मंगलवार, 15 मई 2018

मंटो पागल नहीं था

जब भी फुर्सत पाती है, मंटो की 'आत्मा' मेरे पास चली आती है। हालांकि मंटो को गुजरे पचास साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका है मगर उसकी आत्मा में खास बदलाव नहीं आया है। वो दुनिया-समाज से तब भी नाराज थी, आज भी उतनी ही नाराज है। नाराज हो भी क्यों न! जिस समाज ने हमेशा उसे 'पागल' और उसके लिखे को 'अश्लील' समझा उससे 'नाराजगी' तो बनती है।

मंटो की आत्मा सवाल बहुत करती है। ऐसे-ऐसे सवाल अगर आज की हुकूमत सुन ले तो फिर से उसे 'पागलखाने' में डलवा दे। मगर उसके सवाल होते बहुत वाजिब हैं। वो समाज के- दिमागी स्तर पर- न बदलने पर बहुत खफा है।

मुझसे पूछती है- कितनी हैरानी की बात है, मेरे गुजरने और देश में लोकतंत्र के पैर जमाने के बाद भी लोग जिस्म में तो बदल गए लेकिन दिमागी तौर पर बीमार ही हैं, क्यों? क्या कहूं मंटो की आत्मा से कि उसके इस सवाल का जबाव मेरे पास तो क्या इस्मत आपा के पास भी न होगा।

दरअसल, ये बड़ा ही डरपोक और दब्बू किस्म का समाज है। यहां बखत उसी की है, जो जितना दिमागी से पैदल है। फिर चाहे वो लेखक हो या नेता।

मंटो की आत्मा को यह भी खबर है कि उस पर एक फिल्म तैयार है यहां। इस बात की खुशी उसे भी बहुत है कि लोग उसे पचास साल बीतने के बाद भी शिद्दत से याद करते हैं। उसको खूब पढ़ा और उस पर लिखा भी जा रहा है। लेकिन फिर भी यह दुनिया और समाज बदल क्यों नहीं रहा? कतई कुत्ते की पूंछ जैसा है, टेढ़ा का टेढ़ा।

'यह नहीं बदलने का मंटो साब'। मैं मंटो की आत्मा से कहता हूं। वो खामोश रहती है। थोड़ी हंसी के साथ कहती है कि न बदले मेरा क्या उखाड़ लेगा। मुझे तो जो लिखना था लिख दिया। कह दिया। 'खोल दो' के बाद भी लोग अगर अपनी सोच को नहीं खोलना चाहते तो उनकी मर्जी। पड़े रहें बंद कुएं में। बंद दिमाग और खब्ती विचारों के साथ।

मैं मंटो की आत्मा का दुख समझ सकता हूं। मन में सोतचा हूं- पागल मंटो नहीं, यह समाज ही था।

बुधवार, 9 मई 2018

गर्मी का डर

मनुष्य बड़ा ही डरपोक किस्म का प्राणी है। किसी न किसी बात पर हर वक्त डरा-सहमा सा रहता है। लेकिन 'डर के आगे जीत' होने का दावा भी करता है। हालांकि इस तरह के दावे विज्ञापनों में ही किए जाते, वास्तव में जब डर सामने होता है, तब सारी जीत दस्त बनकर निकल जाती है।

फिलहाल, इन दिनों मनुष्य गर्मी से डरा हुआ है। अभी चार-पांच महीने पहले तक सर्दी से डर हुआ था। थोड़े दिनों बाद जब मानसून शुरू होगा तब बरसात से डरा-डरा घूमेगा। डर को मनुष्य ने अपने व्यवहार में ऐसे शामिल कर लिया है कि नन्हे से कॉकरोच को देखकर भी विकट डर जाता है।

जब से मनुष्य ने यह सुना है कि इस बार गर्मी पेलके पड़ेगी, बस डर गया है। खुद को गर्मी से बचाए रखने के उपाय यूट्यूब पर देख-खोज रहा है। एक-दूसरे को गर्मी से बचाव के नुस्खे भी सुझा रहा है। फिर भी, गर्मी को गरियाने में लगा पड़ा है।

इस भले मनुष्य से यह पूछा जाए कि गर्मी को गरिया कर क्या हासिल हो जाएगा? गर्मी का स्वभाव ही तपाना है, वो तपाएगी ही। किसी के गरियाने या बौखलाने का असर गर्मी पर तो होने से रहा।

