शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

अच्छा तो अलविदा 2011...

प्यारे साल 2011,
तुम्हें कोई याद रखे न रखे परंतु मैं हमेशा याद रखूंगा। कोशिश करूंगा कि इतिहास में तुम्हारा उल्लेख स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करवा सकूं। यह मैं तुमसे इसलिए कह रहा हूं क्योंकि तुम महंगाई और जनलोकपाल बिल जैसे प्रमुख मुद्दों के गवाह रहे हो। हालांकि और भी कई मुद्दे सालभर हवा में तैरते रहे लेकिन इन दो मुद्दों ने तो हमें जीने और दिल लगाने का उत्तम बहाना ही दे दिया। असर देखो, हर आदमी के कने बात और बहस करने के ताईं बस दो ही मुद्दे रहे; महंगाई और जनलोकपाल बिल। अगला जब महंगाई का दुखड़ा रोते-रोते थक जाता है, तो जनलोकपाल बिल पर अपनी राय अपने हिसाब से देने लग जाता है। और यह बात तो तुम भली-भांति जानते ही हो कि हमारे यहां मुफ्त की राय देना और मुफ्त की चाय गटकना कोई नहीं छोड़ता। कभी-कभी तो सियाने लोग व्यक्ति के मरने तक पर राय देने के बहाने चाय की चुस्की मारना नहीं छोड़ते। क्या करें वे राय के हाथों मजबूर हैं!
खैर, छोड़ो। हमें क्या! उनकी राय, वे जानें। हम अपनी अनकही राय के साथ ही ठीक हैं।

तो प्यारे, मैं कह रहा था कि तुम सालभर महंगाई और जनलोकपाल बिल का रंग जमाए रहे। मुझे तो लगता है कि सरकार के मुख्य हितैषियों से एक तुम भी हो। बड़े ही खास अंदाज से उसकी नीतियों का पालन करते हो। महंगाई बढ़ती है तो ताली बजाते हो, जनलोकपाल बिल लटकता है तो ढोल बजाते हो। लेकिन फिर भी हमारा आम आदमी प्रसन्न है। उसकी बला से महंगाई बढ़े या जनलोकपाल बिल टले, उसे तो कुछ मिलने से रहा। क्या करे उसकी तकदीर में छेद की इत्ते किस्म के हैं कि वो न महंगाई के घटने से कम हो सकते हैं न जनलोकपाल बिल के लागू होने से। वो बेचारा तो कभी खाद्य सुरक्षा की खुशबू सूंघ लेता है, तो कभी मनरेगा का राग सुन लेता है। जैसा वो साल के शुरू में था, ठीक वैसा ही साल के अंत में दिखाई देता है।

अरे हां तुमने अण्णा हजारे के रूप में हमें साल का हीरो भी तो दिया है। और तो और टाइम मैगजीन ने भी उनका लोहा मान उन्हें कवर पेज पर लिया है। लेकिन यह भी सुन लो यह लोहा इस भीषण ठंड में सिकुड़ गया है इसीलिए अनशन करने दिल्ली न आकर रालेगण सिद्धि चला गया है। वाहजी.. वाह.. यहां जनता ठंड में संघर्ष करे और आप वहां खुशनुमा मौसम का मजा लें। तिस पर भी जिद यह है कि दूसरा गांधी अण्णा को ही माना जाए। कोई नहीं, हमारे गांधी बाबा मंगल पर बैठे सब देख रहे हैं। दूध का दूध, पानी का पानी सब हिसाब-किताब यहीं होना है।

तो प्यारे 2011, तुम्हें अलविदा कहने का वक्त अब आ गया है। मगर अलविदा कहने से पहले मैं तुम्हारा इस मायने में भी शुक्रगुजार रहूंगा कि तुमने हमें मुन्नी, शीला, जलेबी बाई, रजिया, राखी, विद्या, वीना, सन्नी लियोन और अब चिकनी चमेली जैसी मस्त हसीनाएं मौलिक चिंतन, बेतरतीब बहस और अनलिमिटेड मनोरंजन करने के वास्ते दीं। इन सबोने हमारी समस्त चिंताओं-समस्याओं को बाखूबी दूर किया। दिल के खुश रखने को इनका ख्याल सालभर हमें लरजाए रहा। साथ ही साथ शुक्रिया इनका भी।

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

भ्रष्ट का पत्र अण्णा के नाम

तरह-तरह के आरोप-प्रत्यारोप से उक्ताकर एक भ्रष्ट ने अण्णा हजारे को 'उन्मुक्त पत्र' लिखा है। यह पत्र ज्यों का त्यों आपके समक्ष प्रस्तुत है।
सियाने अण्णा,असल में, इस 'उन्मुक्त पत्र' को लिखने की आवश्यकता केवल इसलिए आन पड़ी क्योंकि पानी अब सर से ऊपर बहने लगा है। बहते पानी में हाथ धोने का सिलसिला थम ही नहीं रहा। जिसे देखो वो खुद पर ईमानदारी का ठप्पा लगाए मुझे गरियाये चला जा रहा है। ताज्जुब इस बात पर अधिक है कि कल तलक बेईमानी की रोटी खाने-खिलाने वाले भी मुझे और भ्रष्टाचार को यूं जुतिया रहे हैं, मानो स्वच्छ चरित्र के एक अकेले बादशाह केवल वही हों! ऊपर से आप उन्हें गलत-सलत नसीहतें दे रहे हैं कि बेटा भ्रष्ट और भ्रष्टाचार से नफरत और सिर्फ मुझसे व मेरी टीम से प्यार करो। वाह! समाज और राजनीति के बीच घुसपैठ करने का यह बढ़िया तरीका चुना है आपने।

अण्णा, जिन रास्तों पर आप चल-फिर रहे हैं, ये रास्ते आपके ताईं ठीक नहीं हैं। दरअसल, ये चोर रास्ते हैं। दूसरे के हक को मारकर अपना उल्लू सीधा करना, न तो श्रेष्ठ इंसानियत की निशानी है न ही लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह उचित है। कायदा यह कहता है कि मिल-बांट कर खाओ। मिल-बांटकर खाने में ही स्वस्थ समाज का हित है। लेकिन नहीं..आपने तो भ्रष्ट और भ्रष्टाचार का खात्मा करने की ठान रखी है। अपनी ठान को सिद्ध करने के वास्ते आप कभी दिल्ली में नौटंकी शुरू कर देते हो तो कभी बंबई में। और अल्टीमेटम भी देते हो कि अगर सरकार ने बात नहीं मानी तो मैं राहुल और सोनिया गांधी के घर पर धरना दूंगा। वहां से नहीं हटूंगा। आखिरी दम तलक यूंही लड़ता-झगड़ता रहूंगा। मजबूत जनलोकपाल बिल ही मेरा असली मकसद है।

यार, समझ नहीं आता कि आप खामाखां इत्ती टेंसन क्यों ले रहे हो? कुछ नहीं तो अपनी सेहत का ही ख्याल करो। सेहत से बढ़कर थोड़े ही है जनलोकपाल बिल! जब भी आप आंदोलन सरीखी नौटंकी करने में जुट जाते हो, मुझे व्यक्तिगत तौर पर आपकी सेहत की चिंता होने लगती है। हालांकि मैं जानता हूं कि आपने कभी मुझसे मेरी सेहत के बारे में कुछ नहीं पूछा लेकिन मैं इंसानी फर्ज को निभाना बाखूबी जानता-समझता हूं। क्या हुआ जो मैं भ्रष्ट हूं परंतु कठोर-दिल नहीं!
मैं फिर कह रहा हूं कि एक अकेले जनलोकपाल बिल के बन जाने से हम भ्रष्टन का कुछ होने-हवाने वाला नहीं! हमारी जड़ें बहुत गहरी हैं। हमारे हाथ बहुत लंबे हैं। जहां तलक रवि और कवि पहुंचने की केवल 'शाब्दिक कल्पना' ही कर पाते हैं, हम वहां तलक 'बे-कल्पना' ही पहुंच जाते हैं। भ्रष्ट या भ्रष्टाचार को मिटाना इत्ता आसान थोड़े ही है, जित्ता की आप समझते हैं! हमें मिटाने की अब तलक जित्तो ने कोशिश की बेचारे खुद ही मिट लिए। इसलिए मैं फिर कह रहा हूं कि हमें बेहद सहजता और सरलता के साथ लें। खामोशी से हमें अपना काम करने दें और आप रालेगण सिद्धि में चैन की बंसी बजाएं। क्या हरज है?
साथ ही यह भी सुन लें कि भ्रष्ट कभी किसी को बरगलाता नहीं, जिस तरह आप और आपके सहयोगी कर रहे हैं। क्या ऐसे बरगलाने से मजबूत जनलोकपाल बन जाएगा? सड़क पर हाय-तौबा मचाने और मंच से मैं भी अण्णा, तू भी अण्णा चीखने-चिल्लाने से सब अण्णा हो जाएंगे? या अण्णा टोपी पहन लेने से ईमानदार हो जाएंगे? और अगर सब ईमानदार हो भी गए तो इत्ते ईमानदारों की ईमानदारी को कहां-कहां खपाएंगे? क्या ईमानदारों के माथे पर लिखा होगा कि मैं ईमानदार हूं। मान्यवर, दाल में ज्यादा नमक दाल को कढ़वा ही करता है। स्वस्थ व्यवस्था के वास्ते भ्रष्ट और ईमानदार का रेशो बराबर होना बेहद जरूरी है, समझे।

अण्णा, आपसे गुजारिश है कि यह अनशन-आंदोलन की नौटंकियों को बंदकर, संसद का सम्मान करते हुए, अपनी सेहत की फिकर करें। हमारा देश बहुत जोर का चल रहा है। सरकार हमारी प्रगतिशील है। व्यवस्था हमारी लचीली है। अर्थव्यवस्था हमारी गुलाबी है। जनता हमारी बेहद काबिल है। बुद्धिजीवि अपने में मस्त हैं। जनवादी अपने जनवाद में व्यस्त हैं। गरीब सस्ते अनाज का सुख भोग रहा है। संचार-क्रांति अपने बूम पर है। कुछ भ्रष्ट जेल का मजा ले रहे हैं, तो कुछ बाहर आकर चैन की सांस। और हां, विधानसभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है। बस, थोड़े ही दिनों में नेता मतदाता के घर पर होंगे। आगे अभी बहुत प्रकार की नौटंकियां देखना शेष है, इसलिए आप जनलोकपाल की जिद को छोड़कर दूसरों को भी नौटंकी करने का मौका दें।

आपका परम-हितैषी
एक भ्रष्ट

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

साल 2011 भ्रष्टाचार के नाम

मेरे विचार में साल 2011 को भ्रष्टाचारी वर्ष घोषित किया जाना चाहिए। क्योंकि, इस साल सबसे अधिक बोलबाला भ्रष्टाचार का ही रहा है। हर किसी ने अपने हिसाब से भ्रष्टाचार के बहाने खुद को भुनाया है। भ्रष्टाचार को गरियाने की खातिर संसद से लेकर सड़क तक खूब हो-हंगामा हुआ है। भ्रष्टाचार से लड़ने की खातिर एक तरफ बाबा रामदेव रामलीला मैदान में डटे तो दूसरी तरफ अण्णा हजारे जेपी मैदान पर। श्री श्री रवि शंकर भी मौके की नजाकत को देख चौका मारने से नहीं चूके। सरकार अपने चरित्र को पवित्र बताती रही और विपक्ष सरकार के चरित्र-हनन में लगा रहा। मीडिया ने भी बहती गंगा में हाथ धोने से परहेज नहीं किया। अपनी-अपनी टीआरपीओं की खातिर उसने भ्रष्टाचार पर कित्ते जुलम किए, क्या बताएं? भ्रष्टाचार की छवि को इस तरह से पेश किया गया कि मानो सबसे बड़ा खलनायक वही है।

