बुधवार, 28 सितंबर 2011

अपन भी उपवास करेंगे

सोच रहे हैं, वैसे ऐसा सोचने में जाता भी क्या है, कि एक उपवास अपन भी कर लें। मोदी जी का उपवास हिट हो ही लिया है, अपन का भी हो जाएगा। आखिर अपन भी मोदी जी से कोई कम मशहूर थोड़ ही हैं! जित्ता उन्हें लोग जानते हैं, उत्ता ही अपन को भी। बैठे-ठाले शोहरत को ले लेने में कोई बुराई भी नहीं है। आजकल जमाना ही कुछ ऐसा है प्यारे। जिसके भीतर हिट होने की कला है, समझिए वो कभी बीट हो ही नहीं सकता।

हालांकि अपन ने अभी यह डिसाइड नहीं किया है कि उपवास करना किस मुद्दे पर है मगर क्या फर्क पड़ता है! उपवास के लिए तो किसी और कैसे भी मुद्दे को पकड़ा जा सकता है। मतलब तो मुद्दे से हो चाहिए। और अपने देश में मुद्दों की कहां कोई कमी है। एक खोजो हजार मिलते हैं। अब देखा जाए तो मोदी जी के कने कोई मुद्दा थोड़े था, वो उपवास तो उन्होंने इस कारण रखा था ताकि सांप्रदायिक धब्बों को मिटा सकें। छवि को उजला बना सकें। लगे हाथ पार्टी को भी यह बता सकें कि दिल्ली की गद्दी पर बैठने की ताकत वे भी रखते हैं। मोदी जी कित्ते ताकतवर हैं, इसे अमेरिकी कांग्रेस की रिपोर्ट पहले ही बता चुकी है। यहां जिस बात, व्यक्ति और मुद्दे पर अमेरिकी ठप्पा लग गया समझिए अब से वो 'पवित्र' है।

अभी तलक तक तो अपन ने केवल बापू के उपवास के बारे में ही सुना-पढ़ा था। बेहद साधारण किस्म का उपवास किया करते थे बापू। उनके उपवास के न्यौते नहीं जाया करते थे खास-खास लोगों को। न ही उपवास के ताईं वो निश्चित दिन या समय रखा करते थे। परंतु वो तब के जमाने का उपवास था और यह आज के जमाने का उपवास है। तब बापू के उपवास को किसी इवेंट मैंनजमेंट ने मैनीज नहीं था, पर मोदी जी का उपवास पूर्णतः मैनीज था। हाई-फाई और हाई-टेक था। जाहिर-सी बात है, जब ऐसे उच्च किस्म के उपवास करने को मिलें तो भला कौन छोड़ना चाहेगा?
मोदी जी से प्रेरणा लेकर यही सोच रहे हैं कि मोहल्ले के नुक्कड़ पर अपन भी एक टेंट जमा लें। शहर के कुछ हाई-फाई लोगों को आमंत्रित कर लें। आर्शीवाद के वास्ते साधु-संतों को मंच पर बैठा लें। अब रही बात भीड़ के जुटान की तो वो जुट ही जाएगी। आखिर मामला उपवास का जो है। हो सकता है, उपवास का निर्णय आगे चलकर अपन के वास्ते कोई राजनीति सौगात ही ले आए। अपन को भी शहर या गांव से कोई इकिट-टिकट मिल जाए। सड़क से संघर्ष करते-करते संसद में ही न पहुंच जाएं। यहां सबकुछ संभव है, बस जुगाड़ को साधने की जुगाड़ आनी चाहिए आपको।

और फिर इस लेखन में धरा ही क्या। रोज--रोज कागजों को रंग-रंगकर दिमाग को खोटी करते रहो। नेता बनकर कम से कम अपने सरकारी और राजनीति हितों को साधने का मौका तो मिलेगा। जो चीज या सुविधा अभी तलक नहीं पाई, उसे पाने का मौका तो हाथ आएगा। इस खातिर अपन केवल तीन दिन नहीं बल्कि कित्ते ही दिनों तलक उपवास पर रहने को तैयार हैं। आखिर राजनीतिक कुर्सी भी तो कोई चीज होती है प्यारे।

अपन का उपवास डिसाइड-सा ही है, जैसे ही दिन और समय का शुभ मुहूर्त तय होता है बताते हैं आपको। तब तलक आप कहीं जाइएगा नहीं क्योंकि उपवास में आपको अपने के साथ जो रहना है।

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