शनिवार, 20 मई 2017

व्यंग्य और क्लीवेज

जितना पसंद मुझे व्यंग्य लिखना है, उतना ही क्लीवेज देखना भी। कभी-कभी तो मुझे व्यंग्य और क्लीवेज एक-दूसरे के पूरक नजर आते हैं। उत्मुक्तता और उत्तेजना दोनों में एक समान होती है। जैसे- व्यंग्यकार को व्यंग्य लिखे बिना चैन नहीं पड़ता, वैसे ही हीरोईनों को क्लीवेज दिखाए (अपवादों को जाने दें) ‘संतुष्टि’ नहीं मिलती। फिल्मों में क्लीवेज दिखाना कितना कहानी की डिमांड होती है और कितना फसाना यह तो मैं नहीं जानता मगर हां ‘शो-ऑफ’ के लायक अगर कुछ है तो देखने-दिखाने में क्या हर्ज? यह तो निर्भर सामने वाले की ‘मानसिकता’ पर करता है कि वो क्लीवेज को ‘जस्ट एंटरटेनमेंट’ एन्जवॉय करता है या फिर सभ्यता-संस्कृति के मूल्यों पर खतरा।

अक्सर हैरानी होती है मुझे कि इतना आधुनिक और डिजिटल होते जाने के बाद भी हमें क्लीवेज पर बात या चर्चा करना बड़ा भद्दा टाइप लगता है। मानो कोई पाप-शाप कर रहे हों। किसी देसी-विदेशी हीरोईन की क्लीवेज को देखते ही जबान से ‘वाह! क्या कमाल क्लीवेज है’ अगर निकल जाए तो अगला इतनी ‘असभ्य नजरों’ से हमें देखता है मानो हम उसकी शर्ट के बटन खोलने की हिमाकत कर रहे हों। अरे भाई अगर कोई सुंदर क्लीवेज नजर आई और तारीफ कर दी तो इसमें इतना बिफर पड़ने की क्या जरूरत है? अमां, जब खूबसूरत चेहरे की तारीफ की जा सकती है तो मदमस्त क्लीवेज की क्यों नहीं? क्या क्लीवेज इंसान के शरीर से बाहर का पार्ट होती है?

ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब हीरोईन दीपिका पादुकोण ने लोगों की यह कहकर कि ‘मेरी क्लीवेज, मेरी मर्जी’ कैसे बोलती बंद कर दी थी। दीपिका को अपनी क्लीवेज पर गर्व है तो उस गर्व की तारीफ करने में क्या जाता है? तारीफें इंसान को हरदम कुछ नया करने के लिए प्रेरित करती हैं।

क्लीवेज की एक झलक ही इंसान को इतना ‘तृप्ति’ कर सकती है, जितना कि संपूर्ण देह-दर्शन नहीं। उसी प्रकार, व्यंग्य के भीतर छिपे छोटे-गहरे पंच भी एक प्रकार से व्यंग्य की क्लीवेज ही होते हैं। जो काम पूरा व्यंग्य नहीं कर सकता वो पंच कर जाते हैं। वनलाइनर इन्हीं पंच को और ग्लैमरस बनाने के काम आते हैं। व्यंग्य का बाहरी और भीतरी ग्लैमर पंच और वनलाइनर से ही तो निखरता-संवरता है। व्यंग्यकार के पास अगर अपने व्यंग्य के ग्लैमर को साधने का हुनर है फिर तो बल्ले-बल्ले...।

व्यंग्य में क्लीवेज का जिक्र हालांकि शुचितावादियों को अटपटा टाइप जरूर लगेगा, लगने दो। जब तक लगेगा नहीं तब तक वे अपने परंपरावादी दायरों से बाहर निकलेंगे नहीं। सच तो यही है कि बिना पंच (क्लीवेज) का इस्तेमाल किए व्यंग्य रचा ही नहीं सकता। पंच और वनलाइनर का मिक्सचर ही व्यंग्य को ‘हॉट’ बनाता है। एंवई, ‘ठंडे व्यंग्य’ लिखने का अब कोई मतलब न रहा प्यारे। व्यंग्य का जमाना बहुत बदल गया है। ‘माइक्रो-व्यंग्य’ ही आजकल चलन में है। कम शब्द, ज्यादा आनंद।


