गुरुवार, 18 जनवरी 2018

तबला और ठंड

हालांकि मुझे तबला बजाना नहीं आता फिर भी बजाने की कोशिश में सिर्फ इसलिए लगा पड़ा हूं ताकि ठंड न लगे। मगर ठंड इतनी ढीठ है कि लगे बिना मान ही नहीं रही। तबले पर भारी पड़ रही है। तबले के सिरों पर जिनती तगड़ी थाप जमाता हूं ठंड उतनी ही विकट चढ़ी आती है। उंगलियां तक पनाह मांग जाती हैं लेकिन ठंड का ताप कम नहीं होता।

हां, पत्नी अच्छे से तबला बजा लेती है। एक शादी में तबला बजाते देखकर ही मैंने उसे पसंद किया था। फिर आपस में प्रेम-इजहार का कुछ ऐसा तबला बजा कि नौबत शादी तक आ ली।

खैर, मैंने पत्नी को तबला बजाने के लिए इसलिए बोला कि शायद लय-ताल में बजने से ठंड अपना प्रकोप हम पर से कुछ कम कर ले। पर उसने तबला बजाने से यह कहते हुए साफ इंकार कर दिया कि वो अपनी नाजुक उंगलियों को इस भीषण ठंड में 'अतिरिक्त कष्ट' नहीं देना चाहती।

आगे मैंने यह जानते-समझते हुए जिद नहीं करी कि जिद के परिणाम मेरे फेवर में बुरे हो सकते हैं। मैं नहीं चाहता इतनी ठंड में मेरी चारपाई बाहर खुले आंगन में पड़े। बहरहाल, पत्नी के 'दो टूक' कहे का कड़वा घूंट मुस्कुराते हुए पी गया। ऐसा करना मेरी ही नहीं, हम पतियों की नियति है।

खैर, पड़ोस में पड़ा अखबार का पहला पन्ना बता रहा है कि ठंड अभी अपना जोर बनाए रखेगी। हाल-फिलहाल कोई संभावना नजर नहीं आ रही कम होने की। खबर में बसी ठंडक मुझे भीतर से और अधिक गलाए जा रही है। तबला मेरे दिलोदिमाग पर ऐसा बज रहा है कि कान के पर्दे सुन्न-से पड़ने लगे हैं।

ठंड का भी अजीब खेला है। न किसी की सुनती है न किसी के बस में ही आती है। इसका भी वही हिसाब है- 'भैंस के आगे बीन बजाए, भैंस खड़ी पगुराये'। इन दिनों जब सूरज महाराज ठंड और कोहरे को मात न दे पा रहे तो हम किस खेत की मूली है। उत्तर भारत से लेकर अमेरिका तक ठंड अकेली सबका बैंड बजा रही है।

यहां अपनी घर बैठे कुल्फी जमी पड़ी है फिर उनका जेल में क्या हाल होगा। इस उमर में इतना सितम, ठीक नहीं। सोचने वाली बात है, इतनी उग्र ठंड में बंदा खुद को संभालेगा या तबला बजाएगा? तबला लय में ही बजे इसकी कोई गारंटी नहीं।

वक़्त का तकाजा तो यही कहता है कि तबले-सबले पर खाक डालिए, ठंड के प्रकोप से खुद को बचाने की फिक्र कीजिए। खुद सलामत हैं तो देर-सवेर तबला भी बज ही जाएगा।

यहां तो अपनी उंगलियां की-पैड पर चलते जमने-सी लगीं हैं। मैं इन्हें अतिरिक्त कष्ट दे रहा हूं। मुझे इनकी फिक्र करनी चाहिए। तबला अभी नहीं तो फिर कभी बजाना सीख लूंगा। अभी तो फिलहाल ठंड से बचना मेरी प्राथमिकता में है। ये जाए तो कुछ सुकून मिले।

'बिजी' रहने और 'टाइम' न मिलने के बीच फंसे हम

जब कोई मुझसे मिलकर यह कहता है- 'यार, मैं बड़ा बिजी हूं।' फिर उससे दूसरा कोई प्रश्न करता ही नहीं। क्योंकि दूसरे प्रश्न का जवाब उसके पास यही होगा- 'टाइम नहीं है।'

