मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

प्याज से मोहब्बत

प्याज से मुझे उतनी ही मोहब्बत है जितनी शीरीं को फरहाद से थी। व्हाट्सएप्प चलाए बिना दो पल को फिर भी रह सकता हूं किंतु प्याज बिना एक पल भी नहीं। प्याज मेरा आदि और अंत है। प्याज के बिना न मुझे खाना हजम होता है न लिखने का आईडिया ही आता है। बोते होंगे लोग बाग अपनी जिंदगी में चरस, मैं तो प्याज ही बोता हूं।

प्याज पर जब भी मुनाफाखोरी या महंगाई का संकट आया है, मैं हमेशा प्याज के साथ खड़ा हुआ हूं। मैंने उन लोगों की कड़ी निंदा की है, जिन्होंने प्याज को बुरा-भला कहा है। मैं उन लोगों का भी सख्त विरोधी हूं जो गाहे-बगाहे प्याज न खाने की सलाह देते हुए पाए जाते हैं। अजी, बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद!

कोई मुझे समझाए कि प्याज के महंगा होने का भला प्याज से क्या मतलब? प्याज ने तो किसी से कहा नहीं कि उसे महंगा करा जाए। उसे तो मालूम भी नहीं होता कि ये सस्ता-महंगा होता क्या है? प्याज के कंधे पर बंदूक रखकर चलाए कोई और दोष बेचारे प्याज को भुगतना पड़े। ये कहां की इंसानियत है दया?

और फिर, प्याज अभी इतना महंगा नहीं हुआ है कि एक सामान्य क्लास का आदमी उसे एफोर्ड न कर सके। 60-70 रुपये किलो ही तो बिक रहा है! ये कोई इतना भारी-भरकम रेट नहीं कि सरे बाजार हाय-तौबा काटी जाए। इससे कहीं महंगा तो टमाटर बिक रहा है। तो क्या लोग टमाटर खाना छोड़ देंगे! हद है यार...।

प्याज की अपनी ताकत है। अपनी राजनीतिक हैसियत है। हालांकि उसने कभी अपनी राजनीतिक हैसियत का फायदा उठाना नहीं चाहा। बल्कि नेता लोग ही उससे खेलते रहते हैं। उधर मुनाफाखोर बाजार में उसका रेट बढ़ा देते हैं सुननी उसे पड़ती है। सब कहते हैं कि प्याज महंगा हो गया। कोई यह नहीं कहता कि प्याज को जानबूझकर महंगा किया गया है। करे कोई, भरे कोई!

मैं भी कम शाणा नहीं। जब-जब प्याज महंगा होता है, तब-तब हर रेट पर उसे खरीदता हूं। देखने वालों की आंखें फटी की फटी रहें इसलिए उसे झोले में नहीं पोली-बैग में भरकर लता हूं। ऐसा तो कभी हुआ ही नहीं जब खाना मैंने बिना प्याज के खाया हो। प्याज के प्रति अपना स्नेह दिखावा नहीं प्योर वाला है।

मैंने तो अपने हर पड़ोसी तक से कह रखा है, जब जरूरत हो मुझसे प्याज मांग ले जाएं। कभी मना नहीं करूंगा। खाने-पीने की चीजों में भला कैसा भेद-भाव।

मैं फिर कह रहा हूं, बढ़ी कीमतों के लिए दोष प्याज को न दें। उनकी गर्दनों को पकड़ें जिन्होंने बेचारे प्याज को जनमानस के बीच बदनाम किया हुआ है। प्याज तो भोला है। उसे क्या मालूम उसका कौन और किस तरह से फायदा उठा रहा है।

प्याज को इज्जत बख्शें। प्याज खाएं और खिलाएं। प्याज के प्रति अपनी मोहब्बत में कमी न आने दें। जय प्याज।

रविवार, 3 दिसंबर 2017

नाक पर भला क्या गर्व करना!