बावजूद हर तरह के जुलो-सितम के भ्रष्टाचार भी अपनी जगह पर डटा रहा। न किसी के कहे की चिंता की न किसी के आंदोलन-सत्याग्रह की। पूरे साल अकेले ही हर किसी से लोहा लेता रहा। लुत्फ देखिए, भ्रष्टाचार को जित्ता गरियाया गया उत्ता ही वो भिन्न-भिन्न रूपों में निखरकर सामने आता रहा। इस सुविधा का लाभ पाकर कभी चपरासी करोड़पति बन गया, तो कभी भिखारी अरबपति।

संसद में नोट उछले। हंगामा हुआ। टूजी पर जमकर तनातनी हुई। सजाएं हुईं। जाने-पहचाने चेहरे बेनाकाब हुए। लेकिन नतीजा क्या निकला? ढाक के वही तीन पात। एक-एक कर सबको जमानतें मिलती गईं और भ्रष्टाचार अपने दबदबे पर मस्त मुस्कुराता रहा। हां, मुस्कुरा वो अब भी रहा है लेकिन हमारी बेचारगियों को देखकर। भ्रष्टाचार के आगे बेचारा तो हमें अण्णा समुदाय ने बनाया है। प्यारे समाज और राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार से लड़ने तो चले हैं किंतु अपनी टीम के भ्रष्टाचार से अभी तलक नहीं निपट पाए हैं। उन्हें शौक तो बड़ा है दूसरों के घरों पर पत्थर फेंकने का लेकिन अपने घर से शुरूआत करने से डरते हैं। वाह जनाब! क्या कमाल की भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम है आपकी। दूसरों को डांटो और अपनों को बांटो!
खैर, भ्रष्टाचार ऐसे सियासतदां अण्णाओं की परवाह नहीं करता। वो केवल अपने काम से मतलब रखता है। न किसी का कुछ ले रहा है न किसी से कुछ कह रहा है। आप भरते-भरवाते रहिए भ्रष्टाचार के खिलाफ हुंकारें लेकिन उसकी सेहत पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं। क्योंकि वो किसी से नहीं डरता। जाड़ा-गर्मी-बरसात हर मौसम में अपने मिजाज के मुताबिक मस्त रहता है। न अधूरी क्रांति में विश्वास करता है न छद्म प्रगतिशीलता में। अब उसके बहाने जिसे जिस तरह की लफ्फबाजी करनी हो, वो करे।

हालांकि मैं यह बात अच्छी तरह से जानता हूं कि भ्रष्टाचार खुद कभी कोई क्रेडिट लेने का प्रयास नहीं करता। लेकिन फिर भी, नैतिकता की खातिर, हमें भ्रष्टाचार को साल 2011 का सबसे हिट आइटम घोषित करना चाहिए। मेरा दावा है, मुन्नी, शीला, जलेबी बाई, रजिया, राखी, विद्या, वीना और चिकनी चमेली से कहीं ज्यादा हिट भ्रष्टाचार ने ही बटोरे होंगे। जय हो भ्रष्टाचार की।

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

बेचारी सरकार! करे भी तो क्या?

पहले तो कभी-कभी आता था लेकिन अब तो हर रोज, हर क्षण आता है; जी हां सरकार पर मुझे बइंतहा 'तरस' आता है। बेचारी सरकार! क्या-क्या देखे और क्या-क्या न देखे? किसे-किसे सुने और किस-किस को सुनना छोड़ दे? हर वक्त अजीब-सी स्थिति में रहती है सरकार हमारी। न विपक्ष चैन लेते देता है न खुद के सहयोगी। कोई टांग खेंचने में लगा है, तो कोई लंगड़ी मारने में। इज्जत की तो कुछ पूछो ही मत प्यारे! जिसके हत्थे पल्लू चढ़ जाता है, वही ऊ ला ला करना शुरू कर देता है। सरकार पर तोहमतें लगाते वक्त कोई यह नहीं सोचता कि यह हमारी सरकार है। हमारे देश, हमारी जनता की सरकार है। हमारा वर्तमान, हमारा भविष्य है। हमारे तमाम तरह के हित इससे जुड़े हैं। लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ है यह। सरकार है तो उम्मीद है कि हम वैचारिक, व्यवहारिक और आर्थिक स्तर पर सुरक्षित हैं।

भले ही आप इस बात को न समझें मगर सरकार खूब समझती है। इसीलिए वो हर वक्त हमारी चिंता में रहती है। न दिन न रात, न जाड़ा न बरसात, न बाढ़ न भूकंप, न आंदोलन न सत्याग्रह हमारी सरकार कभी नहीं सोती। अपने स्तर पर चीजों को सुलटाने में जुटी रहती है। सरकार के तमाम सम्मानीय मंत्री, सोनियाजी के दिशा-निर्देश में, जनता को इस विश्वास में बांधे रखने में लगे रहते हैं कि चाहे खुशी हो या गम मगर हम साथ-साथ हैं। लेकिन इत्ते पर भी सरकार को हर तरफ से खरी-खोटी ही सुनने को मिलती है। सबसे ज्यादा दुंद काटता है विपक्ष! हर समय इस फिराक में लगा रहता है कि कब सरकार बोले और कब वो उसे घेरे!
इस बीच चार-पांच मुद्दे तो लगता है सरकार के 'घर-जमाई' ही बन गए हैं। भ्रष्टाचार, काला धन, महंगाई, एफडीआई और अब मंदी। भ्रष्टाचार पर सरकार के खिलाफ मोर्चा अण्णा संभाले हुए हैं। काला धन बाबा रामदेव का प्रिय विषय है। एफडीआई, महंगाई और मंदी पर विपक्ष हावी है। यानी यहां खाली कोई नहीं है! किसी न किसी के कने कोई न कोई मुद्दा है जरूर। जब दिल करता है कोई भी 'अपना वाला मुद्दा' लेकर कभी सड़क तो कभी जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने बैठ जाता है। कुछ बेचारे सरकार का पुतला फूंककर ही अपना विरोध जता लेते हैं। इस विरोधा-विरोधी में इस बात का खास ख्याल रखा जाता है कि उनका विरोध टी.वी. चैनलों और अखबारों में मय तस्वीर के दिखना जरूर चाहिए। सच कहूं, बिना मीडिया के मैंने अब तलक यहां किसी को न विरोध करते देखा है न सुना।

अब सरकारी भी बेचारी क्या करे? किसके विरोध पर जवाब दे और किसके पर नहीं! खुद सोचिए कित्ता कठिन है 121 करोड़ लोगों को व्यक्तिगत तौर संतुष्ट रख पाना! अब भ्रष्टाचार और महंगाई है तो है, इसमें बेचारी सरकार क्या करे? कोशिश कर तो रही है। वैसे भी सरकारों का काम केवल कोशिश करना ही होता है! कोशिश-कोशिश में ही दांव अगर लग गया, तो बात बन गई, नहीं तो आप करते रहिए विरोध, क्या फर्क पड़ता है।

अब अण्णा ने ही भ्रष्टाचार और सरकार के खिलाफ आंदोलन करके क्या कर लिया? लोकपाल बिल चू-चू का मुरब्बा बनकर रह गया। भ्रष्टाचार अपनी जगह मस्त है। आंदोलन में शामिल चेहरे कित्ते ईमानदार हैं, इसे वे ही अच्छे से जानते-समझते होंगे! कुछ नहीं, बस दोनों तरफ से बयान पर बयान आते रहते हैं। अण्णा अपनी राजनीति की जुगाड़ में लगे हैं, तो सरकार अपनी। इस रस्साकशी में 'मेन मुद्दे' का क्या हुआ, किसी को नहीं मालूम।

बेचारी सरकार अण्णा से बचने की कोशिश करती है, तो महंगाई और मंदी का भूत घेर लेता है। रुपइया है कि लुढ़के ही जा रहा है। सेंसेक्स अपनी संवेदना पर आंसू बहा रहा है। आईआईपी के आंकड़े अलग जुलम ढाह रहे हैं। ऊपर से खबरिया चैनल संभावित मंदी को कुछ तरह से पेश कर रहे हैं कि बस पूछिए मत! सरकार बेचारी इधर कुंआ, उधर खाई जैसी स्थिति में है। इत्ती कठिनाईयों के बीच भी विपक्ष कहता है कि यह सरकार सही से काम नहीं कर रही। प्यारे, सरकार तो सही से काम तब करेगी न, जब उसे दिमागी सुकून मिले। कुछ सोचने-समझने का वक्त मिले। निर्णय लेने का हौसला मिले। मंदी के संकट पर विपक्ष साथ आए। भ्रष्टाचार पर अण्णा अपनी नौटंकी बंद करें। लेकिन नहीं, अगर विरोधियों ने अपने विरोध को दबा दिया, तो सरेआम उनकी नाक कट जाएगी। अब नाक कटने का अर्थ-मतलब तो आप समझते ही हैं न!
बहरहाल, मैं तो सरकार पर केवल 'तरस' खाने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकता। भ्रष्टाचार पर अण्णा आंदोलन करें या महंगाई-एफडीआई पर विपक्ष हंगामा, मेरे तो सरोकार रुपइए से जुडे हैं प्यारे। सरकार रुपइए की इज्जत की खातिर अवश्य कुछ करे। रुपइए का लुढ़कना थमेगा, तभी मंदी को थामने का रास्ता निकलेगा। वरना तो जय हो प्यारे!

ऊ ला ला पर एक ललित निबंध

तमाम लीलाओं की तरह ऊ ला ला भी एक मस्त किस्म की लीला है। यह लीला अभी हाल द डर्टी पिक्चर के बहाने अस्तित्व में आई है। हालांकि ज्ञानी बताते हैं कि यह अस्तित्व में तो पहले से ही थी, परंतु इस पर उस तरह से गौर नहीं किया गया था। वो तो भला हो हमारी एकता कपूर जी का कि उन्होंने ऊ ला ला की महत्ता को समझा और विद्या बालन जी के माध्यम से हमारे समक्ष प्रस्तुत किया।

इधर देखने व सुनने में आया है कि ऊ ला ला की जरूरत हमारे जीवन में लगातार बढ़ती ही चली जा रही है। कुछ ऊ ला ला प्रेमियों ने तो यहां तक कहना शुरू कर दिया है कि बिना इसके हमारे जीवन का उत्सव अधूरा-सा है। ठीक भी तो है, इस दौड़ती-भागती जिंदगी में अगर कुछ क्षण राहत के मिल जाएं, तो क्या बुरा है! आखिर दिल को बहलाने का कोई--कोई बहाना तो हमें चाहिए ही न। फिर ऊ ला ला ही सही।

एक दौर था, जब हम इलू इलू कहकर तमाम तरह की प्रेरणाएं व संतुष्टियां पाया करते थे। उस वक्त इलू इलू लड़कियों को पटाने का उत्तम माध्यम बनकर उभरा था। जो इलू इलू की भावनाओं को समझ लेती थीं, उनके साथ अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती थी और जो नहीं समझ पाती थीं, वे इस शब्द को बेहद हिकारत भरी निगाहों से देखा करती थीं। गाहे-बगाहे बात मां-बाप तलक पहुंच जाया करती थी, फिर जो दूसरे किस्म का इलू इलू होता था, अब उसका जिक्र यहां क्या करना।

