बुधवार, 28 सितंबर 2011

अपन भी उपवास करेंगे

सोच रहे हैं, वैसे ऐसा सोचने में जाता भी क्या है, कि एक उपवास अपन भी कर लें। मोदी जी का उपवास हिट हो ही लिया है, अपन का भी हो जाएगा। आखिर अपन भी मोदी जी से कोई कम मशहूर थोड़ ही हैं! जित्ता उन्हें लोग जानते हैं, उत्ता ही अपन को भी। बैठे-ठाले शोहरत को ले लेने में कोई बुराई भी नहीं है। आजकल जमाना ही कुछ ऐसा है प्यारे। जिसके भीतर हिट होने की कला है, समझिए वो कभी बीट हो ही नहीं सकता।

हालांकि अपन ने अभी यह डिसाइड नहीं किया है कि उपवास करना किस मुद्दे पर है मगर क्या फर्क पड़ता है! उपवास के लिए तो किसी और कैसे भी मुद्दे को पकड़ा जा सकता है। मतलब तो मुद्दे से हो चाहिए। और अपने देश में मुद्दों की कहां कोई कमी है। एक खोजो हजार मिलते हैं। अब देखा जाए तो मोदी जी के कने कोई मुद्दा थोड़े था, वो उपवास तो उन्होंने इस कारण रखा था ताकि सांप्रदायिक धब्बों को मिटा सकें। छवि को उजला बना सकें। लगे हाथ पार्टी को भी यह बता सकें कि दिल्ली की गद्दी पर बैठने की ताकत वे भी रखते हैं। मोदी जी कित्ते ताकतवर हैं, इसे अमेरिकी कांग्रेस की रिपोर्ट पहले ही बता चुकी है। यहां जिस बात, व्यक्ति और मुद्दे पर अमेरिकी ठप्पा लग गया समझिए अब से वो 'पवित्र' है।

अभी तलक तक तो अपन ने केवल बापू के उपवास के बारे में ही सुना-पढ़ा था। बेहद साधारण किस्म का उपवास किया करते थे बापू। उनके उपवास के न्यौते नहीं जाया करते थे खास-खास लोगों को। न ही उपवास के ताईं वो निश्चित दिन या समय रखा करते थे। परंतु वो तब के जमाने का उपवास था और यह आज के जमाने का उपवास है। तब बापू के उपवास को किसी इवेंट मैंनजमेंट ने मैनीज नहीं था, पर मोदी जी का उपवास पूर्णतः मैनीज था। हाई-फाई और हाई-टेक था। जाहिर-सी बात है, जब ऐसे उच्च किस्म के उपवास करने को मिलें तो भला कौन छोड़ना चाहेगा?
मोदी जी से प्रेरणा लेकर यही सोच रहे हैं कि मोहल्ले के नुक्कड़ पर अपन भी एक टेंट जमा लें। शहर के कुछ हाई-फाई लोगों को आमंत्रित कर लें। आर्शीवाद के वास्ते साधु-संतों को मंच पर बैठा लें। अब रही बात भीड़ के जुटान की तो वो जुट ही जाएगी। आखिर मामला उपवास का जो है। हो सकता है, उपवास का निर्णय आगे चलकर अपन के वास्ते कोई राजनीति सौगात ही ले आए। अपन को भी शहर या गांव से कोई इकिट-टिकट मिल जाए। सड़क से संघर्ष करते-करते संसद में ही न पहुंच जाएं। यहां सबकुछ संभव है, बस जुगाड़ को साधने की जुगाड़ आनी चाहिए आपको।

और फिर इस लेखन में धरा ही क्या। रोज--रोज कागजों को रंग-रंगकर दिमाग को खोटी करते रहो। नेता बनकर कम से कम अपने सरकारी और राजनीति हितों को साधने का मौका तो मिलेगा। जो चीज या सुविधा अभी तलक नहीं पाई, उसे पाने का मौका तो हाथ आएगा। इस खातिर अपन केवल तीन दिन नहीं बल्कि कित्ते ही दिनों तलक उपवास पर रहने को तैयार हैं। आखिर राजनीतिक कुर्सी भी तो कोई चीज होती है प्यारे।

अपन का उपवास डिसाइड-सा ही है, जैसे ही दिन और समय का शुभ मुहूर्त तय होता है बताते हैं आपको। तब तलक आप कहीं जाइएगा नहीं क्योंकि उपवास में आपको अपने के साथ जो रहना है।

देश के गरीबों के नाम पाती

सुनो प्यारे गरीबों,
प्रसन्न हो जाओ। घी की मोमबत्तियां जलाओ। मोतीचूर के लड्डू बांटो। क्योंकि तुममें से अब कोई गरीब नहीं रहा! अब तुम और तुम्हारे जैसा अन्य गरीब अब अमीर है। चूंकि तुम्हारी कमाई पच्चीस रुपए से ज्यादा है इस नाते तुम अमीर हो। दरअसल, हमारी प्रगतिशील सरकार के उत्तर-आधुनिक योजना आयोग ने गरीबी की परिभाषा को ही अब बदल दिया है। जिसकी कमाई 32 और 25 रुपए से ज्यादा है, वो अमीर है। यानी कम में अमीर बनने का सुख क्या होता है, इसे तुम अब कदम-कदम पर महसूस किया करोगे। बधाई हो प्यारे!
अरे, तुम्हें तो हमारे योजना आयोग को करबद्ध होकर प्रणाम ठोकना चाहिए कि उसने तुम्हें अमीरियत का स्पष्ट एहसास करवाया। तुम्हारे गरीब जज्बातों का पूरा ख्याल रखा। तुम अमीरों के बीच खुद को डर्टी फील न करो, इस फीलिंग को नस्तेनाबूद किया। भला ऐसा नेकदिल योजना आयोग कहीं किसी देश में होगा जैसा कि अपने देश में है।

वाकई गरीब और गरीबी देश के ताईं कलंक समाने हैं। इससे देश के साथ-साथ सरकार का भी मान घटता है। अमेरिका जैसे देश यह सोचते होंगे कि सरकार अपने देश के गरीबों के वास्ते कुछ करती ही नहीं। देश की गरीबी और गरीबों पर हमारी सरकार को अक्सर यहां-वहां सफाई पेश करनी पड़ती है। सो, योजना आयोग ने इस सफाई का अब झंझट ही खत्म किया। उसने कम में देश के गरीबों को अमीर बनाकर एक बड़ी मिसाल पेश की है। अब जब अमेरिकी कांग्रेस भारत पर कोई रिपोर्ट लिखेगी, तो हमारे योजना आयोग की काबिलीयत का जिक्र वहां सर्वप्रथम होगा। साथ ही विपक्ष के लिए भी यह करार जवाब साबित होगा।

इस परिभाषा पर जिन्हें मुंह मसोसना हो वे मसोसें परंतु देश के गरीब बेहद प्रसन्न (!) हैं। घर बैठे ही वे जरा से रुपयों में अमीर हो लिए यह क्या कम बड़ी बात है उनके ताईं। आज के इस महंगाई भरे दौर में कम में अमीर होना बहुत कठिन है प्यारे। लेकिन योजना आयोग ने इसे कर दिखाया। देश के गरीब उनके प्रति दिल से ऋणी हैं।

चूंकि अपने देश से गरीब और गरीबी समाप्त हो चुकी है, इस नाते हम उम्मीद करते हैं कि अब यहां न कोई किसान आत्महत्या करेगा, न किसी का कंगाली में आटा गीला होगा, न गरीब की बेटी घर में बैठेगी, न किसी को रोटी के लाले होंगे। हर तरफ समृद्ध, पैसा और अमीरपना होगा। सरकार के लिए भी यह राहत की बात होगी कि कोई गरीब उसके दर पर अब फरियाद लेकर नहीं आएगा।
तो प्यारे गरीबों, अपनी गरीबी से मुक्त समझो और झूम के नाचो-गाओ ताकि सरकार भी सुन सके।