मेरी तो कोशिश यही रहती है कि मैं अपने हर व्यंग्य में क्लीवेज (पंच) की खूबसूरती बनाए रखूं। ताकि पढ़ने वाले को ‘रस’ मिले। जरूरी है, पढ़ने और लिखने वाले के दिल का जवान रहना, तभी तो व्यंग्य और क्लीवेज की मस्तियां तन में आनंद बरकरार रखेंगी।

गुरुवार, 18 मई 2017

अपने ही फैलाए वायरस से डरता इंसान

सच पूछो तो मुझे वायरस का डर नहीं। हंसी तो मुझे इस बात पर आ रही है कि इंसान अपने ही फैलाए वायरस से खुद डर रहा है। जगह-जगह चेतावनियां देता फिर रहा है कि रेन्समवेयर वायरस से बच कर रहें। ऐसी-वैसी कोई फाइल या इ-मेल न खोलें। जरा-कुछ खतरा दिखे तो तुरंत अपना कंप्यूटर बंद कर दें। हां, फिरौती के लिए मांगी गई रकम तो बिल्कुल भी न दें।

अचानक से इतना डर, इतना भय क्यों और किसलिए? रेन्समवेयर वायरस भगवान का नहीं इंसानों का बनाया एवं फैलाया हुआ है। इसका उद्देश्य भगवान को नहीं केवल इंसानों को नुकसान पहुंचाना है। उंगुली को टेढ़ा कर पैसा वसूलना है। यह सब तिकड़मबाजियां तो इंसान ने ही इंसान को सिखाई-पढ़ाई-बताई हैं। फिर इनसे क्या घबराना?

इंसान खुद को चाहे कितना ही ‘बलशाली’ प्राणी क्यों न कह ले लेकिन होता वो बहुत ‘डरपोक’ टाइप है। खुल्ला कहूं तो जानवरों से भी ज्यादा डरपोक। गीदड़-भभकी का जानवर फिर भी मुकाबला कर लेते हैं किंतु इंसान तो तुरंत इतना दूर भाग जाता है लंगूर को देखकर बंदर।

बताइए, एक वायरस से पूरी दुनिया डरी पड़ी है। कमाल देखिए, इतना आधुनिक और टेक्नो-फ्रैंडली होने के बावजूद वायरस का कोई तोड़ उसके पास नहीं। बैंक, एटीएम, मेल आदि-इत्यादि बंद करवा रखे हैं, कहीं रेन्समवेयर सबकी लंका न लगा दे। हालांकि कई जगह लगा भी चुका है। तो भी क्या...?

अमां, यह कोई पहला या अनोखा वायरस नहीं जो इतना विकट होकर फैला है। इससे पहले भी कई तरह के वायरस हमारे सिस्टम को तबाह कर चुके हैं। वे सब भी इंसानों के ही फैलाए हुए थे। ब्राह्मांड से नहीं उतरे थे। किन्हीं देवताओं या राक्षसों ने उन्हें नहीं बनाया था। तिस पर भी हम हार गए। अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार कर पड़ोसी से कह रहे हैं- भाई, जरा दवा लगा दे। दवा लगते ही थोड़ी-बहुत राहत जैसे ही मिलती है इंसान अपने दर्द को भूलाकर दूसरे किसी बड़े हमले का इंतजार करता हुआ मिलता है। दोबारा हमला होते ही फिर वही रटी-रटाई चिंताएं-सावधानियां हवाओं में दौड़ने लगती हैं।