खैर, इत्ते बरसों बाद अब तो इलू इलू का पैटर्न ही चेंज हो चुका है। अब शायद ही कोई किसी को इलू इलू कहता-बोलता हो। असल में, इलू इलू की जगह अब ऊ ला ला ने ले ली है। पहले बात इलू इलू से आगे व पीछे बहुत ही कम बढ़ा करती थी परंतु अब ऊ ला ला से भी आगे निकल जाती है। कभी-कभार तो इत्ता आगे निकल जाती है कि अंत में हमें लल्ला या लल्ली के होने का ही शोर सुनाई देता है। किया भी क्या जाए, आजकल के यूथ पर इमरान हाशमी का असर कुछ ज्यादा ही तारी है प्यारे। फिल्मों में ऊ ला ला को स्थापित करने-करवाने में इमरान हाशमी साहब के योगदान को हम चाहकर भी भूला नहीं सकते। कुछ समय पहले एक फिल्म में मल्लिका शेरावत और इमरान हाशमी के बीच ऊ ला ला का खेल तमाम हदों को पार कर गया था। अब आप ही बताएं, ऐसी मादक हद को देखकर भला कौन कमबख्त अपनी ऊ ला ला की हदों पर नियंत्रण रख पाएगा!
हालांकि अभी द डर्टी पिक्चर को आने में थोड़ा-सा टाइम है मगर विद्या बालन जी का ऊ ला ला कुछ अजब प्रकार का गजब ढाने लगा है। उनका पल्लू सरकता देखते ही मनचलों के मुंह से स्वतः ही ऊ ला ला निकल जाता है। मैं जब भी उनके सरकते हुए पल्लू को देखता हूं, मुझे मार्लिन मूनरो की याद आ जाती है। उनकी स्कर्ट का उठना और इनके पल्लू का सरकना में कमाल की जुगलबंदी है। इसी जुगलबंदी ने हमारे जीवन में ऊ ला ला की महत्ता को बढ़ाया है। तहे-दिल से शुक्रिया है उनको।
ऊ ला ला ने जिस तरह से हमारे मध्य उम्र की बंदिशों को तोड़ा है, यह काबिले-गौर है। क्या बच्चा, क्या जवान और क्या बूढ़ा हर कोई ऊ ला ला ऊ ला ला कहने-करने में अपनी तरह से व्यस्त है। सड़कों पर मजनूंओं के बीच ऊ ला ला शब्द की डिमांड बढ़ गई है। आलम यह है कि मेरे मोहल्ले में हर दूसरे घर से किस्म-किस्म की ऊ ला ला, ऊ ला ला की आवाजें दिन-रात आती रहती हैं। कई बिछड़े व बिगड़े दिल ऊ ला ला के असर के बाद से सुधरने व संवरने लगे हैं। यह ऊ ला ला की बड़ी कामयाबी है।

द डर्टी पिक्चर, एकता कपूर, इमरान हाशमी व विद्या बालन को धन्यवाद है कि उन्होंने हमें ऊ ला ला की मस्ती से यूं खुलकर रू--रू करवाया। तमाम यथास्थितिवादी मान्यताओं-स्थापनाओं को तोड़ा। हमें बोल्ड रहना व देखना सीखाया। ऊ ला ला की जरूरत को सीधे फिल्माकर बताया। आलम यह है कि मुंह से अब जय हो की जगह ऊ ला ला ही निकलता है। ऊ ला ला सदा सहाय।

कोलावेरी के बहाने

मैं तहे-दिल से प्यारे धनुष को शुक्रिया कहना चाहता हूं कि उन्होंने हमें कोलावेरी जैसा अद्भूत सांग दिया। आजकल हर कहीं बस कोलावेरी कोलावेरी सांग ही छाया हुआ है। यूथ की खास पसंद है यह सांग। इस सांग पर वो भी फिदा हैं, जो खुद को बेहद परंपरावादी कहते-बताते हैं। लेकिन इस सांग के बजते ही उनका परंपरावाद क्षणभर में ध्वस्त हो जाता है। यह अच्छी बात है कि वे समय के संग-साथ चलने की कोशिश कर रहे हैं।

कोलावेरी ने हमारे बीच भाषा और तुक्कात्मकता का नायाब विमर्श प्रस्तुत किया है। और, संदेश के रूप में यह बताया है कि सूप ब्वॉज का प्यार में विफल हो जाने का मतलब अब जिंदगी का अंत नहीं होता। उस फिलिंग के मोशन को इस सूप सॉग के जरिए निपटाया जा सकता है। लद गए वो जमाने जब प्यार में हुए ब्रेकअप शराब के पानी में गर्त हुआ करते थे, अब ये हिसाब-किताब कोलावेरी से तय होते हैं। मतलब ये कि यह गीत असफल प्रेमी को देवदास होने-बनने से साफ बचाता है। शायद यही वजह है कि हमारे आसपास, यहां तक कि फिल्मों में भी, देवदास अब कम ही नजर आते हैं।

कोलावेरी हमारे समय का यर्थाथ है। एक ऐसा कातिलाना गुस्सा है, जिसे अभिव्यक्त करने के वास्ते हमारी भाषा रेज में ढलकर कभी हिंदी, कभी अंग्रेजी तो कभी तमिल में भी बदल जाती है। कोलावेरी के असर को हम प्यार के साथ-साथ देश की राजनीति, भ्रष्टाचार, घपले-घोटालों या फिर आपसी तू तू, मैं मैं में भी साफ देख व महसूस कर सकते हैं। सोशल नेटवर्किंग साइटस पर तो कोलावेरी आम है। लेकिन, सुना है कि अब सरकार ने भी सोशल नेटवर्किंग साइटस के खिलाफ कोलावेरी कोलावेरी कहना-बोलना शुरू कर दिया है। उसे सख्त कानून के दायरे में लाया जा रहा है।

जो हो, कोलावेरी के असली अर्थ और मकसद को साइड में रखते हुए, यूथ को यह संग इत्ता भा रहा है कि उनके दिल लगाने और बहलाने का यह दिलकश माध्यम-सा बन गया है। एक करोड़ से कहीं ज्यादा के हिट का सम्मान पा चुका है कोलावेरी। बस, इसकी टिंग्लिश-सी खूबसूरत भाषा पर ज्यादा दिमाग मत खर्च कीजिए। क्योंकि इस गाने के बोल, तमिल और अंग्रेजी के होते हुए भी, बेहद सहज हैं। आसानी से गाए व गुनगुनाए जा सकते हैं। फिर आज की बिजी लाइफ में किसके कने इत्ती फुर्सत है कि वो भाषा की सहजता-असहजता पर दिमाग खोटी करे। जो जुबान पर आसानी से चढ़ जाए बस वही हिट है। हिट होने का सीधा सा फंडा है, खुद को आज के वक्त में ढाल लीजिए।

बाजार ने कोलावेरी पर सबसे पहले हाथ मारा। बाजार जानता है कि किसे बेचने से लाभ को भुनाया जा सकता है। फिर चाहे वो सांग हो या बीना मलिक। बाजार की जद में एक बारी जो आ गया, समझो कि मास पर छा गया। असर देखिए, जिन्हें कोलावेरी का अर्थ तलक सही से नहीं मालूम वे भी इस सूप सांग के दीवाने से बने हुए हैं। और तो और, कोलावेरी ने तो ऊ ला ला की मादकता के असर को भी कम-सा कर दिया है।

कह सकते हैं कि कोलावेरी हमारी बोरियत को खत्म करने का एक बेहतरीन सांग है। न भाषा का बोझ, न शब्दों की गंभीरता, न अर्थ का झंझट सबकुछ बहुत आसान और सहज। सीधे जुबान पर तैरने वाला सांग। इसके अलावा और चाहिए भी क्या यूथ को प्यारे!
बस, धनुष को धन्यवाद कहें और साथ में यह भी ध्यान रखें कि बी डॉन्ट हैव च्वाइस, सो दिस कोलावेरी..कोलावेरी डी।

बीना मलिक के बहाने

मेरे दिल ने 'बहकने' का एक नया मगर 'खूबसूरत-सा' ठिकाना ढ़ूढ लिया है। मेरे दिल को यह खूबसूरत-सा ठिकाना बीना मलिक में नजर आया है। इसी कारण मेरा दिल बीना मलिक के प्रति खासा उत्साहित-सा रहने लगा है। दिल का उत्साह तब से और अधिक उग्र-सा हो गया है, जब से इसने बीना मलिक के, एक अंग्रेजी पत्रिका को समर्पित किए अति-उत्साही चित्रों का अवलोकन किया है। दिल ने जिद-सी पकड़ ली है कि अब ऊ ला ला का स्वांग सिर्फ बीना मलिक के साथ ही रचा जाए। हालांकि मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि यह इत्ता आसान नहीं लेकिन क्या करूं अपने दिल के बहकने के हाथों मजबूर हूं!
दरअसल, बहकने की इस मजबूरी में गलती दिल की भी नहीं है। क्योंकि दिल के साथ तमाम तरह के अप्रिय हादसे हुए हैं। इन हादसों में न जाने कित्ते दिलों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। इन नाकामियों ने दिल को खासा हतोत्साहित किया है। प्यार में धोखा खाना, दिलों के वास्ते बेहद हानिकारक साबित हुआ है। लेकिन बदलते परिवेश के साथ दिलों के बहकने और बहलने के अंदाज भी काफी हद तक बदल-से गए हैं। अब दिल किसी एक पर टिककर रहना पसंद नहीं करता। दिल की रंगीनियत को बरकरार रखने के वास्ते मैंने भी दिल्लगी के तरीकों को बदला लिया है। ताकि मेरा दिल स्वस्थ रह सके। दिल को वहीं मशगूल किया है, जहां मस्ती का रस अधिक हो। दिल के टूटे टुकड़ों को पुनः जोड़ने के लिए मस्ती का सहारा जरूरी है प्यारे।

बताते हुए क्या शर्माना, मेरा दिल बहकने के तमाम मस्त प्रयोग कभी मुन्नी, कभी शीला, कभी जलेबी बाई आदि-इत्यादि पर कर चुका है। मगर रिकार्ड है, इमोशनल कहीं नहीं हुआ है। क्योंकि इमोशनल अत्याचार दिल के आचार-व्यवहार पर विपरित प्रभाव डालता है। इसलिए हमें कोशिश करनी चाहिए कि दिल को कभी इमोशल न होने दें। धनुष ने इस बात को कोलावेरी डी सांग में हमें अच्छे से बताया है।

मेरे दिल को बीना मलिक के भीतर कई प्रकार की मस्त संभावनाएं नजर आई हैं। उनका दिल भी कभी किसी एक पर टिककर नहीं रहता। पहले एश्मित पर अटका था, उसके बाद कहीं और अटक गया। लगता है बीना मलिक का दिल खासा महत्वाकांशी है। जहां बहलने की सुविधा देखता है, वहीं अटक जाता है। आज के समय के हिसाब से यह ठीक भी है। शायद इसी दम पर बीना मलिक राखी सावंत का स्थान लेना चाहती हैं। राखी ने भी स्वयंवर रचाया, दिल को बहलाया और बाद में हंसी-खुशी उससे मुक्त हो लीं। संभवता उन्हीं रास्तों पर अब बीना मलिक हैं।

सनसनी को बनाए रखने में बीना मलिक तो राखी सावंत की भी उस्ताद निकलीं। तभी तो अपने न्यूड चित्रों पर खूबसूरत-सी सफाई दे दी कि यह मेरे नहीं बल्कि मेरे चित्रों के साथ छेड़खानी की गई है। वाह! बीना मलिक जी खुद के साथ इत्ती मस्त छेड़खानी करवाके उससे मुकर जाना, अच्छी बात नहीं। मेरा दिल तो आपके इन मस्त चित्रों को देखकर ही बहका है। खुद को चर्चा में बनाए रखने के ताईं यह सब चलता है, बीना मलिक जी। आप बस अपने फेम को एंजॉय करो, बाकी सब अपने चाहनेवालों पर छोड़ दो।

अब तो रहम करो!