मुझे अपनी नाक पर कभी गर्व नहीं रहा! रहे न रहे। कटे न कटे। नाक ही तो है कोई इतिहास थोड़े ही कि हर वक़्त ध्यान रखता फिरूं- कौन इसके साथ छेड़छाड़ कर रहा है, कौन सम्मान दे रहा है। यह मैं अच्छे से जानता हूं कि दुनिया में चाहे कुछ हो जाए मेरी नाक जहां है वहां सही सलामत ही रहेगी। फिर क्या फायदा बेमतलब की टेंशन लेने से।

एक मुझे ही नहीं दुनिया भर में किसी को भी अपनी नाक के प्रति मोह नहीं पालना चाहिए। नाक को आपके चेहरे से उठकर कहीं नहीं जाना है। वो अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक वहीं जमी मिलेगी। उसे कोई नहीं उखाड़ सकता।

मेरा तो बचपन से यही मानना रहा है कि मनुष्य की लाइफ-लाइन दिल नहीं बल्कि नाक है। ये नाक ही है जिससे सूंघकर हम पदार्थ की कोमलता और तीव्रता का अंदाजा लगा सकते हैं। संसार भर की खुशबूओं का अस्तित्व नाक की वजह से ही तो कायम है। नाक न होती तो कितना ही सैंट-डियो खुद पर डाल लो किसी को महसूस न होता। नाक न होती तो बीवी या बावर्ची के बने खाने की महक का अहसास ही मन में न जागता।

तो फिर नाक के प्रति इतना फिक्रमंद क्यों रहना? क्यों इतना गर्व करना? अरे, ये सब तो नाक के फर्ज हैं जिन्हें उसे हर हाल में निभाना ही निभाना है।

इन दिनों जिस तरह से इस-उस की नाक काटने की धमकियां सुनाई में आ रही हैं, सब कोरी लफ्फबाजियां हैं। नाक कोई आलू-तुरई थोड़े है कि जब मन करा काट ली। नाक काटने के लिए लक्ष्मण जैसी ताकत और हिम्मत चाहिए होती है। वो भी सूर्पनखा के कु-कर्मों के कारण उसकी नाक काटनी पड़ी थी। वरना इतनी नौबत ही न आती। जबकि यहां तो बेवजह ही नाक-गला काटने के फरमान जारी हो रहे हैं।

फरमान जारी करने वालो में आधे से ज्यादा तो ऐसे महापुरुष होंगे जिन्होंने जिंदगी में कभी भिंडी तक न काटी होगी। चले हैं नाक काटने!

यों भी इंसान एक नाक कटा प्राणी ही है। अपने जन्म से लेकर बुढ़ापे तक जाने कितनी दफा किस-किस तरह से अपनी नाक कटवाता रहता है। लेकिन मुंह से कभी स्वीकारता नहीं कि हां उसकी नाक काटी जा चुकी है। नाक को यों बचाता फिरता है मानो वो कोई सोना-चांदी हो!

न भूलिए, जब तलक मनुष्य का अस्तित्व रहेगा, नाक का भी रहेगा। फिर खामखां की चिंता क्यों?

गर्व नाक पर मत कीजिए। गर्व करना ही है तो जीभ पर कीजिए। जीभ कंट्रोल में रहेगी तो नाक भी बची रहेगी। बाकी कहते-गाते कुछ भी रहिए।

बुधवार, 29 नवंबर 2017

पत्नी को चाहिए रोशोगुल्ला

पत्नी को रसगुल्ला बेहद पसंद है। इतना पसंद कि एक दफा बहसबाजी के दौरान उसने रसगुल्ले को मुझसे बेहतर करार दिया था। उसकी मिठास को मेरी मिठास से दस गुना उम्दा बताया था। पसंद चूंकि पत्नी की है, इस नाते मैं उससे अधिक बहस बही नहीं कर सकता। यों भी, पत्नियों से बहस के दौरान बहुत-सी बातों का खास ख्याल रखना पड़ता है।

खैर...!

पत्नी के संज्ञान में जब से रसगुल्ले के बंगाल की झोली में चले जाने की बात आई है उसने लगभग जिद-सी पकड़ ली है कि उसे दास बाबू के यहां का ही रोशोगुल्ला खाना है। अब कहां कलकत्ता और कहां बरेली! सिर्फ रोशोगुल्ला लेने कलकत्ता जाना इतना आसान है क्या! आए दिन ट्रेनों की लेट-लतीफी उसको मालूम नहीं? तब भी एक ही जिद।

हालांकि कई दफा समझा चुका हूं उसको यों बच्चों वाली जिद न करे। रसगुल्ला खाना ही है तो बरेली में रसगुल्ले की दुकानों की भला क्या कमी। हां, ये बात सही है कि यहां के रसगुल्लों में बंगाल के रोशोगुल्लों जैसा स्वाद तो नहीं आ सकता फिर भी जीभ को तो तृप्त कर ही सकता है।