बधाई हो प्यारे, गरीब भी अब अमीर हुए

किन शब्दों और किस लहजे में अपन योजना आयोग की 'आर्थिक दूरदर्शिता' को धन्यवाद दें, समझ नहीं पा रहे। गरीबी-अमीरी की जो 'उम्दा परिभाषा' उसने पेश की उस पर अपन को बेइंतहा गर्व हुआ। न सिर्फ अपन को बल्कि गांव-देहात के प्रत्येक गरीब को हुआ। गरीबों ने कभी सपने में भी यह नहीं सोचा होगा कि वे मात्र छब्बीस रुपए की कमाई के सहारे ही अमीर हो जाएंगे। अब से हमें-तुम्हें यह मान लेना चाहिए कि अपने देश से गरीब और गरीबी दोनों ही समाप्त हुई। बधाई हो प्यारे।

खबरदार! गरीबों अब तुममें से किसी ने भी खुद को गरीब-गुरबा बताया तो अच्छा न होगा। योजना आयोग की दी हुई परिभाषा के साथ यह अपमान होगा। तुम तो बस अब अपने अमीर होने का अपनी झोपड़-पट्टी में जश्न मनाओ।

बताइए जिस आर्थिक विषमता तो मिटाने में मार्क्स ने अपना संपूर्ण चिंतन लगा दिया दास कैपिटल तक लिख डाला उसे हमारे काबिल योजना आयोग ने मात्र छब्बीस और बत्तीस रुपए के आधार पर ही सुलटा लिया। प्यारे, कभी मार्क्स ने भी यह कल्पना नहीं की होगी कि छब्बीस और बत्तीस रुपए की कमाईवाले भी अमीर हो सकते हैं! अपन ऐवईं मार्क्स को महान अर्थशास्त्री समझते रहे लेकिन योजना आयोग तो उनसे भी पांच-छह कदम आगे है। अपन तो कहते हैं कि ऐसा योजना आयोग हर देश में होना चाहिए। ताकि आर्थिक विषमताओं पर रोक लग सके।

ठंडे दिमाग से अगर हिसाब-किताब किया जाए तो अपने देश में गरीबी है ही कहां! अपना देश आज भी सोने की चिड़िया है। अरे, वो कुछ फीसद गरीब ही देश के विकास का हाजमा खराब किए हुए हैं। वरना तो यहां हर कहीं खुशहाली ही खुशहाली और दौलत ही दौलत है। तेजी से बढ़ती विकास दर ने तो अब गरीबों को भी अमीरों की श्रेणी में ला खड़ा किया है। गरीब भी अमीर होने लगे हैं। अमां हवा हुए वे जमाने जब भारत कभी गांव में बसता था। भारत अब इंडिया बन गया है। इंडिया में गांव नहीं मल्टीप्लैस और मल्टीकलचर बसता है। भारत और इंडिया के मध्य जो दीवार है। हमारे योजना आयोग की कोशिश है कि इस दीवार को जल्द ही तोड़ा जाए ताकि अमेरिका हम पर नाज कर सके। क्योंकि जब तलक अमेरिका हमें अमीर और विकसित देश घोषित नहीं कर देता, हमारी सरकार को चैन से नींद नहीं आने वाली।

जित्ते मुंह उत्ती बातें। कुछ ज्ञानी लोग कह-लिख रहे हैं कि इस परिभाषा में गरीब और गरीबी का खुला मजाक उड़ाया गया है। गरीबी को छब्बीस और बत्तीस रुपए में नहीं बांटा जा सकता। लो जी, ऐ भी कोई बात हुई भला! सरकारों को देश और जनता की आर्थिक तरक्की के वास्ते प्रायः ऐसे आंकड़ें पेश करने ही होते हैं। जिन ज्ञानियों को यह तरक्की पसंद नहीं, मेरे विचार में, वे देश की आर्थिक ग्रोथ से जलते हैं। वे प्रगतिशील नहीं हैं। अरे, उन्हें तो योजना आयोग में बैठे ज्ञानियों का एहसान मानना चाहिए कि उन्होंने गरीबों को बरसों पुरानी आर्थिक दासता व असमानता की भावना से मुक्त कराया। पर क्या करें आलोचना करने की हमें आदत जो हो गई है।

गरीबी कुछ है नहीं महज 'दिमागी फोबिया' है। विपक्षी दल चाहते हैं कि देश में गरीब और गरीबी बनी रहे ताकि वे वोट बैंक की राजनीति कर सकें। इसीलिए योजना आयोग की इस परिभाषा पर सबसे ज्यादा आपत्ति विपक्ष को ही है। हमारी प्रगतिशील सरकार तो शुरू से प्रयासरत रही है कि देश से गरीब और गरीबी जितना जल्दी हो सके खत्म हो। अगर वैसे नहीं हो सकती तो ऐसे हो। मगर हो। देखिए महंगाई का निरंतर बढ़ते रहना गरीबी को कम करने की दिशा में एक बेहतरीन कदम है। महंगाई बढ़ेगी तो स्वतः ही गरीब कम होंगे। गाहे-बगाहे होने वाली किसानों की आत्महत्याएं स्पष्ट उदाहरण हैं।

आप मानें या न मानें परंतु देश के गरीब भी अब समझदार हो गए हैं। अब अमीरों की तरह उन्हें भी अपनी 'इमेज' की चिंता रहती है। आखिर कब तलक वे अपनी गरीबी का मजाक यूंही बनते रहने देंगे। ध्यान रखें, वे 16-17वीं सदी के गरीब नहीं 21वीं सदी के 'सम्मानजनक गरीब' हैं। कोई गरीब नहीं चाहता कि उसे गरीब कहा या माना जाए। बदलते वक्त के साथ-साथ गरीबों ने अपनी परिभाषा को स्वयं ही बदल दिया है।

फिर इस हिसाब से योजना आयोग की गरीबों के लिए गढ़ी गई नई परिभाषा बिल्कुल उपयुक्त है। ज्ञानी लोग खामाखां ही इसका विरोध करने में जुटे हैं।

प्यारे, यह विरोध का नहीं खुशियां बांटने और मनाने का समय है। हमारा देश अब गरीब और गरीबी मुक्त है। जो थोड़े बहुत गरीब बचे भी हैं, कुछ मेहनत कर वे भी 26-32 की परिभाषा में ढलने का जल्द ही प्रयास करेंगे। आखिर उन्हें भी तो अपने स्टेटस की चिंता होगी की नहीं!
बहरहाल, सरकार अब गरीब और गरीबी की तरफ से बेफिक्र रहे उसे योजना आयोग ने संभाल लिया है। अभी तो सरकार अपना सारा ध्यान चिदंबरम साहेब को बचाने में लगाए क्योंकि टूजी कारनामे में उनकी टांग भी फंसती नजर आ रही है। बेसब्री से इंतजार है, आगे के मनोरंजन का।