'बिजी' और 'टाइम' ये दो जुमले हमारी ज़बान पर इस कदर चढ़ लिए हैं, कभी-कभी तो मुझे लगता है, आगे चलकर सरकार इन्हें 'आधार' से लिंक करने का फरमान न जारी कर दे! आज के समाज में किसी परिवार का ऐसा कोई सदस्य नहीं होगा जो 'बिजी' न हो या जिसके पास 'टाइम' न हो।

आलम यह है, बंदा कुछ भी न करता हो, नितांत खाली बैठा हो तब भी कहता हुआ यही मिलेगा कि बिजी हूं। बिजी होने-रहने का चस्का हमें इस कदर लग चुका है, कभी तो मैं हैरान हो जाता हूं कि ये 24x7 बिजी रहने वाले महापुरुष नींद में कैसे 'फ्री' रह पाते होंगे?

जब से इंसान के हाथ में मोबाइल आया है, तब से बिजी रहने और टाइम न मिलने की अदावतें ज्यादा बढ़ गईं हैं। यह भी एक शाश्वत हकीकत है कि दुनिया में सबसे अधिक झूठ मोबाइल पर ही बोले जाते हैं। मोबाइल पर बोले जाने वाले प्रमुख झूठों में 'बिजी' और 'टाइम' ही हैं। मैंने तो संडास में मोबाइल लिए बैठे लोगों को भी 'बिजी' और 'टाइम' का बहाना मारते देखा है।

यों भी मोबाइल पर बोले जाने वाले सफेद झूठ संभवतः कम पकड़े जाते हैं।

हालांकि लोगबाग ऐसा कहते हैं कि अगला युद्ध 'पानी' के लिए लड़ा जाएगा मगर मुझे लगता है अगला युद्घ 'बिजी' और 'टाइम' जैसे शब्दों के लिए ही लड़ा जाएगा! दुनिया में जब सब बिजी और किसी के पास टाइम नहीं होगा तो अगला ऑप्शन युद्ध का ही बचता है।
धीरे-धीरे अब यह बात मुझे समझ आने लगी है कि क्यों लोग मुझसे कटे रहते हैं। क्योंकि जब भी कोई मुझे पूछता है- क्या कर रहे हो तो तुरंत बोल देता हूं- जी खाली हूं। फ्री हूं। जबकि मुझे ये न बोलकर हमेशा यही बोलना चाहिए- यार, बहुत बिजी हूं। सांस लेने तक का टाइम नहीं। तब लोग मुझसे ज्यादा खुश और जुड़े भी रहेंगे।

खाली और फ्री आदमी की समाज में कोई औकात नहीं।

मंगलवार, 16 जनवरी 2018

चम्मच खतरे में है!

बहरहाल, यह तो नहीं बता सकता कि लोकतंत्र कितना खतरे में है कितना नहीं। यह जजों और बुद्धिजीवियों के विमर्श का विषय है। हां, इतना जरूर बता सकता हूं कि लोकतंत्र में चम्मच खतरे में हैं! चम्मचों से चमचों का अस्तित्व खतरे में है। यह खतरा छोटा-मोटा नहीं, बहुत बड़ा है।

इतिहास में ऐसा पहली दफा हुआ है, जब सोशल मीडिया के माध्यम से चम्मच चोरी की घटना सामने आई। मुद्दा चूंकि एक बड़ी मुख्यमंत्री साहिबा ने उठाया था तो सामने आना ही था। वरना तो तमाम रूटीन चोरियों के साथ चम्मच चोरी की वारदात भी दबी की दबी रह जाती। जब हीरे-जवाहरात चोरी होने की घटनाएं कुछ समय बाद ठंडी पड़ लेती हैं, ये तो बेचारे चम्मच थे!

