शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

ठलुओं का खत अन्ना के नाम

मारे प्यारे अन्ना,

हम सब फलां मोहल्ले के काबिल ठलुए हैं। हमें अपनी काबिलियत पर जरा भी शक नहीं लेकिन क्या करें मोहल्लेवाले हमें समझने की कोशिश ही नहीं करते! देखिए, यह हमारी काबिलियत का ही असर है कि हम सब आज आपके संग आपके आंदोलन के बीच खड़े हैं। एक तीर से दो-दो निशाने साध रहे हैं। एक तरफ आपके आंदोलन का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं और दूजी तरफ अपनी ठलुए की इमेज से बाहर आने की कोशिश में लगे हैं। गली के नुक्कड़ पर तांक-झांक करने से तो बेहतर है कि थोड़ी-बहुत अन्नागिरी ही कर ली जाए!

सच्ची बताएं अन्ना अब हमारा दिन पहले से कहीं बेहतर गुजरने लगा है। पौ फटते ही हम आंदोलन में जुट जाते हैं। हमारी टीम में किसी के जिम्मे चीखना-चिल्लाना है, तो किसी के जिम्मे व्यवस्था और सरकार को कोसना। और जिन्हें हर रोज नए-नए खूबसूरत दोस्त बनाने की आदत है, वे सिविल सोसाइटी के बीच रहने-उठने का जिम्मा संभाले हुए हैं। आजकल उनकी तो समझिए निकली हुई है। कल तलक जो दोस्त खूबसूरत चेहरों को देखकर बस आह ही भरकर रह जाते थे, आज वे उन चेहरों के बीच ऐसे घुल-मिल गए हैं, जैसे उनकी उनसे बरसों पुरानी जान-पहचान हो। वाकई अन्ना ये सिविल सोसाइटी के लोग भी क्या मस्त-मौला किस्म के होते हैं। अबसे हमने ठान लिया है कि हम भी सिविल सोसाइटी के साथ ही उठा-बैठा करेंगे। अभी तो बहुत कुछ उनसे सीखना बाकी है हमें।

हमने आजादी का आंदोलन तो खैर नहीं देखा। लेकिन आज जब आपके आंदोलन को देख व उसके बीच रह रहे हैं, कसम से बढ़ा ही मजा आ रहा है हमें। हमें नहीं मालूम था कि आंदोलन इत्ते खूबसूरत भी हुआ करते हैं। मोहल्ले के किसी भी कोने पर खड़े हो जाओ पांच-सात लोग आपके आंदोलन का समर्थन करते हुए मिल ही जाते हैं। यहां कोई अन्ना की टोपी लगाकर समर्थन कर रहा है, तो कोई हाथों में तिरंगा थामे। सरकार और पुलिस तो एक कोने में खड़े बस तमाशा देखने को मजबूर हैं।

चूंकि हम ठलुओं का एजूकेशन में हाथ जरा तंग है, इस कारण हम जनलोकपाल बिल के क ख ग को समझने में असमर्थ हैं लेकिन कोई बात नहीं, भीड़ संग भागना हमें अच्छे-से आता है। दरअसल, इस वक्त तो हमें अपनी इमेज का ख्याल है और इसे बनाने में हम कुछ भी करेंगे। एक हम ही क्यों आपके आंदोलन के बहाने ऐसे न जाने कितनों को हम देख चुके हैं, जो इन दिनों अपनी बेईमान छवि को ईमानदार बनाने में जी-जान से जुटे हैं। भला बहती गंगा में हाथ धोने में किसे मजा नहीं आता! फिर गंगा जब अन्ना व सिविल सोसाइटी की हो तो बात ही क्या है।

न न अन्ना आप चिंता मती करो। हम ठलुए अपनी नासमझदारी को भी समझदारी में बदल लेते हैं। आप तो बस रामलील मैदान में डटकर संघर्ष करो। हम आपके साथ हैं।