बुधवार, 21 सितंबर 2011

सरकार का खत जनता के नाम

प्रिय जनता,आपके 'बहुमूल्य गुस्से' को हम समझ सकते हैं। आपका गुस्सा अपने ठिकाने सही है। लेकिन ज्यादा नहीं तो थोड़ा-बहुत हमें भी समझने की कोशिश कीजिए। हमारी अंदरूनी व बाहरी मजबूरियों पर गौर फरमाइए। विश्वास कीजिए हमें कतई शौक नहीं है आपके बजट से खेलने का। हम तो चाहते हैं कि आपका बजट हमारे बजट से भी श्रेष्ठ रहे। पर हम पर कुछ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय किस्म के प्रेशर होते हैं, जिसके कारण कभी हमें तेल के दाम बढ़ाने पड़ते हैं तो कभी दाल के। हम अच्छी तरह से जानते हैं कि तेल और दाल के भावों का बढ़ना न आपके हित में है न हमारे। परंतु समझदारी इसी में है कि हम एक-दूसरे के हितों की पेचिदगियों से समझौता करते हुए अपने-अपने गुस्से को काबू में रखें।

अरे, आप तो हमारी जनता हैं। हमारी प्रजा हैं। हमारी खेवनहार हैं। आप हैं तो हम हैं। आप नहीं तो हम कुछ नहीं। भला ऐसा कैसे हो सकता है कि हमें आपका आपके जनहितों का ख्याल नहीं रहता। आलम यह है कि हम जनहित की चिंता के कारण रातभर चैन से सो नहीं पाते। अपने दिन का आधे से ज्यादा वक्त आपकी तकलीफों को सुलटाने में ही निकाल देते हैं। प्रायः संसद में हम जो तू-तू मैं-मैं करते हैं न, यह सब आपके हितों के वास्ते ही तो करते हैं। हमें हर कहीं और हर पल आपकी जबरदस्त चिंता रहती है!
आपका हम पर गुस्सा महंगाई को लेकर ही है न। असल में महंगाई से हम खुद भी त्रस्त हैं। अब आपको कैसे बताएं कि किन-किन हालातों के बीच संघर्ष करते हुए हम अपने घर का बजट साध पाते हैं। हमारी पत्नियां कैसे अपनी रसोई की गाड़ी को खींचती हैं आपको क्या मालूम! कभी-कभार तो हमें भी अपने पड़ोस के नेता जी से सिलेंडर, चीनी, दूध आदि-आदि उधार तक लेना पड़ जाता है। लेकिन यह रिकार्ड है कि हमने कभी अपनी दिक्कतों को आप पर जाहिर नहीं होने दिया। और जाहिर होने भी न देंगे क्योंकि हम हमारे नारे कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ से इतर कभी नहीं जा सकते।

तमाम सचों की भांति महंगाई व मूल्य-वृद्धि भी हमारे समय का स्थाई सच बन चुकी है। हमें कोशिश कर इस सच को अब अपनी आदत बना लेना चाहिए। ऐसा नहीं है कि महंगाई कोई बुरी बला है। महंगाई का बढ़ना अपनी जगह अपने तरीके से भला है। आप स्वयं ही देख लीजिए कि बढ़ती महंगाई के बीच आपने किस खूबसूरती से अपने दैनिक व शौकिया खर्चों पर लगाम कसी है। जो तीन वक्त खाने के शौकीन थे, दो या एक वक्त के खाने से ही काम चलाने लगे हैं। और कुछ तो खाने के इत्ते चूजी हो गए हैं कि सूंघकर ही काम चला रहे हैं। हमारी सरकार आपके इस अनूठे त्याग के समक्ष नतमस्तक है।

चूंकि हम सरकार हैं इस नाते हमारे कने इधर-उधर की जिम्मेदारियां भी हैं। कुछ जिम्मेदारियां तो हमें उधार में मिली हैं। खैर, निभाना तो उन्हें भी है। जब भी हम आपकी तरफ से कॉनसंट्रेट करने की कोशिश करते हैं तो कभी अन्ना का आंदोलन आड़े आ जाता है, कभी कहीं धमाका हो जाता है, कभी घोटाले का डंक लग जाता है, तो कभी कोई जांच शुरू हो जाती है। अब आप ही बताइए कि एक जान और इत्ते सारे काम भला कैसे सध पाएंगे! ऊपर से सोने पर सुहागा विपक्ष अलग से जान में बवाल किए रहता है। देखिए उधर मोदी जी को उपवास पर बैठा दिया है और इधर हम पर एक और मुसीबत लाद दी है।

बहरहाल, सरकार होने के नाते हमने जब सत्ता संभाली है तो यह सब झेलना ही पड़ेगा। परंतु आप जनता से गुजारिश है कि अपने गुस्से और विरोध पर कंट्रोल रखें। आप कंट्रोल रखेंगे तो हमें अपना केलेस्ट्रोल मेनटेन करने में सुविधा रहेगी। इसलिए आगे जब भी किसी प्रकार की मूल्य या बेमूल्य वृद्धि होती है, तो हमको बुरा-भला कहने के बजाए हमारी मजबूरियों को समझने का प्रयास करें।

धन्यवाद।
आपकी अपनी सरकार

सोमवार, 19 सितंबर 2011

बंधु, बस मन लगाए रहें

मन लगाने के लिए राजनीति से उम्दा कोई नीति नहीं है। दुनिया की तमाम नीतियां राजनीति के समक्ष जीरो हैं। राजनेताओं को राजनीति करने का बस सिरा मिलना चाहिए फिर देखिए उनकी 'दिमागी चपलता'। जहां तलक आपकी सोच मुद्दे को नहीं पकड़ पाती वहां तलक राजनेता मुद्दे को भुनाने का निर्णय भी ले लेते हैं। और इत्ती खूबसूरती से लेते हैं कि आप-हम दातों तले उंगली दबाकर ही रह जाते हैं।

यूं भी राजनीति में रहकर उन्होंने राजनीतिक चपलताओं को नहीं सिखा, तो कुछ नहीं सिखा। खुद की कुर्सी बचाने, उसकी कुर्सी डिगाने, इसकी कुर्सी हथियाने की तमाम सहुलियतें हैं इस राजनीति के भीतर। बावजूद इसके जनता भी न राजनेता न राजनीति से कभी अलग नहीं होना चाहती। लोकतंत्र के सम्मान की खातिर उसे सब मंजूर है। वो तो अन्ना हजारे जैसे एक-दो गांधीवादी राजनेता और राजनीति की मट्टी पलीद किए रहते हैं, वरना यहां सुख ही सुख और चैन ही चैन है। अपना काम बनता भाड़ में जाए जनता वाला हिसाब है यहां।

खास बात, राजनीति में राजनेताओं द्वारा कोई भी काम खामोशी के साथ नहीं खूब गा-बजाकर किया जाता है। मतलब वे अगर विरोध भी करेंगे तो चीख-चिल्लाकर, संसद में अपनी बात को रखेंगे तो कुर्सी-माइक को हाथ में लेकर, शोक-संवेदना भी व्यक्त करेंगे तो सरकार को निशाने पर लेकर। मेरी समझ से इसके पीछे उनका मंतव्य जनता को यह बतलाना होता है कि वे काम कर रहे हैं, खाली नहीं हैं।

बहरहाल, इधर कुछ दिनों से एक मुद्दे ने घना राजनीतिक रंग ले लिया है। और इस रंग में विपक्ष के साथ-साथ पक्ष भी रंग जाना चाहता है। यह रंग है गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के कथित उपवास का। जब से नरेंद्र मोदी के उपवास की खबर आई है 'उपवास युद्ध' के से आसार नजर आने लगे हैं। भाजपाई मोदी के विरूद्ध कंग्रेसी वाघेला मैदान में उतर आए हैं। दोनों के बीच जबरदस्त होड़ है यह बतलाने कि किसका उपवास कित्ता पवित्र है। मोदी जी के उपवास का मंच राजसिंहासन सरीखा है, तो वाघेला जी का टेंट सरीखा।