यों भी, गर्मी इस दफा कोई पहली बार तो पड़ नहीं रही। हर बार की यही कहानी है। गर्मियों के दिनों में ही पेड़ लगाने, पानी बचाने, प्रकृति से छेड़छाड़ न करने जैसी क्रांतिकारी बातें याद आती हैं। गर्मी के विदा लेते ही सारी बातें हवा में धूल उड़ाती जान पड़ती हैं।

बात-बात पर गाल बजाना मनुष्य का जन्म से ही स्वभाव रहा है। प्रकृति की रक्षा के वास्ते जाने कितनी ही कसमें हम हर रोज खाते हैं। पर नतीजा किसी का कुछ नहीं निकलता। जैसे- नेता जनता के समक्ष कसमें खाकर भूल जाते हैं, वैसे ही हम प्रकृति के समक्ष। हिसाब बराबर।
हर साल गर्मियों में पारा 50 पार निकल जाता है। टीवी हल्ला मचाता है। मनुष्य हाय गर्मी, हाय गर्मी चिल्लता है। मगर गर्मी है कि अपनी मर्जी से बाज नहीं आती। सोचने वाली बात है, गर्मी गर्मियों में नहीं पड़ेगी तो कब पड़ेगी?

मुझ जैसों को तो बेसब्री से इंतजार रहता है गर्मी का। हालांकि गर्मियां अब मेरे बचपन जैसी नहीं रहीं तो क्या आनंद तो अब भी उतना ही देती ही है। गर्मी के होने का अहसास ही बचपन की यादों में ले जाता है। बचपन की गर्मियां कितनी बे-फिक्र थीं। नानी का घर था। पास में घना पेड़ था। दोपहरें यों ही आपस में खेलते बीत जाती थीं। आंगन में पसरी धूप और उसी में खेलने की जिद का भी अपना ही मजा था।

मगर वो समय अब गुजर चुका है पर गर्मियां अपने स्वभाव में अब भी नहीं बदली हैं। हां, लोग जरूर बदल गए हैं। अब लोग गर्मी से घबराते हैं। ज्यादा गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर पाते। पेड़ की नहीं एसी की ठंडक ढूंढ़ते हैं।

कितना डरपोक हो गया है मनुष्य न। गर्मी से डरता है।

मंगलवार, 1 मई 2018

लाल किला बिक थोड़े न रहा है

बात बहुत बड़ी नहीं, बस इतनी-सी है। कि, सरकार लाल किले की देख-भाल का जिम्मा एक निजी ग्रुप को सौंप रही है। तो क्या...! सौंपने दीजिए न। जब खुद से नहीं संभल-संवर पा रहा तो निजी ग्रुप ही देखे। इस बहाने लाल किला लाल किला तो नजर आएगा। निजी ग्रुप उसकी साफ-सफाई तो करता रहेगा। रंगाई-पुताई, धुलाई भी साथ-साथ हो जाया करेगी।

अब सरकार के पास इतना वक्त कहां धरा है कि वो देश की धरोहरों की देख-भाल करती फिरे। सरकार खुद की ही देख-भाल कर ले, ये ही बहुत है। आए दिन तो उसे कभी इस तो कभी उस राज्य के चुनावों में बिजी रहना पड़ता है। सरकार या मंत्री लोग चुनाव देखें या धरोहरों को। उनके लिए तो उनकी कुर्सी ही धरोहर है। वे तो उसे ही बचाए रखने में दिन-रात संघर्षरत रहते हैं।

अच्छा ही किया जो सरकार ने लाल किले की साफ-सफाई का अधिकार एक निजी ग्रुप को दे दिया। कम से कम अब वे लाल किले को अपना समझकर तो उसकी देख-रेख करेंगे। अब सब कुछ समय-प्रबंधन के साथ होगा। उम्मीद है, लाल किला का लाल रंग और भी निखर कर आएगा।

मगर उड़ाने वाले तो यह अफवाह उड़ा रहे हैं कि सरकार ने लाल किले को निजी हाथों बेच दिया। उसका सौदा कर दिया। धरोहर की इज्जत को नुकसान पहुंचाया। विश्व में देश का सिर शर्म से झुका दिया। आदि-आदि।