रसगुल्ले के चाहने वालो की उसके प्रति दीवानगी को समझ सकता हूं। यह दीवानगी और प्यार का ही तो असर रहा जो बंगाल वालो ने ओडिशा वालो से रसगुल्ले पर मालिकाना अधिकार को जीत लिया। अच्छा ही हुआ, नहीं तो बेचारा दो राज्यों के आपसी विवाद के बीच पिसता रहता।

मगर मेरे और पत्नी के बीच रसगुल्ले को लेकर विवाद अभी तलक कायम है। इसका फैसला न कोई अदालत कर सकती है न घर-परिवार वाले। मैं भी अच्छी तरह से जानता हूं कि अन्ततः झुकना मुझे ही पड़ेगा। फिर भी मामला जितना और जहां तक लंबा खींच जाए क्या हर्ज है।

पत्नी का कहना है कि वो बंगाल के रसगुल्ले को खाकर उसके स्वाद को 'फील' करना चाहती है। उसकी आत्मा तक घुस जाना चाहती है। मानो, रसगुल्ला कोई आलू हो जिसे मशीन में डालते ही वो सोना उगलने लगे। रसगुल्ले रसगुल्ले सब एक से चाहे बंगाल का हो या बरेली का।

कहीं पढ़ा था कि बनारस में रहने वाले कुछ बंगाली यह तक कहते हैं कि रसगुल्ला उन्होंने बनाया है। और एक दफा जिसने उनका बनाया रसगुल्ला खा लिया तो बंगाल, ओडिशा के रसगुल्ले को भूल जाएगा। अजी, दावा पेश करने में क्या जाता है। कल को अगर मैं यह कहने लग जाऊं कि मैं परसाई जी से बेहतर व्यंग्य लिख सकता हूं। तो क्या मेरे खुशफहमीनुमा दावे पर यकीन कर लिया जाएगा। कभी नहीं...।

फिलहाल तो कोशिश जारी है पत्नी को रसगुल्ले पर मनाने की। कभी मौका पड़ा तो बंगाल का रोशोगुल्ला उसको खिला दिया जाएगा। तब तक वो बरेली के रसगुल्ले का ही स्वाद ले। तिस पर भी नहीं मानती है तो फिर एक ही चारा होगा मेरे कने बंगाल की यात्रा का। वो भी रसगुल्ले की खातिर। 

गुरुवार, 23 नवंबर 2017

'ऑटो-करेक्ट' के लफड़े

उस कहावत 'इंसान गलतियों का पुतला है' को हमने मोबाइल फोन के 'की-पैड' में मौजूद 'ओटो-करेक्ट' फीचर पर डाल- छोटी-मोटी गलतियों से कम्पलीट मुक्ति पा ली है। शब्दों-वाक्यों में अगर किसी को कहीं कोई गलती मिलती है और उसके लिए अगला हमें टोकता भी है तो हम यह कहकर- 'यार, ऐसा 'ऑटो-करेक्ट' के कारण हुआ होगा'- आसानी से पिंड छुड़ा सकते हैं।

हमारे जीवन में व्यस्तताएं इस कदर बढ़ गईं हैं कि अपने ही लिखे को जांचने की फुर्सत हमारे पास नहीं। 'की-पैड' पर उंगलियां जैसा, जो भी लिख डालें सब मंजूर है। यों, सोशल मीडिया पर 98वें लोग अगर 'अशुद्ध' लिख रहे हैं 99वें अगर आप लो लिए तो कौन-सा पहाड़ खिसक जाना है!