और फिर मोदी जी का उपवास कोई ऐसा-वैसा उपवास नहीं है। बड़ा ही हाई-फाई किस्म का उपवास है यह। पूरा इंवेट मैनीजमेंट लगा हुआ है, उनके उपवास को मैनीज करने में। सीसीटीवी कैमरे हैं। सुरक्षाकर्मियों की पूरी फौज है। साथ ही पार्टी के तमाम बड़े-बड़े नेता मौजूद होंगे उनके कने।

मंगल पर बैठे बेचारे बापू जरूर यह सोच रहे होंगे कि काश! वे आज के समय में उपवास किए होते। बापू ने तो अपने उपवास को एक लंगोटी में ही निपटा दिया था। मगर नरेंद्र मोदी का यह उपवास वातानुकूलित है। तमाम आधुनिक सुविधाओं से परिपूर्ण है। क्या करें राजनीति में खुद को बनाए रखने के लिए अक्सर ऐसे हाईटेक उपवास करने पड़ते हैं प्यारे।

समझ में न आने बात यह है कि अभी अन्ना हजारे नरेंद्र मोदी के इस आलीशान उपवास पर कुछ नहीं बोले हैं।

साथ ही उपवास पर सिविल सोसाइटी का खामोश रहना भी कुछ पल्ले नहीं पड़ रहा। बाबा रामदेव की भी कोई 'क्रांतिकारी प्रतिक्रिया' अभी तलक कानों में नहीं पड़ी है। समय के साथ सबके मानक बदल गए से लगते हैं शायद!
वैसे दिल बहलाने के लिए इन सब की प्रतिक्रियाओं का आना जरूरी है।

राजनीति में रहकर हमारे राजनेताओं के बस यही मजे हैं। उपवास करो या उपभोग सब चलता है। आखिर हम लोकतांत्रिक मुल्क जो ठहरे। लोक और तंत्र के बीच कुछ अलग-सा तो रहना चाहिए ही न।

देखिए, अब यह जनता की सोच पर निर्भर करता है कि वो मोदी के उपवास के साथ है या सरकार की मूल्य वृद्धि के खिलाफ। पर राजनीति की बिसातें दोनों ही जगह बिछी हुई हैं। बिन राजनीति राजनेता जनता के बारे में कुछ सोच या कर ले, यह कम से कम अपने मुल्क में तो संभव नहीं है प्यारे।

तो बंधु एक तरफ आप नरेंद्र मोदी के हाईटेक उपवास का आनंद लें और दूसरी तरफ मूल्य वृद्धि का। मैं चाहता कि बस आप अपने मन को लगाए रखें क्योंकि हमारे यहां राजनीति और राजनेता केवल मन लगाने और बहलाने का माध्यम ही बनकर रह गए हैं।

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

कृपया महंगाई को उपेक्षित न करें

इधर कई दिनों से देख रहा हूं हमने महंगाई पर बात व चर्चा करना लगभग बंद-सा कर दिया है। न सरकार, न विपक्ष, न जनता, न मीडिया, न नेता, न अफसर, न गरीब, न अमीर कोई महंगाई के बढ़ने या घटने का जिक्र ही नहीं करता। महंगाई को क्या सब लोग भूल गए हैं? या फिर सबने महंगाई को अपनी आदत में शुमार कर लिया है? कहीं न कहीं कोई बात तो जरूर है। वरना ऐसा कम ही हुआ है कि महंगाई बढ़े और हम कुलबुलाएं नहीं। महंगाई और सरकार के खिलाफ अपने तर्क न रखें। महंगाई को चर्चा में न बनाए रखना महंगाई का घोर अपमान है। बता दूं महंगाई इसे ज्यादा दिनों तलक सहन न कर सकेगी।

ऐसा भी नहीं है कि महंगाई के बढ़ने के संकेत हमें न मिल रहे हों। इन संकेतों को मिलना निरंतर जारी है। लेकिन महंगाई के बढ़ने का जिक्र बस समाचारपत्रों में ही होकर रह जाता है। महंगाई पर कभी वित्तमंत्री का बयान आ जाता है तो कभी सरकार का। जनता महंगाई में अब उस प्रकार से इंट्रस्ट नहीं ले रही जैसाकि पिछले दिनों ले रही थी।

अभी-अभी सरकार ने फिर से पैट्रोल के दाम बढ़ाए हैं। महंगाई के बढ़ने का एक और अवसर हमें प्रदान किया है। हमारे खर्चों पर एक और बोझ लादा है। मगर देख रहा हूं इस दफा हम चुप से हैं। मीडिया अपने यहां खबर तो लगातार चला रहा है पर आम आदमी के रिएक्शन तक कम ही जाने का प्रयास कर रहा है। हर बार की तरह समाज का संभ्रांत तबका पैट्रोल की बढ़ी कीमतों पर अपना दुखड़ा रोकर विरोध की खानापूर्ति कर देता है। और हम समझ व मान लेते हैं कि विरोध हो रहा है। पर यह विरोध थोड़े ही है। जब तलक हम सरकार या महंगाई का बीच चौराहे पर पुतला न फूंक लें तब तलक हमारे विरोध के मायने ही पूरे नहीं होते।

सच कहूं इस बार पैट्रोल की कीमतों का बढ़ना कुछ मजा नहीं दे पाया।

इस तरह से महंगाई की उपेक्षा ठीक नहीं है। हमारे जीवन में महंगाई का बहुत महत्व है। महंगाई हमें जीने-रहने, खाने-पीने आदि का सलीका प्रदान करती है। हमारे शरीर व विचारों को संतुलित रखती है। सरकार और व्यवस्था के खिलाफ विरोध के खुले अवसर देती है। किसानों की आत्महत्याओं और पीपली लाइव जैसी महान फिल्मों का मुख्य कारण है महंगाई। इसी महंगाई ने न जाने कितने लेखकों और व्यंग्यकारों को लेखन के क्षेत्र में नाम कमवाया है। और आज हम महंगाई को ही भूला बैठे हैं। कित्ते एहसानफरामोश हैं हम!
अच्छी तरह से समझ लें अगर हम महंगाई को तरजीह नहीं देंगे तो बेकार हैं घूसखोरी, भ्रष्टाचार, काला धन, काला बाजारी के विरूद्ध हमारे आंदोलन। भ्रष्टाचार आदि को देश व समाज के बीच पनपाने में महंगाई का बहुत बड़ा योगदान है।

बेशक अन्ना हजारे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के कारण हीरो बने हों लेकिन उन्हें हीरो बनाने का रास्ता महंगाई की गली में से होकर ही निकलता है, इसे न भूलें।

दरअसल, महंगाई को अपने खिलाफ विरोध से कोई डर नहीं है उसे तो डर आपकी उपेक्षा से है। इसीलिए मेरी पुनः आपसे विनती है कि महंगाई को उपेक्षित न करें। उसे महत्व दें। उसे चर्चा और

बहस में बनाए रखें। महंगाई के प्रति हमारा यही सबसे बड़ा सम्मान होगा।

इत्ता विरोध भी ठीक नहीं प्यारे

बेचारी सरकार भी क्या करे। उसकी भी मजबूरियां हैं। उसकी भी परेशानियां हैं। किन आर्थिक दवाबों के बीच सरकार को पैट्रोल की कीमतें बढ़ानी पड़ी हैं इसे आप क्या जानें! आपको तो बस सरकार के विरूद्ध विरोध का बहाना मिलना चाहिए। मेरे प्यारे, सरकार का विरोध करने से पहले जरा सोच-समझ तो लो कि विरोध क्यों और किस आधार पर कर रहे हो? एक तो सरकार के कने वैसे ही इत्ती परेशानियां हैं ऊपर से आप विरोध कर उसकी परेशानियों को और बढ़ा रहे हैं। यह ठीक नहीं है।