हद है। सरकार भला ऐसा क्यों करेगी। जितना प्यार विपक्ष लाल किला से करता है, उससे कहीं ज्यादा सरकार करती है। धरोहर को कैसे सहेजा जाए, यह सरकार से ज्यादा अच्छा कौन जानता है भला। सरकार के भीतर क्या कम धरोहरें हैं। जिन्हें वो आज भी करीने से सहेजे हुए है।
लाल किला जैसी धरोहर अगर सरकार की प्राथमिकता में नहीं होती तो उसके बारे में वो सोचती ही क्यों। यह बात सरकार भी अच्छे से जानती है कि धरोहर की हिफाजत जितना बेहतरीन तरीके से निजी ग्रुप कर लेगा शायद सरकार न कर पाए। कभी सरकारी दफ्तर और निजी ऑफिस के भीतर जाकर देखिए, फर्क स्वयं पता चल जाएगा।

कल तक लाल किले की चिंता किसी को नहीं थी। आज एक निजी ग्रुप को क्या कह दिया देख-भाल करने के लिए विपक्ष से लेकर बुद्धिजीवि तक यों चीख-चिल्ला रहे हैं मानो हिमालय पर्वत खिसक कर बरेली में शिफ्ट हो गया हो!

लाल किला को बेचने-फेचने की बातें सिर्फ अफवाहें हैं। अफवाहों के न सिर होते हैं न पैर। वे बे-पर ही यहां-वहां उड़ती रहती हैं। अतः अफवाहों पर ध्यान न दें। सरकार की मंशा को गलत न समझें। लाल किला कल भी अपना था। आज भी अपना है। हमेशा अपना ही रहेगा।

बुधवार, 25 अप्रैल 2018

उपवास से उपहास तक

उनके उपवास को उपहास का केंद्र खामखां बनाया गया। जबकि ऐसा किसी इतिहास या कानून की किताब में नहीं लिखा है कि उपवास मतलब नितांत 'भूखा' रहना। पहले या बीच-बीच में थोड़ी-बहुत टूंगा-टांगी चलती है। बंदा उपवास कर रहा है, कोई अपनी जान देने थोड़े न बैठा है। जीवन अनमोल है।

सोशल मीडिया तो झूठ और फोटोशॉप का पुलंदा है। जो धत्तकर्म कहीं नहीं हो सकते वो यहां होते रहते हैं। और, बेहद खुलकर होते हैं। सीन को थोड़ा समझने का प्रयास करें। पहली बात, सोशल मीडिया पर खाने की जो तस्वीर वायरल हो रही है, उसमें छोले-भटूरे नहीं पूरियां-छोले नजर आ रहे हैं। दूसरी बात, उस तस्वीर में अध्य्क्ष महोदय कहीं नहीं हैं। अब पार्टी के कुछ सदस्य बाहर जाकर कुछ खा-पी लेते हैं तो इसमें इतना हंगामा खड़ा करने का क्या मतलब! पेटपूजा से बड़ा कोई कर्म नहीं।

यों भी, यह कुछ घंटे का सांकेतिक उपवास था। सरकार को बस बताना भर था कि 'देखो, दलित हित के नाम पर उपवास हम भी कर सकते हैं।' जरा-सी देर के उपवास के लिए तमाम तरह की फॉर्मिल्टज निभाई जातीं, यह तो कोई अक्लमंदी नहीं होती! आगे जब कभी उन्हें लंबी भूख हड़ताल करनी होगी, तब देखा जाएगा।

हर किसी ने सोशल मीडिया और अखबारों में कथित छोले-भटूरे तो खूब देख लिए किंतु उपवास के पीछे का उद्देश्य समझने की कोशिश ही नहीं की। अमां, इतना आसान नहीं होता जन-हित के लिए सरकार से लड़ना-भिड़ना। धरने पर बैठना। आंदोलन करना। उपवास रखना। हरदम जनता को यह विश्वास दिलाते रहना कि तुम चिंता मत करो। हम मरते दम तक तुम्हारे साथ हैं। ऐसा कहने और करने का साहस केवल जन-नेता के पास ही होता है। और, उन्होंने यह करके भी दिखा दिया। यह क्या कम बड़ी बात रही?

पता नहीं कुछ लोग उनके हर प्रयास को मजाक में क्यों लेते हैं। वे कोई पहले जन-नेता तो हैं नहीं जो उपवास पर बैठे हों। अतीत में ऐसे नेताओं की फौज है जिन्होंने अपना राजनीतिक करियर ही उपवास के सहारे चमकाया है। उनमें से कोई सीएम बना बैठा है तो कोई मंत्री।

सामाजिक जीवन में भले ही न हों पर राजनीतिक जीवन में उपवास के अनेक लाभ हैं। सीधे शब्दों में कहूं तो बड़ा और मशहूर नेता बनने का रास्ता उपवास की गली में से होकर ही निकलता है। वो नेता ही किया जो अपनी जनता के हितों की खातिर कुछ देर भूखा न रह पाए। या दलित के घर खाना खाने न जाए!