लुत्फ तो ये है कि कभी-कभी 'ऑटो-करेक्ट' खुद ही मनमानी पर उतर आता है। भले ही आप किसी शब्द या वाक्य को एकदम सही लिख रहे हैं लेकिन बीच में वो अपनी टांग घुसेड़कर उसे सही जाने नहीं देता। सही शब्द-वाक्य को भी 'अंडर-लाइन' कर गलत बता देता है। अब चूंकि 'ऑटो-करेक्ट' हमसे शब्द को सही करने को बोल रहा है तो भला हम उसकी बात को कैसे टाल सकते हैं। हम भी वही लिख डालते हैं जो जैसा उसने हमें सूचित किया है। ऐसे में भला हम कैसे 'ऑटो-करेक्ट' की गलती को अपने सिर ले सकते हैं! 'ऑटो-करेक्ट' की गलती ऑटो-करेक्ट ही जाने।

किसी और को दोष क्यों दूं मैं खुद 'ऑटो-करेक्ट' के भ्रमजाल में फंसा हुआ हूं। अपने दिमाग से कम 'ऑटो-करेक्ट' की नसीहत से अधिक चलता हूं। जाने कितनी दफा शब्द का अनर्थ कर चुका हूं। यहां तक कि अपने नाम के साथ भी 'ऑटो-करेक्ट' का खेल खेल चुके हूं। तब भी बाज न आता। 'ऑटो-करेक्ट' की ऐसी लत पड़ चुकी है कि अपने सही लिखे शब्द भी कभी-कभी गलत से नजर आते हैं।

सोने पे सुहागा 'की-पैड' के साथ उपलब्ध होने वाली 'डिक्शनरी' कर देती है। साथ में डिक्शनरी लेके बैठने की जरूरत ही नहीं बची है। लिखे जा रहे शब्द से मिलता जुलता शब्द डिक्शनरी पेश कर ही देती है। उसे चिपकाइये और निश्चिंत होकर लिखते जाइए। सही-गलत का जिम्मा 'ऑटो-करेक्ट' और 'डिक्शनरी' पर छोड़िए।

अपने लेखन में अक्सर निकलने वाली शाब्दिक गलतियों के प्रति अब मैंने गंभीर होना छोड़ दिया है। कोई अगर टोकता भी है तो कहता देता हूं, संभावताः 'ऑटो-करेक्ट' के कारण हुआ होगा!

सोमवार, 13 नवंबर 2017

खुशनसीबी: जिनके नाम 'पैराडाइज पेपर्स' में आए!

कहते हैं, मोक्ष स्वर्ग जाकर ही मिलता है! धरती पर रहकर इंसान कर्म चाहे कैसे भी करे पर अंतिम इच्छा उसकी स्वर्ग जाने की ही रहती है। स्वर्ग से मनुष्य का मोह अब का नहीं आदि काल से है। नरक में जाने की तमन्ना तो चोर-अपराधी भी नहीं रखना चाहते। जो भी हो पर स्वर्ग का हमारे जीवन में अच्छा-खासा क्रेज है। यकीन मानिए, कभी-कभी तो बैठे-ठाले मैं भी स्वर्ग जाने की इच्छा अपने मन में गढ़ लिया करता हूं।
धरती पर रहकर कलयुग का आनंद बहुत ले लिया। एक दफा स्वर्ग का लुत्फ भी तो लेकर देखना चाहिए कि नहीं...! इस बहाने बड़े-बड़े देवी-देवताओं से ही मुलाकात हो जाएगी।

सच पूछिए तो मैं उन महान हस्तियों को 'खुशनसीब' मानता हूं जिनका नाम 'पैराडाइज पेपर्स' में आया! जिस कांड के साथ ही पैराडाइज (स्वर्ग) जुड़ा हो वो भला 'गलत' कैसे हो सकता है? इसे तो साक्षत देवताओं का वरदान माना जाना चाहिए! मानो- ये पैराडाइज पेपर्स उन्हीं सेलेब्रिटीज़ के लिएही  रचा गया हो!

इस 'नश्वर संसार' में भांति-भांति के लोग हैं। यहां कभी भी कुछ भी हो सकता है। 'कुछ भी हो सकता है' के लिए खाली-पीली में टेंशन लेने को मैं उचित नहीं मानता। इससे पहले पनामा पेपर्स में जिन ऊंची हस्तियों के नाम आए थे, सिवाय मियां नवाज शरीफ को छोड़के, बाकी किसी के साथ कुछ भी 'बुरा' नहीं हुआ। वो तो मियां शरीफ राजनीतिक उठा-पटक के लपेटे में आ गए। वरना तो गाड़ी चल ही रही थी।

सिंपल-सा फंडा है, बड़े आदमी की चोरी चोरी नहीं 'वरदान' समझी जाती है जबकि छोटा आदमी अगर चोरी से सांस भी ले ले तो तरह-तरह की धराएं लगाकर उसे निपटा दिया जाता है। इस फर्क को समझें और चिल करते रहें।