वैसे तकनीक की इस अलबेली दुनिया में आधे से ज्यादा संघर्ष तो सोशल नेटवर्किंग के जरिए ही हो रहा है। कोई फेसबुक की दीवारों के रंग-रौवन में लगा है, तो कोई टि्वटर पर चहचहा रहा है। यानी सब के सब अन्ना के आंदोलन को हिट करने-कराने में व्यस्त हैं। हम ठलुए लकी हैं कि हमारा सहयोग भी आप ही को जा रहा है।

अन्ना अबकी दफा यह जंग थमनी नहीं चाहिए। गांधी भी मंगल पर बैठे-बैठे आपको आर्शीवाद दे रहे हैं। और तो और समस्त देवी-देवता भी आपके इस इंडिया अगेंस्ट करपशन के प्रयास से अति-प्रसन्न हैं। समूचे ब्रह्मांड में आपकी जयजयकार हो रही है। सिविल सोसाइटी का किया कमाल अब जाकर अपनी रंगत दिखा रहा है। तो मान लें कि अन्ना-क्रांति का रंग जम गया है। चाहें तो मिस्र वाले भी अन्ना एंड कंपनी से क्रांति व आंदोलन करने की सलाह ले सकते हैं।

तो अन्ना अभी हम ठलुए आपसे विदा लेते हैं काफी सारा चिखना-चिल्लाना बाकी रह गया है। अब तो दूसरे मोहल्ले के ठलुए भी हमारे साथ आ चुके हैं। अन्ना आप ऐसे ही चहकते रहो हमारा पूरा का पूरा ग्रुप आपके साथ है। जय अन्ना। जय ठलुआ बिरादरी।

शुभेच्छु
आपके सभी काबिल ठलुए

विरोध की सजा

साथियों, इन दिनों अपन बड़े ही दुखदाई दौर से गुजर रहे हैं। घर से राशन-पानी के लाभ लगभग बंद है। सोना फुटपाथ पर और पहनना पड़ोसी के कपड़ों का हो रहा है। इस अपमान के खिलाफ अपन की आवाज को निरंतर दबाया जा रहा है। जिससे जिक्र करो सब सांत्वना देकर रह जाते हैं। कोई भी अपन का साथ देने आगे नहीं आता। यहां तक कि नाते-रिश्तेदारों ने भी साफ कह दिया है कि या तो अपनी पत्नी की बात मानो नहीं तो यूंही यहां-वहां धक्के खाते रहो। क्या मेरी शक्ल को देखकर आपको लगता है कि मैं केवल धक्के खाने के लिए हूं! अरे, जिस शख्स ने आज तलक कभी कलम को धक्का नहीं दिया, वो सरेराह धक्के खा रहा है। यह बेहद अफसोसजनक है।

दरअसल, आजकल पत्नी और अपन में काफी ऐंठी हुई है। बढ़ते-बढ़ते यह ऐंठ इस कदर बढ़ गई कि अपन का आटा कंगाली में गिला होने लगा। पत्नी को बहुतेरा समझाया परंतु वो समझने को तैयार ही नहीं। उसने एकमन से डिसाइड कर लिया है कि वो अन्ना की मुहिम के साथ है। और मुझ पर भी यह दवाब बनाना शुरू कर दिया कि मैं भी उसकी मुहिम का हिस्सा बनूं। सिविल सोसाइटी का पैरोकार बनूं। उसके साथ घर-घर जाकर भ्रष्टाचार के खिलाफ परचे बाटूं। शहर के चौराहे पर टी. वी. कैमरों के समक्ष भ्रष्टाचार का पुतला दहन करूं। यहां-वहां बैठकें कर लोगों को जोड़ूं व भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलूं। गालों पर इंडिया (भारत का नहीं) का नक्शा पुतवाऊं। रोज पहननेवाले कपड़ों में थोड़ा देशभक्तिमय किस्म का फ्यूजन लाऊं। यानी कि अन्ना के फेवर में, मन न होते हुए भी, अपन हर वो काम करें जो और जैसा पत्नी का आदेश हो। यह तो खुली तानाशाही हुई न।

