शुक्रवार, 8 मई 2020

हंगामा है क्यों बरपा


लोग क्षुब्ध हैं। कह रहे हैं, तालाबंदी के बीच शराब बिक्री की छूट नहीं दी जानी चाहिए थी। इससे समाज और घरेलू हिंसा में वृद्धि होगी। बताइए, यह भी कोई बात हुई भला! आटा, दाल, चावल आदि बिक्री की छूट है पर शराब बिक्री पर 'हंगामा' बरपा हुआ है। दारू प्रेमियों पर लानत भेजी जा रही है। लोग भी न कितने आत्म-केंद्रित हो गए हैं। हमेशा अपने बारे में सोचते हैं। चालीस दिन से जो बंदा 'सूखा' घर में बैठा है अगर ठेके पर जाकर दो घूंट लगा लेता है तो क्या गलत करता है!

एक तरफ कोरोना का ख़ौफ़, दूसरी तरफ तालाबंदी का झंझट आदमी क्या करे, कहां जाए, कैसे अपने गम को गलत करे; इससे उबरने के लिए 'कुछ' तो चाहिए न। जब लाल दवाई में हर मर्ज का इलाज मुमकिन है फिर थोड़ी-बहुत ले लेने में क्या हर्ज! दिमागी परेशानियों से मुक्ति के लिए यह 'रामवाण' है। कसम से। खुद के 'निजी अनुभव' के आधार पर कह रहा हूं।

यकायक ठेकों पर उमड़ी भीड़ को देख कहा गया कि यह लॉकडाउन का उल्लंघन है। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं किया जा रहा। आदि। ये सब मिथ्या-प्रचार है। दारू प्रेमियों ने हर नियम-कायदे का पूर्णतः पालन किया। बराबर एक-दूसरे के बीच दो फिट का अंतर रखा। न ठेके पर न ठेके से बाहर न कोई आपस में लड़ा न झगड़ा। न किसी ने दारू चढ़ाकर सड़क पर हंगामा काटा। न कहीं छेड़छाड़ की वारदात हुई न छीनाझपटी की। दारू की बिक्री 'शांति' के साथ संपन्न हुई। और क्या लेंगे!

हर दारू-प्रेमी 'हंगामेबाज' नहीं होता, ध्यान रखें। बल्कि जितना सभ्य और अपने काम से मतलब रखने वाला दारू-प्रेमी होता है शायद ही कोई होता हो। पीकर हंगामा काटना उसका मकसद कभी नहीं रहा। जाने-अनजाने कभी कोई बहक गया हो तो बात अलग है। बहक कर भला कौन डांवाडोल नहीं होता।

चाहे कोई माने या न माने पर कोरोना का काट सिर्फ दारू में निहित है। दारू ही है जो इससे लड़ व भिड़ सकती है। 'इम्युनिटी' में जितनी श्रीवृद्धि दारू कर देगी, कोई और दवा या वैक्सीन नहीं कर पाएगी। मेरे मोहल्ले के एक वरिष्ठ दारू प्रेमी का कहना है- कोरोना महज वहम है। मैं उनसे इतिफाक रखता हूं। लगी रहे दुनिया कोरोना की वैक्सीन को बनाने के चक्कर में पर दारू प्रेमियों ने तो पहले ही इस पर सफलता पा ली है।

इतिहास गवाह है, दारू या दारू प्रेमी ने कभी किसी प्रकार की हिंसा की वकालत नहीं की। खुद को हमेशा इससे बचाकर रखा। कुछ ऐसे महापुरुष भी हैं, जिनके पीने के बाद लगेगा ही नहीं कि उन्होंने पी भी है। कमाल का 'कंट्रोल' रखते हैं वे खुद पर। वो तो दो-चार बहक कर हंगामा खड़ा कर देते हैं, जिससे दारू और दारू प्रेमी मुफ्त में बदनाम हो जाते हैं। वरना उनसे अधिक 'शांत' इस धरती क्या ब्रह्मांड में कोई नहीं।