आपके विरोध का कारण बस इत्ता-सा है न कि सरकार ने पैट्रोल के दाम क्यों बढ़ाए? अरे प्यारे, यह भी कोई बात हुआ भला कि क्यों बढ़ाए! वह हमारी सरकार है। हमारी मालिक है। जो मन में आए कर सकती है। दाम बढ़ा सकती है। दाम घटा सकती है। मेरे प्यारे, सरकार को कोई शौक थोड़े ही है जनता के जज्बातों से खेलने का। लेकिन जब तमाम प्रकार के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय आर्थिक दवाब सामने हों तो सरकार को यह सब करना पड़ता है। और फिर हमारी सरकार ने कोई अनोखा थोड़े ही किया है पैट्रोल के दाम बढ़ा कर! दूसरे देशों की सरकारें भी ऐसा करती रहती हैं।

मुझे एक बात समझ नहीं आती। जित्ता वक्त हम-आप सरकार को कोसने या विरोध करने में जाया करते हैं अगर उत्ता ही समय सरकार की मजबूरियों-परेशानियों को समझने में लगाएं तो कित्ता अच्छा हो। हर वक्त विरोध हर कहीं से विरोध। विरोध को तो हमने स्कूली इमला बना लिया है, जब मन आता है रटने बैठ जाते हैं। आखिर ऐसा कब तलक चलेगा प्यारे।

प्यारे, हमें तो अपनी यूपीए सरकार का हमेशा एहसानमंद रहना चाहिए कि उससे अधिक समझदार व प्रगतिशील सरकार हमें अभी तलक मिली ही नहीं! आम आदमी के हाथ पर गजब की पकड़ रखती है हमारी सरकार। कित्ता कुछ हमें सरकार से सीखने को मिला है। कई आदतें उसने हमें ऐसी डलवा दी हैं कि अब हम उनके आदी से हो गए हैं। भ्रष्टाचार, घपला, घोटाला, महंगाई आदि-आदि सब आदतें ही तो हैं। इन सब के बीच रहकर भी इन्हें कैसे झेला जाए यह हमारी सरकार ने ही हमें बताया है। और प्यारे आप हमेशा उसके खिलाफ बगावत पर उतरारू रहते हैं। अपने को संभालिए बंधु।

दरअसल, पैट्रोल की कीमतें तो सरकार ने इसलिए बढ़ाई हैं ताकि हमें महंगाई को झेलने की आदत पड़ी रहे। इधर कई दिनों से महंगाई के बढ़ने का कोई खास जिक्र भी नहीं हुआ था हमारे बीच। चलो अब पैट्रोल के बहाने ही सही कम से कम महंगाई हमारी चिंता और चिंतन में तो आई। हम तो ऐवईं महंगाई को उपेक्षित से किए हुए थे।

प्यारे माहौल को समझो। खाली-पीली विरोध न करो। सरकार सब जानती है। अभी कीमतें बढ़ाई हैं, तो कल को घटा भी देगी। बस थोड़े दिनों की बात और है। चुनाव होने वाले हैं बस देखते रहियो कि सरकार तुम्हें और जनता को क्या-क्या कीमती तोहफे देती है!

बुधवार, 14 सितंबर 2011

भ्रष्टाचार के पैर

अन्नाजी का तहे-दिल से शुक्रिया।

अब हमें भ्रष्टाचार के पैर साफ नजर आने लगे हैं। आए दिन अखबारों में प्रकाशित खबरों में किसी न किसी भ्रष्टाचारी का पैर अलां-फलां भ्रष्टाचार में फंसा पढ़ने को मिल ही जाता है। अब तलक जो भ्रष्टाचारी अपने पैरों को सबसे मजबूत मानते-समझते थे, एक-एक कर वे सब सतह से उखड़ने लगे हैं। और ऐसे उखड़े हैं कि लगता नहीं पुनः अपने पैरों को मजबूत कर पाएंगे। सब अन्ना के आंदोलन का प्रताप है।

ऊंट को पहाड़ के नीचे आते देखने का सुख क्या होता है, अब जाकर पता चला।

अन्ना न अनशन करते, न आंदोलन होता, न जनता जुटती, न मोमबत्तियां जलतीं, न सरकार झुकती और न ही भ्रष्टाचार के दबे-छिपे पैर सामने दिखते।

अभी-अभी रेड्डी बंधुओं और अमर सिंह के पैरों का उखड़ना अपने आप में सहज होकर भी उन्हें असहज ही लगा होगा। क्योंकि इस तरह की असहजता को न रेड्डी बंधुओं न अमर सिंह ने अपने ताईं कल्पना में भी न सोची होगी।

इधर रेड्डी बंधुओं के पैर क्या उखड़े कर्नाटक के साथ-साथ राजधानी की भाजपा में भी अंदरखाने बहुत कुछ उखड़ने-बिखने-सा लगा है। जिन्हें कभी रेड्डी बंधुओं के साथ अपनी यारी-दिलदारी पर नाज था, आज वे सभी बेहद नासाज हैं। उनमें से बहुत से तो नाराज भी हैं। पर असल समस्या तो यही है कि अपनी नाराजगी को जन-जाहिर करें भी तो कैसे? डर है उनके प्रति कहीं जनता अखड़ गई तो!
अमां अपन तो सुन-पढ़कर ही दंग रह गए कि रेड्डी बंधुओं के कने भ्रष्टाचार की पूरी खान है। इधर हाथ डालो तो सोना, उधर हाथ डालो तो हीरा। बंधुगण लाख रुपया की बैल्ट पहनते थे और स्वर्णजड़ित कुर्सी पर विराजते थे। फिर भला कैसे उनके मजबूत पैर सरकार को दिखाई पड़ते! वो तो देखकर भी अनदेखा ही किए रही होगी अब तलक। लेकिन अपने अन्ना की आंधी ऐसे मजबूत पैरों को एक-एक कर बहाए लिए चली जा रही है। कह सकते हैं कि भ्रष्टाचार के पैरों की शामत-सी आ गई है।

लगभग यही हाल अपने पुराने समाजवादी अमर सिंह का है। गए वक्त में फिल्म, उद्योग और राजनीति की दुनिया के वे अकेले सरताज थे, इशारे पर सबको नचाने की ताकत रखते थे, मगर अब उनके कने न ताज रहा न ताकत। अब तिहाड़ की सलाखें हैं और वे हैं।

इंतजार करें..अभी तो ऐसे बहुत-से नायकों का सामना आना बाकी है मेरे दोस्त। तमाम सरकारी, गैर-सरकारी दफ्तरों में जिन 'परिचित पैरों' को अब तलक हम अंडर द टेबल ही छुते-दबाते रहे, उन्हें भी अब डर-सा लगा रहता है कि कब, कौन, कहां उनके पैरों को भी न उखाड़ दे।

बहरहाल, अब तलक जितने भ्रष्टाचारियों के पैर उखड़ चुके हैं, देखते हैं, अब अपनी सफाई में वे किन पैरों को सामने करते हैं!