इन किस्म-किस्म के वायरसों पर अधिक चिंता करने की जरूरत नहीं। ये होते रहे हैं। होते रहेंगे। जिम्मेवार ठहरा कर दोष चाहे किसी भी देश को दे लीजिए मगर इंसान अपनी ‘काली फितरत’ को कभी नहीं छोड़ने वाला। निरंतर आधुनिक या डिजिटल होकर वो किसी न किसी तरीके से खुद को ही नुकान पहुंचा रहा है। कभी वायरस फैला कर। कभी वेबसाइट हैक कर। कभी एटीएम से बेलेंस उड़ा कर। कभी डाटा करप्ट कर।

लुत्फ तो यह है कि इंसान ही इंसान के इजाद किए गए तोड़ को नहीं भेद पा रहा। तमाम सवाधानियों-चिंताओं के बीच खुद भी उलझा रहता है। दूसरों को भी उलझाए रखता है।

आज नहीं तो कल रेन्समवेयर का खतरा टल ही जाएगा। लेकिन इस बात का क्या भरोसा कि अगला फैलने वाला वायरस इससे भी ज्यादा स्ट्रौंग न होगा?

बुधवार, 17 मई 2017

चिप-कांडः इंसानी खोपड़ी का जवाब नहीं

पिछले कई दिनों से अखबार और खबरिया चैनल ‘चिप-मय’ दिख रहे हैं। तेल के खेल में प्रयोग की जानी वाली ‘चिप’ की खबरें खोद-खोद कर छापी-दिखाई जा रही हैं। लोग कभी चिप को तो कभी तेल मालिकों को ‘कोस’ रहे हैं। चिप-कांड ने न केवल सरकार बल्कि चिप-धारकों की नींद भी हराम कर रखी है। क्या तो तेल वाले, क्या तो मोबाइल वाले हर कोई चिपों के लेकर ऐसे ‘डरे-सहमे’ हुए हैं मानो यह कोई ‘चरस-गांजा’ टाइप हो।

कुछ भी कहिए पर ‘दाद’ देनी पड़ेगी इंसानी खोपड़ी की। जाने कहां-कहां से कैसे-कैसे धांसू आइडिया दिमाग में ले आते हैं। पर्दे के पीछे सारा खेल खुल्लम-खुल्ला चलता रहता है। भनक कहीं जाके तब लग पाती है, जब अच्छा-खासा माल पिट लिया जाता है। इंसानी (करतबी) खोपड़ी के आगे कंप्यूटर तो क्या कैलक्युलेटर तक फेल है।

कस्टमर की जेब का गेम चिप के सहारे बजाने का आइडिया जिस भी बंदे का रहा हो मगर था ‘नायाब’। अभी तलक तो हमने चिप का ज्यादा से ज्यादा यूज मोबाइल में या किसी डिजिटल मशीन के भीतर ही देखा-सुना था। लेकिन चिप के सहारे तेल का खेल भी खेला जा सकता है, यह वाक्या पहली दफा ही सामने आया।

कुछ गलत नहीं कहते अगर यह कहते हैं कि कुछ भी हो सकता है। ऐसे तिकड़मी और घोर-जुगाड़ू मसलों को देख-सुनकर तो यह बात और भी ‘बलबती’ हो जाती है। पूरी दुनिया में इंसानी दिमाग से तेज और बेहतर कोई चीज दौड़ ही नहीं सकती। घपलों-घोटालों के मामलों में तो खासकर। देखिए न, पेट्रोल पंप मालिक बड़ी तत्परता के साथ चिप-कांड करते रहे। न इसकी भनक ग्राहक को कभी लगने दी, न सरकार को। और जब चिप का राज खुला तो ऐसे-ऐसे किस्से सामने आए कि दांतों तले उंगुली भी दबा लो तो भी उंगुली को कोई फरक न पड़े।