हमें दारू प्रेमियों को 'मुख्यधारा' में लेना ही होगा। उनके प्रति अपनी सोच को बदलना होगा। उन्हें सम्मान देना होगा। दारू पीने का मतलब यह नहीं कि अगला 'बिगड़ैल' है। मुझे ही देख लीजिए, मेरे चिंतन व लेखन का सारा दारोमदार दारू पर निर्भर है। लगाने के बाद मैं कहीं बेहतर लिख पाता हूं। एक मैं ही नहीं बड़े-बड़े लेखकों-शायरों ने पीने के बाद लिखा और क्या खूब लिखा। हम आज उनके लिखे को बिंदास गुनगुना रहे हैं।

दारू पर हंगामा खड़ा न करें। जिन्हें शौक है पीने का उन्हें पी लेने दें। ठेके दारूबाजी के अड्डे नहीं, यह भ्रम अपने मन से निकल फेंके। देश की अर्थव्यवस्था में दारू प्रेमियों का भी बड़ा योगदान है। इसे कभी न भूलें। कोरोना से जंग का यही अंतिम उपाय है। 

अंत में-
हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी-सी जो पी ली है
डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है

शनिवार, 2 मई 2020

लॉकडाउन और डिश

लॉकडाउन जब से चालू हुआ है, घर में खाना खाना बंद कर दिया है। जब भी भूख लगती है, फेसबुक पर चला आता हूं। यहां घर से कहीं अधिक स्वादिष्ट भोजन देखने को मिल जाता है। इतनी तरह के व्यंजन होते हैं कि समझ नहीं आता क्या देखूं और क्या छोड़ दूं! खाने से भी इतनी तृप्ति न मिले, जितना देखकर मिल जाती है। यहां जितने लोग हैं, उतनी तरह के खाने हैं। जिसे देखो वही रसोई में खाना बनाने में लगा पड़ा है। लोगों ने तो दिन-रात के हिसाब से खाने के टास्क बांट रखे हैं। मसलन- सुबह के खाने में फलां डिश बनेगी, तो रात के खाने में अलां डिश। बीच-बीच में टुंग-टांग भी चलती रहती है।

सोचता हूं, लॉकडाउन में लोग कितना 'पेटू' हो गए हैं। घर-घर में या तो खाना खाने-बनाने की बातें हैं या फिर कोरोना पर डॉक्टरी ज्ञान। फेसबुक पर बकायदा लोग आपस में पूछते हैं कि आज खाने में क्या पकाया। जो पकाया है, उसी फोटू अपनी दीवार पर चढ़ाओ न। फिर लोग उस पर अपने कमेंट देते हैं। उन कमेंट्स तो पढ़कर मुझे लगता ही नहीं कि इस वर्ग को उन भूखे मजदूरों की रत्तीभर भी चिंता रहती होगी, जो खाली पेट पैदल ही अपने घरों की तरफ़ निकल पड़े थे। या उन की, जिन्हें एक वक्त का खाना भी बमुश्किल नसीब हो पा रहा है।

फेसबुक पर फैली खाने-पीने की तस्वीरें कभी-कभी मुझे बेहद अश्लील जान पड़ती हैं। लगता है, सब मिलकर अन्न, अन्नदाता और भूखों का 'मजाक' उड़ा रहे हैं। किसी के दिल में किसी के प्रति संवेदना ही नहीं। सब अपना खा पका रहे हैं और लॉकडाउन का आनंद भोग रहे हैं।

मुझसे भी कई दफा पूछा गया कि आप इन दिनों क्या डिश पका रहे हैं? क्या खा रहे हैं? मैं सोच में पड़ जाता हूं कि खाए-पिए-अघाए लोगों की मानसिकता कितनी कुंद होती है! उन्हें सिवाय खाने के कुछ सूझ ही नहीं रहा। थोड़ा उनके बारे में भी सोचिए, जिनके पास खाने का एक दाना भी नहीं। लॉकडाउन ने उनका न सिर्फ रोजगार बल्कि भूख तक छीन ली है। लेकिन नहीं, ऐसा वे शायद इसलिए नहीं सोचेंगे क्योंकि उनके पेट भरे हुए हैं। भरे पेट भला कौन 'सहायता' या 'क्रांति' करने की सोचेगा।

लॉकडाउन का हासिल यह हुआ है कि लोग 'हलवाई' बन गए हैं। मैंने तो प्लान भी कर लिया है कि मेरे घर कभी कोई पार्टी होती है तो खाना मैं इन्हीं कथित हलवाईयों से ही बनवाऊंगा! उम्मीद है, वे मुझे निराश नहीं करेंगे।

मैं भी कितना बड़ा पागल हूं, उनके बारे में चिंता कर रहा हूं, जिन्होंने कई दिनों से रोटी की शक्ल तक नहीं देखी। मैं भी क्यों नहीं उन जैसे बन जाता हूं, जो फेसबुक पर 'शेफ' बनकर खाने और जिंदगी की ऐश लूट रहे हैं। लॉकडाउन शायद उन पर भारी नहीं है!