प्यारे सेंसेक्स, यह तुम्हें क्या हो गया है? और, क्यों हो गया है? इसे नहीं होना चाहिए। यह होता है, तो दिल में तकलीफ होती है। बेकार-बेकार से विचार मन में आते हैं। मेरे दिन के चैन और रात की नींद को स्थगित कर जाते हैं। तुम्हारा लगातार लुढ़कते रहना अब असहनीय-सा होता जा रहा है। तुम पर से विश्वास डगमगाने-सा लगा है। कभी मेरी आंख के तारे रहे तुम, अब आंख की करकिरी-सी बनते जा रहे हो। तुम्हारे प्रति मेरा जी इस किस कदर खट्टा-सा हो गया है, तुम्हें क्या मालूम! अब तो मन करता है कि तुम्हें तल्लाक ही दे दूं। अपने हर रिश्ते, हर बंधन को तुमसे अलग कर लूं। तुमसे दूर, इत्ती दूर जाकर रहूं कि तुम्हारा बिम्ब-प्रतिबिम्ब भी मुझ तक न पहुंच सके।

देखो प्यारे, मेरे कटू शब्दों का बुरा कतई न मानना क्योंकि तकलीफ में ही दिल से इस तरह की उन्मुक्त बददुआएं निकलती हैं। तुम अच्छी तरह से जानते हो मेरे नेचर को तुम्हारे प्रति लेकिन फिर भी हमारी दोस्ती को ताक पर रखते हुए, दर्द पर दर्द दिए चले जा रहे हो। कभी तीन सौ अंक खिसक लेते हो, तो कभी पांच सौ अंक। तुम्हारी इस खिसका-खिसकाई में अपनी तो दिल के साथ-साथ रकम भी खिसकते-खिसकते अंतिम छोर तलक जा पहुंची है। बीवी ताने देती है सो अलग। मोहल्ले वाले दीवाना समझ दुत्कारते हैं वो अलग। कहते हैं, यूंही सेंसेक्स के चक्कर में पड़े रहोगे, तो एक दिन दुनिया से ही खिसक लोगे! बताओ, कित्ती-कित्ती सुननी पड़ रही हैं प्यारे तुम्हारी खातिर मगर तुम पता नहीं किस गम में खुद को देवदास बनाए हुए हो?
तुम्हारे यूं लुढ़कते रहने पर अर्थव्यवस्था की बाट लगी हुई है। ससुरा रुपइया भी तुम्हारे नक्शे-कदम पर चल रहा है। औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े अलग परेशान किए हुए हैं। विकास दर में दरार आ चुकी है। महंगाई डायन भी कोई कम सितम नहीं ढाह रही है। पारा हर रोज नई गिरावट दर्ज करवा रहा है। आलम यह है कि जिधर निगाह डालो, उधर कुछ न कुछ खिसक-लुढ़क या फिर गिर रहा है। कभी-कभी महसूस-सा होता है कि हम लोकतांत्रिक नहीं बल्कि लुढ़काऊ देश में रह रहे हैं। मुझे डर है कि कहीं हम पर 'लुढ़कने में रिकार्ड' बनाने का ठप्पा न लग जाए!
मैं यह बात अच्छी तरह से जानता हूं कि संवेदनाएं तुम्हारे भीतर भी हैं। चोट तुम्हें भी पहुंचती है। आत्मा तुम्हारी भी दुखती है। समय-असमय इलाज की जरूरत तुम्हें भी होती है। लेकिन वक्त की नजाकत को समझते-जानते हुए तुम्हें अपनी संवेदना को काबू में रखना चाहिए। गुस्से के साथ-साथ समय-समय पर मुस्कुराते भी रहना चाहिए। एक अच्छी जिंदगी को जीने और अर्थव्यवस्था को गुलाबी बनाए रखने के वास्ते ये संवेदनशीलता बेहद जरूरी है।

यह बात तुम बेहतर जानते हो कि यहां कित्ते ही लोगों के हित तुमसे जुड़े हुए हैं। देश की अर्थव्यवस्था के सरोकार तुमसे कायम हैं। सिर्फ तुम्हारे ही कारण अब हम एक विकसित देश हैं। अपनी पिछली तेजी में तुमने इस देश की आर्थिक विकास दर को कहां से कहां पहुंचा दिया था। तब हर चेहर खिला और गुलाबी रंगत लिए हुआ था। मगर पता नहीं किस मुए की काली नजर लग गई तुमको कि तुम ऐसे धराशाही हुए जो अब तलक न संभल पाए हो। तुम्हारी गिरावट की जद में फंसकर कित्ते ही हमारा साथ छोड़ गए हैं, कोई हिसाब नहीं।

तुम्हारी सेहत की रिकवरी की खातिर अब मेरे कने बस एक ही उपाय बचा है कि कुछ हवन-यज्ञ करवाया जाए। दलाल पथ के साथ-साथ प्रत्येक आर्थिक क्षेत्र का शुद्धिकरण किया जाए। हो सकता है वहां कोई बुरी आत्मा अपने नाखून गढ़ाए बैठी हो! कहते है, जब डॉक्टरी इलाज से बात न बने तो कभी-कभार टोने-टोटके से भी काम चला लेना चाहिए। केवल तुम्हारी खातिर मैं अपनी अंधविश्वास-विरोधी आदत को बदलने को तैयार हूं। परंतु शर्त इत्ती है कि बदलना तुम्हें भी पड़ेगा प्यारे सेंसेक्स। तुम बदलोगे, तो बहुत कुछ बदलेगा। तुम सुधरोगे, तो बहुत कुछ सुधरेगा। एक मेरा लिए ही नहीं देश के आर्थिक विकास के वास्ते भी तुम्हारा चुस्त-दुरूस्त होना बेहद जरूरी है।

तो हे प्यारे सेंसेक्स महाराज! अब तो रहम करो। लुढ़कना बंद करो। साथ ही रुपइए को भी समझाओ कि वो भी अपने बर्ताव में सुधर लाए। दोनों मिल-जुलकर शातिर डॉलर का मुकाबला करो। बस हौसला रखो। जीत तुम्हारी ही होगी। हां, जज्बात में आकर अगर मैंने कुछ अल्लम-बल्लम कह दिया हो तो दिल पर मत लेना प्यारे सेंसेक्स! दोस्ती-यारी के बीच कभी-कभी ऐसी झिड़कियां जरूरत होती हैं। समझे।

सस्ते अनाज का मारा आम आदमी बेचारा!

प्यारे आम आदमी,
अब तो तुम खुश हो न! अब तो सरकार ने तुम्हारी सुन ली! अब तो तुम्हें सरकार से कोई शिकायत नहीं! अब तो तुम अपनी भूख का रोना सरकार या नेताजी के आगे जाकर नहीं रोओगे न! मालूम है, केवल तुम्हारी ही खातिर सरकार ने खाद्य सुरक्षा बिल को मंजूरी दी है! जबकि लोकपाल बिल पर संसद के भीतर और बाहर भारी तू तू, मैं मैं जारी है। सरकार की नीयत पर तरह-तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं सो अलग।
उधर, अण्णा हजारे पुनः अनशन पर उतरने को उतारू बैठे हैं। लेकिन सरकार अपने आम आदमी के दर्द को बखूबी समझती है। उसे पता है कि देश के आम आदमी के लिए जन-लोकपाल बिल से कहीं ज्यादा जरूरी खाद्य सुरक्षा बिल है। बोले तो, 'सस्ता राजनीतिक अनाज' है। माना कि जन-लोकपाल बिल भ्रष्टाचार को रोकने में 'कुछ' सहायक हो सकता है, परंतु भूख का इंतजाम करने में नहीं। भूख की शांति के लिए अन्न का होना ही जरूरी है। इसीलिए सरकार ने अण्णा से ज्यादा अन्न को महत्व दिया है। तो है न तुम्हारी सरकार महान!
अब यह साबित-सा हो गया है कि हमारी प्रगतिशील सरकार ही आम आदमी की असली हित-चिंतक है! आम आदमी को मुफ्त अनाज उपलब्ध करवाना किसी सरकार के बस की बात कहां थी प्यारे। यह तो केवल वही सरकार कर सकती है, जिसके कने आम आदमी के हाथ की ताकत हो! ले देकर एक आम आदमी ही तो है, जो चुनावी समर में सरकार, पार्टी और नेता के काम आता है। उसका वोट बैंक बनता है। वही सरकार बनवाता है। और सरकार बन जाने के बाद, उसके बीच अपनी जगह को तलाशता रहता है। मगर आम आदमी की तलाश पांच साल में केवल एक दफा ही पूरी हो पाती है। उसके बाद सरकारें फिर से उसे उसके हाल पर यथावत छोड़ देती हैं।

दरअसल, मुफ्त अनाज देने जैसे वायदे आम आदमी के वास्ते इसलिए निर्धारित किए जाते हैं, ताकि सरकारों की सत्ताएं बची रह सकें। मुफ्त अनाज का लोभ आम आदमी के दिल में सरकार के प्रति दया-भाव पैदा कर सके। आम आदमी सरकार से बंधा रह सके। और, इस बहाने सरकार अपनी दयालुता को भुना सके। विपक्ष को जतला सके कि देखो, जो काम तुम अपने दौर में न कर सके, अब हमने कर दिखाया। यानी कि अब हम तुमसे कहीं बड़े जन-हितैषी हैं!
सरकारों की इन नौटंकियों को देखकर आम आदमी अक्सर सोचता अवश्य होगा कि मैं आम आदमी क्यों हूं? दरअसल, आम आदमी के लिए आम आदमी होना किसी भयंकर पीड़ा से गुजरने से कम नहीं है। राजनीति के सारे के सारे दांव-पेच, टोने-टोटके, नियम-सिद्धांत बेचारे आम आदमी पर ही खेले और किए जाते हैं। इस खेल में इस बात से किसी को कोई मतलब नहीं होता कि आम आदमी की इसमें भूमिका क्या और कहां है? जब जिसका मन करता है, आम आदमी को उल्लू बनाना शुरू कर देता है। और एक हमारा आम आदमी है, जो खुद को उल्लू बनता देख कभी उफ्फ तक नहीं करता। शायद यही आम आदमी की आम पहचान है, क्यों प्यारे!
खैर, मुझे नहीं मालूम कि आम आदमी सरकार के इस सस्ते अनाज के तोहफे का बदला कैसे चुकाएगा? पर हां इतना जरूर जानता हूं कि सरकार की तरफ से यह तोहफा आम आदमी से यह कहने के लिए दिया गया है कि 'हमारा ध्यान अवश्य रखना' क्योंकि चुनाव के दिन करीब हैं। अमां, यह तो केवल सस्ते अनाज का बिल है, सरकार का बस चले तो, चुनावी समर में, न जाने क्या-क्या आम आदमी के वास्ते सस्ता और मुफ्त कर दे। क्योंकि सत्ता की मलाई बहुत चिकनी होती है प्यारे। सरकार यह कभी नहीं चाहेगी कि इस मलाई का स्वाद कोई और दल चखे।

भारत रत्न से कम कुछ नहीं!