चिप बनाने वालों ने कभी सपने में भी न सोचा होगा कि एक नन्हा-सा आइटम इतना बड़ा कांड कर सकता है। डाइरेक्ट दिल पर न लीजिएगा लेकिन प्रधानमंत्रीजी के ‘डिजिटल’ और ‘न्यू इंडिया’ के सपने को ढंग से ऊंचाईयों पर ये लोग ही ले जा रहे हैं। इंसानी दिमाग इतने फितुरों से भरा पड़ा है कि कब कहां क्या खेल खेल जाए कुछ नहीं पाता। कोड पूछकर बैंक खाते से रुपये साफ करने के किस्से तो अब चोरी-चकारियों की तरह आम हो चले हैं। शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता हो जब फ्रॉड द्वारा किसी बंदे के लुटने की खबर अखबार में न छपती हो। ठग-विद्या में इंसानी खोपड़ी महारत हासिल कर चुकी है। महारत।

आलम यह है कि यहां जिसे ‘ठलुआ’ समझो वो एक दिन बड़ा कांड करने वाला निकलता है। उसके कांड के किस्से जब अखबारों में छपते हैं, तब कहीं जाकर यह एहसास होता है कि दिमाग का असल इस्तेमाल तो ठलुए ही कर रहे हैं। चिप कांड भी कुछ-कुछ ऐसा ही है। सारा खेल खेल लिए जाने के बाद सरकार और अधिकारी नींद से जाग रहे हैं। वाह!

आगे चिप कांड वालों का तेल पुलिस या प्रशासन कैसे निकालेंगे यह बाद की बात रही फिलहाल तो उनकी खोपड़ी की चपलता पर रश्क कीजिए और अपनी कटी जेबों पर आंसू बहाइए।

काहे के गरीब मुल्क

वो तो एंवई लोग छोड़ते रहते हैं कि इंडिया गरीब मुल्क है। जबकि ऐसा कतई नहीं है। इंडिया राजा-महाराजाओं के जमाने में भी ‘सोने की चिड़िया’ था, अब भी है। फर्क सिर्फ इतना आया है कि अभी सोने की चिड़िया को चंद बड़े लोगों ने हैक कर रखा है। पर कोई नहीं…। कभी-कभी छोटे लोग भी सोने की चिड़िया का लुत्फ अपनी सुविधानुसार ले लेते हैं। किंतु गरीब वे भी नहीं है।

आम लाइफ में किसी आम आदमी को गरीब कह दो तो अगला यों ‘भड़क’ उठता है मानो कोई ‘अश्लील’ टाइप गाली दे डाली हो। गरीब शब्द और गरीबी की परिभाषाएं किताबों या फिर वाम विचारकों के मुंह से सुनने में ही अच्छी लगती हैं। जबकि असल जिंदगी में गरीब तो वे भी नहीं होते।

मैं तो यह कहता हूं कि हम अपने को गरीब माने ही क्यों? जिस देश में बाहुबली-2 एक हजार करोड़ कमा और जस्टिन बीबर का शो सौ करोड़ कूट ले जाए भला वहां की जनता गरीब कैसे हो सकती है? वे तो गरीब शब्द के आस-पास भी कहीं नहीं ठहरते।

सुना कि तीन से लेकर पचहत्तर हजार रुपये तक का टिकट बिका था बीबर के लाइव शो का। क्या सेलिब्रिटी, क्या नॉन-सेलिब्रिटी हर वर्ग का बंदा-बंदी बीबर को देखने-सुनने को बेताब था। विदेशियों के प्रति हमारी बेताबी का आलम तो पूछिए ही मत। किसी ट्यूरिस्ट प्लेस या फिर जहां विदेशी लोग इकठ्ठा हों आम भारतीय जब तलक उनके साथ एकाध फोटू या सेल्फी नहीं ले लेता, उसके हलक से रोटी का गस्सा ही नहीं उतरता। तो बीबर के शो में अगर भारतीयों में पचहत्तर हजार का टिकट खरीद भी लिया तो कौन-सा गुनाह कर दिया?