शुक्रवार, 1 मई 2020

कवि, कोरोना और कविता

बेमतलब सड़कों पर टहलने वाले कवि आजकल घरों में कैद हैं। घरों में रहकर 'कोरोना पर कविताएं' लिख रहे हैं। एक से एक धाकड़ कविताएं लिखी जा रही हैं। जो कभी कहानी, व्यंग्य, उपन्यास लिखा करते थे, वे भी कोरोना पर कविताएं खींच रहे हैं। कविताएं फेसबुक पर चढ़ाई जा रही हैं। इन-बॉक्स में लिंक डालकर कह जा रहा है, जरूर पढ़ें। पढ़कर प्रतिक्रिया भी दें। मुझे भी कई लिंक प्राप्त हुए हैं पर कविताओं को पढ़ने-समझने में मैं हमेशा से 'अनाड़ी' रहा हूं।

मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि कोरोना किसी 'वैक्सीन' से नहीं कविताएं लिखकर ही भागेगा। ट्रंप बेवजह ही भारत से क्लोरोक्वीन मंगाने के पीछे पड़े हैं, दो-चार कवि मंगवा लें और पीड़ितों को उनकी कविताएं सुनवाएं निश्चित ही उन्हें आराम मिलेगा। बल्कि मैं तो कहता हूं, भारत के कवियों को उन मुल्कों में भी भेजा जाना चाहिए जहां-जहां कोरोना संक्रमित मरीज हैं। वे कविताएं सुनाकर ही बीमारी को भगा देंगे।

कवि के बारे में कहा भी गया है- 'जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि'। दरअसल, कोरोना जब चीन के वुहान में था तब ही हिंदुस्तान के कवियों ने उसे 'पहचान' लिया था। उन्होंने तब ही से उस पर कविताएं लिखना शुरू कर दी थीं। बल्कि कुछ कवियों ने तो इतनी धीर-गंभीर कविताएं लिखीं कि कोरोना उनका 'मुरीद' हो गया। कहीं ऐसा तो नहीं कि कोरोना उन्हीं की कविताओं को सुनने यहां आया हो! क्योंकि अब तो मामला 'लोकल' का हो गया है न। इधर कवि कविता लिखेगा, उधर कोरोना उसे पढ़ लेगा। आपदा और कविता साथ-साथ चलते रहेंगे।

कोरोना वायरस पर जिस तरह और जितनी तादाद में कविताएं लिखीं जा रही हैं, मुझे उम्मीद है, कविता पर दिया जाने वाला अगला पुरस्कार 'कोरोना कविता' को ही मिलेगा। इस पर कवियों के कविता-संग्रह आएंगे। कविता पाठ होंगे। गोष्ठियां होंगी। कवियों का सम्मान होगा। देश उन्हें इज्जत की नजरों से देखेगा।

देश का कवि अब भोला न रहा। वो जानता है, कैसे उसे अपनी कविता की मार्केटिंग करनी है। कैसे अपनी कविता को बाजार के बीच भुनाना है। कवि जब से फेसबुक पर आया है, कविता के रंग-ढंग ही बदल गए हैं। जिन्होंने कभी कविता का 'क' भी नहीं सीखा था, वे भी जमकर फेसबुक पर कविताएं लिखने लगे हैं। फ़ेसबुकिया कवियों ने कविता को उस मुकाम पर पहुंचा दिया, जहां पहुंचने की कविता ने कभी कल्पना भी न की होगी। गजब यह है, कोरोना पर सबसे अधिक कविताएं फेसबुक पर ही लिखी जा रही हैं। फेसबुक-लाइव में पढ़कर सुनाई जा रही हैं। कवि अनगिनत लाइक और कमेंट में वाह, वाह पा रहा है। कोरोना के बहाने ही सही कवि इन दिनों चांदी कूट रहा है।