कोई माने या न माने मगर मैं तो चम्मच के चुर जाने को लोकतंत्र का सबसे दुखद पहलू मानता हूं। अरे, इससे क्या होता है कि चम्मच रसोई का आइटम है। इसकी जरूरत सिर्फ खाना खाने या परोसने के लिए पड़ती है। तरह-तरह के चम्मच प्लेट्स की शोभा बढ़ाते हैं। एक दिन की छोड़िए, बस एक टाइम ही बिना चम्मच खाना खाकर देखिए- अमां, दाल-चीनी के भाव मालूम पड़ जाएंगे।

खुदा-न-खास्ता चम्मच बिरादरी अगर हड़ताल कर दे तो रसोई में न खाना पकेगा न कोई खाएगा। भूखमरी की नौबत आ जाएगी। क्या समझे!

चम्मच मूलतः शांतिप्रिय होते हैं। न किसी से उलझते हैं न अपना दुख-दर्द किसी से बांटते। अपनी छोटी किंतु सुखद लाइफ में मस्त रहते हैं। पर इसका ये मतलब तो नहीं कि उन्हें शादियों या पार्टियों में चुरा लिया जाए। चोरी चले जाने की खबर तक थाने में दर्ज न करवाई जाए। वैसे तो हम बड़े ही जिम्मेदार नागरिक बने फिरते हैं। कार, कूलर, मग्गा, कुत्ता चुर जाए तो थाना छोड़ अखबारों तक में खबर देने से नहीं चूकते।
आसमान सर पर उठा लेते हैं। यहां चम्मच चोरी हो गए तो सब कानों में तेल डाले ऐसे बैठे हैं मानो कुछ हुआ ही न हो। वाकई, किसी ने सही कहा है धरती पर इंसान से ज्यादा मतलबी प्राणी कोई और नहीं।

अब तक एक भी बंदा निकलकर सामने नहीं आया है जिसने चम्मच चोरों के खिलाफ चोरी की रपट दर्ज कराई हो। सब मिलकर सोशल मीडिया पर चम्मचों पर चुटकुले बनाने में लगे हैं। विडंबना देखिए, इनमें वो लोग भी शामिल हैं जो चम्मचों की सहायता से आज किसी न किसी के चमचे बने मौज काट रहे हैं।

और एक मैं हूं जब से इस खबर का पता चला है, खुद को गहरे सदमे में फील कर रहा हूं। रात-दिन इसी चिंता में डूबा जा रहा हूं, चोरी गए चम्मच पता नहीं किस हालत में होंगे? उनके साथ कैसा बर्ताव बरता जा रहा होगा?

चम्मच का चोरी होना लोकतंत्र का लिए खतरे की घंटी है! देश में जब चम्मच ही सुरक्षित नहीं फिर आम आदमी की बिसात ही क्या? जजों और बुद्धिजीवियों को इस मसले को बहुत गंभीरता से लेना चाहिए। साथ ही, राजनीतिक दलों को इस मसले पर राजनीति कतई नहीं करनी चाहिए।

ध्यान रखें, चम्मच की हिफाजत में ही देश का लोकतंत्र और चमचे सुरक्षित हैं। मेरे विचार में इस मसले को यूएन तक लेके जाना चाहिए। नहीं क्या...!

सोमवार, 15 जनवरी 2018

आधार, फेसबुक और मियां की बेचैनी

मियां मेरे लंगोटिया यार हैं। मोहल्ले में ही रहते हैं। जीवन का अच्छा और बुरा समय हमने साथ बिताया है। दिल में छिपी जो बात अपनी बेगम से न कह पाते, मुझसे कह देते हैं। मैं इत्मीनान से सुन भी लेता हूं। जरूरत पड़ती है तो अपनी तरफ से राय टाइप भी दे देता हूं। हालांकि ऐसा सौ में पांच बार ही होगा।

कल ही की बात रही। मियां हाथ में किसी अंग्रेजी अखबार की प्रति थामे तेज हवा के झोंके की मानिंद घर में दाखिल हुए। पास पड़ी कुर्सी पर जोरदार तशरीफ रखी। अखबार में छपी एक खबर को मेरे सामने करते हुए बोले- 'क्या अब यही दिन देखना बाकी रह गया था? मतलब प्राइवेसी का कोई मोल ही नहीं रह जाएगा! आखिर ये सरकार चाहती क्या है?'