अंदर ही अंदर मैं भी उनकी सांकेतिक भूख हड़ताल से प्रभावित हुआ हूं। मेरा भी दिल करने लगा है कि किसी दिन किसी सोशल मुद्दे पर मैं भी उपवास पर बैठूं। गोटी अगर फिट बैठ गई तो लेखक से नेता बनने की संभावनाएं किसी भी पॉलिटिकल पार्टी में तलाश लूंगा। जन-हित के वास्ते जितने काम मैं नेता बनकर कर सकता हूं, लेखक बने रहकर नहीं कर पाऊंगा। लेखक की इस दुनिया में सुनता ही कौन है! खुद की बीवी तक न सुनती।

भले ही उनके उपवास का सोशल मीडिया पर उपहास उड़ा पर कदम उन्होंने पीछे नहीं हटाए हैं। सरकार से 2019 में दो-दो हाथ करने की तैयारी में दिख रहे हैं। अच्छा है। बहुत अच्छा है। करें। मेरी शुभकामनाएं उनके साथ हैं।

तंज कसने वालो से मैं कहना चाहता हूं, छोले-भटूरे इतना बुरा आइटम नहीं कि आप उपहास उड़ाएं। बड़ा ही मस्त धंधा है। सही बताऊं, अगर मैं ज्यादा न पढ़ा होता तो आज निश्चित ही अपने शहर में मेरा भी छोले-भटूरे का ठेला होता। जितना मैं नौकरी कर कमा पा रहा हूं, इससे दोगुना छोले-भटूरे का ठेला लगा कर कमा लिया होता अब तक। जिंदगी चैन से गुजर रही होती।

अपने देश में हर टाइप का धंधा मंद हो सकता है पर खाने-पीने का कभी नहीं। बड़े-बड़े भूखड़ पड़े हैं यहां। खाने-पीने का फ्यूचर हमेशा ही ब्राइट है अपने देश में।

लोगों का क्या है वो तो कुछ न कुछ कहते ही रहते हैं। अभी उन्होंने उनके उपवास को टारगेट किया कल को पीएम के किसी भाषण पर जोक बनाने लग जाएंगे। सोशल मीडिया के अपने चोचले हैं। अच्छा खासा उनका उपवास चल रहा था अगर सोशल मीडिया पर इसका उपहास न उड़ाया गया होता।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यह उनका पहला उपवास था। पहले कदम में थोड़ी-बहुत गलतियां तो हो ही जाती हैं। परफेक्ट तो यहां कंप्यूटर भी न होता शिरिमानजी।

उपहास उड़ाने वाले खुद जरा आधा घंटा भूखा रहकर तो देख लें। कसम से भीतर तक के टांके ढीले न हो जाएं तो जो कहें वो हारने को तैयार हूं।
पॉपुलर नेता बनने के लिए ये सब तो करना पड़ेगा। अभी उन्होंने उपवास किया है, हो सकता है, कल को जन-हित की खातिर वनवास पर भी निकल जाएं। इरादे मजबूत होने चाहिए बाकी समय इतिहास लिखता रहता है। उनके उपवास ने भी कम बड़ा इतिहास नहीं रचा है! मानिए तो सही।

मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

कैशलैस होइए, क्या समस्या है

जब 'पैसा हाथ का मैल है' तो 'एटीएम में कैश नहीं है' को लेकर इतना फिक्रमंद क्यों होना महाराज? नहीं है तो नहीं है। समझदारी तो इसमें है कि जो चीज नहीं है, काम उसके वगैर चलाया जाए। लेकिन नहीं...।
लगा पड़ा है हर कोई सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक कभी सरकार तो कभी बैंक को गरियाने में। गरियाते रहिए। गरियाने से न तो कैश एटीएम में भर जाएगा। न सरकार नतमस्तक होकर अपनी जेब से पैसा निकालकर आपके हाथ में धर देगी।