कभी किसी जमाने में कवि बनना 'कठिन' रहा होगा किन्तु आजकल बहुत 'आसान' है। जो बंदा स्मार्टफोन चलाना जानता है, वो निश्चित कवि होगा ही होगा। शायद ही ऐसा कोई घर या मोहल्ला हो जहां कोई कवि न हो। आजकल के जमाने में 'वन-लाइनर' लिखने से लेकर 'चार लाइन' लिखने वाला भी कवि है। इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि लॉकडाउन ने भी बहुतों को बैठे-ठाले कवि बना दिया है। मेरे मोहल्ले का सब्जी वाला भी कोरोना पर कविता लिख रहा है। आज वो भी कवि है।

कभी-कभी मुझे खुद के कवि न होने पर 'अफसोस' होता। कोशिश तो मैंने बहुतेरी की कवि होने की लेकिन बन नहीं सका। बड़े और वरिष्ठ कवियों की संगत का भी कोई असर न हुआ। निराला से लेकर मुक्तिबोध तक को पढ़ डाला। फेसबुक के कवियों को भी दबाकर पढ़ा। 'कविता कैसे लिखें' की क्लास भी ली मगर कवि बनने का एक भी गुण मेरे भीतर न घुस पाया। अगर कवि बन गया होता तो आज मैं भी कोरोना पर कविता लिख देश सेवा कर रहा होता।

खैर, मैं फिर कह रहा हूं- कोरोना को हराएगा कवि ही। कवि ने इतनी कविताएं कभी 'स्वाइन फ्लू', 'एड्स', 'डेंगू', 'प्लेग' आदि पर न लिखी होंगी, जितनी कोरोना पर लिख रहा है। कोई बता रहा था, कोरोना पर कविता लिखने के लिए देश में कवि भी कम पड़ने लगे हैं। आज यह जिम्मेदारी प्रत्येक देशवासी की है कि वो कोरोना पर कविता लिख इसे हराने के प्रयास में जुट जाए।

फिलहाल मैं व्यंग्य लिखकर ही कोरोना को देश निकाला देने की कोशिश में जुटा हूं। एक तरफ कवि है दूसरी तरफ व्यंग्यकार, हो सकता है, सामूहिक प्रयास से वायरस उलटे पैर यहां से भाग जाए।

गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

खुद पर थूक लेता हूं

थूकना अब 'जुर्म' है। यों, यहां-वहां, जहां-तहां अब कोई नहीं थूक सकता। सरकार थूक और थूकने वाले पर 'सख्त' हो गई है। सुना है, कोरोना थूक से भी फैल सकता है! इसीलिए पान-गुटके पर रोक लगाई गई है। न कोई इन्हें खाएगा, न सार्वजनिक जगहों पर थूक की चित्रकारी करेगा। थूक को इससे पहले इतना 'संदिग्ध' कभी नहीं देखा था। कुछ लोगों ने तो थूक का रंग भी रख दिया है। रंग देखकर ही पता लगा लेते हैं कि किसने थूका था।

थूकने पर लगी 'पाबंदियों' ने मुझे मुसीबत में डाल दिया है। पूरा मोहल्ला जानता है कि मुझे थूकने की बीमारी है। मैं बिन लिखे रह सकता हूं किंतु बिन थूके नहीं। मेरा थूक इतना चर्चित है कि देखते ही कोई भी बता सकता है किसने थूका है। अपनी थूकने की आदत के चलते मैं दफ्तर में बॉस की और घर में बीवी की 'जली-कटी' सुनता रहता हूं। लेकिन क्या करूं थूक पर कंट्रोल नहीं रख पाता।

हमें यह भूलना नहीं चाहिए कि भारत एक थूक-प्रधान देश भी है। पान की पीकों के दर्शन हमें कहीं भी हो जाते हैं। गलती से कोई किसी पर थूक भी दे तो 'सॉरी' कहकर मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है। एक दफा चलती बस में से एक सज्जन ने मुझ पर थूककर तुरंत ही 'सॉरी' बोल दिया था। मैंने भी उनके थूकने का बुरा नहीं माना। बुरा मानकर उनका कर भी क्या लेता। थूक ही तो था निकल गया। हमें अपने ही नहीं वरन दूसरे के थूक की भी इज्जत करनी चाहिए। बल्कि पान-गुटका खाने वाले तो बाकायदा 'दूर तक थूकने' का आपस में कंपीटिशन भी करते हैं।