हां, यह बात अलग है कि बीबर केवल ‘लिप सिंग’ कर हमें ‘मूर्ख’ बनाकर चला गया पर विदेशियों से मूर्ख बनने में हमें ज्यादा आनंद आता है न। अच्छा, कुछ होड़ भी होती है हममें कि अगर सामने वाला बाहुबली या बीबर देखने जा रहा है तो अगला घर पर कैसे रह सकता है। नोट को जेब में पड़े-पड़े सड़ना नहीं चाहिए। बाहुबली या बीबर के बहाने बढ़ने वाली आय से ही तो पता चलता है कि हम अब गरीब टाइप मुल्क नहीं रहे।

सरकार की कोशिश भी यही है कि न्यू इंडिया का हर बाशिंदा टेक्निकली-इकॉनोमिकली संपन्न हो। डिजिटल और कैशलेस होते इंडिया की तरफ बढ़ते हमारे कदम गरीबी से मुक्ति की ही तो पहल है। देश तो नोटबंदी के वक्त भी गरीब नहीं हुआ था। कहीं न कहीं से किसी न किसी के पास से लाखों-करोड़ों रुपये मिलने की खबरें आ ही जाती थीं। जिन्हें नोटबंदी के दिनों में लाइनों में खड़े होने से दिक्कत थी वे बाहुबली और बीबर के लिए बिना किसी तकलीफ खड़े रहे। ये है न्यू इंडिया।

वाम विचारकों को अब अपना पुराना राग छोड़ देना चाहिए। उनका रात-दिन गरीबी-गरीबी चिल्लाना अब काम नहीं आना। मुल्क को गरीब कहने से पहले एक दफा उन्हें बाहुबली-2 और बीबर के आंकड़ों को भी देख ले ना चाहिए।

बाहुबली-2 की अपार कामयाबी के बाद से मैंने तो खुद को गरीब कहना-मानना ही बंद कर दिया है। मैं तो फख्र के साथ कहता हूं कि मैं उस मुल्क का बाशिंदा हूं जहां की जनता ने बाहुबली-2 को एक हजार करोड़ की कमाई करवाई है। फिर काहे के गरीब मुल्क?

सोमवार, 8 मई 2017

थोड़ी सी जो पी ली है

हालांकि चीते को पीते कभी देखा तो नहीं मगर एक ऐड में दिखाया गया था कि चीता भी पीता है। यों, पीने पर किसी के ‘रोक-टोक’ नहीं। इंसान हो या जानवर कभी भी, कहीं भी, कैसे भी पी सकता है। बहुत से तो पीने को अपना ‘लोकतांत्रिक अधिकार’ मानते हैं। हां, यह बात अलग है कि पीने के बाद वे खुद ‘होश’ में नहीं रहते। लेकिन पीना जरूरी है। ऐसी उनकी ‘दिली-मान्यता’ है।

ऐसा सुना है, इंसान या तो दर्द गलत करने या फिर खुशी को सेलिब्रेट करने के लिए पीता है। उसकी तासीर ही कुछ ऐसी है कि हलक से नीचे जाते है पूरी दुनिया रंगीन टाइप नजर आने लगती है। चलो, इंसान की पीने-पिलाने की दिलचस्पी तो समझ आती है लेकिन चूहों को उस रंगीन पानी में ऐसा क्या खासा नजर आया जो- बिना हिचकी लिए- पूरी नौ लाख लीटर अकेले ही गटक गए। क्या इंसान के साथ-साथ चूहे भी मदिरा-प्रेमी हैं? हां, हो भी सकते हैं। दुनिया में किसी इंसान या जानवर का कोई भरोसा नहीं कब किस तरह का शौक पाल ले। शौक बड़ी चीज है।

