गुरुवार, 11 अगस्त 2011

ढीला करेक्टर सदा सहाय

रेक्टर
का ढीला होना अब कोई संगीन मुद्दा या जुर्म नहीं रह गया है। लोग जमकर अपने करेक्टर को ढीला कर व करवा रहे हैं। दरअसल, करेक्टर जितना ढीला होगा समाज का आपके प्रति दृष्टिकोण उतना ही लचीला बनेगा। आप हर कहीं आसानी से जान-पहचान लिए जाएंगे। आज हमारे समाज में छह में से साढ़े पांच लोगों का करेक्टर किसी न किसी वजह से ढीला ही है। और मजे की बात यह है कि वे बेहद मस्ती के साथ अपने ढीले-ढाले करेक्टर को इंजॉय भी कर रहे हैं। गए वो दिन जब करेक्टर का ढीला होना देश, समाज और परिवार में बेहद बुरा समझा जाता था। ढीले करेक्टरवालों से सभ्य लोग बात तक करना पसंद नहीं करते थे। समाज में एक तरह से अछूतों जैसा व्यवहार उनके साथ किया जाता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। वक्त बदल गया है। अब ढीले करेक्टरवालों को ज्यादा चरित्रवान माना जाता है। बुद्धिजीवि उन पर कलमें तोड़ते हैं। मीडिया दिन-रात उन पर बहस चलाता है। अब तो पढ़े-लिखे मां-बापों ने अपने बच्चों को कुछ न कुछ करेक्टर के ढीला होने व रखने की हिदायतें भी देना शुरू कर दिया है। आगे चलकर सरकार इसे कोर्स में भी जोड़ सकती है। हमारे बीच बहुत तेजी से एक नए तरह का ढीला चरित्र आकार लेने लगा है। क्या नहीं लगता आपको कि यह हमारी उत्तर-आधुनिक सोचों का विस्तार है?

फिल्म रेडी के बाद से तो ढीले करेक्टर ने ऐसा जमकर जोर पकड़ा है कि पूछिए ही मत। मेरे मोहल्ले के न जाने कितने चरित्रवान युवक-युवतियां अब अपने करेक्टर को ढीला करने में जुट गए हैं। वे जल्द से जल्द अपनी कथित 'अच्छे बच्चे' की छवि से बाहर आना चाहते हैं। आपनी जिंदगी को अपने स्टाइल में जीने की हसरत रखते हैं। अगर आप उन्हें ऐसा करने से रोकते या टोकते हैं, तो टका-सा जवाब देते हैं कि जब ए. राजा, कलमाडी, कनिमोझी आदि-आदि अपने करेक्टर को ढीला कर सकते हैं, तो फिर हम क्यों नहीं? हमें हमारे करेक्टर को ढीला करने से हर पल रोका-टोका क्यों जाता है? क्या अपने ढीले करेक्टर के प्रति हमारे अरमान नहीं हो सकते?
आज राजनीति से लेकर साहित्य तक में जिसे भी देख लीजिए हर कोई अपने करेक्टर के स्ट्रेक्चर को ढीला करने में लगा हुआ है। करेक्टर ढीला है एक तरह से मुफ्त की पब्लिसिटी का माध्यम-सा बनता जा रहा है। यानी हींग लगे न फिटकरी, रंग फिर भी चोखा का चोखा।

आप माने या न मानें ढील करेक्टर का सबसे ज्यादा लाभ हमारे नेताओं ने उठाया है।

क्या वक्त आ गया है। समाज भी अब उन्हें ही सफल मानता है, जिनका जितना करेक्टर ढीला होता है। ढीला करेक्टर हमारे बीच ज्यादा समय तक टीका भी रहता है। अब हमारी यूपीए सरकार को ही ले लीजिए। सरकार में तमाम बड़े नेताओं के करेक्टर ढीले होने के बावजूद सरकार मस्त चल रही है। पिछले सात सालों से टिकाऊ है। तमाम हो-हल्ले के बाद भी महंगाई, भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दे पर अपना रूख लचीला ही रखती है। काबिले-गौर यह है कि सरकार के ढीले करेक्टर के खिलाफ जितने भी अनशन या सत्याग्रह होते हैं, सरकार के चरित्र पर कौनऊ फर्क नहीं पड़ता। अन्ना ने अनशन किया। बाबा ने अनशन किया। आठ दिन तलक भूखे-प्यासे भी रहे। हस्पताल तक की यात्रा कर आए। पर सरकार टस से मस न हुई। ऊपर से ताना और मार दिया कि सब नौटंकी है। प्रचार पाने का सस्ता तरीका है। हम अपने ढीले करेक्टर को किसी कीमत ठीक नहीं कर सकते।

समझ लीजिए जब सरकार और उसके मंत्री अपने ढीले करेक्टर के प्रति संजीदा नहीं हैं, तो भला आम आदमी क्यों हो? सल्लू मियां ने ठीक ही तो कहा है कि मैं करूं तो साला करेक्टर ढीला है। यह बरसों पुरानी इंसानी फितरत है कि वो कभी अपने गिरेबान में मुंह डालकर नहीं देखता, हमेशा दूसरों के गिरेबानों में ताकता-झांकता रहता है।

कुछ भी हो हमें तहे-दिल से सल्लू मियां का पुनः शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने हमें दबंग की दबंगई सिखाने के बाद अब ढीले करेक्टर के बेहद उम्दा मायने बताए हैं। वैसे भी ढीले करेक्टर की दुश्वारियों का सबब सल्लू मियां से बेहतर कोई नहीं जान-समझ सकता। बावजूद इतने दंद-फंद के सल्लू मियां अपने ढीले करेक्टर को भरपूर इंजॉय कर रहे हैं, यह बड़ी बात है। मैं तो कहता हूं कि हमें अपने करेक्टर के साथ किसी न किसी बिंदु पर ढीला होना ही चाहिए। ढीला करेक्टर सदा सहाय।

फिलहाल, अब अपनी कोशिश तो यही है कि किसी न किसी बहाने अपना भी करेक्टर ढीला हो जाए। कुछ वाद हों। कुछ विवाद हों। करेक्टर के पुर्जे कुछ यहां उछलें तो कुछ वहां। समाज और परिवार के बीच ढीले करेक्टर का कम से कम खिताब तो मिले। देखते हैं अपनी यह दिली-तमन्ना कब तलक पूरी होती है।

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