थूक पर कायम सख्ती को देख मैंने यह किया है कि अब मैं थूक को अपने मुंह में ही रखना पसंद करता हूं। न यह बाहर निकलेगा, न जुर्माना पड़ेगा। इसे सटक लेने में ही खुद की, समाज की और देश की भलाई है। कोरोना से लड़ना है तो थूक पर कंट्रोल करना ही होगा।

लेकिन मैं उन लोगों के बारे सोचता हूं, जो थूकते ही नहीं। पता नहीं वे बिना थूके कैसे रह पाते होंगे! जिनके मुंह से थूक नहीं निकलता, वे कैसे किसी को 'गाली' भी दे पाते होंगे। मेरे एक परिचित कवि हैं वे कभी थूकते ही नहीं। बिना थूके ही कविता लिखते हैं। जबकि लोग उनकी कविताएं पढ़-सुनकर उन पर थूकते हैं। वे तब भी चुप रहते हैं। हो सकता है, उनकी कविताओं पर मिलने वाले थूक उन्हें थूकने से रोक लेते हों।

बहरहाल, मुझे थूकना तो दूर इस पर किसी से बात करने में भी डर-सा लगने लगा है। जब कभी बहुत मन करता है तो चुपचाप खुद पर ही थूक लेता हूं। खुद पर थूका थूक किसी को दिखे नहीं सो उसे चाट भी लेता हूं। थूक कर चाटना शायद इसी को कहते होंगे। है न...।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

घर में खाली रहने का लुत्फ

आजकल घर पर 'खाली' रहने का 'लुत्फ' उठा रहा हूं। सुबह से लेकर रात तक खाली ही रहता हूं। खाली रहने को छोटा काम न समझें। यह बहुत बड़ा काम है। बड़ा काम करने से मैं कभी पीछे नहीं हटता।

मैं इतना खाली रहता हूं कि 'वर्क फ्रॉम होम' भी नहीं कर पाता। क्या करूं, टाइम ही नहीं मिलता। खाली रहने में टाइम का बड़ा लोचा है। हालांकि मेरे मोहल्ले के सब लोग 'वर्क फ्रॉम होम' में व्यस्त रहते हैं। लेकिन मैं उनकी नकल नहीं करता। यह क्या बात हुई भला कि घर पर रहो और 'वर्क फ्रॉम होम' भी करते रहो। यह खाली रहने और घर पर रहने दोनों का 'अपमान' है। भई, जब हमसे कहा गया है कि घर में रहिए। तो घर में ही हूं। घर के अलावा कहीं नहीं जा रहा। पिछले कई दिनों से तो मैंने पड़ोसी के यहां झांक कर यह भी नहीं देखा है कि वो है भी या नहीं। 'सोशल डिस्टेंसिंग' का पूरा ख्याल रख रहा हूं।

आलम यह है, बीवी से बात भी छह फीट की दूरी पर रहकर ही करता हूं। उसे मेरा यों दिनभर खाली रहना अखर अवश्य रहा है पर कह नहीं पाती, मजबूरी है। बीवी की मजबूरी का फायदा उठाने का मौका हर रोज थोड़े न हाथ आता है।

वैसे, खाली रहना मेरे तईं कोई बड़ी बात नहीं। मैं तब भी लगभग खाली-सा ही रहता था, जब पूरी दुनिया किसी न किसी काम में लगी रहती थी। दफ्तर में भी मैं खाली रहने की ही कोशिश अधिक किया करता हूं। कभी किसी फ़ाइल पर निगाह मार ली तो सही, नहीं तो जाने दो। और लोग हैं तो वे देख लेंगे। मुझे यह कहने में जरा भी शर्म नहीं कि मैं दफ्तर में 'खाली बैठने की ही तनख्वाह' ले रहा हूं। अपनी-अपनी किस्मत है। यों भी अधिक काम करके बॉस ने मुझे कौन-सा प्रोमोशन दे देना है। जितना बन पड़े करो। बाकी पर खाक डालो।

खाली बैठना मुझे मक्खी या मच्छर मारने से अधिक बेहतर लगता है। मक्खी या मच्छर को क्यों मारना, कौन-सा वे हमें नुकसान पहुंचा रहे हैं। मैं 'जियो और जीने दो' के सिद्धांत को मानता हूं। जब मुझे खाली बैठे रहना पसंद है तो जीव-जंतुओं को क्या न होगा!