लेकिन पानी जब खतरे के निशान से ऊपर बहने लगा तो अपन ने पत्नी से साफ कह दिया यह अपने बस की बात नहीं और तुम भी इस लफड़े में न ही पड़ो तो अच्छा। क्या पता कल को किस नेता या मंत्री से अपना कोई व्यक्तिगत काम निकल आवे। आज के समय में हर किसी से संबंधों को बनाकर चलने में ही भलाई है। अगर वे भ्रष्टाचारी हैं भी तो क्या हुआ, कौन-से अपने घर के सगे हैं। और फिर भ्रष्टाचारियों पर पहला पत्थर तो वो फेंके जिनके खुद के घर शीशे के न हों। अरे, ईमानदार होना कोई अच्छी बात थोड़े ही है।

बस पत्नी को अपन की यही नसीहत नापसंद गुजरी और अपना टिकट घर से कटने में क्षणभर भी न लगा। अपन अब सड़क पर हैं। बाकी देश के सभी भ्रष्ट-ईमानदार मौज में। देश में इत्ती तादाद में यकायक ईमानदारों का बढ़ना अपन को परेशान किए हुए है। सच्ची कह रहे हैं जिन चेहरों को अपन ने सरकारी दफ्तरों में कभी सीट पर बैठे नहीं देखा, जब भी देखा तो हरी पत्ती की महक लेते हुए देखा, आज वे सब के सब अन्ना के आंदोलन तले धरनों-प्रदर्शनों के साथ ईमानदार हो गए हैं! उनकी भाषा अति-क्रांतिकारी हो गई है। नैतिकता का बोध उनमें कुलाचे मार रहा है। और भी न जाने इन दिनों उनके भीतर क्या-क्या हो-चल रहा है।

पर क्या करें अपन की पत्नी उनके इस करेक्टर को पढ़ना ही नहीं चाहती। उसके ताईं तो अन्ना और सिविल सोसाइटी ही माई-बाप है। जो भी हो मगर ये हो गलत रहा है; अपन के साथ भी और देश के साथ भी। सिविल सोसाइटी को समझना चाहिए कि भ्रष्टाचार समय की मांग है। भ्रष्टाचारी पुरातन परंपरा के सहज वाहक। अन्ना के इशारे पर अगर सभी ईमानदार हो गए, तो यह देश, समाज, लोकतंत्र, राजनीति, व्यवस्था सब कैसे चलेगा!
फिलहाल, अपन तो इतना कह सकते हैं कि ईश्वर उन्हें (मय पत्नी) सदबुद्धि दे।

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

सोने की चमक में चेन चोरों की चांदी

प्यारे सोने, तुम दिन-दूनी राती-चौगनी रफ्तार से यूंही बढ़ते रहो। तुम बढ़ते हो तो मेरे मोहल्ले के चेन चोरों को काम मिला रहता है। वे दिन-रात कभी इसकी तो कभी उसकी चेन खेंचने में व्यस्त रहते हैं। इस बहाने तुम उन बेचारों का परिवार पाल रहे हो तुम्हारा यह एहसान क्या कम है उन पर! दोस्त वही जो जरूरत पर काम आए। आज के बिगड़ैल समय में ऐसे नेकदिल दोस्त भला कहां मिलते हैं।

प्यारे चेन चोरों, तुम दुनिया की चिंता न करो। इसका काम तो कहना है। यह कहती रहेगी। बिन कहे इसकी रोटी भी कहां हजम होती है। बस तुम खामोशी के साथ अपने काम को अंजाम देते रहो। यही सबसे बेहतरीन मौका है। इस वक्त प्यारे सोने के दाम आम की पहुंच से पीछे और खास की पहुंच में हैं। खास वर्ग जमकर सोने पर पैसा लुटा रहा है। उसे ऐसे ही लुटाने दो। सोना जितना चमकेगा खास वर्ग उतना ही रिझेगा। तुम तो कैसे भी उसके रिझने का फायदा उठाए रहो।