दरअसल, घपलों-घोटालों के मामले में हम एक बेहद बेफिक्रे मुल्क हैं। विडंबना देखिए, घपले करने वाले ही अक्सर आदर्शवाद और ईमानदारी पर लंबा-चौड़ा भाषण देते पाए जाते हैं। विज्ञापनों में साफ-सफाई व स्वच्छता के उपदेश देने वाले अपना टैक्स दूसरे देश में जाकर बचाते मिलते हैं। जब नाम अख़बारों की सुर्खियों में आ जाता है तो बड़े ही फ़ॉलोसिफिकल अंदाज में 'शांति' का पाठ पढ़ाने लगते हैं। साथ-साथ अपनी बढ़ती उम्र का वास्ता भी दे देते हैं।

वो मशहूर कहावत है न- 'हाथी के दांत दिखाने के कुछ और खाने के कुछ और होते हैं'। तो यही कहावत यहां भी अक्षरशः फिट बैठती है।
फिल्मी या पॉलिटिकल सेलिब्रिटियों का नाम चाहे पनामा पेपर्स में सामने आया हो या पैराडाइज पेपर्स में सेहत और चेहरे पर पीलापन अभी तलक किसी के भी देखने को नहीं मिला है। न ही मिलेगा। बड़े-बड़े लोगों की बड़ी-बड़ी बातें!

वे तो मन ही मन प्रसन्न हो रहे होंगे चाहे कैसे भी आया चलो नाम तो आया। आजकल हर कहीं नाम का ही बोल-बाला है। नाम चाहे बदनामी से मिले या नेक-कर्म से। बस, नाम होना चाहिए। सेलिब्रिटियों को तो वैसे भी थोड़ा बदनाम होकर मिले नाम को एन्जॉय करने में ज्यादा आनंद आता है। अक्सर बदनामियां ही उनकी फिल्में चला ले जाती हैं। समाज भी ऐसे सेलिब्रिटी को ही महत्त्व देने लगा है जो किसी न किसी स्तर पर कुछ न कुछ बदनाम तो हो ही!

सोशल मीडिया अपनी बदनामियों को वायरल करने का सबसे सशक्त माध्यम है आजकल।

पैराडाइज पेपर्स के जरिए मिले नाम को तो सीधा स्वर्ग से मिला वरदान ही माना जाएगा न!

हालांकि विकास-प्रधान सरकार कह जरूर रही है कि पैराडाइज पेपर्स में आए नामों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाएगी मगर फिर आंखों के सामने 2जी और कोयला घोटाला आ जाता है और खुशफहमी दइमाः पर धीरे-धीरे कर असर जमाने लगती है। कुर्सी पर बैठकर कोई भी राजनीतिक जुमला छेड़ने में कुछ नहीं जाता। बस ज़बान ही तो हिलानी होती है। यों भी, राजनीति ज़बान हिलाने का ही तो खेल है। जिसकी जितनी लंबी ज़बान उसका उतना ही ऊंचा जुमला। क्या समझे...!

कृपया ध्यान में रखें जहां स्वर्ग, धर्म, आस्था आदि का मसला बीच में आ जाता हैं वहां सारी की सारी ऊंची बातें धरी की धरी रह जाती हैं। चूंकि पैराडाइज पेपर्स में ऑलरेडी स्वर्ग घुसा हुआ है, तो इसमें कुछ 'कठोर' होता हुआ दिखाई पड़ेगा, उम्मीद कम ही है पियारे! स्वर्ग-सम्मत किसी मसले में अपने नाम का शामिल होना 'गर्व' की बात मानी जाए! है कि नहीं...!

मंगलवार, 7 नवंबर 2017

कूड़े पर बहस के बहाने

उस दिन मोहल्ले में दो पड़ोसी आपस में सिर्फ इस मुद्दे पर भिड़ लिए कि तूने मेरे घर के आगे कूड़ा क्यों डाला! दोनों के मध्य बहुत देर तक इस मुद्दे पर हल्की-फुल्की गालियों के साथ विचार-विमर्श चलता रहा। बात कूड़े के रास्ते होती-होती कभी एक दूसरे के खानदान तक पहुंच जाती तो कभी एक-दूसरे के अत्यंत निजी प्रसंगों तक। कुछ देर के लिए यह समझना दुर्लभ जान पड़ता कि दोनों के बीच विमर्श या बहस का विषय है क्या?