खाली बैठकर ही तो देश, समाज और दुनिया की चिंता की जा सकती है। सबसे अधिक ऊंचे आइडियाज खाली बैठकर ही आते हैं। मैं बताऊंगा तो आप हंसेंगे। इन दिनों मैं कोरोना वायरस की वैक्सीन किस विधि से बनाई जाए, इस पर मंथन कर रहा हूं। अब इतनी ऊंची विधि सोचने के लिए खाली टाइम चाहिए कि नहीं। इधर-उधर के कामों में घिर कर तो यह काम नहीं हो सकता न। मुझे पक्की उम्मीद है कि जल्द ही मैं इस पर कुछ ऊंचा सोच पाऊंगा।

एक बात और बताऊं। मैं अपना लेखन खाली बैठकर ही किया करता हूं। खाली रहकर ही अधिक अच्छा लिख पाता हूं। लेखन है ही बैठे-ठाले का काम। पता नहीं अन्य लेखक लेख व किताब लिखने के लिए कई-कई दिन कैसे बर्बाद कर देते हैं। मैं उतना ही लिखता हूं, जितना मेरा खालीपन परमिशन देता है।

लॉकडाउन की छ्त्र-छाया में जो हैं, वे खाली रहें। स्वस्थ रहें। लेकिन घरों में ही रहें। घर में रहकर अपने खालीपन को एंजॉय करें।

रविवार, 26 अप्रैल 2020

हाथों के आगे मजबूर

इन दिनों मैंने लिखना-पढ़ना, घूमना-फिरना एकदम बंद कर दिया है। दिनभर घर पर ही रहता हूं। दफ्तर से आदेश मिला है, घर से काम करें। इसीलिए ज्यादातर समय या तो हाथ धोता हूं या फिर मुंह पर मास्क चढ़ाए एकांत में बैठता हूं। जीवन में शायद ही पहले कभी इतनी दफा हाथ धोए हों, जितना अब धो रहा हूं। रात में सपने भी हाथ धोने के आने लगे हैं।

बीवी के छोड़िए, इधर कई दिनों से तो मैंने अपने हाथ भी न ढंग से देखे हैं न छुए हैं। हाथों को, किसी के भी, देखकर मन आशंका और भय से भर जाता है। यही ख्याल आता है कि पता नहीं हाथ धुले हुए भी हैं कि नहीं। कोई गलती से भी हाथ मिलाने को हाथ बढ़ा ले तो तुरंत अपना हाथ पीछे खींच लेता हूं। उस व्यक्ति से छह फीट का फासला कर लेता हूं। आजकल तो मिलने-मिलाने का सामान्य शिष्टाचार तक लोगों ने टाल दिया है।

कोरोना ने न केवल मनुष्य-जाति पर बल्कि हाथों पर भी संकट ला दिया है। घर में ही हम आपस में एक-दूसरे के हाथों को देख सवाल करने लगे हैं। हाथों को बार-बार धोने पर जोर देने लगे हैं। हाथों से चेहरे व आंखों को छूने पर पाबंदी लगा दी है। हाथों को हमने इस हद तक 'मजबूर' कर दिया है कि वे शरीर पर खुजली के लिए भी न उठें। अब कोई पुरुष किसी महिला से यह कहता हुआ नहीं दिखता कि आपके हाथ बहुत खूबसूरत हैं। मुझे तो डर है, आगे चलकर कहीं हाथ को हाथ में लेकर 'प्रपोज' की परंपरा ही न लुप्त हो जाए। कहीं 'साथी हाथ बढ़ाना' का जज्बा ही खत्म न हो जाए। कहीं हाथ पकड़कर जिंदगी भर साथ निभाने का वायदा करने पर ही ग्रहण न लग जाए। कहीं ज्योतिष को हाथ दिखाने का चलन ही खटाई में न पड़ जाए।