निरंतर देख-पढ़ रहा हूं कि चेन चोरी हमारे चोर भाईयों का सबसे प्रॉफिट का काम बनती जा रही है। हालांकि यह है तो काफी जोखिम और मेहनत भरा काम लेकिन एक दांव में ही वारे-नियारे हैं। वाईमिस्टेक आप चेन चुराते पकड़े भी जाते हैं तो घबराने की कोई जरूरत नहीं क्योंकि हरी पत्ती के आगे हर पकड़-धकड़ बेमानी है। मेरे ही शहर में अब तलक न जाने कितनों की चेन पर हाथ साफ हुए हैं परंतु पकड़ा एक भी चेन चोर नहीं गया। हालांकि चेन चोरों को पकड़ने के लिए हमारी पुलिस अब भी प्रयासरत है। उनके प्रयास जारी रहें।

कायदे में चेन के न चुरने का ख्याल तो चेन पहनने वाले को रखना चाहिए। जब मालूम है कि सोने के दाम आसमान पर हैं और चोर भाईयों की भी नजरें ललचाई हुई हैं, तो आप चेन पहनकर निकलती ही क्यों हैं? बावजूद इसके अगर आपको सोने की चेन पहनकर फैशन करने का इत्ता ही शौक है, तो अपने घर में करिए न। कौन रोकता है। सोना पहनकर बाहर निकलेंगी तो हादसा होना संभव ही मानिए। फिर चोर भाई अपने आप को रोक नहीं पाएंगे। आखिर उन्हें भी आगे जवाब देना होता है। मैं तो कहता हूं कि चेन चोरी के लिए चेन चोरों को ही जिम्मेवार ठहराना गलत है, इसके लिए पहनने वाला ही सबसे बड़ा दोषी है।

देखिए, सोना तो सोना ही है। चाहे वो छब्बीस हजार हो जाए या छब्बीस सौ उसका रूतबा कभी कम न होगा। सोना जितना पसंदीदा महिलाओं के बीच है, लगभग उतना ही चोर-उचक्कों के बीच भी। अगर दोनों ही सोना पाने के संघर्ष में लगे रहते हैं, तो हमें या पुलिस वगैहरा को उनके इस कंपटीशन के बीच नहीं पड़ना चाहिए। अपने हाथ व सहयोग से जिसका जितना भला हो सके करते रहना चाहिए। यही इंसानियत का पैगाम भी है।

कुछ मालूम भी है आपको। वो समाज बड़ा ही उदासीन होता है, जहां चोर भाई नहीं होते। चोर भाईयों का होना ठीक उतना ही जरूरी है जितना कि दाल में नमक। अगर चोर भाई नहीं होंगे तो समाज का रहन-सहन गड़बड़ा जाएगा। फिर तो हर बड़ा-छोटा अपनी ली और पहनी हुई चीज पर इतराता फिरेगा। दूसरों को जलाएगा। चोर भाईयों के रहते कम से कम लोगों के भीतर खौफ तो बना रहता है कि कहीं हमारी चीज चोरी न चली जाए! हम कहीं लुट न जाएं! दरअसल चोरी-चकारी एक आदर्श व्यवस्था है अगर सुचारू रूप से चलाई जाए तो। लोगों को चोर भाईयों व चोरी के प्रति अपने नजरिए को बदलने की आवश्यकता है। जिस प्रकार प्रकृति में संतुलन का बने जरूरी है, ठीक वैसे ही समाज के मध्य भी।

सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात, रुपया-पैसा, जमीन-जायदाद, जोरू-दारू समाज के बीच हर वक्त कुछ न कुछ करते-करवाते ही रहते हैं। एक दफा जरा ठंडे दिमाग से सोचकर देखिए कि अगर इनमें से एक भी चीज न हो तो जीवन कितना बेनूर-बेरंग-सा हो जाएगा! फिर न मुझे यहां रहने में लुत्फ आएगा न ही आपको। आप ईमानदारी का गाना कितना ही गा लें किंतु एक समय यही ईमानदारी आपको उक्ताने भी लगेगी। जीवन में जब तक चोरी-चकारे के बहाने एक-दूसरे के खिलाफ भागमभाग नहीं होगी फिर जीने में मजा ही कहां आएगा!
मेरे विचार में सोना इस वक्त बिल्कुल ठीक राह पर है। चेन चोर इसकी चकम को मौका-बेमौका भुना रहे हैं यही उचित भी है। हम तो बस यही चाहते हैं कि किसी के भी पेट पर लात न पड़े। सबकी रोजी-रोटी बनी रहे। सोना अपना काम करता रहे। खास वर्ग अपना। और चेन चोर अपना। अब ऐसे-वैसी खबरें हैं खबरों क्या। जितने मुंह उतनी बातें तो होनी ही हैं। खबरों से बस खबरदार रहिए और अगली चेन चोरी पर रूआंसा नहीं बेशर्म बनिए ताकि चेन चोर भी यह समझ सकें कि आपका दिल कित्ता बड़ा है!