करोड़पति नेता की जरूरत

मियां, इसमें इत्ता उखड़ने की क्या जरूरत है अगर हमारे देश के कुछ नेता करोड़पति हैं? क्या नेता का करोड़पति होना किसी 'विशेषाधिकार हनन' के तहत आता है? जब आप और हम करोड़पति हो-बन सकते हैं, तो फिर नेता क्यों नहीं? आपको अपना करोड़पति होना 'संघर्ष का प्रतीक' लगता है और उनका करोड़पति होना 'राष्ट्रीय शर्म'। वाह! जनाब यह भी कोई बात हुई भला।

न भूलें वे हमारे नेता हैं। हमारी सरकार हैं। हमारे मालिक हैं। दिन-रात हमारी सेवा में खपकर तरह-तरह की योजनाएं-परियोजनाएं बनाते हैं। जनहित में लगे रहने को वे अपना फर्ज मानते हैं। संसद के अंदर-बाहर जोर का शोर मचाते हैं ताकि हम उनके काम करने के तरीके को सुन, समझ व देख सकें। जनता के प्रति इत्ता पसीना बहाने के बाद अगर वे आएं-बाएं-दाएं से कुछ लाख या करोड़ रुपया जमा कर भी लेते हैं, तो मियां आपके पेट में क्यों मरोड़ें पड़ने लगती हैं! कमाई के प्रति जित्ता मोह आपके दिल में है लगभग उत्ता ही उनके भी। बस आपमें और उनमें फर्क इत्ता-सा है कि आप जोड़कर कमाते हैं और वे जुगाड़कर।

कायदे में हमें तो प्रसन्न होना चाहिए कि हमारे देश (इंडिया) के नेता-मंत्री अमीर हैं। अमीर होकर भी वे कित्ते सहज हैं। अपनी अमीरी का खुलासा उन्होंने तब ही किया जब उनसे ऐसा करने को कहा गया। वरना उन्हें क्या पड़ी है जनता के बीच अपनी अमीरी दिखाने की! उनके बीच महान बनने की! लेकिन हम उनके इस त्याग (संपत्ति के खुलासे) को ऐढ़ी निगाह से देख रहे हैं। सबसे ज्यादा देख-दिखा है हमारा मीडिया। खबरिया चैनलों पर हर वक्त बस यही खबर दौड़ रही है कि फलां मंत्री इत्ता अमीर है तो अलां इत्ता। इसके कने इत्ता सोना है तो उसके कने इत्ती जमीन। पता नहीं यह मीडिया देश के नेताओं-मंत्रियों से जला-जला-सा क्यों रहता है?
अभी सरकार संपत्ति की घोषणा करने को आम आदमी से कह दे फिर देखिए यहां कित्ता हाहाकार मचता है। सड़कों-चौराहों पर सरकार के खिलाफ कित्ते धरना-प्रदर्शन होंगे। पुतले फूंके जाएंगे। प्रत्येक की जुबान पर बस एक ही प्रश्न होगा कि आखिर सरकार को क्या पड़ी है आम आदमी से उसकी कमाई या संपत्ति का खुलासा करवाने की? यह तो आम आदमी के अधिकारों का हनन हुआ। बहुत बढ़िया मियां जब अपनी बारी आई तो आपको अधिकारों का हनन याद आया। यह तो साफ दोगलापन हुआ न।

मियां, हर नेता-मंत्री एक जैसे नहीं होते। उनमें से अगर कुछ करोड़पति हैं, तो कुछ बे-कार और बे-घर भी। मगर आज तलक उन्होंने आपसे अपनी गरीबी का रोना तो नहीं रोया न। तो फिर क्यों आप उनकी संपत्ति व कमाई को लेकर इत्ता दुखी हैं। नेता अगर राजनीति में है तो कमाएगा नहीं क्या? क्या हर सुख-सुविधा का लुत्फ आप ही उठाएंगे? नेताओं-मंत्रियों का अमीर होना बताता है कि अपने देश की राजनीति कित्ती समृद्ध है। अपने देश को सोने की चिड़िया कहलाने का कुछ मान तो बचाकर रख लेने दीजिए उन्हें भी।

बेहतर यही होगा कि आप नेताओं-मंत्रियों की संपत्ति पर ज्यादा ध्यान देकर अपनी संपत्ति की चिंता करें। जिस तरकीब से वे कमा रहे हैं आप भी वैसे ही कमाएं। देश की आर्थिक तरक्की ही हमारा पहला और आखिरी उद्देश्य होना चाहिए। अब यह उद्देश्य कैसे और किस रास्ते पूरा हो रहा है इस पर खाक डालिए। और हां नेताओं का करोड़पति होना वक्त की जरूरत है, समझे मियां।

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

तिहाड़ उनकी ऋणी है

दिनों तिहाड़ जेल का वातावरण आनंदमय है। बेशक बाहर गर्मी-बरसात का दिक्कतें हो पर यहां सबकुछ कूल-कूल है। दिन कब में और कहां गुजर जाता है पता ही नहीं चलता। पता चले भी कैसे, क्योंकि तिहाड़ के भीतर आजकल बड़ी-बड़ी मशहूर हस्तियां जो मौजूद हैं। यकीनन यह तिहाड़ का सौभाग्य ही है कि उसे ऐसी मशहूर हस्तियों का संग-साथ मयस्सर हुआ। तिहाड़ सलाखों सहित उनकी ऋणी है।

यहां हर बैरक अपनी-सी अद्भूत कहानी लिए हुए है। एक तरफ कलमाड़ी जी अपने खेल में मस्त रहते हैं तो दूजी तरफ ए. राजा जी अपने स्पैक्ट्रम के हिसाब-किताब में व्यस्त। कनिमोझी के कने कविताओं की व्यस्तता है। मतलब कि यहां खाली कोई नहीं है। सबके कने अपने-अपने खास काम हैं। खाली रहना भी नहीं चाहिए क्योंकि ज्ञानी कह गए हैं कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है।
दरअसल, व्यक्ति के मन को पहचानने का सबसे उत्तम स्थान जेल ही है। जेल के भीतर ही व्यक्ति का असली व्यक्तित्व सामने आ पता है। माना कि इन मशहूर हस्तियों ने बाहर बहुत-से घपले-घोटाले किए मगर जेल के भीतर वे हर प्रकार की बुरी आदतों से दूर हैं। आजकल खुद को बेहतर इंसान बनाने में जुटे हुए हैं। मेरी शुभकामनाएं उनके साथ हैं।

बंधु, बड़े ही नसीब वाले होते हैं वे, जिनके कने जेल की हवा और रोटी खाना व चक्की पिसना लिखा होता है। इतिहास उनके इस त्याग का गवाह बनता है। यह बड़ी बात है।

खैर, उनके जेल जाने के पीछे उद्देश्य जो भी रहा हो परंतु निभाया तो उन्होंने नैतिक फर्ज ही है न! इस फर्ज को निभाने के अतिरिक्त उनके कने कोई चारा भी नहीं था खुद को बचाने का। बाहर की चिल्ल-पौं और आरोप-प्रत्यारोप से कहीं बेहतर है जेल की बैरक। अंदर कम से कम ये मशहूर हस्तियां हर पल की सांस तो चैन से ले ही रही हैं।

चैन की सांस लेने अब हमारे पूर्व समाजवादी श्री अमर सिहंजी भी पहुंच गए हैं। उन्हें ऐसे शांतिपूर्ण माहौल की जरूरत भी थी। अभी हाल वे आपरेशन के कठिन दौर से गुजरकर चुके हैं। कुछ दिन तिहाड़ में रहेंगे, पुराने संगे-साथियों से मिले-जुलेंगे सब ठीक हो जाएंगे। हमारे ताईं वे और उनका स्वास्थ्य अति-महत्वपूर्ण है। धन्य हुई तिहाड़ उनको पाकर।

हम तो चाहते हैं कि ये मशहूर हस्तियां ऐसे ही तिहाड़ में बनी रहें। तिहाड़ की शोभा बढ़ाती रहें। साथ ही इनसे वे लोग भी सबक हासिल करें, जो इनके जैसे ही कामों में बाहर संलिप्त हैं। कभी पुलिस के हत्थे चढ़ गए, तो उनके वास्ते भी यही सबसे श्रेष्ठ जगह होगी।