आज मुझे अपने ही हाथ 'दुश्मन' नजर आ रहे हैं। टीवी और अखबार में भी लगातार हाथों पर केंद्रित विज्ञापन आ रहे हैं। क्या छोटा क्या बड़ा, क्या अमीर क्या गरीब, क्या मंत्री क्या सन्तरी हर कोई अपने हाथों को बचाने और धोते रहने में लगा है। उधर सेनिटाइजर बेचने वाले 'चांदी' काट रहे हैं। अब हर हाथ में मोबाइल कम सेनिटाइजर ही अधिक नजर आता है। बाहरी किसी चीज को छूने के तुरंत बाद ही लोग अपने हाथों को सेनिटाइज करने लगते हैं। लोग जागरूक हो रहे हैं अच्छा है पर खुद से और अपनों के बीच से कटते भी जा रहे हैं। कोरोना जो न करवाए वो थोड़ा।

मैंने तो बीवी से भी फासले से मिलना शुरू कर दिया है। फासले के रहते हममें संवाद भी थोड़ा घट गया है। न मैं उसकी न वो मेरी कही बात सही से सुन पाते हैं। एक ही छत में हमने अपने-अपने कोने बना लिए हैं। या तो हमारे हाथों में मोबाइल होता है या फिर सेनिटाइजर। ऐसा मेरे साथ ही नहीं ज्यादातर घरों में अब यही हो रहा है। मैंने तो यह भी पढ़ा कि चीन में पति-पत्नी के लगातार घर में बने रहने से आपस में झगड़े और तलाक के मामले बढ़ गए हैं। यों भी, घर में खाली बैठा बंदा कुछ तो करेगा ही; चलो तलाक-तलाक ही खेल लें।

लाइफ में पहले ही 'शून्य' क्या कम था, जो कोरोना ने अब और बढ़ा दिया है। मैं तो निरंतर अपने हाथों के शून्य को निहारता रहता हूं। हाथों को धो जरूर रहा हूं पर न जाने क्यों हाथों की लकीरें मुझे पहले से अधिक गंदी नजर आ रही हैं। उंगलियां अपने आकार में कुछ घट-सी गई हैं। मोह भी उनके प्रति कुछ कम-सा हो गया है। कुछ पकड़ने से पहले मन करता है पहले हाथ धो लूं। बार-बार हाथों को धोने के बाद भी ऐसा लगता है कि कुछ कीटाणु अब भी जमे रह गए हैं। कहीं मुझे हाथों का 'फोबिया' तो नहीं हो गया है!

पहले कितना उन्मुक्त और स्वतंत्र रहते थे मेरे हाथ मगर अब वाश-वेसन के गुलाम बनकर रह गए हैं। जानता हूं, ऐसा एक मेरे साथ ही नहीं सबके साथ हो रहा होगा! हमारे ही हाथ हमसे पराए हो जाएंगे, शायद ही ऐसी कल्पना कभी किसी ने की हो!

साथ ही, मैं इस उम्मीद से भी हूं कि जल्द ही हम सब एक-दूसरे के हाथों को छू सकेंगे। तपाक से गले भी मिल सकेंगे। 'सोशल डिस्टेंसिंग' भी हमारी कम होगी। फिलहाल अभी तो हम सब अपने-अपने हाथों के आगे 'मजबूर' हैं।

रविवार, 8 मार्च 2020

पूर्व प्रेमिका संग होली

बीवी संग होली कितना खेली जाए। सच बताऊं, मैं तो बोर हो चुका हूं बीवी संग होली खेल-खेलकर। होली भी खेलो और नखरे भी झेलो। बाद में ताने सुनो, 'तुम्हें होली भी खेलनी नहीं आती। देखो कितना रंग लगाया है कि छुटाना मुश्किल।' ये हाल एक मेरी बीवी का ही नहीं लगभग सभी बीवियों का रहता है।

अरे, होली पर यह थोड़े न देखा जाता है कि रंग कितना और कहां-कहां लग रहा है। उसे तो बस लगा दिया जाता है। किंतु बीवियों के साथ यह बड़ी समस्या है कि रंग भी उनकी मर्जी के मुताबिक ही खेला और लगाया जाए। जबकि वे यह नहीं समझती कि होली के रंग से उनकी ब्यूटी दबती नहीं, बल्कि निखरती है। रंग में डूबे चेहरे अलग ही छाप छोड़ते हैं। जिसे रंगों से एलर्जी हो उसके लिए क्या होली, क्या वसंत।