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

सेंसेक्स की लुढ़कती सेहत

प्रि सेंसेक्स, यह तुम्हारी सेहत को क्या हो गया है? क्या हालत बना ली है तुमने अपनी। बस हर रोज लुढ़के ही चले जा रहे हो। तुम्हारा लुढ़कना हमारे दिलों में घबराहट पैदा कर रहा है। हम आशंकाओं पर आशंकित-से हुए जाते हैं। दिन-रात बस यही चिंता खाए जा रही है कि क्या होगा अगर तुम्हारी सेहत ऐसे ही लुढ़कती रही? तुम जानते नहीं तुम्हारी सेहत पर हमारा कितना कुछ निर्भर करता है। तुम स्वस्थ हो तो हम स्वस्थ हैं। तुम प्रसन्न हो तो हम प्रसन्न हैं। तुम्हारी तकलीफ भी हमारी ही तकलीफ है।

हमें इस बात का बेहतर इल्म है कि तुम कितने संवेदनशील प्राणी हो। जरा-जरा सी निगेटिव खबरों पर बिफर जाते हो। फिर ऐसे बिफरते हो कि संभाला मुश्किल पड़ जाता है। न जाने कितनी ही दफा खुद वित्तमंत्री को तुम्हें संभालने आना पड़ा है।

भला कैसे भूल सकते हैं हम तुम्हारी उन पिछली बिफराहटों को। पलभर में तुमने सबकुछ को नेस्तेनाबूद कर दिया था। सड़क पर ले आए थे तुम प्रत्येक आमो-खास निवेशक को। तुम्हारे न उबर पाने के सदने में हमारे बीच से न जाने कितने ही संगी-साथी परलोक सिधार लिए अब तो इसका कोई पक्का हिसाब-किताब भी नहीं मिलता।

इस दफा भी तुम अपनी पुरानी डगर पर ही चल निकले हो। लेकिन इस बात की हमें खासा तकलीफ है कि सरकार अभी तलक तुम्हारी तरफ से नहीं चेती है। सरकार महंगाई की सेहत पर तो चिंतित है परंतु तुम्हारी सेहत का ख्याल अभी तलक उसे नहीं आया है। महंगाई पर संसद में बहस हो रही है और तुम पर कोई बात ही नहीं कर रहा। यह तुम्हारे प्रति घोर अपमान का विषय है। बताइए जिस सेंसेक्स पर समूची गुलाबी अर्थव्यवस्था का भार है, जिसके बहाने विदेशी निवेशक हमारी अर्थव्यवस्था पर कुर्बान हैं, उसकी लुढ़कती सेहत की फिक्र करने वाला न सरकार के बीच कोई है न वित्त-मंत्रालय के।
सेंसेक्स की लुढ़कती सेहत का पूरा फायदा सोना-चांदी जमकर उठा रहे हैं। जिस प्रस्थान बिंदू पर कभी हमारा सेंसेक्स हुआ करता था, वहां पर आज सोना है। चांदी का कहना ही क्या वो तो हर बिंदू को पार कर और भी ज्यादा बिंदास हो गई है।

लेकिन ध्यान रखें सोने-चांदी की यह दबंगई सेंसेक्स के प्रति ठीक संदेश नहीं है। सेंसेक्स के दिमाग की अगर जरा-सी भी हिल गई तो सब दबंगईयां धरी की धरी रह जाएंगी। इस वक्त हमें यही सबसे बड़ा डर है। हम चाहते हैं कि सेंसेक्स दबंग न बने। साथ ही अमेरिकी मंदी का जो फितरती संकट आन खड़ा हुआ है, यह भी सेंसेक्स की सेहत के प्रति सबसे बड़ा लोचा है। हम चाहते हैं कि इस बारे में सरकार कुछ करे। महंगाई की चिंता को हाल-फिलहाल कोने में सरकाकर पूरी तरह से सेंसेक्स की सेहत को संभालने में लग जाए। क्योंकि सेंसेक्स की चुस्त-दुरूस्त सेहत के बल पर ही हमारी अर्थव्यवस्था का गुलाबीपन बरकरार रह सकता है!