क्या आपको नहीं लगता कि अन्ना की मुहिम का रंग धीरे-धीरे कर असर दिखाने लगा है।

ब्लास्ट के बाद

धर दिल्ली में ब्लास्ट हुआ और उधर खामाखां ही इश्यू बन गया। यार इश्यू बनाने के लिए थोड़े ही न उन्होंने (आतंकवादियों) ब्लास्ट किया था। और फिर ब्लास्ट तो उन्होंने किया था, बुरा-भला उन्हें कहें, आप और विपक्ष मिलकर नाहक ही हमारी प्रगतिशील सरकार को कोस रहे हैं। यह कोई बात थोड़े न हुई यार!
क्या सरकार हर वक्त यही देखती रहे कि कहां ब्लास्ट हुआ, किसने किया, क्यों किया, किसलिए किया? ब्लास्ट में कहां कित्ते मरे गए और कित्ते हताहत हुए? सरकार के कने और भी कई जरूरी काम हैं। जनहित के वास्ते तमाम योजनाएं-परियोजनाएं बनाने को पैंडिंग पड़ी हैं। विकास दर को भी देखना है। अभी महंगाई को भी काबू में करना बाकी है। भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसनी है। साथ ही अपना और मंत्रियों का घर भी देखना-भालना है। क्या जानते नहीं कि हमारी सरकार अभी-अभी एक बड़े ही जटिल आंदोलन से पार पाके चुकी है। जैसे-तैसे अन्ना जी को समझा-बुझाकर मामले को शांत करवाया है। और एक आप हैं कि सरकार से ब्लास्ट क्यों हुआ, कैसे हुआ जैसे गैर-जरूरी प्रश्न पूछने पर आमादा हैं। यह ठीक नहीं है।

यार, जब आपको सरकार बनना पड़ेगा , तब पता चलेगा कि सरकार चलाना क्या होता है? सरकार को तमाम तरह के राजनीतिक दवाबों में रहकर काम करना पड़ता है। कभी इसकी सुन्नी पड़ती है, तो कभी उसकी। जिसके काम आओ उसके बुरे। बंधु, सरकार होना कित्ते जिगरे का काम है, आपको क्या मालूम! आप तो बस...

ठीक है.. ठीक है.. ब्लास्ट की धमक सरकार के कानों तक भी पहुंच चुकी है। अभी वो सारे माजरे को देख समझ रही है। प्राथमिक स्तर पर जांच के आदेश दिए जा चुके हैं। सरकारी फरमान पर दिल्ली समेत हर राज्य, हर प्रदेश, हर शहर, हर गांव, हर गली-मोहल्ले तक में हाई-अलर्ट घोषित कर दिया गया है। सूंघने वाले कुत्तों को काम पर लगा दिया गया है। जगह-जगह के मेटल डिडक्टर और सीसीटीवी कैमरे पोंछे ठीक किए जा रहे हैं। बसों-रेलों-हवाईजहाजों आदि-आदि को छाना जा रहा है। जिसे जहां जो भी संदिग्ध वस्तु या व्यक्ति नजर आवे झटसे पुलिस या सरकार को सूचित करें। यकीन करें एक्शन तुरंत होगा। हमारी हर वक्त मुस्तैद रहने वाली पुलिस हर कहीं लगी हुई है। निश्चिंत रहें कार्य प्रगति पर है।

कान खोलकर सुन लीजिए सरकार विपक्ष इस वक्त कोई भी चुप नहीं बैठा है। यह निंदा का समय है। सभी दल और मंत्रीगण अपनी-अपनी तरह और तरीके से ब्लास्ट की निंदा करने में व्यस्त हैं। जिसे जहां जगह मिल रही है, वहां जाकर अपनी निंदा को अभिव्यक्त कर रहा है। ब्लास्ट पर देशभक्तिपूर्ण बयानों का आना शुरू हो चुका है। किसी के निशाने पर सरकार है, तो किसी के गृहमंत्री। अंदरखाने इस-उस के इस्तीफों की आवाजें भी उठने लगी हैं। जनहित में कुछ नेता-मंत्री हस्पतालों के भी चक्कर काट आए हैं। राहुल बाबा भी गए थे पर उन्हें मायूसी में वहां से रूखस्त होना पड़ा। मतलब कि ब्लास्ट पर सरकार, विपक्ष और नेताओं के बीच कुछ कुछ चल जरूर रहा है।

प्रधानमंत्री जी ने साफ कह दिया है कि चाहे जो हो जाए पर घुटने नहीं टेकेंगे। सख्त से सख्त कार्रवाई का भरोसा उन्होंने जताया है। अब आपको चाहिए कि आप उनके भरोसे पर भरोसा रखें क्योंकि यही वक्त की मांग है। अपनी अक्ल दौड़ाएं, दौड़ने के लिए सरकार और प्रशासन के कने तमाम लोग हैं। हां दिल बहलाने को थोड़ी-बहुत भर्त्सना चलेगी।

सरकार हमारी भली है। प्रगतिशील है। सब मैनेज कर लेगी। इत्ते सालों से कैसे कर रही है आपको पता ही है। सरकार को अधिक डिस्टर्ब करें। अन्य कामों के साथ-साथ वो ब्लास्ट और ब्लास्ट करने वालों को भी देख लेगी। मालूम होगा कि सरकार ने मुआवजे का ऐलान कर ही दिया है। सरकार के ताईं मुआवजा राशि ही हर मर्ज और दर्द का इलाज है शायद!
बहरहाल, आप जनता से गुजारिश है कि चुप रहें। क्योंकि जब जनता बोलती है तो सरकारों को बुरा लगता है। जैसाकि अभी भ्रष्टाचार के मसले पर लगा था। ऐसा ही अक्सर उसे कसाब और अफजल गुरु के मसले पर भी लग जाता है।

लेकिन एक डर मेरे मन में उठने-सा लगा है कि कहीं भ्रष्टाचार के मुद्दे की तरह अब आतंकवाद को लेकर कोई दूसरा अन्ना कहीं धरने या अनशन पर बैठ जाए। सरकार को इस डर को समझना चाहिए।
 

हिंदी दिवस पर दिए ज्ञानी जी के भाषण के बहाने

हमारे मोहल्ले के ज्ञानी जी द्वारा हिंदी दिवस की याद के मौके पर दिए गए भाषण के संपादित अंश आपके जेरे-नजर हैं।
साथियों, आज हिंदी दिवस है। यानी हिंदी को याद करने का एक दिन। हिंदी दिवस को केवल अपने मोहल्ले में ही नहीं बल्कि पूरे देश के हर मोहल्ले के कोने-कोने में खूब जोर-शोर के साथ सैलिब्रेट किया जाता है। सैलिब्रेट किया भी जाना चाहिए क्योंकि हमारी लाइफ हिंदी के बिना इनकंपलीट-सी है। लाइफ को अगर कंपलीट करना या बनाना है, तो जितना और जहां तक हो सके हम-आप हिंदी में ही कनवरसेशन करें। जैसे कि आज इस मंच से मैं आपसे कर रहा हूं।

यह तो आप बचपन से ही जानते हैं कि हिंदी हमारी मदरटंग है। चूंकि इसमें मदर शब्द जुड़ा है, इस नाते हिंदी की हर प्रकार से रिसपेक्ट करना हमारी ड्यूटी बनती है। बट मैं देख रहा हूं हम अब हिंदी के प्रति इनडिफरेंट-सा रूख अपनाते जा रहे हैं। हम बोल तो हिंदी ही रहे हैं बट उसमें जरूरत से ज्यादा इंग्लिश के बडर्स इस्तेमाल कर हमने अपनी मदरटंग को हिंग्लिश बना दिया है। दिस इज बेरी बेड। यह हिंदी लैंग्विज का सीधा-सीधा अपमान है।