प्यारे, अब बस टंकी पर चढ़ना बाकी है। बहुत सहन कर लिया। हर तरह से कह और लिखकर देख लिया। लेकिन अब और नहीं। सरकार ऐसे सुने-मानेगी भी नहीं। अब मुझे वीरू की राह पर ही चलना होगा। कब से गुहार लगा रहा हूं कि भारत रत्न मुझे भी चाहिए। मेरा भी भारत रत्न पर उत्ता ही हक बनता है, जित्ता कि सचिन तेंदूलकर का! अगर सचिन महान बल्लेबाज है, तो मैं भी उससे कम थोड़े ही हूं! महानता का पुट मेरे अंदर भी है। मैं भी किसी महान लेखक से कम नहीं। दुनिया अगर सचिन की दीवानी है, तो मेरी भी है! जब सचिन को भारत रत्न देने के वास्ते नियम-कानून में बदलाव हो सकता है, तो फिर मेरे वास्ते क्यों नहीं?
मैंने इस दफा पक्के मन से ठान ली है कि भारत रत्न लेकर ही दम लूंगा। चाहे कैसे भी जुगाड़ करनी या करवानी पड़े। संसद के भीतर इस मुद्दे को उठवाऊंगा। अगर वहां बात नहीं बनी तो सड़क पर आऊंगा। फिलहाल, कोशिश में लगा हूं अण्णा हजारे से संपर्क साधने की। अगर वे इस मुद्दे पर मेरे साथ आ जाते हैं, तो फिर देखना भारत रत्न मुझे ही मिलेगा! क्योंकि सरकार आजकल केवल अण्णा हजारे से ही डरती है। यही सही मौका है प्यारे, अण्णा के बहाने, सरकार के डर को झट से भुना लेने का।

और हां आप लोग ये मत समझना कि मैं पुरस्कार का भूखा हूं! पुरस्कार पाने के लिए इस-उस की जी-हुजूरी करता हूं!.. .. ऐसा कतई नहीं है। मेरे अंदर पुरस्कार को लेकर कोई भूख या तमन्ना नहीं है। अब तलक मैं खुद नहीं जानता कि कित्ते किस्म के पुरस्कार-सम्मान ठुकरा चुका हूं। मेरा स्पष्ट मानना है कि पुरस्कार लेना किसी लोचे से कम नहीं है। पहले पुरस्कार लो और बाद में इस-उस के ताने सुनो। दरअसल, भारत रत्न लेने की जिद तो मैंने केवल इसीलिए पाल रखी है क्योंकि इसमें सचिन तेंदुलकर का नाम आया है। जब सचिन को भारत रत्न देने की जुगाड़ फिट हो सकती है, तो फिर मुझे क्यों नहीं? बस, इसी एक बात पर मेरा भत्था भन्नाया हुआ है। अगर ये सम्मान मेजर ध्यानचंद या मिर्जा गालिब को दिया जाता, तो मैं बिल्कुल बीच में नहीं पड़ता। मगर सचिन को भारत रत्न देने की बात जहां आएगी, मैं ऐसे ही बीच में टांग घुसेडूंगा।

असल में, मैं इस बात का स्वाद लेकर देखना चाहता हूं कि जब लेखक सीधे सरकार से खुद को पुरस्कार देने की गुहार लगाए, तब सरकार का क्या रिएक्शन होता है? समाज क्या कहता है? लेखक बिरादरी क्या कहती है? सगे-संबंधी क्या कहते हैं? वैसे भी इत्ते बड़े पुरस्कार के ताईं सीधे अपने मुंह से दावेदारी ठोंकना हर किसी के बस की बात नहीं है प्यारे! वो तो मैं हूं जो यह कर पा रहा हूं, वरना यहां लफ्फबाजों की कमी कहां है। और फिर किसी के कंधे पर रखकर बंदूक चलाने से क्या हासिल? खुद चलाओ और खुद झेलो, इसका लुत्फ ही कुछ और है।

खैर, भारत रत्न तो मुझको चाहिए ही चाहिए। नहीं मिला तो किस टंकी पर चढ़ना है यह भी मैने देख ली है। लेकिन अपनी सहुलियत के हिसाब से। उत्ती ऊंची भी नहीं है, जिस पर वीरू चढ़ा था। उसे तो टंकी पर चढ़कर बसंती का प्यार मिल गया, देखते हैं मुझे भारत रत्न मिलता है कि नहीं? फिलहाल, लगा हुआ हूं।

रविवार, 27 नवंबर 2011

डर्टी पिक्चर के बहाने

हालांकि डर्टी पिक्चर को अभी आने में वक्त है, परंतु किस्म-किस्म की चर्चाओं की गर्म हवाएं बहने लगी हैं। चूंकि पिक्चर का नाम डर्टी है, तो जाहिर है हमें अपनी भारतीय सभ्यता-संस्कृति की याद तो अवश्य आएगी ही। इस बहाने विरोध-प्रदर्शन अभी तो नहीं हुए हैं, लेकिन अगर हो भी जाएं, तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। अक्सर, पिक्चर को हिट कराने-बनाने में ये कारक बेहद काम आते हैं। इस बात का इतिहास गवाह है।

डर्टी पिक्चर पर अभी तलक हुई खुसुर-पुसुर में सुनाई यही दिया है पिक्चर गंदी है। गाने गंदी हैं। डांस गंदा है। अदाएं गंदी हैं। विद्या बालन के वस्त्र गंदे हैं। संवाद गंदे हैं। साथ ही ज्ञानियों ने यह भी बताया है कि पिक्चर में चुम्मा-चाटी भी अधिक है। मतलब यह कि पिक्चर मां-बहन-बेटी-बीवी के साथ देखने की नहीं, केवल अकेले ही देखने की है। गौरतलब है कि पिक्चर को अकेले ही देखना पसंद करने वालों की संख्या अधिक है, ऐसा भरोसेमंद सूत्र बताते हैं। बताइए, इत्ते दिन हो गए हमें इक्कीसवीं सदी कदम रखे हुए लेकिन गंदी पिक्चरों को अब भी हम अकेले में ही देखने को अभिशप्त हैं। जबकि गंदी पिक्चरों में गंदा कुछ नहीं होता, यह केवल हमारी आंखों का भ्रम है।

अरे, हमको तो दिल खोलकर तारीफ करनी चाहिए विद्या बालन और एकता कपूर की कि उन्होंने हमें सॉफ्ट पॉर्न के दर्शन कराए। और, वो भी हिंदी फिल्म में। वरना, हिंदी फिल्मों में इत्ती सारी उन्मुक्तताएं भला कहां देखने को मिलती हैं? जो देखने को मिलती भी हैं, उनमें रस कम होता है। जबकि डर्टी पिक्चर में मादकता व उन्मुक्तता का हर रस मौजूद है। इसी रस ने विद्या बालन को पिक्चर में इत्ता रसीली बनाया है। यह पिक्चर की कामयाबी का अग्रिम द्योतक है। खुद में मौजूद रस को कला के बहाने निकालने का हुनर कलाकार को आना भी चाहिए। शुक्रिया! विद्या बालन कि तुमने यह कर दिखाया।

देखो जी, पेड़-पत्तों के पीछे नाचने-गाने और कुछ न दिखाने का दौर गुजर चुका है। अब दौर सबकुछ खुलकर दिखाने व बताने का है। यह नए तरह और तरीके का सिनेमा है। यहां देल्ही-बेली और डर्टी पिक्चर जैसी फिल्में ही चल सकती हैं। फिल्म में मस्ती का तड़का लगाने के लिए एक आइटम सांग का होना बेहद जरूरी है। आइटम में आप जित्ता चाहे मुन्नी को बदनाम कीजिए, शीला की जवानी देखिए, जलेबी बाई के जलबों पर निगाहें गाड़े रहिए, रजिया का गुंडों के बीच फंसने का आनंद लीजिए, छम्मकछल्लो या कट्टो गिलहरी का कमर-हिलाऊ डांस देखिए, यहां किसी प्रकार की कोई रोक-टोक नहीं है। सब अपनी-अपनी मस्ती में मस्त हैं। और, सबके कने एक ही जवाब है, जब दिखाने वाले को कोई एतराज नहीं, तो फिर देखने वालों को क्यों हो? फिल्मी समाज में आदर्श ऐसे ही स्थापित किए जाते हैं।

इसलिए कहता हूं कि डर्टी पिक्चर में गंदा या अश्लील कुछ नहीं है, सबकुछ साफ-सुथरा और यूथ की डिमांड के मुताबिक है। आप तो प्यारे बस ऊ ला ला की मस्त पंक्तियों पर थिरकते रहिए और विद्या बालन के सरकते-उघड़ते पल्लू के मोहपाश में बंधे रहिए। क्योंकि जीवन के परम आनंद को मस्ती के साथ भोगने का इससे उत्तम साधन कोई और नहीं हो सकता। कम से कम अब हमें बदलते समय के साथ चलना व देखना सीख लेना चाहिए।

सच्ची कहूं मेरा मन तो डर्टी पिक्चर के कमोत्तेजक प्रोमो देखने के बाद से ही बेहद मचला हुआ है। विद्या बालन को खुले अंदाज में देखने की तमन्ना अब दबाए नहीं दब पा रही। पिक्चर के ताईं एक-एक दिन कैसे कट रहे हैं, इसे मुझसे बेहतर तो एकता कपूर भी नहीं जान-समझ सकतीं। मैं अपना दिल हर उस चीज के साथ बहलाना पसंद करता हूं, जहां से मुझे ऊर्जा मिल सके। और, डर्टी पिक्चर में ऐसी ऊर्जा की तमाम संभावनाएं मौजूद हैं प्यारे। मेरे विचार में बॉलीवुड के प्रत्येक डाइरेक्टर को ऐसी ऊर्जावान फिल्में निरंतर बनाते रहना चाहिए। ताकि हर किसी को अपनी-अपनी ऊर्जा की क्षमता का एहसास हो सके। यह जरूरी भी है।

गुरुवार, 24 नवंबर 2011

सनी लियोन के नाम पत्र

प्रिय सनी लियोन,
आजकल बस तुम्हारे ही चरचे हैं। हर कहीं बस तुम ही तुम छाई हुई हो। सोशल नेटवर्किंग साइटस पर तुम्हारे बारे में कित्ता कुछ लिखा जा रहा है, क्या बताऊं! फेसबुक और ट्वीटर पर न जाने कित्ते ही लोगों ने अपनी तस्वीरों को हटाकर तुम्हारी 'रंगीन तस्वीर' चढ़ा ली है। तुम्हारे बारे में बात करते वक्त वे इत्ते खुश होते हैं, शायद इत्ता तो कभी वे अपनी बीवी के बारे में बात करके नहीं हुए होंगे! यकीन करो, तुम उनके दिलों में बस चुकी हो। बसना भी चाहिए, क्योंकि अपने अतिथि का सम्मान करना भला हमसे बेहतर कौन जान-समझ सकता है।

सुना है कि सिर्फ तुम्हारे कारण हमारे गूगल बाबा भी काफी अस्त-व्यस्त से रहने लगे हैं। तुम्हारे जीवन, आचरण व कार्य-पद्धति से जुड़ी तमाम प्रकार की सूचनाएं जुटाने में संलग्न हैं आजकल। गूगल बाबा पर इस वक्त तुम्हें ही सबसे अधिक खोजा व जाना जा रहा है। दरअसल, खोज की यह भावना हमारे दिलों में तब से और ज्यादा प्रबल हो गई, जब से मालूम हुआ कि तुम नीली पिक्चरों की रानी हो। किस्म-किस्म की नीली पिक्चरों को तुमने अंजाम दिया है। खुलेपन की प्रवृति तुममें कूट-कूटकर भरी है। शायद यही तुम्हारी स्वस्थ सेहत व फिगर का असली राज भी है। यही वजह कि यहां हर कोई बेताब-सा है तुम्हारे बारे में गूगल बाबा की मदद लेने के लिए।

कायदे से हमें बिग बॉस का तहे-दिल से शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उन्होंने हमें तुम्हारे दर्शन करवाए। तुम्हें इस शो में पूरी इज्जत के साथ जगह दी। और, हमें सहारा दिया कि हम तुममें अपना मन लगा सकें। नहीं तो इस दफा बिग बॉस में ऐसा कोई चेहरा नहीं है, जिससे दिल बहलाया जा सके। ऐसे शो को देखते वक्त दिल का बहलना ज्यादा जरूरी हो जाता है। लेकिन तुममें वो अदा है जिसे तुम यहां दिखा सकती हो।

इधर फिल्मी दुनिया में तुम्हें लेकर तरह-तरह की खिचड़ी पकने लगी है। बिग बॉस के पूर्व अभिनेता केआरके यानी कमाल आर खान तुम्हारे साथ पिक्चर बनाना व शादी भी करना चाहते हैं। तुम्हारे ताईं वे बड़े ही बेताब हैं। तुमसे तमाम प्रकार की उम्मीदें लगाए बैठे हैं। खबर यह भी है कि तुमको मर्डर 3 में लेने की बात चल रही है। और, महेश भट्ट साहब तुम्हें लेकर अपने पुत्र के साथ कोई पिक्चर बनाना चाहते हैं। यह तो कमाल है भाई। तुम्हारे वास्ते कतार में खड़े होने वालों की संख्या यहां बढ़ती ही जा रही है। यह तुम्हारे काबिल चरित्र व उम्दा अभिनय की उपलब्धि है।

हम तो अभी तलक द डर्टी पिक्चर के ऊ ला ला में ही अटके हुए थे, मगर तुममें तो उससे भी ज्यादा ऊ ला ला करने के गुण मौजूद हैं। कहीं अगर तुम यहां ज्यादा दिनों तक टिक ली, तो बहुतों की हालत पतली हो सकती है। चूंकि तुम सर्वगुण संपन्न अभिनेत्री हो, इस वास्ते आइटम सांग के लिए डाइरेक्टर को किसी की जी-हुजूरी नहीं करनी पड़ेगी। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि तुम्हारा आइटम शीलाओं, मुन्नियों, जलेबी बाइयों से कहीं अधिक हॉट एंड वाइल्ड होगा।

फिलहाल तो अभी तुम बिग बॉस की सेवा करो, वहां से जब बाहर आओगी तब हम तुम्हें बारी-बारी से अपनी-अपनी सेवा का अवसर देंगे।

तुम्हारे इंतजार में...