ढीला करेक्टर सदा सहाय

रेक्टर
का ढीला होना अब कोई संगीन मुद्दा या जुर्म नहीं रह गया है। लोग जमकर अपने करेक्टर को ढीला कर व करवा रहे हैं। दरअसल, करेक्टर जितना ढीला होगा समाज का आपके प्रति दृष्टिकोण उतना ही लचीला बनेगा। आप हर कहीं आसानी से जान-पहचान लिए जाएंगे। आज हमारे समाज में छह में से साढ़े पांच लोगों का करेक्टर किसी न किसी वजह से ढीला ही है। और मजे की बात यह है कि वे बेहद मस्ती के साथ अपने ढीले-ढाले करेक्टर को इंजॉय भी कर रहे हैं। गए वो दिन जब करेक्टर का ढीला होना देश, समाज और परिवार में बेहद बुरा समझा जाता था। ढीले करेक्टरवालों से सभ्य लोग बात तक करना पसंद नहीं करते थे। समाज में एक तरह से अछूतों जैसा व्यवहार उनके साथ किया जाता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। वक्त बदल गया है। अब ढीले करेक्टरवालों को ज्यादा चरित्रवान माना जाता है। बुद्धिजीवि उन पर कलमें तोड़ते हैं। मीडिया दिन-रात उन पर बहस चलाता है। अब तो पढ़े-लिखे मां-बापों ने अपने बच्चों को कुछ न कुछ करेक्टर के ढीला होने व रखने की हिदायतें भी देना शुरू कर दिया है। आगे चलकर सरकार इसे कोर्स में भी जोड़ सकती है। हमारे बीच बहुत तेजी से एक नए तरह का ढीला चरित्र आकार लेने लगा है। क्या नहीं लगता आपको कि यह हमारी उत्तर-आधुनिक सोचों का विस्तार है?

फिल्म रेडी के बाद से तो ढीले करेक्टर ने ऐसा जमकर जोर पकड़ा है कि पूछिए ही मत। मेरे मोहल्ले के न जाने कितने चरित्रवान युवक-युवतियां अब अपने करेक्टर को ढीला करने में जुट गए हैं। वे जल्द से जल्द अपनी कथित 'अच्छे बच्चे' की छवि से बाहर आना चाहते हैं। आपनी जिंदगी को अपने स्टाइल में जीने की हसरत रखते हैं। अगर आप उन्हें ऐसा करने से रोकते या टोकते हैं, तो टका-सा जवाब देते हैं कि जब ए. राजा, कलमाडी, कनिमोझी आदि-आदि अपने करेक्टर को ढीला कर सकते हैं, तो फिर हम क्यों नहीं? हमें हमारे करेक्टर को ढीला करने से हर पल रोका-टोका क्यों जाता है? क्या अपने ढीले करेक्टर के प्रति हमारे अरमान नहीं हो सकते?
आज राजनीति से लेकर साहित्य तक में जिसे भी देख लीजिए हर कोई अपने करेक्टर के स्ट्रेक्चर को ढीला करने में लगा हुआ है। करेक्टर ढीला है एक तरह से मुफ्त की पब्लिसिटी का माध्यम-सा बनता जा रहा है। यानी हींग लगे न फिटकरी, रंग फिर भी चोखा का चोखा।

