शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

विरोध की सजा

साथियों, इन दिनों अपन बड़े ही दुखदाई दौर से गुजर रहे हैं। घर से राशन-पानी के लाभ लगभग बंद है। सोना फुटपाथ पर और पहनना पड़ोसी के कपड़ों का हो रहा है। इस अपमान के खिलाफ अपन की आवाज को निरंतर दबाया जा रहा है। जिससे जिक्र करो सब सांत्वना देकर रह जाते हैं। कोई भी अपन का साथ देने आगे नहीं आता। यहां तक कि नाते-रिश्तेदारों ने भी साफ कह दिया है कि या तो अपनी पत्नी की बात मानो नहीं तो यूंही यहां-वहां धक्के खाते रहो। क्या मेरी शक्ल को देखकर आपको लगता है कि मैं केवल धक्के खाने के लिए हूं! अरे, जिस शख्स ने आज तलक कभी कलम को धक्का नहीं दिया, वो सरेराह धक्के खा रहा है। यह बेहद अफसोसजनक है।

दरअसल, आजकल पत्नी और अपन में काफी ऐंठी हुई है। बढ़ते-बढ़ते यह ऐंठ इस कदर बढ़ गई कि अपन का आटा कंगाली में गिला होने लगा। पत्नी को बहुतेरा समझाया परंतु वो समझने को तैयार ही नहीं। उसने एकमन से डिसाइड कर लिया है कि वो अन्ना की मुहिम के साथ है। और मुझ पर भी यह दवाब बनाना शुरू कर दिया कि मैं भी उसकी मुहिम का हिस्सा बनूं। सिविल सोसाइटी का पैरोकार बनूं। उसके साथ घर-घर जाकर भ्रष्टाचार के खिलाफ परचे बाटूं। शहर के चौराहे पर टी. वी. कैमरों के समक्ष भ्रष्टाचार का पुतला दहन करूं। यहां-वहां बैठकें कर लोगों को जोड़ूं व भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलूं। गालों पर इंडिया (भारत का नहीं) का नक्शा पुतवाऊं। रोज पहननेवाले कपड़ों में थोड़ा देशभक्तिमय किस्म का फ्यूजन लाऊं। यानी कि अन्ना के फेवर में, मन न होते हुए भी, अपन हर वो काम करें जो और जैसा पत्नी का आदेश हो। यह तो खुली तानाशाही हुई न।

लेकिन पानी जब खतरे के निशान से ऊपर बहने लगा तो अपन ने पत्नी से साफ कह दिया यह अपने बस की बात नहीं और तुम भी इस लफड़े में न ही पड़ो तो अच्छा। क्या पता कल को किस नेता या मंत्री से अपना कोई व्यक्तिगत काम निकल आवे। आज के समय में हर किसी से संबंधों को बनाकर चलने में ही भलाई है। अगर वे भ्रष्टाचारी हैं भी तो क्या हुआ, कौन-से अपने घर के सगे हैं। और फिर भ्रष्टाचारियों पर पहला पत्थर तो वो फेंके जिनके खुद के घर शीशे के न हों। अरे, ईमानदार होना कोई अच्छी बात थोड़े ही है।

बस पत्नी को अपन की यही नसीहत नापसंद गुजरी और अपना टिकट घर से कटने में क्षणभर भी न लगा। अपन अब सड़क पर हैं। बाकी देश के सभी भ्रष्ट-ईमानदार मौज में। देश में इत्ती तादाद में यकायक ईमानदारों का बढ़ना अपन को परेशान किए हुए है। सच्ची कह रहे हैं जिन चेहरों को अपन ने सरकारी दफ्तरों में कभी सीट पर बैठे नहीं देखा, जब भी देखा तो हरी पत्ती की महक लेते हुए देखा, आज वे सब के सब अन्ना के आंदोलन तले धरनों-प्रदर्शनों के साथ ईमानदार हो गए हैं! उनकी भाषा अति-क्रांतिकारी हो गई है। नैतिकता का बोध उनमें कुलाचे मार रहा है। और भी न जाने इन दिनों उनके भीतर क्या-क्या हो-चल रहा है।

पर क्या करें अपन की पत्नी उनके इस करेक्टर को पढ़ना ही नहीं चाहती। उसके ताईं तो अन्ना और सिविल सोसाइटी ही माई-बाप है। जो भी हो मगर ये हो गलत रहा है; अपन के साथ भी और देश के साथ भी। सिविल सोसाइटी को समझना चाहिए कि भ्रष्टाचार समय की मांग है। भ्रष्टाचारी पुरातन परंपरा के सहज वाहक। अन्ना के इशारे पर अगर सभी ईमानदार हो गए, तो यह देश, समाज, लोकतंत्र, राजनीति, व्यवस्था सब कैसे चलेगा!
फिलहाल, अपन तो इतना कह सकते हैं कि ईश्वर उन्हें (मय पत्नी) सदबुद्धि दे।

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