जबकि प्रधानमंत्री जी कितनी ही दफा हमसे कैशलैस होने का आह्वान कर चुके हैं। कितनी ही तरह की एप्स मौजूद हैं पैसे के लेन-देन के लिए। एक प्रकार से बैंक ही मोबाइल पर आ गया है। अब ज्यादा जरूरत न बैंकों के चक्कर काटने की रही, न कैश को जेबों में रखने की। लेकिन फिर भी लोग एटीएम और कैश के प्रति अपना मोह त्यागना नहीं चाहते।
कैशलैस होने के अपने फायदे हैं। सबसे बड़ा फायदा तो यही है कि जेब भारी-भरकम पर्स के बोझ से मुक्त रहती है। जेब कटने का खतरा भी न के बराबर रहता है। प्लास्टिक मनी से पैसा चुकाते वक्त चार लोगों की निगाह आप पर रहती है। सोसाइटी में आपका मान-सम्मान बढ़ता है।
अब तो कुछ एप्स से पेमेंट करने पर अच्छा-खासा 'कैश-बैक' भी मिलने लगा है। जेब में क्रेडिट कार्ड का होना खुद में कितना आत्मविश्वास भर देता है। इसे दिल से महसूस कीजिए।

न्यू इंडिया में रहना है तो कैश और एटीएम का मोह तो छोड़ना होगा। आदत तो डालने से डलती है जनाब। मुझे ही देखिए न। जेब में कैश होने के बावजूद पत्नी से साफ कह देता हूं पैसे नहीं हैं। जब भी कोई रिश्तेदार घर आने का मन बनाता है तो उनसे कह देता हूं कार्ड साथ में लेते आइएगा। बाहर नकदी की समस्या विकट है।

चाहे दूध वाला हो या सब्जी वाला सबको पेटीएम ही करता हूं। कैश का अपने साथ कोई रगड़ा नहीं। सिर्फ कहने या विज्ञापन के दिखाए जाने से ही थोड़े न बन जाएंगे हम न्यू या डिजिटल इंडिया। उस रूप में खुद को ढालना तो पड़ेगा ही न।

यकीन मानिए, इस कैश-वैश, एटीएम-फेटीएम में कुछ नहीं रखा। जितना जल्दी हो खुद को कैशलैस कर लीजिए। कैश के झंझट से मुक्ति पाइए। समय से दो कदम आगे चलने में ही भलाई है। कब तक यथास्थितिवाद में जीते रहेंगे महाराज।

मैं तो उस कल्पना भर से ही प्रफुल्लित हो जाता जब मुझे पूरा इंडिया कैशलैस नजर आता है। यों लगता है मानो किसी दूसरे ही संसार में आ गया हूं। कितना दिलचस्प होगा न कि एक भिखारी मुझसे कैशलैस भीख मांगे। या एक जूस वाला मुझे कैशलैस जूस पिलाए। इंडिया ऐसे ही तो बदलेगा। सरकार या बैंक को गरिया लेने से मन की भड़ास जरूर निकल जाएगी मगर कैश फिर भी हाथ-पल्ले न पड़ेगा।

तो क्यों न कैशलैस ही हुआ जाए। क्या समस्या है।

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018

आतंकवादी नहीं हैं मच्छर

आजकल मुझे मच्छरों से पीड़ित लोग बहुत मिल रहे हैं। हर किसी की जुबान पर बस यही शिकायत है- 'मच्छरों ने आतंक मचा रखा है।' तो क्या मच्छर आतंकवादी हो गए हैं? नहीं। मैं मच्छरों की तुलना आतंक या आतंकवादी से करने के सख्त खिलाफ हूं। यह एक निरही जीव को बदनाम करने की कुत्सित साजिश है।

मैं इस बात की पूर्ण जिम्मेदारी लेने को तैयार हूं कि मच्छर कभी आतंक मचा ही नहीं सकते। आतंक न तो मच्छरों के स्वभाव में है न ही उनका शौक। यह मैं इसलिए भी कह रहा हूं क्योंकि मेरा उनका साथ 24x7 का है। न वे मुझसे एक पल को दूर रह सकते हैं न मैं उनसे।

सिर्फ हल्का-सा काट भर लेने के अतिरिक्त मच्छर कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। ईश्वर ने डंक उन्हें दिए ही इस बात के लिए हैं ताकि वे उनके माध्यम से खुद का दाना-पानी ले सकें। क्या हम मच्छरों के पेट की खातिर अपना थोड़ा-सा खून भी नहीं दे सकते? हे! मनुष्य, इतना भी स्वार्थी न बन कि एक नन्हे से जीव को जीवन भी न दे सके। यों भी बेचारे मच्छर की जिंदगी होती ही कितनी-सी है। बामुश्किल दस-पन्द्रह दिन।