आप माने या न मानें ढील करेक्टर का सबसे ज्यादा लाभ हमारे नेताओं ने उठाया है।

क्या वक्त आ गया है। समाज भी अब उन्हें ही सफल मानता है, जिनका जितना करेक्टर ढीला होता है। ढीला करेक्टर हमारे बीच ज्यादा समय तक टीका भी रहता है। अब हमारी यूपीए सरकार को ही ले लीजिए। सरकार में तमाम बड़े नेताओं के करेक्टर ढीले होने के बावजूद सरकार मस्त चल रही है। पिछले सात सालों से टिकाऊ है। तमाम हो-हल्ले के बाद भी महंगाई, भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दे पर अपना रूख लचीला ही रखती है। काबिले-गौर यह है कि सरकार के ढीले करेक्टर के खिलाफ जितने भी अनशन या सत्याग्रह होते हैं, सरकार के चरित्र पर कौनऊ फर्क नहीं पड़ता। अन्ना ने अनशन किया। बाबा ने अनशन किया। आठ दिन तलक भूखे-प्यासे भी रहे। हस्पताल तक की यात्रा कर आए। पर सरकार टस से मस न हुई। ऊपर से ताना और मार दिया कि सब नौटंकी है। प्रचार पाने का सस्ता तरीका है। हम अपने ढीले करेक्टर को किसी कीमत ठीक नहीं कर सकते।

समझ लीजिए जब सरकार और उसके मंत्री अपने ढीले करेक्टर के प्रति संजीदा नहीं हैं, तो भला आम आदमी क्यों हो? सल्लू मियां ने ठीक ही तो कहा है कि मैं करूं तो साला करेक्टर ढीला है। यह बरसों पुरानी इंसानी फितरत है कि वो कभी अपने गिरेबान में मुंह डालकर नहीं देखता, हमेशा दूसरों के गिरेबानों में ताकता-झांकता रहता है।

कुछ भी हो हमें तहे-दिल से सल्लू मियां का पुनः शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने हमें दबंग की दबंगई सिखाने के बाद अब ढीले करेक्टर के बेहद उम्दा मायने बताए हैं। वैसे भी ढीले करेक्टर की दुश्वारियों का सबब सल्लू मियां से बेहतर कोई नहीं जान-समझ सकता। बावजूद इतने दंद-फंद के सल्लू मियां अपने ढीले करेक्टर को भरपूर इंजॉय कर रहे हैं, यह बड़ी बात है। मैं तो कहता हूं कि हमें अपने करेक्टर के साथ किसी न किसी बिंदु पर ढीला होना ही चाहिए। ढीला करेक्टर सदा सहाय।

फिलहाल, अब अपनी कोशिश तो यही है कि किसी न किसी बहाने अपना भी करेक्टर ढीला हो जाए। कुछ वाद हों। कुछ विवाद हों। करेक्टर के पुर्जे कुछ यहां उछलें तो कुछ वहां। समाज और परिवार के बीच ढीले करेक्टर का कम से कम खिताब तो मिले। देखते हैं अपनी यह दिली-तमन्ना कब तलक पूरी होती है।

बुधवार, 10 अगस्त 2011

बाबा संग राखी : खूब जमेगी जोड़ी

पन राखी सावंत को यूंही नहीं चाहते। इस चाहत के पीछे उनकी बोल्डनेस के प्रति अपन का मोह है। मोह भी कोई ऐसा-वैसा नहीं जबरदस्त वाला। अख्खा फिल्म लाइन में एक राखी सावंत ही हैं जो अपने कहे पर न माफी मांगती हैं न पीछे हटती हैं। एक दफा जो बोल दिया सो बोल दिया। यही वजह है कि बोल्डनेस राखी सावंत का सिंबल बन गई है।

राखी सावंत ने एक बार फिर से अपनी बोल्डनेस को जग-जाहिर किया है। कहा है कि वे योगगुरू बाबा रामदेव से शादी करने को तैयार हैं। अगर बाबा राजी हों तो! हालांकि बाबा की तरफ से राखी के कहे पर अभी कोई प्रतिउत्तर नहीं आया है परंतु यह प्रस्ताव है बहुत उम्दा। राखी और बाबा की जोड़ी मस्त जमेगी। बेशक दोनों की विचारधाराएं अलग-अलग हैं पर इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। इतना फर्क तो दो जन के बीच चलता ही है। लेकिन हां बोल्डनेस के मामले में राखी बाबा से बीस ही बैठती हैं। बाबा तो बात कहकर पलटी मार भी जाते हैं परंतु राखी नहीं पलटती।