बुधवार, 16 नवंबर 2011

मेरा खटिया चिंतन

दुनिया भर के लेखकों का तो नहीं पाता, लेकिन मैंने अपना आधे से अधिक चिंतन खटिया पर बैठकर ही किया है। खटिया पर चिंतन का अपना ही मजा है प्यारे। खटिया पर चिंतन के दौरान ऐसा लगता ही नहीं कि हम कुछ गंभीर किस्म का काम कर रहे हैं। हर पल यह एहसास दिल को बहलाए रखता है कि हम खटिया पर हैं और चिंतन खुद--खुद हो रहा है। दरअसल, खुद--खुद होने वाला चिंतन बड़ा ही मस्त होता है। तमाम वैचारिक चिंताओं से मुक्त, इधर-उधर की दिलकश उन्मुक्तताओं में अधिक व्यस्त रहता है। मैं शुरू से ऐसे ही चिंतन का हिमायती रहा हूं। दिमाग पर बना जोर डाले, चिंतन और दिल को बहकाते रहने में मुझे ज्यादा आनंद आता है। और, यह आनंद आपको बिना खटिया चिंतन के कभी नहीं मिल सकता।

हो सकता है मेरा खटिया चिंतन आपको मेरी सनकपन की निशानी लगे पर कोई नहीं, मुझे ऐसा लगने में एतराज भी नहीं है। देखिए, जिसका चिंतन खटिया पर होगा, उसका थोड़ा-बहुत सनक जाना तो बनता है यार। यह कोई ज्यादा बड़ा मुद्दा नहीं। साफ बताऊं, मैं अपने चिंतन को बेहद कंट्रोल में रखता हूं। उसे न ज्यादा सर पर चढ़ाता हूं, न ही ज्यादा प्रगतिशील बनाने कोशिश करता हूं। क्योंकि इन दोनों में से अगर मैंने किसी एक को भी छूट दे दी, तो मेरा लेखन चौपट समझिए। चिंतन को उतना ही भाव देना चाहिए, जितना और जहां तक वो निभ सके। मैंने तो ऐसे-ऐसे चिंतन-स्वामी देखे हैं, जिन्होंने ताउम्र अपने चिंतन और विचार को गंभीर व प्रगतिशील बनाने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया। ऐसे चिंतन-स्वामियों ने लगता है अपना सारा चिंतन 'खटिया पर बैठकर' नहीं बल्कि 'पलंग पर रहकर' किया होगा। परंतु, गनीमत रही कि मैं अपने खटिया चिंतन की बदौलत बचा गया। यह बड़ी बात है।

वैसे, खटिया जितनी लाभप्रद चिंतन के लिए है, उतनी ही जाड़े के लिए भी। कहा भी गया है कि सरकाए लियो खटिया जाड़ा लगे...। मेरे विचार में जाड़े को दुरूस्त करने के लिए खटिया से बेहतरीन कोई दूसरा विकल्प नहीं हो सकता। खटिया जाड़े की तीव्रता को कम कर, गरमाहट की मात्रा को संतुलित रखती है। इससे दिल भी बहला रहता है और दिमाग भी। शहरों की तो खैर जाने दें, गांव में अब भी खटिया को ही जाड़े का मारक माना व समझा जाता है।

प्रायः मैं इस बात पर थोड़ा विचलित-सा हो जाता हूं कि अगर मेरे जीवन व चिंतन में खटिया नहीं रही होती, तो मैं कैसा होता? कैसा होता मेरे लेखन का मिजाज? कैसा होता मेरी वैचारिता का पैमाना? और, कैसे मैं केवल साधारण-सा इंसान बनकर रह पाता? हालांकि साधारण तो मैं अब भी हूं, बस नाम के साथ लेखक जुड़ गया है। लेकिन मैंने अपने लेखक होने को कभी अपने साधारण होने पर हावी नहीं होने दिया है। और, यह सब केवल और केवल मेरी प्यारी खटिया की वजह से ही है।
साधारण खटिया पर बैठकर साधारण चिंतन करके मैं अब भी साधारण लेखक ही हूं। इसका मुझे अतिरिक्त गर्व है।

मैं अपनी खटिया का आभारी हूं कि उसने मुझे लेखक बनाया। खटिया मेरी विरासत है। मेरी जान है। वक्त बदला तो मेरी खटिया भी बदल गई। अब खटिया की जगह कुर्सी, मेज और कंप्यूटर ने ले ली है। बावजूद इसके, मेरे चिंतन के फलसफे अब भी खटियायुक्त ही हैं। तनहाई में अपनी प्यारी खटिया की कमी मुझे अक्सर महसूस होती है, मगर दिल को इस बात से बहला लिया करता हूं कि खटिया तू न गई मेरे मन से। जय हो खटिया चिंतन की...!

रविवार, 13 नवंबर 2011

जब दिल बहका छम्मकछल्लो पर


प्यारे, दिल का बहकना स्वास्थ के ताईं बड़ा फायदेमंद रहता है। जिनका दिल नहीं बहकता वो बीमार होते हैं। इसलिए, अपन इस प्रयास में रहते हैं कि अपने दिल को कहीं न कहीं बहकाएं रखें। दिल का बहकना मन लगाने का उत्तम साधन है। आजकल अपन इसी काम में लगे हैं। घर-परिवार, देश-दुनिया की प्रत्येक चिंता से मुक्त होकर अपन इसकबाजी में व्यस्त हैं। और, कोई उच्ची-टुच्ची नहीं स्टैंडर्ड की इसकबाजी में।

दरअसल, आजकल अपन छम्मकछल्लो से इसक फरमा रहे हैं। अपने ज्ञान-ध्यान में छम्मकछल्लो के अतिरिक्त फिलहाल कोई नहीं है। पत्नी को भी कुछ समय के लिए विराम पर रख छोड़ा है। कभी-कभार ऐसा इसलिए भी करना पड़ता है ताकि पता लग सके कि अपन का दिल अब भी बहकने की स्थिति में है। और फिर सब जानते हैं कि दिल बहकने की न कोई उम्र होती है न समय। जब मन करे तब बहक जाओ। बिन बहके बहकने का लुत्फ भी कहां पता चलता है प्यारे!
रा. वन में किए छम्मकछल्लो के नृत्य पर अपन सुपर फिदा हैं। ऐसा नृत्य अपन चाहकर भी अपनी पत्नी से नहीं करवा सकते क्योंकि कमर कमर का सवाल है प्यारे। अब जित्ते भी आइटम नृत्य होते हैं, उनमें कमर की भूमिका ही अव्वल रहती है। ऐसी कमर की मादकता को देखकर भला किस मूरख की दिल नहीं बहकेगा! अब किसी से क्यों छिपाना अपन तो सिनेमा हॉल जाते ही आइटम नृत्य देखने के लिए हैं, ताकि कमर की नाजाकत के दर्शन करीब से हो सकें।

अपन इस तथ्य की गारंटी ले सकते हैं कि छम्मकछल्लो से उम्दा कमर कोई दूसरी कट्टो गिलहरी नहीं मटका सकती। अपन ने शीला की कमर भी देखी, मुन्नी की भी मगर जो बात छम्मकछल्लो की कमर में है, वो किसी में नहीं। केवल इस कमर की खातिर ही अपन छम्मकछल्लो के इसक में अपने दिल को बहकाए हुए हैं। और बड़े ही आनंद में हैं। दिन में न जाने कित्ती दफा छम्मकछल्लो के गीत-नृत्य को देख लेते हैं, खुद नहीं जानते। इत्ती दफा तो अपन ने पत्नी ने उस नृत्य को भी न देखा होगा, जो उसने पहली दफा हमारे यहां लेडिज संगीत में किया था।

कुछ भी कहो आइटम नृत्य का अपना ही मजा होता है प्यारे। फिल्म में चाहे कुछ हो या न हो परंतु आइटम नृत्य तो जरूर ही होना चाहिए ताकि दिल बहला रहे। वैसे इस प्रकार के सभ्य आइटम नृत्यों को नई दिशा और दशा देने में राखी सावंत की अहम भूमिका रही है। हीरोइनें तो तब भी आइटम नृत्य करने में थोड़ा-बहुत सकुचा जाती हैं किंतु राखी सावंत के साथ ऐसा नहीं है। आइटम को हॉट बनाने की कला राखी को अच्छे से मालूम है।

देखा इसे ही कहते हैं दिल का बहकना। बात छम्मकछल्लो की हो रही है लेकिन राखी को भी कहां भूले हैं। वैसे ऐसी कमसिनों के बीच रहकर क्या भूलूं क्या याद रखूं वाला सवाल होना भी नहीं चाहिए प्यारे। इसक एक से फरमाओ या दस से निभाने का तरीका आना चाहिए बस।

फिलहाल, छम्मकछल्लो के इसक में पड़े रहना दिल-दिमाग को सुकून दे रहा है। अपन अब इस सुकून को किसी हालत छोड़ना नहीं चाहते। क्या करें, अपन का दिल भी थोड़ा बेशर्म-सा हो गया है बिन बहके संभलता ही नहीं। चाहता है एक ही समय में कई-कई के साथ इसक फरमा ले। इसको बहलाए रखने के लिए कभी अपन को छम्मकछल्लो का आइटम नृत्य देखना पड़ता है, तो कभी कट्टो गिलहरी का।

अपन तो आप सब से भी कहते हैं कि अपने-अपने दिल को बहलाए रखिए। किसी छम्मकछल्लो को दिल दे दीजिए और फिर चैन की बंसी बजाइए।

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

सात अरब होने की खुशी

लो जी अब हम सात अरब हुए। तालियां बजाइए। सात अरब होकर भी हम खुश हैं। अपनी खुशी का इजहार हमने सात अरबवें बच्चे के जन्म पर मिठाई खा-बांटकर किया। लगा ही नहीं जैसे निरंतर बढ़ती जनसंख्या हमारे ताईं कोई चिंताजनक मुद्दा हो। अगर हो भी, तो भी हम क्या कर लेंगे? कौन-से सुधर जाएंगे? दरअसल, ऐसी चिंताओं और सुधारों को तो हम जेब में डालकर घुमते हैं। जेब में अगर न डालें तो ये चिंताएं और सुधर हर वक्त हमारे दिमाग का दही किए रहेंगी। हमारे कने वैसे ही इत्ती चिंताएं हैं, उस पर जनसंख्या की चिंता और पाल लें। ऐसे तो हमारे पागल होने में जरा भी देरी नहीं लगेगी प्यारे।