माजरा मेरी समझ में अब भी नहीं आया था कि क्यों मियां इतना भड़क रहे हैं? चूंकि अंग्रेजी में मेरा हाथ और दिमाग बचपन से ही तंग रहा है सो मियां से उक्त खबर के बाबत पूछा। इस भीषण सर्दी में भी चार घूंट ठंडे पानी से गला तर करने और थोड़ा शांत पड़ने के बाद मियां ने खुलासा किया कि 'सरकार अब फेसबुक को आधार से लिंक करने पर विचार कर रही है!'

'तो इसमें इतनी हैरानी और हत्थे से उखड़े वाली क्या बात है?' मैंने मियां से पूछा। 'वाह जी वाह बात क्यों नहीं है? आखिर निजता भी कोई चीज होती है कि नहीं! क्या जरूरत है सरकार या फेसबुक को हमारी निजता पर डाका डालनी की।' मियां ने खासा तैश में प्रतिकार किया।

'न न ऐसा कुछ नहीं है महाराज। बल्कि सरकार और फेसबुक तो हमारी निजता को इस प्लेटफॉर्म पर बचाने की जुगत में हैं। आधार के फेसबुक से लिंक होते ही इना, मीना, एंजल प्रिया, डॉली, बबली टाइप तमाम फर्जी एकाउंट्स पर रोक लग जाएगा। यहां सिर्फ वही टिका रहेगा जो जेनुइन है। समझे न।'

'समझना क्या है? मैं इस मनमानी को चलने न दूंगा। इस मसले को यूएन तक लेके जाऊंगा। सड़कों पर आंदोलन करूंगा। तानाशाही नहीं चलेगी..नहीं चलेगी..।' नारा बुलंद करते हुए मियां अपने घर को निक्कल लिए। मैंने उन्हें पुकारा भी मगर वे न पलटे।

एक बे-किताब लेखक होने की व्यथा-कथा

मैं केवल अपनी ही निगाह में लेखक हूं। अपने लेखक होने पर केवल मुझे ही गर्व है। लेकिन पत्नी मुझे लेखक नहीं मानती। गर्व करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। यों, गर्व तो उसे मेरी पत्नी होने पर भी नहीं है। फिर भी, कुछ रस्में समाज को बहलाए रखने की खातिर निभा ली जाती हैं।

बाकी कुछ सोच रहे हों या न सोच रहे हों आप यह तो जरूर सोच ही रहे होंगे कि पत्नी को खुद पर मेरी पत्नी होने का गर्व भला क्यों नहीं है? वैसे तो एक लोकतांत्रिक मुल्क में हर पति-पत्नी को एक-दूसरे पर गर्व करने न करने का व्यक्तिगत अधिकार है। किसी पर किसी की जोर-जबर्दस्ती नहीं। न गर्व करने-करवाने के लिए एक-दूसरे को कोई हड़का ही सकता है। अब पत्नियां पुराने जमाने जैसी नहीं रहीं। अपने पतियों पर अपना जोर उतना ही रखती हैं जितना लेखक अपने विचारों पर रखता है।
तो पति की बेहतरी इसी में है कि वो अपनी पत्नी के कहे पर रिएक्ट कतई न करे। बुझे मन से ही सही यह स्वीकार कर ले कि पत्नी जो कह रही है वो ही दुनिया का अंतिम किंतु शाश्वत सत्य है। यही वजह है कि मैं भी पत्नी के कहे-बोले को बिना ईफ एंड बट किए मान लेता हूं।

अच्छा तो अब बताता हूं कि पत्नी क्यों मुझे लेखक मनाने से इंकार और क्यों मुझ पर गर्व नहीं करती। हालांकि इस वजह का कोई बहुत बड़ा कारण नहीं। कारण केवल इतना-सा है कि इतने बरस लेखक होने के बाद भी अभी तक मेरी कोई किताब क्यों नहीं आई है? हम पति-पत्नी के मध्य बहस और आंशिक झगड़े का कारण सिर्फ किताब है।