अक्सर जब आप किसी 'राष्ट्रीय समस्या' पर आपस में बहस को जुटते हैं तो विषय से इतर दो-चार बातें हो ही जाती हैं। बहस को प्रासंगिक बनाए रखना बहुत जरूरी है ताकि आस-पास के लोग भी इंटरेस्ट के साथ उसमें शरीक हो सकें।

यों भी, कूड़े पर लड़ाई या बहस हमारे देश की अनादि काल से राष्ट्रीय समस्या रही है। शायद ही ऐसा कोई शहर, घर, मोहल्ला, कॉलोनी, सोसाइटी हो जहां इस मुद्दे पर लोग आपस में लड़े-भिड़े न हों। बहुत से मामलों में तो बात थाना-कोतवाली, कोर्ट-कचहरी तक भी पहुंच चुकी है। तिस पर भी लोग अपने व्यवहार में अंतर न ला पाए हैं।

बात जहां तक आपस में भिड़ने की है तो हम कूड़े तो क्या भूलवश एक-दूसरे से टच हो जाने तक पर भिड़ लेते हैं। भिड़ना हमारी 'लड़ताऊ संस्कृति' का अहम हिस्सा-सा है। इसे हम कदापि नहीं त्याग सकते।

दूसरी तरफ सरकार के तमाम छोटे-बड़े मंत्री जी-जान से जुटे हैं कूड़े की समस्या के निस्तारण के लिए। आए दिन किसी न किसी अखबार में कोई न कोई मंत्री साफ-सुथरी झाड़ू पकड़े नजर आ ही जाता है, कूड़ा (गंदगी) साफ करते हुए। कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि मंत्रीजी के जाने से पहले ही कथित जगह पर कूड़े को पहुंचा दिया जाता है। ताकि मंत्रीजी की कूड़े को झाड़ू मारते हुए फोटू टनाटन आ सके।

विपक्षी लोग इसे बेशक पब्लिसिटी का फण्डा मान सकते हैं किंतु है ये खालिस नेक काम है। नेक कामों के लिए पब्लिसिटी का दरवाजा हमेशा खुला रखना चाहिए।

देखिए, सुधरते-सुधरते ही हममें सुधार आ पाएगा। सुधार कोई जादुई छड़ी न होता कि घुमाई और असर चालू।

कूड़े पर झगड़े-टनटें शाश्वत हैं। ये कभी न कम होने। फिर भी, यह उम्मीद तो कायम है ही कि एक दिन कूड़े पर बाजी हम जीत ही लेंगे।

सोमवार, 6 नवंबर 2017

मंदड़ियों से भी सहानुभूति रखिए

मंदड़ियों से 'सहानुभूति' रखने का कोई भी मौका मैं हाथ से नहीं जाने देता। मंदड़ियों से सहानुभूति रख मुझे ऐसी ही 'शांति' मिलती है जैसे भक्त को अपने ईश्वर की उपासना कर। मैं उन 'मतलबी' लोगों में से नहीं हूं जो टेढ़े वक़्त में 'मजबूर आदमी' का साथ छोड़ दे। आजकल मंदड़ियों की स्थिति लगभग मजबूर आदमी जैसी ही हो रखी है।

इधर, सेंसेक्स ने 33 हजार के पार जब से 'जम्प' लगाई है बेचारे मंदड़ियों के 'खराब दिन' आ लिए हैं। सेंसेक्स के गिरने की उम्मीद में बनाया गया उनका हर 'नक्का' लगभग 'फेल' साबित हो रहा है। कल तक वे दलाल पथ पर 'सीना चौड़ा' कर घूमते पाए जाते थे, इन दिनों आलम यह है कि वे अपने घरों से नहीं निकल रहे हैं। ऐसी विकट मार मारी है सेंसेक्स ने न सहलाते बन रहा है न मरहम लगाते।

सेंसेक्स की महिमा भी अपरंपार है। कब किस करवट, ऊंट की मानिंद, पलट या बैठ जाए कोई नहीं जानता। 2014 के बाद से इसने जो तेजी पकड़ी है अब तक हाथ न आ पाया है मंदड़ियों के। अपवादस्वरूप छोटी-मोटी गिरावटों को अगर परे रखें तो भी सेंसेक्स अपनी रौ में मस्तराम ही बना हुआ है। मार्केट के जानकार लोग बता रहे हैं कि सेंसेक्स में बनी तेजी को अभी कुछ साल और प्रभावी रहना है!

