सोमवार, 19 सितंबर 2011

बंधु, बस मन लगाए रहें

मन लगाने के लिए राजनीति से उम्दा कोई नीति नहीं है। दुनिया की तमाम नीतियां राजनीति के समक्ष जीरो हैं। राजनेताओं को राजनीति करने का बस सिरा मिलना चाहिए फिर देखिए उनकी 'दिमागी चपलता'। जहां तलक आपकी सोच मुद्दे को नहीं पकड़ पाती वहां तलक राजनेता मुद्दे को भुनाने का निर्णय भी ले लेते हैं। और इत्ती खूबसूरती से लेते हैं कि आप-हम दातों तले उंगली दबाकर ही रह जाते हैं।

यूं भी राजनीति में रहकर उन्होंने राजनीतिक चपलताओं को नहीं सिखा, तो कुछ नहीं सिखा। खुद की कुर्सी बचाने, उसकी कुर्सी डिगाने, इसकी कुर्सी हथियाने की तमाम सहुलियतें हैं इस राजनीति के भीतर। बावजूद इसके जनता भी न राजनेता न राजनीति से कभी अलग नहीं होना चाहती। लोकतंत्र के सम्मान की खातिर उसे सब मंजूर है। वो तो अन्ना हजारे जैसे एक-दो गांधीवादी राजनेता और राजनीति की मट्टी पलीद किए रहते हैं, वरना यहां सुख ही सुख और चैन ही चैन है। अपना काम बनता भाड़ में जाए जनता वाला हिसाब है यहां।

खास बात, राजनीति में राजनेताओं द्वारा कोई भी काम खामोशी के साथ नहीं खूब गा-बजाकर किया जाता है। मतलब वे अगर विरोध भी करेंगे तो चीख-चिल्लाकर, संसद में अपनी बात को रखेंगे तो कुर्सी-माइक को हाथ में लेकर, शोक-संवेदना भी व्यक्त करेंगे तो सरकार को निशाने पर लेकर। मेरी समझ से इसके पीछे उनका मंतव्य जनता को यह बतलाना होता है कि वे काम कर रहे हैं, खाली नहीं हैं।

बहरहाल, इधर कुछ दिनों से एक मुद्दे ने घना राजनीतिक रंग ले लिया है। और इस रंग में विपक्ष के साथ-साथ पक्ष भी रंग जाना चाहता है। यह रंग है गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के कथित उपवास का। जब से नरेंद्र मोदी के उपवास की खबर आई है 'उपवास युद्ध' के से आसार नजर आने लगे हैं। भाजपाई मोदी के विरूद्ध कंग्रेसी वाघेला मैदान में उतर आए हैं। दोनों के बीच जबरदस्त होड़ है यह बतलाने कि किसका उपवास कित्ता पवित्र है। मोदी जी के उपवास का मंच राजसिंहासन सरीखा है, तो वाघेला जी का टेंट सरीखा।

और फिर मोदी जी का उपवास कोई ऐसा-वैसा उपवास नहीं है। बड़ा ही हाई-फाई किस्म का उपवास है यह। पूरा इंवेट मैनीजमेंट लगा हुआ है, उनके उपवास को मैनीज करने में। सीसीटीवी कैमरे हैं। सुरक्षाकर्मियों की पूरी फौज है। साथ ही पार्टी के तमाम बड़े-बड़े नेता मौजूद होंगे उनके कने।

मंगल पर बैठे बेचारे बापू जरूर यह सोच रहे होंगे कि काश! वे आज के समय में उपवास किए होते। बापू ने तो अपने उपवास को एक लंगोटी में ही निपटा दिया था। मगर नरेंद्र मोदी का यह उपवास वातानुकूलित है। तमाम आधुनिक सुविधाओं से परिपूर्ण है। क्या करें राजनीति में खुद को बनाए रखने के लिए अक्सर ऐसे हाईटेक उपवास करने पड़ते हैं प्यारे।

समझ में न आने बात यह है कि अभी अन्ना हजारे नरेंद्र मोदी के इस आलीशान उपवास पर कुछ नहीं बोले हैं।

साथ ही उपवास पर सिविल सोसाइटी का खामोश रहना भी कुछ पल्ले नहीं पड़ रहा। बाबा रामदेव की भी कोई 'क्रांतिकारी प्रतिक्रिया' अभी तलक कानों में नहीं पड़ी है। समय के साथ सबके मानक बदल गए से लगते हैं शायद!
वैसे दिल बहलाने के लिए इन सब की प्रतिक्रियाओं का आना जरूरी है।

राजनीति में रहकर हमारे राजनेताओं के बस यही मजे हैं। उपवास करो या उपभोग सब चलता है। आखिर हम लोकतांत्रिक मुल्क जो ठहरे। लोक और तंत्र के बीच कुछ अलग-सा तो रहना चाहिए ही न।

देखिए, अब यह जनता की सोच पर निर्भर करता है कि वो मोदी के उपवास के साथ है या सरकार की मूल्य वृद्धि के खिलाफ। पर राजनीति की बिसातें दोनों ही जगह बिछी हुई हैं। बिन राजनीति राजनेता जनता के बारे में कुछ सोच या कर ले, यह कम से कम अपने मुल्क में तो संभव नहीं है प्यारे।

तो बंधु एक तरफ आप नरेंद्र मोदी के हाईटेक उपवास का आनंद लें और दूसरी तरफ मूल्य वृद्धि का। मैं चाहता कि बस आप अपने मन को लगाए रखें क्योंकि हमारे यहां राजनीति और राजनेता केवल मन लगाने और बहलाने का माध्यम ही बनकर रह गए हैं।

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