पत्नी को लगता है कि किताब आ जाने पर ही लेखक के लेखन और चरित्र को पहचान मिलती है। तब ही वो लेखक होने की गिनती में गिना जाता है। इस बाबत मैंने कई दफा उसे शांति से बैठाकर समझाया कि लेखक की पहचान केवल किताब नहीं बल्कि उसके लेखन को पाठकों से मिला अपार प्यार है। जोकि मुझे सहर्ष हासिल भी है। लेकिन नहीं। उसके तईं न मेरा लेखन मायने रखता है न पाठकों का प्यार। उसे तो मतलब मेरी किताब से है बस।

दरअसल, उसे किताबों के प्रकाशन के पीछे की राजनीति तो मालूम नहीं। न कोई अहसास है लेखक-प्रकाशक के बीच बनी रहने वाली अनबन का। अरे, अपनी किताब ले आना कोई इतना आसान थोड़े न है, जितना वो समझती है। कितनी तरह के दंद-फंद करने-करवाने पड़ते हैं। प्रकाशक कोई इतना सीधा तो होता नहीं कि बिना 'कुछ लिए' वो किताब छाप देगा। अपनी जेब से पैसा देकर अपनी किताब छपवाने का मुझको कोई शौक नहीं।

मैं तो चलो छोटा-मोटा लेखक ठहरा। बड़े और वरिष्ठ किस्म के लेखकों के भी पसीने छूट जाते हैं अपनी किताब को निकलवाने में। आजकल के भीषण बाजारवाद के दौर में अपना माल (किताब) बेचना इतना आसान नहीं। लेखक को भी अपनी किताब की वैसी ही मार्केटिंग करनी पड़ती है जैसे सेल्समैन अपने प्रोडक्ट की करता है। चेतन भगत के अपनी किताब को प्रमोट करने के फंडे देखे हैं न।

पत्नी इतने से भी संतुष्ट नहीं। दो टूक कह देती है, जैसा वे लोग करते हैं तुम भी करो न। क्या हर्ज है। बन जाओ न अपनी किताब के सेल्समैन! क्या मार्केटिंग में एमबीए घुइयां छीलने के लिए किया था!

अरे, मेरी किताब न सही पर इतने अखबारों में निरंतर छप तो रहा हूं न। यह भी तो एक प्रकार का प्रकाशन और मेरे लेखन की पब्लिसिटी है। रोज लिखना इतना भी सरल नहीं होता प्रियवर।

यहां-वहां छपके और रोज लिखके तुम न कोई बहुत बड़ा तीर मार रहे हो न मुझ पर कोई अहसान ही कर रहे हो। लेखक हो क्या इतना भी न करोगे। रोज ठेला लगाने या रिक्शा चलाने वाला कभी कहता है कि मैं ये-ये करता हूं। अपने पेट की खातिर सब मेहनत करते हैं श्रीमानजी। तुम कोई अनोखे न हो। बताइये, ये तो पत्नी का जवाब होता है।
इस मुद्दे पर उससे ज्यादा बहसबाजी करो तो वही चिर-परिचित धमकी 'घर छोड़कर चली जाऊंगी'।

स्साला कभी-कभी तो बड़ी खुंदक आती है खुद पर कि काहे मैं लेखक बन गया! नेता या बिजनेसमैन होता तो सही था। तब कम से कम मेरे ऊपर चौबीस घंटे 'बे-किताब लेखक' होने का ताना तो नहीं मारा जा रहा होता। जिंदगी ठाठ से कटती। न पत्नी के नखरे उठाने को सौ दफा सोचना पड़ता।

खैर, ये सब तो ख्याली बातें हैं। बातों से पेट कहां भरता है पियारे।
अब तो इसी उधेड़बुन में उलझा हुआ हूं कि कैसे भी करके अपने ऊपर से 'बे-किताब लेखक' होने का कलंक मिटा सकूं। 10-12 न सही कम से कम अपनी एक किताब लाके तो पत्नी को दिखा ही दूँ।  किताब के बहाने हमारे बीच हर वक़्त रहने वाला गतिरोध कुछ तो दूर हो।

जानता हूं, मेरे लिए ये सब जुगाड़-तुगाड़ करना कठिन होगा। पर इसके अतिरिक्त कोई और चारा भी तो नहीं। एक किताब आ जाने से पत्नी की निगाह में 'बहुत अच्छा पति' तो नहीं हां 'कुछ अच्छा पति' होने का सम्मान तो पा ही जाऊंगा।

उम्मीद है, अगले पुस्तक मेला तक मेरे किताब भी होगी मार्केट में।

रविवार, 31 दिसंबर 2017

बदनामियां अच्छी हैं!

