बुधवार, 21 सितंबर 2011

सरकार का खत जनता के नाम

प्रिय जनता,आपके 'बहुमूल्य गुस्से' को हम समझ सकते हैं। आपका गुस्सा अपने ठिकाने सही है। लेकिन ज्यादा नहीं तो थोड़ा-बहुत हमें भी समझने की कोशिश कीजिए। हमारी अंदरूनी व बाहरी मजबूरियों पर गौर फरमाइए। विश्वास कीजिए हमें कतई शौक नहीं है आपके बजट से खेलने का। हम तो चाहते हैं कि आपका बजट हमारे बजट से भी श्रेष्ठ रहे। पर हम पर कुछ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय किस्म के प्रेशर होते हैं, जिसके कारण कभी हमें तेल के दाम बढ़ाने पड़ते हैं तो कभी दाल के। हम अच्छी तरह से जानते हैं कि तेल और दाल के भावों का बढ़ना न आपके हित में है न हमारे। परंतु समझदारी इसी में है कि हम एक-दूसरे के हितों की पेचिदगियों से समझौता करते हुए अपने-अपने गुस्से को काबू में रखें।

अरे, आप तो हमारी जनता हैं। हमारी प्रजा हैं। हमारी खेवनहार हैं। आप हैं तो हम हैं। आप नहीं तो हम कुछ नहीं। भला ऐसा कैसे हो सकता है कि हमें आपका आपके जनहितों का ख्याल नहीं रहता। आलम यह है कि हम जनहित की चिंता के कारण रातभर चैन से सो नहीं पाते। अपने दिन का आधे से ज्यादा वक्त आपकी तकलीफों को सुलटाने में ही निकाल देते हैं। प्रायः संसद में हम जो तू-तू मैं-मैं करते हैं न, यह सब आपके हितों के वास्ते ही तो करते हैं। हमें हर कहीं और हर पल आपकी जबरदस्त चिंता रहती है!
आपका हम पर गुस्सा महंगाई को लेकर ही है न। असल में महंगाई से हम खुद भी त्रस्त हैं। अब आपको कैसे बताएं कि किन-किन हालातों के बीच संघर्ष करते हुए हम अपने घर का बजट साध पाते हैं। हमारी पत्नियां कैसे अपनी रसोई की गाड़ी को खींचती हैं आपको क्या मालूम! कभी-कभार तो हमें भी अपने पड़ोस के नेता जी से सिलेंडर, चीनी, दूध आदि-आदि उधार तक लेना पड़ जाता है। लेकिन यह रिकार्ड है कि हमने कभी अपनी दिक्कतों को आप पर जाहिर नहीं होने दिया। और जाहिर होने भी न देंगे क्योंकि हम हमारे नारे कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ से इतर कभी नहीं जा सकते।

तमाम सचों की भांति महंगाई व मूल्य-वृद्धि भी हमारे समय का स्थाई सच बन चुकी है। हमें कोशिश कर इस सच को अब अपनी आदत बना लेना चाहिए। ऐसा नहीं है कि महंगाई कोई बुरी बला है। महंगाई का बढ़ना अपनी जगह अपने तरीके से भला है। आप स्वयं ही देख लीजिए कि बढ़ती महंगाई के बीच आपने किस खूबसूरती से अपने दैनिक व शौकिया खर्चों पर लगाम कसी है। जो तीन वक्त खाने के शौकीन थे, दो या एक वक्त के खाने से ही काम चलाने लगे हैं। और कुछ तो खाने के इत्ते चूजी हो गए हैं कि सूंघकर ही काम चला रहे हैं। हमारी सरकार आपके इस अनूठे त्याग के समक्ष नतमस्तक है।

चूंकि हम सरकार हैं इस नाते हमारे कने इधर-उधर की जिम्मेदारियां भी हैं। कुछ जिम्मेदारियां तो हमें उधार में मिली हैं। खैर, निभाना तो उन्हें भी है। जब भी हम आपकी तरफ से कॉनसंट्रेट करने की कोशिश करते हैं तो कभी अन्ना का आंदोलन आड़े आ जाता है, कभी कहीं धमाका हो जाता है, कभी घोटाले का डंक लग जाता है, तो कभी कोई जांच शुरू हो जाती है। अब आप ही बताइए कि एक जान और इत्ते सारे काम भला कैसे सध पाएंगे! ऊपर से सोने पर सुहागा विपक्ष अलग से जान में बवाल किए रहता है। देखिए उधर मोदी जी को उपवास पर बैठा दिया है और इधर हम पर एक और मुसीबत लाद दी है।

बहरहाल, सरकार होने के नाते हमने जब सत्ता संभाली है तो यह सब झेलना ही पड़ेगा। परंतु आप जनता से गुजारिश है कि अपने गुस्से और विरोध पर कंट्रोल रखें। आप कंट्रोल रखेंगे तो हमें अपना केलेस्ट्रोल मेनटेन करने में सुविधा रहेगी। इसलिए आगे जब भी किसी प्रकार की मूल्य या बेमूल्य वृद्धि होती है, तो हमको बुरा-भला कहने के बजाए हमारी मजबूरियों को समझने का प्रयास करें।

धन्यवाद।
आपकी अपनी सरकार

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