देखा जाए तो बालकृष्ण की नैया डांवा-डोल होने के बाद से बाबा को अपने ताईं एक सहारे की सख्त जरूरत भी आन पड़ी है। बाबा के लिए राखी से बेहतर सहारा भला और क्या और कहां मिल सकता है? राखी का साथ पाकर बाबा की भटकाहट कुछ तो कम होगी। पुनः वे अपने पुराने काम यानी योग शिक्षा पर वापस लौट सकेंगे। अब जब उनकी वापसी होगी तो उनके संग बालक बालकृष्ण की जगह बालिका राखी सावंत को देखकर उनके भक्त कित्ते प्रसन्न होंगे, इसकी कल्पना मात्र से ही अपन सिहर उठते हैं। बाबा और राखी की संयुक्त योग शिक्षा का प्रदर्शन कितनों को नैन लाभ कराएगा यह सहजता से समझा जा सकता है। बाबा की अनुपस्थिति में राखी की योग शिक्षा जाने कितने दिल के मरीजों को यूंही ठीक कर देगी। फिर कभी वे अपने दिल के बैठने या उठने की शिकायत न घर में करेंगे न ही बाहर। अपन को पक्का विश्चास है कि बाबा और राखी के योग शिविर उनके भक्तों के भीतर एक नई तरह की स्फूर्ति का संचार करेंगे!

रामलीला मैदान की घटना के बाद से बाबा काफी अपसेट से चल रहे हैं। अब तो कभी-कभार की टी. वी. पर बयान देने आते हैं। भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ चल रहा उनका संघर्ष भी ठंडा-सा पड़ने लगा है। इस बहाने विवाद बढ़ गए हैं सो अलग। बावजूद इसके बाबा होकर उनने जिस तरह की वीरता दिखाई है, अपने ख्याल से राखी सावंत को यही भा गया है। वरना एक हसीन महिला क्यों संत के साथ संग होना की इच्छा जताएगी! हमें आगे बढ़कर राखी के इस फैसले की प्रशंसा करनी चाहिए। साथ ही बाबा को भी समझाना चाहिए कि वे इस विषय में सोचें जरूर।

अब रही बात लोगों के कहने की तो उन्हें कहने दीजिए। कुछ लोगों को केवल कहने में ही सुकून मिलता है। खुद कुछ कर पाते नहीं जो बेचारा करने की इच्छा जाहिर करता है उसे ऐसा-वैसा कहकर बदनाम करते हैं। अरे भई अब क्या किया जाए जो राखी का दिल बाबा पर आ गया। यह दिल है किसी पर, कभी भी आ सकता है। किसी ने क्या खूब कहा है कि दिल पर किसी का जोर नहीं होता, दिल की आवाज से शोर नहीं होता। योग गुरू पर दिल आने का मतलब आप समझते हैं। दिल की पूरी हिफाजत। इस बहाने राखी का यहां-वहां भटकता दिल हमेशा योग की छत्र-छाया में रहेगा। एक हसीन व्यक्ति को स्वस्थ दिल के अतिरिक्त और क्या चाहिए!

आपसे गुजारिश है कि राखी या बाबा के विषय में गढ़े मुरदे न उखाड़ें। बीती बातों का समय अब बीत चुका है। इस वक्त तो सुंदरता और योग शिक्षा की बातें करें बस। यही शाश्वत है। राखी और योग गुरू की छत्र-छाया में सब जन निरोगी रहें भला हमें और क्या चाहिए!

हे! भाग्यविधाता अब तेरा सहारा है, तू ही कुछ कर। राखी और बाबा की राहें एक कर दे। इस नाते कुछ हद तक राखी भी संभल जाएंगी और बाबा भी भ्रष्टाचार और काले धन पर से ध्यान हटाकर सौंदर्य की दुनिया में लौट आएंगे। जय हो।