मेरा ही खून दिन भर में जाने कितनी बार मच्छर पी लेते हैं किंतु मैंने न तो कभी बुरा माना न कभी शहर के डीएम साहब से शिकायत की। पी लेते हैं तो पी लें। इतने बड़े शरीर से चींटी बराबर खून अगर निकल भी जाएगा तो मेरा क्या चला जाएगा। जरूरतमंद को खून देना शास्त्रों में पुण्य का काम बताया गया है।

न जाने क्यों हम इंसान पुण्य कमाने से घबराते हैं। जबकि सबको पता है खाली हाथ आए थे, खाली हाथ ही जाना है। फिर भी...!

मच्छरों का वर्चस्व सर चढ़कर बोल रहा है। जमीन से लेकर जहाज तक में उनका रुतबा कायम है। अभी खबर पढ़ी कि एक विमान में मच्छर के काट लेने से अंदर विकट अप्रिय स्थिति बन गई। एयर-होस्टेस ने तो यात्री से यह तक कह डाला- 'हर कहीं हैं मच्छर। तुम देश बदल लो।'

मच्छरों से पार पाना फिलहाल असंभव-सा जान पड़ता है। लेकिन मच्छर आतंकवादी नहीं हैं।

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

नाम में कुछ न रखा

तय किया है कि मैं अपना नाम बदलूंगा! यह नाम अब मुझे जमता नहीं। न तो मेरे नाम में फिल्मी फील है न साहित्यिक प्रभाव। जब भी कोई मेरा नाम पुकारता है, लगता है, शुष्क नदी में पत्थर फेंक रहा हो! पता नहीं, क्या और क्यों सोचकर मेरे घर वालों ने मेरा यह नाम रख दिया।

बहुत अच्छे से याद है, जब क्लास में टीचर मुझे मेरे नाम से बुलाया करते तो सारे दोस्त मुझ पर हंसा करते थे। मजाक उड़ाते हुए कहते- कभी टाइम निकालकर दो-चार फूल हमारी बगिया में भी लगा जाना यार। कसम से उस वक़्त इतनी आक्रमक टाइप फील आती थी कि बस कुछ पूछिए मत। मन मसोस और मुट्ठी भिंच कर रह जाता था। लड़-भिड़ इसलिए नहीं सकता था क्योंकि मेरी गिनती क्लास के चरित्रवान स्टूडेंट्स में हुआ करती थी।

वैसे, मेरा चरित्रवान होना उनका कोरा भ्रम ही था। जबकि चरित्र से मेरा नाता दूर-दूर तक न तब था न अब है।

मैं अपने नाम के साथ कुछ ऐसा जोड़ना चाहता हूं ताकि भीड़ से अलग दिखूं। नाम से कुछ फेम तो कुछ बदनामी भी मिले। बदनामी से मैं डरता नहीं। क्योंकि लेखक आधा बदनाम ही होता है।

सोच रहा हूं, मैं भी अपने नाम के बीच में 'राम जी', 'शिव जी', 'गणेश जी', 'टकला', 'लंगड़ा', 'कबाड़ी', 'भूरा' आदि उपनाम लगा लूं। ये सभी नाम हिट हैं। और, आसानी से किसी की भी जुबान पर चढ़ जाने के लिए पर्याप्त हैं।

कोशिश मेरी यही रहेगी कि मेरे नाम पर थोड़ा सियासी बवाल भी हो। मेरे 'उपनाम' की प्रासंगिकता या अप्रासंगिकता पर नेता और बुद्धजीवि लोग आपस में बहस करें। मेरे उपनाम से जुड़ा इतिहास खंगाला जाए। सोशल मीडिया पर मेरे 'उपनाम' के स्क्रीन या फोटो-शॉप्ड लगे जाएं।
इससे मुझे और मेरे नाम दोनों को समान फायदा मिलेगा। साथ ही, इस अवधारणा पर लोगों का विश्वास मजूबत होगा कि नाम में कुछ न रखा। कभी भी कैसे भी इस्तेमाल कर लो।

मैं तो कहता हूं, एक मुझे ही नहीं हर किसी को अपने नाम के साथ कुछ-न-कुछ खिलवाड़ करते रहना चाहिए। इससे खुद के साथ-साथ कई लोगों का मन लगा रहता है।

बदनाम होकर नाम कमाने का चार्म ही कुछ अलग है बॉस।