इसीलिए मैंने तय किया है कि इस बार बीवी संग होली खेलूंगा ही नहीं। अपनी पूर्व प्रेमिका संग खेल लूंगा पर बीवी संग खेलने से मुक्ति मिलेगी। पूर्व प्रेमिका ने तो जाने कितनी बार मुझे चांस दिया उसके संग होली खेलने का लेकिन मैं ही राजी न हुआ। राजी इसलिए न हुआ कहीं बीवी को पता लग गई तो बवाल न हो जाए। उसे तो बहाना चाहिए मुझसे भिड़ने का। बहरहाल, चाहे कुछ हो जाए पर इस बार होली पूर्व प्रेमिका के घर जाकर ही मनेगी।

हालांकि इससे पहले भी कई दफा उसके संग होली खेल चुका हूं पर वो दौर ही अलग था। तब न बीवी का झंझट था न जमाने की फिक्र। तब के रंग और आज के रंग में भी फर्क था। तब होली डिजिटल न थी। घर-घर जाकर प्रेम पूर्वक खेलो। न कहने वाला कोई न कोई शक करने वाला।

कुछ ऐसा ही समां इस होली पर भी बनाना चाहता हूं पूर्व प्रेमिका संग होली खेल। उसके संग होली खेलने का फायदा यह है कि वो कितना ही रंग लगाओ बुरा नहीं मानती। कितनी ही देर होली खेलो घड़ी नहीं देखती। रंग चाहे उसके चेहरे पर लगाओ या बदन पर कभी दिल पर नहीं लेती। और तो और उसके संग दो-दो जाम भी हो जाते हैं लगे हाथ।

दरअसल, मेरी पूर्व प्रेमिका मेरे जैसे ही टेस्ट की है। स्वच्छंद और बिंदास। जमाने की परवाह न करने वाली। यही कारण है उसके संग होली छिप-छिपाकर नहीं सीधा उसके घर जाकर खेलता हूं। वैसे, मेरा मानना रहा है कि होली हमेशा प्रेमिका या पड़ोसन या फिर दोस्त की बीवी संग ही खेलनी चाहिए। इससे कुछ 'डिफरेंट फिलिंग' आती है। रंग पर रंगत चढ़ी मालूम देती है। नजदीकियां बढ़ती हैं। दिल मिलते हैं। फ्लर्ट करने का चांस मिलता है सो अलग।

होली खेलने का मजा तब ही है जब दिल से खेली जाए। उसके साथ खेली जाए जो बुरा न माने। बुरा मानने वाले को होली पर कमरे से बाहर निकलना ही नहीं चाहिए। इतने बरस मुझे होली खेलते हो गए मजाल है जो कभी बुरा माना हूं। रंगों से जिन्हें इश्क नहीं, उनका जीवन ही नीरस है।

बताता चलूं, पूर्व प्रेमिका को रंगों से खास मोहब्बत है। होली ही नहीं उसके साथ रंगों से कभी खेला जा सकता है। बुरा कभी नहीं मानती। खूब याद है, दो साल पहले उसके संग खेली होली की तस्वीरें और चोली अभी भी उसके पास हैं। ऐसा आनंद कभी बीवी संग होली खेलकर मिल सकता है क्या! नहीं कभी नहीं मिल सकता।

इसीलिए तो मैं कहता हूं, अपने इश्क को कभी बीच रास्ते में न छोड़िए। पकड़े रहिए। शादी के बाद भी दिल में जवानी और उमंग बरकरार रखिए। हल्का-फुल्का इश्क और फ्लर्ट करते रहिए। बीवी संग होली न खेल पा रहे हैं तो पूर्व प्रेमिका संग तो खेल ही सकते हैं न। किस्मत के धनी हैं वे लोग जो आज भी अपनी पूर्व प्रेमिकाओं संग होली खेल रहे हैं। उनमें से एक मैं भी हूं।

अच्छा, निकलता हूं पूर्व प्रेमिका संग होली खेलने। इस दफा उसके संग होली खेलने की थीम 'भांग विथ होली' रखी गई है।

तो रंगों से खेलते रहिए। मुस्कुराते रहिए। हां, बुरा कतई न मानिए, होली है। होली मुबारक।