सोचो तो सात अरब होना अपने आप में बहुत बड़ी बात लगती है। और, कित्ती मेहनत के बाद हमने इस मजेदार आंकड़े को छुआ है, यह कोई हमसे पूछे। भले दुनिया कित्ती ही चिल्लाती रही कि जनसंख्या को नियंत्रित करो, नियंत्रित करो मगर हम कहां मानने वाले हैं। अपनी पहुंच, अपनी हैसियत से आगे जाकर हमने इस क्षेत्र में बड़ा मुकाम हासिल किया है। हमें शाबासी दीजिए। हम दो, हमारे दो के फार्मूले को हमने केवल विज्ञापनों में ही जीवंत बनाए रखा है। इन विज्ञापनों से जिन्हें जागृत होना हो वे होएं, हम ऐसे ही ठीक हैं।

केवल समझ-समझ का फेर है। भई, जिस देश के कने जनसंख्या को झेलने के पर्याप्त संसाधन होंगे, वो भला क्यों कंट्रोल करने-करवाने को कहेगा। उसके कने जित्ते लोग होंगे वो खुद को उत्ता ही मजबूत महसूस करेगा। प्यारे, यह तो सब जी भरमाने की बातें हैं कि जनसंख्या का बढ़ना खतरे का सूचक है। अगर यह होता तो दुनिया अभी तलक सात अरब पर भी जीवित नहीं बची होती! सात अरब होकर भी हम मस्त हैं। खुशहाल हैं। और, भरपूर जी रहे हैं। इससे ज्यादा और क्या चाहिए हमें!
यह तो हाल है कि जब सात अरबवां बच्चा दुनिया में आया तो हर कहीं होड़-सी मच गई अपने-अपने बच्चे को सात अरबवां घोषित करने की। वो तो सौभाग्य से दो बच्चे ही इस खिताब को पा सके। ऐसा ही कुछ तब भी हुआ था, जब हमारे बीच मिलेनियम बेबी आया था। दुनिया भर में उसके आने पर खुशी मनाई गई थी। अखबारों ने बड़ी-बड़ी तस्वीरें छापीं थीं। हर कहीं बस मिलेनियम बेबी की ही धूम थी। उस दौरान भी बढ़ती जनसंख्या पर चिंता जताई गई थी। लेकिन अब तलक कुछ हुआ क्या? यहां जनसंख्या के बहाने रिकार्ड बनाए जा रहे हैं और वहां चिंता पर चिंता जताई जा रही है। पर, कोई सुने-समझे-माने तब न।

प्यारे, अभी तो हम सात अरब ही हुए हैं, आगे यह आंकड़ा दस अरब के पार पहुंच जाए तो कोई हैरानी की बात नहीं। क्योंकि इस देश-दुनिया में सबकुछ संभव है। यहां रिकार्ड बनते ही पिछले रिकार्ड तोड़ने के लिए हैं। तो टूटने दीजिए न रिकार्डें को आप काहे टेंशन में टल्ली हुए जाते हैं। मिठाई खाइए और खुशी होने पर ताली बजाइए। फिलहाल, कंट्रोल को विराम दीजिए। जय हो।

मंगलवार, 11 अक्तूबर 2011

आओ! पुरस्कारों पर लड़ें

शुक्र है प्यारे कि अपन बच गए। ऐसे मामलों में बचना ही बेहतर। गर न बचो तो चर्चाओं की सजा को झेलो जिंदगीभर। यहां महान होना किसी सजा से कम थोड़े है! महान होकर उस पर पुरस्कार का बिल्ला चिपकना तो और भी बड़ी सजा है। इसीलिए अपन अब तलक न महान होने के चक्कर में पड़े हैं न ही पुरस्कारों के। इस बिन मांगी 'दया' से जित्ती दूरी भली, उत्ता ही ठीक। यह अपन का दावा है कि पुरस्कार पाकर अब तलक कोई भी लेखक या साहित्यकार एक पल चैन से नहीं जी सका है। विवाद या चर्चा का कोई न कोई फुंतरू उसके साथ चिपका ही रहता है। यानी कि पहले पुरस्कार के वास्ते जुगाड़ बैठाओ और फिर उस पर यहां-वहां सफाई देते फिरो। वाह! यह क्या सम्मान है प्यारे।

ज्ञानी कहते हैं कि पुरस्कार की गरीमा को बचाए-बनाए रखना चाहिए। लेकिन यह नहीं बताते कि कैसे...? जबकि पुरस्कार की गरीमा को मटियामेट करने में उन्हीं का खास योगदान रहता है। चूंकि वे खुद को ज्ञानी मानते-समझते हैं कि इस नाते पुरस्कार पर पहला हक अपना ही जताते हैं। कहते हैं, अगर ज्ञानियों को पुरस्कार नहीं मिला तो यह उनका अपमान होगा। एक तो अपने यहां अपमान का बड़ा लोचा है प्यारे। बात ही बात में कोई भी अपने को अपमानित-सा महसूस कर लेता है।

देख लो अपने यहां जिन दो महान साहित्यकारों को, संभावित होने के बावजूद, नोबेल न मिल सका, इस बात पर उनसे कहीं ज्यादा उनके चेलों ने खुद को अपमानित महसूस किया है। बकायदा कह-लिखकर वे अपने अपमान को जतला रहे हैं। कोई क्रांतिकारी कविता कहने में लगा है तो किसी ने कहानी पर काम शुरू कर दिया है। मतलब लेखन से ज्यादा प्यारा पुरस्कार है। पता नहीं पुरस्कारों को अपने शो केसों में सजाकर लेखकों-साहित्यकारों को क्या लुत्फ मिलता है!
प्यारे, यही सब देख-पढ़कर अपन ने पुरस्कारों की मुधशाला से खुद को दूर ही रखा हुआ है। न इसके कने जाओ न ही इसे मुंह लगाओ। बस दूर से बैठकर पुरस्कारों की बंदरबांट पर होनेवाले घमासान का मजा लो। इसी में सुख है। साथ ही यह भी ध्यान रखा कि बस लेखक बने रहो कभी कोशिश भी न करो बड़ा या महान साहित्यकार होने की। क्योंकि बड़ा या महान होने में सौ तरह के झंझट हैं। यहां अपन खुद को तो संभाल नहीं पाते, अपने बड़प्पन को क्या खाक संभाल पाएंगे। प्यारे, अपनी तो यह आदत है कि कानों में तेल डाले रहो और आंखों पर काला चश्मा चढ़ाए रहो, साहित्य की दुनिया में जो हो रहा है उसे न सुनो न ही देखो। केवल अपनी में मस्त रहो। जिन्हें नोबेल की जरूरत है, वे वहां जाकर अपनी नाक रगड़ें।

वैसे प्यारे अपन ने बड़े-बड़ों को पुरस्कार की आस में तड़पते देखा है। जिन ज्ञानियों ने ताउम्र पुरस्कार पर राजनीति का विरोध किया पर जब उन्हें मिलने की घोषण हुई तो सारा इरोध-विरोध गया हमाम में। पुरस्कार के दाम अंटी में दबते ही सारी प्रगतिशीलता चू-चू का मुरब्बा हो जाती है प्यारे। लुत्फ तो अपन को तब आता है, जब ज्ञानी अपने ही पुरस्कार को डिफाइन करते हैं। 'मैं इस लायक कहां था' को इत्ती खूबसूरती से अभिव्यक्त करते हैं कि मुंह में जो न आ जाए वो थोड़ा।

और फिर बिन बहस ही पुरस्कार दे दिए जाएं यह भी भला कहां संभव है। इस बहस में वो भी कूद पड़ते हैं, जिन्होंने पुरस्कार ले तो लिया है मगर उनके भीतर गर्दे-गुबार अभी बाकी है। जिस रूप में उनका गर्दे-गुबार सामने आता है, उसका तो कहना ही क्या। इस बहस में इत्ती कलमें टूटती हैं कि बस पूछो मत। कहीं न कहीं कलमों को भी शर्म जरूर आती होगी कि हाय! हम प्रगतिशील ज्ञानियों की कलम क्यों हुए।

साहित्य-वाहित्य से अगर टेक्नो-फ्रैंडली युवाओं का नाता टूट रहा है, तो प्यारे उसका एक कारण ये बेतुकी बहसें भी हैं। जो साहित्यिक ज्ञानी दूसरों को 'ये करो, ये न करो' का ज्ञान देते रहते हैं, जब खुद ही आपसी और पुरस्कार राजनीति में घुस आते हैं, तब साहित्य का दामन बदनाम हुए बिना नहीं रहता। अपन सच कह रहे हैं प्यारे फिर तो दिल करता है कि न साहित्य पर बात करो न ही उन साहित्यिक ज्ञानियों की शक्लों को देखो। बस, एक कोने में बैठकर चैन की बंसी बजाओ। न नौमन तेल होगा न राधा नाचेगी।

तो प्यारे, जिन्हें नोबेल के लिए या भारत रत्न के लिए लड़ना हो वे लड़ें अपन तो उनकी लड़ाई का लुत्फ ऐसे ही लेते रहेंगे। जय हो।

बुधवार, 28 सितंबर 2011

अपन भी उपवास करेंगे

सोच रहे हैं, वैसे ऐसा सोचने में जाता भी क्या है, कि एक उपवास अपन भी कर लें। मोदी जी का उपवास हिट हो ही लिया है, अपन का भी हो जाएगा। आखिर अपन भी मोदी जी से कोई कम मशहूर थोड़ ही हैं! जित्ता उन्हें लोग जानते हैं, उत्ता ही अपन को भी। बैठे-ठाले शोहरत को ले लेने में कोई बुराई भी नहीं है। आजकल जमाना ही कुछ ऐसा है प्यारे। जिसके भीतर हिट होने की कला है, समझिए वो कभी बीट हो ही नहीं सकता।

हालांकि अपन ने अभी यह डिसाइड नहीं किया है कि उपवास करना किस मुद्दे पर है मगर क्या फर्क पड़ता है! उपवास के लिए तो किसी और कैसे भी मुद्दे को पकड़ा जा सकता है। मतलब तो मुद्दे से हो चाहिए। और अपने देश में मुद्दों की कहां कोई कमी है। एक खोजो हजार मिलते हैं। अब देखा जाए तो मोदी जी के कने कोई मुद्दा थोड़े था, वो उपवास तो उन्होंने इस कारण रखा था ताकि सांप्रदायिक धब्बों को मिटा सकें। छवि को उजला बना सकें। लगे हाथ पार्टी को भी यह बता सकें कि दिल्ली की गद्दी पर बैठने की ताकत वे भी रखते हैं। मोदी जी कित्ते ताकतवर हैं, इसे अमेरिकी कांग्रेस की रिपोर्ट पहले ही बता चुकी है। यहां जिस बात, व्यक्ति और मुद्दे पर अमेरिकी ठप्पा लग गया समझिए अब से वो 'पवित्र' है।

अभी तलक तक तो अपन ने केवल बापू के उपवास के बारे में ही सुना-पढ़ा था। बेहद साधारण किस्म का उपवास किया करते थे बापू। उनके उपवास के न्यौते नहीं जाया करते थे खास-खास लोगों को। न ही उपवास के ताईं वो निश्चित दिन या समय रखा करते थे। परंतु वो तब के जमाने का उपवास था और यह आज के जमाने का उपवास है। तब बापू के उपवास को किसी इवेंट मैंनजमेंट ने मैनीज नहीं था, पर मोदी जी का उपवास पूर्णतः मैनीज था। हाई-फाई और हाई-टेक था। जाहिर-सी बात है, जब ऐसे उच्च किस्म के उपवास करने को मिलें तो भला कौन छोड़ना चाहेगा?
मोदी जी से प्रेरणा लेकर यही सोच रहे हैं कि मोहल्ले के नुक्कड़ पर अपन भी एक टेंट जमा लें। शहर के कुछ हाई-फाई लोगों को आमंत्रित कर लें। आर्शीवाद के वास्ते साधु-संतों को मंच पर बैठा लें। अब रही बात भीड़ के जुटान की तो वो जुट ही जाएगी। आखिर मामला उपवास का जो है। हो सकता है, उपवास का निर्णय आगे चलकर अपन के वास्ते कोई राजनीति सौगात ही ले आए। अपन को भी शहर या गांव से कोई इकिट-टिकट मिल जाए। सड़क से संघर्ष करते-करते संसद में ही न पहुंच जाएं। यहां सबकुछ संभव है, बस जुगाड़ को साधने की जुगाड़ आनी चाहिए आपको।