हालांकि स्टॉक मार्केट में कुछ भी 'निश्चित' नहीं है, जैसे कभी क्रिकेट में अंतिम गेंद तक नहीं होता, फिर भी अगर ऐसा हुआ तो मंदड़ियों की तो विकट वाली वाट लग ही जानी है। जाने कितने मंदड़ियों को सदमे में आ जाना है। जाने कितने मंदड़ियों के चूल्हे बंद हो जाने हैं।

मैं तो कभी-कभी मंदड़ियों के खराब दिनों की स्थिति को सोचकर लगभग अवसाद टाइप माहौल में चला जाता हूं। वे मंदड़िये हुए तो क्या हुआ; हैं तो अपने ही भाई लोग न।

देखो जी, क्षेत्र चाहे स्टॉक मार्केट का हो चाहे लेखन या राजनीति का- अपना तो बचपन से यही मनाना रहा है- कि दुकान सबकी चलती रहनी चाहिए। ऐसा कभी न होना चाहिए कि फलां की दुकान में तला पड़ जाए। आज के जमाने में किसी भी टाइप की दुकान को चलाए रखना 'वैवाहिक जीवन' को चलाए रखने से कहीं ज्यादा कठिन काम है! क्या समझे पियारे...।

एक तरफा तेजी या एक तरफा मंदी दोनों की स्टॉक मार्केट की सेहत और देश की इकोनॉमी के लिए 'घातक' हैं। दोनों के बीच बैलेंस बराबर का बना रहना चाहिए। अच्छा, थोड़ा मंदड़ियों को भी यह समझना चाहिए कि 'सब दिन होत न एक समान'। उनके दिमाग में जब 24x7 मंदी-मंदी ही घूमेगी, तो ऐसे कैसे चलेगा। एक न एक दिन ऊंट को पहाड़ के नीचे आना ही होगा। जैसाकि इन दिनों आया हुआ है। सेंसेक्स का घोड़ा राणा प्रताप का 'चेतक' बना हुआ है। न किसी के रोके रुक रहा है न किसी के ठहरे ठहर।

बेचारे मंदड़िये इस 'खुशफहमी' में फंसे हुए हैं कि बुल नीचे का रूख करे तो बेयर उस पर हावी होए। मगर बुल को तो ऊंचाई का ऐसा चस्का लगा हुआ है कि 33 हजार के पहाड़ पर चढ़ मंदड़ियों के साथ-साथ बेयर को भी चिढ़ा रहा है। सच पूछिए तो अच्छे दिन बुलिश सेंसेक्स के ही आए हैं।

शेयर मार्केट में गुजारे अपने लंबे कॅरियर में मैंने ऐसे तमाम तीसमारखां मंदड़िये भी बहुत नजदीक से देखे हैं जो बार-बार चोट खाकर भी अपनी मंदी की प्रवृत्ति को छोड़ते नहीं। बाजार चाहे कितना ही क्यों न बढ़ जाए उनका नक्का तो सेंसेक्स को गिराने पर ही केंद्रित रहता है। हर आती और जाती सांस के साथ वे यही दुआ करते हैं कि कब बुल घड़ाम हो और वे उस पर चढ़ाई करें। गिरने वाले पर हंसना या ताली बजाना हमारी सदियों पुरानी आदत रही है।

फिर भी, सेंसेक्स में बनी तेजी की इस बेला में हमें मंदड़ियों का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। उनसे पूरी नहीं तो 'आंशिक सहानुभूति' तो रखनी ही चाहिए। आखिर वे भी स्टॉक मार्केट की व्यवस्था का एक अहम हिस्सा हैं। उनका 'मंदी-प्रूफ नजरिया' यह बताने के लिए काफी है कि आप शेयर मार्केट से गिरावट के समय में भी अच्छा कमा सकते हैं। बस मंदी को सहन करने का जज्बा होना चाहिए भीतर।

वैसे, मंदड़िये (मजबूरी के बाद भी) मजबूत दिल के मालिक होते हैं। इसलिए तो मैं उनके प्रति सहानुभूति रखने का कोई मौका छोड़ता नहीं।