बदनामियां अब दाग जितनी ही अच्छी लगने लगी हैं! एक बार बदनाम हो लिए तो फिर जन्म-जिंदगी भर की ऐश ही ऐश। कहीं भी किसी को अपना परिचय देने की आवश्यकता नहीं। नाम के साथ जुड़ी बदनामी खुद परिचय बन जाती है। हालांकि एकाध दिन थोड़ा बुरा टाइप जरूर लगता है मगर जल्द ही आदत में आ जाता है।

कुछ बदनामखोर तो मैंने ऐसे भी देखे-सुने हैं जिनका नाम ज़बान पर आते ही अगला थर-थर कांपने लगता है। आगे-पीछे की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है। तब मीडिया भी पूरी दिलचस्पी के साथ बदनाम की कथित बदनामी को अपने तरीके से ग्लोरीफाई करता है। फिर बदनामियां पर्सनल न रहकर ग्लोबल हो जाती हैं। ग्लोबल होने में जो सुख है उसका तो आनंद ही कुछ और है। है न...!

एक वक्त था जब लोग किसी बदमान को अपने पास तो दूर उसकी छाया के करीब जाने से भी घबराते थे। बदनाम के दिखते ही उसके चरित्र पर किस्म-किस्म की लानतें भेजते थे। अपने गली-मोहल्ले में रहने तक नहीं देते थे। मगर अब ऐसा नहीं है! जमाने के बदलने के साथ-साथ लोगों ने अपनी सहनशक्ति को भी काफी स्ट्रांग कर लिया है। चाहे बदनाम हो या अपराधी उनकी हेल्थ पर अब कोई खास फर्क न पड़ता। सब अपने में ही व्यस्त और मस्त रहने लगे हैं। उनके पड़ोस में बदनाम रह रहा है या नाम वाला उन्हें नहीं खबर।

मैंने तो तमाम लोग ऐसे भी देखे-सुने हैं जो अपना काम निकलवाने के लिए बदनाम का दामन थामने में भी गुरेज नहीं करते। पूछो तो तर्क देते हैं, ईमानदार का हाथ पकड़ने से बेहतर है किसी ऊंचे बदनाम और बिंदास व्यक्ति का हाथ थामा जाए ताकि आड़े वक़्त में वो काम आ सके। चरित्र अब कोई बहुत बड़ा मसला नहीं रह गया है पियारे। देश-दुनिया में सभी बे-चरित्र मौज कर रहे हैं।

लुत्फ तो यह है कि लोग समाज से कहीं अधिक अब सोशल मीडिया पर बदनाम हो रहे हैं। और तो और सोशल मीडिया पर मिली बदनामी को फुल-टू एन्जॉय भी कर रहे हैं। 'आ बैल मुझे मार' वाली कहावत यहां पूरी तरह फिट बैठती है। और, जो सोशल मीडिया पर बदनाम नहीं है वो कतई हाशिए पर है।

सोशल मीडिया से मिली बदनामी के तमाम ऊंचे फायदे हैं। ये बदनामियां बहुत तेजी से ग्लोबलता को प्राप्त होती हैं। अमेरिका से लेकर चीन-जापान-युगांडा तक आपको नाम से कम बदनामियों से ही अधिक जाना जाता है। रात भर में बदनामियों की ख्याति इतनी बढ़ जाती है कि दूसरे लोग भी प्रेणना लेना शुरू कर देते हैं। इतिहास गवाह है, लोग नेकियों से कम अपितु बदनामियों से अधिक सीखते हैं।

