मंगलवार, 11 अक्तूबर 2011

आओ! पुरस्कारों पर लड़ें

शुक्र है प्यारे कि अपन बच गए। ऐसे मामलों में बचना ही बेहतर। गर न बचो तो चर्चाओं की सजा को झेलो जिंदगीभर। यहां महान होना किसी सजा से कम थोड़े है! महान होकर उस पर पुरस्कार का बिल्ला चिपकना तो और भी बड़ी सजा है। इसीलिए अपन अब तलक न महान होने के चक्कर में पड़े हैं न ही पुरस्कारों के। इस बिन मांगी 'दया' से जित्ती दूरी भली, उत्ता ही ठीक। यह अपन का दावा है कि पुरस्कार पाकर अब तलक कोई भी लेखक या साहित्यकार एक पल चैन से नहीं जी सका है। विवाद या चर्चा का कोई न कोई फुंतरू उसके साथ चिपका ही रहता है। यानी कि पहले पुरस्कार के वास्ते जुगाड़ बैठाओ और फिर उस पर यहां-वहां सफाई देते फिरो। वाह! यह क्या सम्मान है प्यारे।

ज्ञानी कहते हैं कि पुरस्कार की गरीमा को बचाए-बनाए रखना चाहिए। लेकिन यह नहीं बताते कि कैसे...? जबकि पुरस्कार की गरीमा को मटियामेट करने में उन्हीं का खास योगदान रहता है। चूंकि वे खुद को ज्ञानी मानते-समझते हैं कि इस नाते पुरस्कार पर पहला हक अपना ही जताते हैं। कहते हैं, अगर ज्ञानियों को पुरस्कार नहीं मिला तो यह उनका अपमान होगा। एक तो अपने यहां अपमान का बड़ा लोचा है प्यारे। बात ही बात में कोई भी अपने को अपमानित-सा महसूस कर लेता है।

देख लो अपने यहां जिन दो महान साहित्यकारों को, संभावित होने के बावजूद, नोबेल न मिल सका, इस बात पर उनसे कहीं ज्यादा उनके चेलों ने खुद को अपमानित महसूस किया है। बकायदा कह-लिखकर वे अपने अपमान को जतला रहे हैं। कोई क्रांतिकारी कविता कहने में लगा है तो किसी ने कहानी पर काम शुरू कर दिया है। मतलब लेखन से ज्यादा प्यारा पुरस्कार है। पता नहीं पुरस्कारों को अपने शो केसों में सजाकर लेखकों-साहित्यकारों को क्या लुत्फ मिलता है!
प्यारे, यही सब देख-पढ़कर अपन ने पुरस्कारों की मुधशाला से खुद को दूर ही रखा हुआ है। न इसके कने जाओ न ही इसे मुंह लगाओ। बस दूर से बैठकर पुरस्कारों की बंदरबांट पर होनेवाले घमासान का मजा लो। इसी में सुख है। साथ ही यह भी ध्यान रखा कि बस लेखक बने रहो कभी कोशिश भी न करो बड़ा या महान साहित्यकार होने की। क्योंकि बड़ा या महान होने में सौ तरह के झंझट हैं। यहां अपन खुद को तो संभाल नहीं पाते, अपने बड़प्पन को क्या खाक संभाल पाएंगे। प्यारे, अपनी तो यह आदत है कि कानों में तेल डाले रहो और आंखों पर काला चश्मा चढ़ाए रहो, साहित्य की दुनिया में जो हो रहा है उसे न सुनो न ही देखो। केवल अपनी में मस्त रहो। जिन्हें नोबेल की जरूरत है, वे वहां जाकर अपनी नाक रगड़ें।

वैसे प्यारे अपन ने बड़े-बड़ों को पुरस्कार की आस में तड़पते देखा है। जिन ज्ञानियों ने ताउम्र पुरस्कार पर राजनीति का विरोध किया पर जब उन्हें मिलने की घोषण हुई तो सारा इरोध-विरोध गया हमाम में। पुरस्कार के दाम अंटी में दबते ही सारी प्रगतिशीलता चू-चू का मुरब्बा हो जाती है प्यारे। लुत्फ तो अपन को तब आता है, जब ज्ञानी अपने ही पुरस्कार को डिफाइन करते हैं। 'मैं इस लायक कहां था' को इत्ती खूबसूरती से अभिव्यक्त करते हैं कि मुंह में जो न आ जाए वो थोड़ा।

और फिर बिन बहस ही पुरस्कार दे दिए जाएं यह भी भला कहां संभव है। इस बहस में वो भी कूद पड़ते हैं, जिन्होंने पुरस्कार ले तो लिया है मगर उनके भीतर गर्दे-गुबार अभी बाकी है। जिस रूप में उनका गर्दे-गुबार सामने आता है, उसका तो कहना ही क्या। इस बहस में इत्ती कलमें टूटती हैं कि बस पूछो मत। कहीं न कहीं कलमों को भी शर्म जरूर आती होगी कि हाय! हम प्रगतिशील ज्ञानियों की कलम क्यों हुए।

साहित्य-वाहित्य से अगर टेक्नो-फ्रैंडली युवाओं का नाता टूट रहा है, तो प्यारे उसका एक कारण ये बेतुकी बहसें भी हैं। जो साहित्यिक ज्ञानी दूसरों को 'ये करो, ये न करो' का ज्ञान देते रहते हैं, जब खुद ही आपसी और पुरस्कार राजनीति में घुस आते हैं, तब साहित्य का दामन बदनाम हुए बिना नहीं रहता। अपन सच कह रहे हैं प्यारे फिर तो दिल करता है कि न साहित्य पर बात करो न ही उन साहित्यिक ज्ञानियों की शक्लों को देखो। बस, एक कोने में बैठकर चैन की बंसी बजाओ। न नौमन तेल होगा न राधा नाचेगी।

तो प्यारे, जिन्हें नोबेल के लिए या भारत रत्न के लिए लड़ना हो वे लड़ें अपन तो उनकी लड़ाई का लुत्फ ऐसे ही लेते रहेंगे। जय हो।