वैसे, वैज्ञानिकों के लिए चूहों का इतनी मात्रा में शराब गटकना बड़ा शोध का विषय बन सकता है। पीने के बाद उनका व्यवहार खुद के या अपने साथियों के प्रति कैसा रहा? पीने के बाद वे कितना लुढ़के, कितना संभले, किस टाइप की शायरी उनके मुंह से निकली? हां, कौन सा वाला ब्रांड उन्हें सबसे ज्यादा पसंद आया।

पीने के मामले में अब कोई यह नहीं कह सकता कि चूहे इंसानों से कमतर हैं। इस नाते शराब की डिमांड देश में और अधिक बढ़ जानी चाहिए। फिर भी, पता नहीं क्यों कुछ राज्य शराब-बंदी पर इतना जोर दे रहे हैं। गम को गलत करने का इससे बेहतर साधन कोई नहीं हो सकता। यह बात बिहार के चूहों ने साबित भी कर दी है।

अब तो उस दिन का इंतजार है मुझे जब इंसान और चूहे साथ बैठकर जाम छलकाएंगे। क्या उम्दा जुगलबंदी होगी दोनों के बीच। कभी इंसान चूहे को तो कभी चूहा इंसान को पैग बनाकर देगा। बीच-बीच में दोनों के बीच थोड़ी-बहुत तू तू मैं मैं भी हो जाया करेगी।

पीने की इतनी सामर्थ्य चूहों में होगी किसी से सोचा भी न था। फिर भी, चूहों ने नौ लाख लीटर शराब गटक कर ठीक ही किया। शराब के बेकार चले जाने से तो बेहतर यही रहा कि किसी के काम ही आ गई। भले ही चूहों के आई। भलाई में किसी की क्या जाता है।

मगर चूहों के पीने पर हंगामा खड़ा होना गलत है। उनके जरा से पेट में थोड़ी सी ही तो गई होगी। थोड़ी सी पी लेने में क्या जाता है। शौक बड़ी चीज है। बना रहना चाहिए। बाकी कहने वाले तो जाने क्या-क्या कहते रहते हैं।

गुरुवार, 4 मई 2017

बाहुबली सेंसेक्स

आज जिधर भी निगाह उठाकर देख लीजिए, सबसे अधिक चर्चे कटप्पा के बाहुबली को मारने के ही मिलेंगे। हालांकि बाहुबली-2 सिनेमा घरों तक पहुंच चुकी है। लोगों ने देख भी ली है। लोग देख भी रहे हैं। किंतु यह सवाल अब भी वहीं का वहीं है कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा? लुत्फ देखिए, बाहुबली मरा फिल्म में है, ‘चिंतित’ पूरा समाज है।

लेकिन कटप्पा-बाहुबली के इस रहस्यमयी द्वंद्व बीच एक बेमिसाल खबर ऐसी भी रही जिस पर किसी का ध्यान ‘न’ के बराबर ही गया। अभी चंद रोज पहले ही हमारा सेंसेक्स तीस हजारी हुआ। दलाल पथ ‘झूम’ उठा। अर्थव्यवस्था को ‘बूस्ट-अप’ मिला। व्यापार चैनलों पर ‘उत्सव’ टाइप माहौल रहा। निवेशकों के दिल अपार खुशियों से गद-गद हो गए। किंतु समाज और सोशल मीडिया सेंसेक्स की इस ‘आला उपलब्धि’ को यों ‘इग्नोर’ किए रहा जैसे- वाम सोच वाले राष्ट्रवादियों को किए रहते हैं। जिस लोकतांत्रिक और समावेशी व्यवस्था पर अक्सर हम लंबे-चौड़े लेक्चर देते हैं, सेंसेक्स के संदर्भ में बहुत ही ‘उदासीनता’ का माहौल रहा।

