हम अकेले में ही देखने को अभिशप्त हैं। जबकि गंदी पिक्चरों में गंदा कुछ नहीं होता, यह केवल हमारी आंखों का भ्रम है।

अरे, हमको तो दिल खोलकर तारीफ करनी चाहिए विद्या बालन और एकता कपूर की कि उन्होंने हमें सॉफ्ट पॉर्न के दर्शन कराए। और, वो भी हिंदी फिल्म में। वरना, हिंदी फिल्मों में इत्ती सारी उन्मुक्तताएं भला कहां देखने को मिलती हैं? जो देखने को मिलती भी हैं, उनमें रस कम होता है। जबकि डर्टी पिक्चर में मादकता व उन्मुक्तता का हर रस मौजूद है। इसी रस ने विद्या बालन को पिक्चर में इत्ता रसीली बनाया है। यह पिक्चर की कामयाबी का अग्रिम द्योतक है। खुद में मौजूद रस को कला के बहाने निकालने का हुनर कलाकार को आना भी चाहिए। शुक्रिया! विद्या बालन कि तुमने यह कर दिखाया।

देखो जी, पेड़-पत्तों के पीछे नाचने-गाने और कुछ न दिखाने का दौर गुजर चुका है। अब दौर सबकुछ खुलकर दिखाने व बताने का है। यह नए तरह और तरीके का सिनेमा है। यहां देल्ही-बेली और डर्टी पिक्चर जैसी फिल्में ही चल सकती हैं। फिल्म में मस्ती का तड़का लगाने के लिए एक आइटम सांग का होना बेहद जरूरी है। आइटम में आप जित्ता चाहे मुन्नी को बदनाम कीजिए, शीला की जवानी देखिए, जलेबी बाई के जलबों पर निगाहें गाड़े रहिए, रजिया का गुंडों के बीच फंसने का आनंद लीजिए, छम्मकछल्लो या कट्टो गिलहरी का कमर-हिलाऊ डांस देखिए, यहां किसी प्रकार की कोई रोक-टोक नहीं है। सब अपनी-अपनी मस्ती में मस्त हैं। और, सबके कने एक ही जवाब है, जब दिखाने वाले को कोई एतराज नहीं, तो फिर देखने वालों को क्यों हो? फिल्मी समाज में आदर्श ऐसे ही स्थापित किए जाते हैं।

इसलिए कहता हूं कि डर्टी पिक्चर में गंदा या अश्लील कुछ नहीं है, सबकुछ साफ-सुथरा और यूथ की डिमांड के मुताबिक है। आप तो प्यारे बस ऊ ला ला की मस्त पंक्तियों पर थिरकते रहिए और विद्या बालन के सरकते-उघड़ते पल्लू के मोहपाश में बंधे रहिए। क्योंकि जीवन के परम आनंद को मस्ती के साथ भोगने का इससे उत्तम साधन कोई और नहीं हो सकता। कम से कम अब हमें बदलते समय के साथ चलना व देखना सीख लेना चाहिए।

सच्ची कहूं मेरा मन तो डर्टी पिक्चर के कमोत्तेजक प्रोमो देखने के बाद से ही बेहद मचला हुआ है। विद्या बालन को खुले अंदाज में देखने की तमन्ना अब दबाए नहीं दब पा रही। पिक्चर के ताईं एक-एक दिन कैसे कट रहे हैं, इसे मुझसे बेहतर तो एकता कपूर भी नहीं जान-समझ सकतीं। मैं अपना दिल हर उस चीज के साथ बहलाना पसंद करता हूं, जहां से मुझे ऊर्जा मिल सके। और, डर्टी पिक्चर में ऐसी ऊर्जा की तमाम संभावनाएं मौजूद हैं प्यारे। मेरे विचार में बॉलीवुड के प्रत्येक डाइरेक्टर को ऐसी ऊर्जावान फिल्में निरंतर बनाते रहना चाहिए। ताकि हर किसी को अपनी-अपनी ऊर्जा की क्षमता का एहसास हो सके। यह जरूरी भी है।

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