और फिर इस लेखन में धरा ही क्या। रोज--रोज कागजों को रंग-रंगकर दिमाग को खोटी करते रहो। नेता बनकर कम से कम अपने सरकारी और राजनीति हितों को साधने का मौका तो मिलेगा। जो चीज या सुविधा अभी तलक नहीं पाई, उसे पाने का मौका तो हाथ आएगा। इस खातिर अपन केवल तीन दिन नहीं बल्कि कित्ते ही दिनों तलक उपवास पर रहने को तैयार हैं। आखिर राजनीतिक कुर्सी भी तो कोई चीज होती है प्यारे।

अपन का उपवास डिसाइड-सा ही है, जैसे ही दिन और समय का शुभ मुहूर्त तय होता है बताते हैं आपको। तब तलक आप कहीं जाइएगा नहीं क्योंकि उपवास में आपको अपने के साथ जो रहना है।

देश के गरीबों के नाम पाती

सुनो प्यारे गरीबों,
प्रसन्न हो जाओ। घी की मोमबत्तियां जलाओ। मोतीचूर के लड्डू बांटो। क्योंकि तुममें से अब कोई गरीब नहीं रहा! अब तुम और तुम्हारे जैसा अन्य गरीब अब अमीर है। चूंकि तुम्हारी कमाई पच्चीस रुपए से ज्यादा है इस नाते तुम अमीर हो। दरअसल, हमारी प्रगतिशील सरकार के उत्तर-आधुनिक योजना आयोग ने गरीबी की परिभाषा को ही अब बदल दिया है। जिसकी कमाई 32 और 25 रुपए से ज्यादा है, वो अमीर है। यानी कम में अमीर बनने का सुख क्या होता है, इसे तुम अब कदम-कदम पर महसूस किया करोगे। बधाई हो प्यारे!
अरे, तुम्हें तो हमारे योजना आयोग को करबद्ध होकर प्रणाम ठोकना चाहिए कि उसने तुम्हें अमीरियत का स्पष्ट एहसास करवाया। तुम्हारे गरीब जज्बातों का पूरा ख्याल रखा। तुम अमीरों के बीच खुद को डर्टी फील न करो, इस फीलिंग को नस्तेनाबूद किया। भला ऐसा नेकदिल योजना आयोग कहीं किसी देश में होगा जैसा कि अपने देश में है।

वाकई गरीब और गरीबी देश के ताईं कलंक समाने हैं। इससे देश के साथ-साथ सरकार का भी मान घटता है। अमेरिका जैसे देश यह सोचते होंगे कि सरकार अपने देश के गरीबों के वास्ते कुछ करती ही नहीं। देश की गरीबी और गरीबों पर हमारी सरकार को अक्सर यहां-वहां सफाई पेश करनी पड़ती है। सो, योजना आयोग ने इस सफाई का अब झंझट ही खत्म किया। उसने कम में देश के गरीबों को अमीर बनाकर एक बड़ी मिसाल पेश की है। अब जब अमेरिकी कांग्रेस भारत पर कोई रिपोर्ट लिखेगी, तो हमारे योजना आयोग की काबिलीयत का जिक्र वहां सर्वप्रथम होगा। साथ ही विपक्ष के लिए भी यह करार जवाब साबित होगा।

इस परिभाषा पर जिन्हें मुंह मसोसना हो वे मसोसें परंतु देश के गरीब बेहद प्रसन्न (!) हैं। घर बैठे ही वे जरा से रुपयों में अमीर हो लिए यह क्या कम बड़ी बात है उनके ताईं। आज के इस महंगाई भरे दौर में कम में अमीर होना बहुत कठिन है प्यारे। लेकिन योजना आयोग ने इसे कर दिखाया। देश के गरीब उनके प्रति दिल से ऋणी हैं।

चूंकि अपने देश से गरीब और गरीबी समाप्त हो चुकी है, इस नाते हम उम्मीद करते हैं कि अब यहां न कोई किसान आत्महत्या करेगा, न किसी का कंगाली में आटा गीला होगा, न गरीब की बेटी घर में बैठेगी, न किसी को रोटी के लाले होंगे। हर तरफ समृद्ध, पैसा और अमीरपना होगा। सरकार के लिए भी यह राहत की बात होगी कि कोई गरीब उसके दर पर अब फरियाद लेकर नहीं आएगा।
तो प्यारे गरीबों, अपनी गरीबी से मुक्त समझो और झूम के नाचो-गाओ ताकि सरकार भी सुन सके।

बधाई हो प्यारे, गरीब भी अब अमीर हुए

किन शब्दों और किस लहजे में अपन योजना आयोग की 'आर्थिक दूरदर्शिता' को धन्यवाद दें, समझ नहीं पा रहे। गरीबी-अमीरी की जो 'उम्दा परिभाषा' उसने पेश की उस पर अपन को बेइंतहा गर्व हुआ। न सिर्फ अपन को बल्कि गांव-देहात के प्रत्येक गरीब को हुआ। गरीबों ने कभी सपने में भी यह नहीं सोचा होगा कि वे मात्र छब्बीस रुपए की कमाई के सहारे ही अमीर हो जाएंगे। अब से हमें-तुम्हें यह मान लेना चाहिए कि अपने देश से गरीब और गरीबी दोनों ही समाप्त हुई। बधाई हो प्यारे।

खबरदार! गरीबों अब तुममें से किसी ने भी खुद को गरीब-गुरबा बताया तो अच्छा न होगा। योजना आयोग की दी हुई परिभाषा के साथ यह अपमान होगा। तुम तो बस अब अपने अमीर होने का अपनी झोपड़-पट्टी में जश्न मनाओ।

बताइए जिस आर्थिक विषमता तो मिटाने में मार्क्स ने अपना संपूर्ण चिंतन लगा दिया दास कैपिटल तक लिख डाला उसे हमारे काबिल योजना आयोग ने मात्र छब्बीस और बत्तीस रुपए के आधार पर ही सुलटा लिया। प्यारे, कभी मार्क्स ने भी यह कल्पना नहीं की होगी कि छब्बीस और बत्तीस रुपए की कमाईवाले भी अमीर हो सकते हैं! अपन ऐवईं मार्क्स को महान अर्थशास्त्री समझते रहे लेकिन योजना आयोग तो उनसे भी पांच-छह कदम आगे है। अपन तो कहते हैं कि ऐसा योजना आयोग हर देश में होना चाहिए। ताकि आर्थिक विषमताओं पर रोक लग सके।

ठंडे दिमाग से अगर हिसाब-किताब किया जाए तो अपने देश में गरीबी है ही कहां! अपना देश आज भी सोने की चिड़िया है। अरे, वो कुछ फीसद गरीब ही देश के विकास का हाजमा खराब किए हुए हैं। वरना तो यहां हर कहीं खुशहाली ही खुशहाली और दौलत ही दौलत है। तेजी से बढ़ती विकास दर ने तो अब गरीबों को भी अमीरों की श्रेणी में ला खड़ा किया है। गरीब भी अमीर होने लगे हैं। अमां हवा हुए वे जमाने जब भारत कभी गांव में बसता था। भारत अब इंडिया बन गया है। इंडिया में गांव नहीं मल्टीप्लैस और मल्टीकलचर बसता है। भारत और इंडिया के मध्य जो दीवार है। हमारे योजना आयोग की कोशिश है कि इस दीवार को जल्द ही तोड़ा जाए ताकि अमेरिका हम पर नाज कर सके। क्योंकि जब तलक अमेरिका हमें अमीर और विकसित देश घोषित नहीं कर देता, हमारी सरकार को चैन से नींद नहीं आने वाली।

जित्ते मुंह उत्ती बातें। कुछ ज्ञानी लोग कह-लिख रहे हैं कि इस परिभाषा में गरीब और गरीबी का खुला मजाक उड़ाया गया है। गरीबी को छब्बीस और बत्तीस रुपए में नहीं बांटा जा सकता। लो जी, ऐ भी कोई बात हुई भला! सरकारों को देश और जनता की आर्थिक तरक्की के वास्ते प्रायः ऐसे आंकड़ें पेश करने ही होते हैं। जिन ज्ञानियों को यह तरक्की पसंद नहीं, मेरे विचार में, वे देश की आर्थिक ग्रोथ से जलते हैं। वे प्रगतिशील नहीं हैं। अरे, उन्हें तो योजना आयोग में बैठे ज्ञानियों का एहसान मानना चाहिए कि उन्होंने गरीबों को बरसों पुरानी आर्थिक दासता व असमानता की भावना से मुक्त कराया। पर क्या करें आलोचना करने की हमें आदत जो हो गई है।

गरीबी कुछ है नहीं महज 'दिमागी फोबिया' है। विपक्षी दल चाहते हैं कि देश में गरीब और गरीबी बनी रहे ताकि वे वोट बैंक की राजनीति कर सकें। इसीलिए योजना आयोग की इस परिभाषा पर सबसे ज्यादा आपत्ति विपक्ष को ही है। हमारी प्रगतिशील सरकार तो शुरू से प्रयासरत रही है कि देश से गरीब और गरीबी जितना जल्दी हो सके खत्म हो। अगर वैसे नहीं हो सकती तो ऐसे हो। मगर हो। देखिए महंगाई का निरंतर बढ़ते रहना गरीबी को कम करने की दिशा में एक बेहतरीन कदम है। महंगाई बढ़ेगी तो स्वतः ही गरीब कम होंगे। गाहे-बगाहे होने वाली किसानों की आत्महत्याएं स्पष्ट उदाहरण हैं।

आप मानें या न मानें परंतु देश के गरीब भी अब समझदार हो गए हैं। अब अमीरों की तरह उन्हें भी अपनी 'इमेज' की चिंता रहती है। आखिर कब तलक वे अपनी गरीबी का मजाक यूंही बनते रहने देंगे। ध्यान रखें, वे 16-17वीं सदी के गरीब नहीं 21वीं सदी के 'सम्मानजनक गरीब' हैं। कोई गरीब नहीं चाहता कि उसे गरीब कहा या माना जाए। बदलते वक्त के साथ-साथ गरीबों ने अपनी परिभाषा को स्वयं ही बदल दिया है।

फिर इस हिसाब से योजना आयोग की गरीबों के लिए गढ़ी गई नई परिभाषा बिल्कुल उपयुक्त है। ज्ञानी लोग खामाखां ही इसका विरोध करने में जुटे हैं।

प्यारे, यह विरोध का नहीं खुशियां बांटने और मनाने का समय है। हमारा देश अब गरीब और गरीबी मुक्त है। जो थोड़े बहुत गरीब बचे भी हैं, कुछ मेहनत कर वे भी 26-32 की परिभाषा में ढलने का जल्द ही प्रयास करेंगे। आखिर उन्हें भी तो अपने स्टेटस की चिंता होगी की नहीं!
बहरहाल, सरकार अब गरीब और गरीबी की तरफ से बेफिक्र रहे उसे योजना आयोग ने संभाल लिया है। अभी तो सरकार अपना सारा ध्यान चिदंबरम साहेब को बचाने में लगाए क्योंकि टूजी कारनामे में उनकी टांग भी फंसती नजर आ रही है। बेसब्री से इंतजार है, आगे के मनोरंजन का।