सेंसेक्स का तीस हजारी होना कोई छोटी-मोटी खबर या उपलब्धि नहीं। यहां तक पहुंचने में सेंसेक्स ने न जाने कितने आड़े-तिरछे पड़ावों को पार किया। कितने ही लोगों की जली-कटी सुनी। मंदड़ियों के घातक नक्कों को सीधे जिगर पर झेला। कितने ही भीषण करेक्शनों की मार झेली, फिर-फिर साहस के साथ उठ खड़ा हुआ। किंतु हमारे समाज ने उसकी तीस हजारी कामयाबी पर ‘लड्डू’ खिलाना तो छोड़िए उसे ‘बधाईयां’ तक न दीं।

समाज की सेंसेक्स के प्रति इस ‘एग्नोरेंस’ से मैं बेहद ‘आहत’ हूं। हर उस व्यक्ति की ‘कड़ी निंदा’ करता हूं जिसने सेंसेक्स को यों ‘उपेक्षित’ रख छोड़ा।

प्रायः मैंने देखा-सुना है कि लोग सेंसेक्स को ‘गुलाबी अर्थव्यवस्था’ का प्रतीक मानते हैं। कहते हैं, सेंसेक्स एलिट वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है वनिस्पत निम्न या मध्य वर्ग के। लोगों की सेंसेक्स के प्रति ये धारणा बहुत गलत है। सेंसेक्स हमारी अर्थव्यवस्था का ‘टर्निंग प्वाइंट’ है। सेंसेक्स बढ़ता है तो देश की इकॉनोमी में सुधार होता है। जीडीपी में निखार आता है। दूसरे मुल्कों के बीच देश की आन-वान-शान बढ़ती है। भारत कृषि-प्रधान मुल्क होने के साथ सेंसेक्स-प्रधान भी है, न भूलें। तीस हजारी होने के बाद से तो उसकी जिम्मेदारियां और भी बढ़ जाती हैं।

सबसे खास बात। सेंसेक्स ने कभी किसी का ‘अहित’ नहीं चाहा। हां, ज्यादा मुनाफा कमाने के लालच में लोग खुद ही अपना अहित कर बैठे तो उसे लिए भला सेंसेक्स क्यों दोषी हो? सेंसेक्स ने कभी किसी निवेशक से सट्टा करने को नहीं कहा। निवेशक अगर खुद ही सट्टा करने लग जाए तो भला सेंसेक्स क्या करे? देखो जी, सेंसेक्स तो समंदर है, यहां जितना डालेंगे उतना उसमें समाता चला जाएगा। अपनी चादर के अनुसार पैर तो आपको फैलाने हैं।

मतलबपरस्ती हम पर इतना हावी रहती है कि हम अपनों को तो जीत या कामयाबी की बधाईयां दिन-रात देते रहते हैं किंतु सेंसेक्स के एचीवमेंट पर मौन साधे हुए हैं। कटप्पा-बहुबली-आइपीएल की खुमारी जरा बाहर निकलिए हुजूर और सेंसेक्स को उसके तीस हजारी होने की शुभकामनाएं दीजिए ताकि उसे भी लगे कि लोग उसे भी ‘प्यार’ करते हैं।

बुधवार, 3 मई 2017

अब दिमाग से सोचना बंद

जब से अखबार में खबर पढ़ी है कि फेसबुक ‘ब्रेन सेंसिंग तकनीक’ पर काम कर रहा है। मतलब, हमारा दिमाग जो सोचेगा, वही हमारी फेसबुक वॉल पर उतरता चला जाएगा। तब से मैंने दिमाग से सोचना ही बंद कर दिया है! दिमाग को खोपड़ी से अलग कर एक कोठरी में ताला-बंद कर दिया है। न सांप होगा, न लाठी टूटेगी।

दिमाग है कुछ भी सोच सकता है। किसी का कोई जोर थोड़े न रहता है उस पर। पता चला फेसबुक खोले बैठा हूं, आ गई दिमाग में कोई ऐसी-वैसी बात, तुरंत उतर गई मेरी फेसबुक वॉल पर। तब सोच सकते हैं क्या होगा मेरा? ऐसी-वैसी बात पर कब तक किस-किस को यह सफाई देता फिरूंगा कि इस सोच के लिए मैं नहीं दिमाग दोषी है। कौन मानेगा भला?