मुझे यह बताते हुए बड़ी सेडनेस फील हो रही है कि हमारी हिंदी आज डेनजरजोर में है। और, हिंदी के प्रति यह खतरा निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। हिंदी को सबसे ज्यादा खतरा ग्लोबल ताकतों से है। मार्केट हिंदी को बेहद अफेक्ट कर रहा है। मार्केट ने हिंदी की वेल्यूज को ही नष्ट कर दिया है। हम हिंदी का कल्चर भूलते जा रहे हैं। आज जब मैं युवा पीढ़ी को आपस में हिंग्लिश में स्पीस करते हुए देखता व सुनता हूं, तो मेरा कलेजा मुंह को आ जाता है। मेरे फोरहेड पर चिंता की लकीरें उभरने लगती हैं। बार-बार खुद से कोशचन करता हूं कि हमारी यंगर जनरेशन को यह क्या होता जा रहा है! बैड थिंकिंग।

बताइए आज नाइनटी परसेंट युवा एसएमएस की लैंग्विज में ही बात करना पसंद करते हैं। हिंदी को भी बेहद शार्ट करके लिखते हैं। हिंदी-अंग्रेजी का मिक्चर हमारी भाषा को खराब कर रहा है। और, यह सब अमेरिकी कल्चर के कारण ही है। हमारे भीतर अमेरिकी कल्चर इस कदर बस गया है हम उससे बाहर आना ही नहीं चाहते। मुझे यह कहते हुए कतई फियर नहीं कि हमारी हिंदी को अमेरिकी कल्चर ही बिगाड़ रहा है। यह अमेरिका की सोची-समझी चाल है। इंडियन गवरमेंट को इस बारे में कुछ न कुछ सोचने व करने की जरूरत है।

सोने पर सुहागा ये कि मुई फेसबुक और अदर सोशल नेटवर्किंग साइटस भी हिंदी लैंग्विज को नुकसान पहुंचा रही हैं। आई डोंट नो लोग कैसे कह रहे हैं कि सोशल नेटवर्किंग के कारण हिंदी का स्पेस बढ़ रहा है, बट मुझे यह तर्क अटपटा-सा लगता है। अरे, फेसबुक की भी कोई भाषा है। मजा तो हमारी ओल्ड लैंग्विज में ही था। इत्ती पियोर की पियोरनेस भी शरमा जाए। पर क्या करें हम तो अंधी दौड़ में भागे ही चले जा रहे हैं। दस इज डेंजरस फॉर आवर हिंडी लैंग्विज।

यू नो आजकल की हिंदी फिल्में भी हिंदी का कबाड़ा कर रही हैं। बताइए देल्ही-बेली (धीमी-सी आह भरते हुए) जैसी अश्लील फिल्म को प्रोग्रेसिव फिल्म की कैटीगिरी में रखा जा रहा है। ऊपर से उसकी स्लंग-लैंग्विज...हम ऐसी फिल्मों को अपनी फैमली के साथ बैठकर नहीं देख सकते। अभी हाल मैंने डर्टी पिक्चर के प्रोमो को देखा। उफ्फ! मुझसे वो सबकुछ फैमली के साथ देखा नहीं गया। कित्ता गलत वातावरण बना रही हैं ये फिल्में हमारे आसपास। मैं पूरजोर आवाज में यह कहना चाहता हूं कि ऐसी फिल्में और भाषा हमारी मदरटंग के प्रति अपमान सरीखी हैं। हमें इसके खिलाफ प्रोटेस्ट करना चाहिए। अन्ना जी से इसके रिगार्डिंग बता करता हूं।

वैल, मेरे कने अभी कहने को बहुत कुछ है। बट टाइम की शार्टनेस है। अभी एक जगह और हिंदी के प्रोग्राम को सैलिब्रेट करने जाना है। बट हममें से प्रत्येक आज इस मंच से यह ओथ ले कि हम अपनी मदरटंग का अपमान नहीं सहेंगे, नहीं सहेंगे। ग्लोबल पावर का हर हाल में विरोध करेंगे। हिंदी को उसका लॉस्ट हुआ कल्चर, वैल्यूज और डिगनिटी सब वापस लाकर देंगे।

जय हिंदी! जय भारत! जय इंडिया!

निंदा तू न गई मन से


यह निंदा का समय है। यहां-वहां से किस्म-किस्म की निंदाएं सुनने में भी आ रही हैं। कोई धमाके की निंदा में व्यस्त है, तो कोई सरकार की। निंदा की आड़ पाकर विपक्ष के कने सुनहरा मौका हाथ आया है, अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने का। सरकार को बतलाने का कि जब हम थे तो ऐसा नहीं होता था, लेकिन जबसे आप आएं हैं ऐसा होता ही रहता है। क्यों? बेचारी सरकार गफलत में है कि करे भी तो क्या? मगर अफसोस सरकार की मजबूरियों को कोई समझने की कोशिश ही नहीं करना चाहता। यहां तो सभी निंदारस का लुत्फ लेने और देने में लगे हैं।


वाकई आतंकवाद और भ्रष्टाचार सरकार की नाक का नासूर बन गए हैं। शायद यही वजह है कि सरकार ने निंदाओं पर अधिक ध्यान देना ही बंद कर दिया है। उसकी बला से जिसके मन में जो आए वैसी निंदा करे। सरकार को निंदा सहने की आदत-सी हो गई है शायद। क्या करें ऐसी घोर निंदाओं के बीच जिसे निंदा न सहने की आदत हो वो भी इसे सहन करना सीख जाएगा। वक्त अपने हिसाब से हमें सबकुछ सीखा देता है।

बतलाने की आवश्यकता नहीं कि निंदा करना हमारा 'लोकतांत्रिक अधिकार' है। निंदा करने का बस बहाना हमारे हत्थे आना चाहिए फिर देखिए हम क्या से क्या नहीं कह-बोल जाते हैं।

अब देखिए न। धमाका दिल्ली में हुआ, धमाका करने वाले भी कोई और थे, पर निंदा खामाखां ही बेचारी सरकार और नेताओं की हो रही है! समूचा विपक्ष गा रहा है कि यह सरकार धमाके और हमलों को रोकने में नाकाम साबित हुई है। इसे इस्तीफा दे देना चाहिए। जरा-जरा-सी बात पर तो इस्तीफा मांगने लग जाते हैं वे। सरकार ने भी माना है कि चूक हुई है पर इसका हल इस्तीफा थोड़े है। बेहद गंभीरता से सरकार इस मसले को देख-समझ रही है। प्रधानमंत्री जी ने भी धमाके को कायरतापूर्ण कदम बताया है। दहशतगर्दों को न बख्शने का आश्वासन भी दिया है। फिर भी आप सरकार के इकबाल को तोड़ने पर जुटे हैं। सरकार को वक्त दीजिए। एक दिन वो दूध का दूध और पानी का पानी करके दिखा देगी।

यूं निंदा से कुछ हासिल नहीं। निंदा कर अपना खून न जलाइए। आप ही सुरक्षित रहने की कोशिश कीजिए। जब जरूरी हो तब ही घर से बाहर निकलिए। और जब निकलिए अपना बीमा करवाकर निकलिए। क्योंकि अपने यहां धमाकों का कोई भरोसा नहीं कहीं भी हो जाते हैं। बस यह न भूलिए कि सरकार का हाथ हमेशा आम आदमी के साथ है। उसे सहयोग कीजिए और करते रहिए। पर निंदा न कीजिए...क्योंकि सरकार को निंदा सुनना अच्छा नहीं लगता।