बुधवार, 16 नवंबर 2011

मेरा खटिया चिंतन

दुनिया भर के लेखकों का तो नहीं पाता, लेकिन मैंने अपना आधे से अधिक चिंतन खटिया पर बैठकर ही किया है। खटिया पर चिंतन का अपना ही मजा है प्यारे। खटिया पर चिंतन के दौरान ऐसा लगता ही नहीं कि हम कुछ गंभीर किस्म का काम कर रहे हैं। हर पल यह एहसास दिल को बहलाए रखता है कि हम खटिया पर हैं और चिंतन खुद--खुद हो रहा है। दरअसल, खुद--खुद होने वाला चिंतन बड़ा ही मस्त होता है। तमाम वैचारिक चिंताओं से मुक्त, इधर-उधर की दिलकश उन्मुक्तताओं में अधिक व्यस्त रहता है। मैं शुरू से ऐसे ही चिंतन का हिमायती रहा हूं। दिमाग पर बना जोर डाले, चिंतन और दिल को बहकाते रहने में मुझे ज्यादा आनंद आता है। और, यह आनंद आपको बिना खटिया चिंतन के कभी नहीं मिल सकता।

हो सकता है मेरा खटिया चिंतन आपको मेरी सनकपन की निशानी लगे पर कोई नहीं, मुझे ऐसा लगने में एतराज भी नहीं है। देखिए, जिसका चिंतन खटिया पर होगा, उसका थोड़ा-बहुत सनक जाना तो बनता है यार। यह कोई ज्यादा बड़ा मुद्दा नहीं। साफ बताऊं, मैं अपने चिंतन को बेहद कंट्रोल में रखता हूं। उसे न ज्यादा सर पर चढ़ाता हूं, न ही ज्यादा प्रगतिशील बनाने कोशिश करता हूं। क्योंकि इन दोनों में से अगर मैंने किसी एक को भी छूट दे दी, तो मेरा लेखन चौपट समझिए। चिंतन को उतना ही भाव देना चाहिए, जितना और जहां तक वो निभ सके। मैंने तो ऐसे-ऐसे चिंतन-स्वामी देखे हैं, जिन्होंने ताउम्र अपने चिंतन और विचार को गंभीर व प्रगतिशील बनाने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया। ऐसे चिंतन-स्वामियों ने लगता है अपना सारा चिंतन 'खटिया पर बैठकर' नहीं बल्कि 'पलंग पर रहकर' किया होगा। परंतु, गनीमत रही कि मैं अपने खटिया चिंतन की बदौलत बचा गया। यह बड़ी बात है।

वैसे, खटिया जितनी लाभप्रद चिंतन के लिए है, उतनी ही जाड़े के लिए भी। कहा भी गया है कि सरकाए लियो खटिया जाड़ा लगे...। मेरे विचार में जाड़े को दुरूस्त करने के लिए खटिया से बेहतरीन कोई दूसरा विकल्प नहीं हो सकता। खटिया जाड़े की तीव्रता को कम कर, गरमाहट की मात्रा को संतुलित रखती है। इससे दिल भी बहला रहता है और दिमाग भी। शहरों की तो खैर जाने दें, गांव में अब भी खटिया को ही जाड़े का मारक माना व समझा जाता है।

प्रायः मैं इस बात पर थोड़ा विचलित-सा हो जाता हूं कि अगर मेरे जीवन व चिंतन में खटिया नहीं रही होती, तो मैं कैसा होता? कैसा होता मेरे लेखन का मिजाज? कैसा होता मेरी वैचारिता का पैमाना? और, कैसे मैं केवल साधारण-सा इंसान बनकर रह पाता? हालांकि साधारण तो मैं अब भी हूं, बस नाम के साथ लेखक जुड़ गया है। लेकिन मैंने अपने लेखक होने को कभी अपने साधारण होने पर हावी नहीं होने दिया है। और, यह सब केवल और केवल मेरी प्यारी खटिया की वजह से ही है।
साधारण खटिया पर बैठकर साधारण चिंतन करके मैं अब भी साधारण लेखक ही हूं। इसका मुझे अतिरिक्त गर्व है।

मैं अपनी खटिया का आभारी हूं कि उसने मुझे लेखक बनाया। खटिया मेरी विरासत है। मेरी जान है। वक्त बदला तो मेरी खटिया भी बदल गई। अब खटिया की जगह कुर्सी, मेज और कंप्यूटर ने ले ली है। बावजूद इसके, मेरे चिंतन के फलसफे अब भी खटियायुक्त ही हैं। तनहाई में अपनी प्यारी खटिया की कमी मुझे अक्सर महसूस होती है, मगर दिल को इस बात से बहला लिया करता हूं कि खटिया तू न गई मेरे मन से। जय हो खटिया चिंतन की...!

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