यों, फेसबुक पर बवाल पहले ही क्या कम हैं, जो अब यह ब्रेन सेंसिंग तकनीक गजब ढहाएगी। न जाने जुकरबर्ग के भेजे में कैसी-कैसी वाहियात तकनीकें घर करती रहती हैं। पहले ‘डिस्लाइक’ के बटन को लेकर अच्छा-खासा रायता फैला था। यहां तो ‘लाइक’ न देने पर लोग राशन-पानी लेकर सिर पर सवार हो लेते हैं। कहीं अगर डिस्लाइक का बटन आ जाता तो खुद जाने क्या-क्या, कैसे-कैसे हंगामें कट रहे होते फेसबुक के प्लेटफॉर्म पर।

चलो बोलकर लिखने वाला स्टेटस तो समझ आता है, जिसे बाद में हम अपने अनुसार एडिट भी कर सकते हैं। किंतु ब्रेन सेंसिंग तकनीक तो पूरी बावल-ए-जान है। क्या जुकरबर्ग को मालूम नहीं कि मनुष्य दिल से कहीं ज्यादा अपने दिमाग का गुलाम है। दिमाग अच्छा भी सोच सकता है। बुरा भी। यों भी, हर किसी का दिमाग न ओशो की तरह गहराई लिए होता है, न कबीर की तरह सच्चाई लिए। कुछ के दिमाग तो शक्ति कपूर से भी कहीं अधिक अश्लीलताएं लिए होते हैं। उनका क्या होगा?

दिमाग कोई बच्चा थोड़े है कि आंखें दिखाईं और मान गया। दिमाग प्रत्येक सोच के बंधन से मुक्त होता है। चाहे तो शोध करवा के देख लीजिए, मनुष्य के दिमाग में कायदे की बातें कम, बे-कायदे की ही अधिक आती हैं। ये सब फेसबुक पर सीधा जब आने लग जाएगा फिर तो जाने कितनों को लेने के देने पड़ जाएंगे।

जुकरबर्ग तुम स्वयं एक पति हो। जरा उन लाखों पतियों पर तो रहम फरमाओ जो दिन में कितनी ही दफा अपनी पत्नी के अतिरिक्त अपनी पड़ोसन, अपने ऑफिस की कॉलिग, अपनी पक्की दोस्ती आदि-इत्यादि के बार में दिमाग में जाने क्या-क्या सोच लेते हैं। उनके दिमाग की वो सोच कहीं उनके फेसबुक स्टेटस पर जाहिर होने लग गई और उनकी पत्नियों ने पढ़ ली फिर खुद ही अनुमान लगा सकते हो, उन बेचारे पतियों का क्या हश्र होगा। कहीं के नहीं रहेंगे वे। अपने दिमाग का पाप भुगतेंगे वे बेचारे। यह ब्रेन सेंसिंग तकनीक तो उन पतियों के लिए किसी ‘अभिशाप’ से कम नहीं प्यारे जुकरबर्ग। क्यों हम पतियों की बसी-बसाई दुनिया को अपनी बेतुकी तकनीक के बल पर ऊजाड़ देना चाहते हो।


मेरे विचार में न केवल जुकरबर्ग बल्कि फेसबुक को भी अपनी ब्रेन सेंसिंग तकनीक पर पुर्नविचार जरूर करना चाहिए। या फिर पतियों को ही फेसबुक से अपना नाता तोड़ लेना चाहिए। अपने दिमाग पर भला किसका जोर चला है आज तक।