खुद को बदनाम होने देने में फ़िल्म स्टारों का जबाव नहीं। जो फ़िल्म स्टार जितना बदनाम हो लेगा उसकी फ़िल्म भी उतनी ही चलनी है। ये प्रमोशन-फिरमोशन तो महज बहाना है असल मकसद तो खुद से जुड़ी बदनामी को मार्केट करना है। अभी हाल मार्सल को जिस प्रकार बदनाम किया गया, फ़िल्म सुपर हिट का रूतबा पा गई।

दूसरी तरफ, सोशल मीडिया पर कुछ भी कह-लिख या पहनकर बदनाम हो लो फिर ट्रोलर्स आगे की बदनामी का काम आसान कर ही देते हैं। फ़िल्म में एक दफा हिट का तड़का लगा नहीं कि सारी बदनामियां काफूर! तब न कोई पूछने वाला मिलेगा न कहने वाला कि क्यों और किस बात पर बदनाम हुए थे महाराज।

आज के जमाने में जिसने अपनी बदनामी को भुना लिया उसकी पौ बारह। बदनामी से हासिल हुए नाम से ही सफलता का रास्ता निकलता है। यही वजह है कि अब लोग अपनी बदनामियों पर शर्मसार नहीं बल्कि गौरवान्वित टाइप फील करते हैं।

मानना पड़ेगा, चरित्र निर्माण में बदनामियां ही सार्थक भूमिका निभा रही हैं। बाकी आदर्शवाद पर झड़े रहिए कलेक्टरगंज...!

ढोल-नगाड़े की सार्थकता

ढोल-नगाड़ों से मुझे बहशत-सी होती है। आस-पास बज रहे ढोल-नगाड़े की आवाज भी अगर कानों में पड़ जाए तो मैं घंटों घर से बाहर नहीं निकलता। ऐसा लगता है कि कोई बहुत दूर खड़ा होके मेरी बर्बादी का जश्न टाइप मना रहा है। आप यकीन नहीं करेंगे, इसी डर से मैंने अपनी शादी में ढोल-डीजे का झंझट ही नहीं रखा था। हालांकि काफी लोग मुझसे नाराज भी हुए लेकिन मैंने किसी की न सुनी।

अरे, शादी ही तो करने जा रहा था कोई माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने नहीं। कि, अपनी कथित विजय का जुलूस ढोल-नगाड़े बजाकर निकालूं। लोग ऐसा स्वीकार नहीं करते किंतु मेरी निगाह में शादी-बियाह एक ऐसा जुआ है कि दांव लग गया तो जीवन भर आनंद ही आनंद नहीं तो उम्रभर का कर्ज। तो फिर क्यों ढोल-नगाड़े बजवाकर अपनी जग-हंसाई करवाना!

कल को लोगों को कहने का मौका ही क्यों दो कि जनाब ने शादी तो बड़े ढोल-नगाड़े बजाकर की थी, पर चार दिन में ही चांद-तारे नजर आ गए। लोगों को कहने से आप रोक थोड़े न लोगे।

कई शादियों में तो मैंने यह तक देखा है कि घोड़ी पर बैठते ही घोड़ी बिदक ली। एकाध दफा तो घोड़ी ने दूल्हे को ही अपनी पीठ पर से नीचे धकेल दिया है। मतलब अपशकुन...! फिर भी लोग केस को नहीं समझते और बैंड-बाजा-बारात करवा ही देते हैं।

मुझे तो ढोल-नगाड़ों का बजना नेताओं की जीत पर समझ आता है। सही भी लगता है। धरती पर असली मेहनत तो नेता लोग ही करते हैं। बेचारे चुनावों में दिन-रात एक कर देते हैं। साम-दाम-दंड-भेद सब आजमा लेते हैं। तब कहीं जाकर उन्हें कुर्सी का सुख प्राप्त होता है।

हम समझते नहीं किंतु ये सब इतना सरल नहीं होता। चुनाव लड़ना और जीतना एक प्रकार से अपने जीवन को ही दांव पर लगाना होता है। ऐसे चुने हुए नेताओं की जीत पर ढोल-नगाड़े बजें तो उसकी बात ही कुछ और है। इससे ढोल-नगाड़े की सार्थकता का पता चलता है!

शादी की कथित खुशी और नेता की जीत में यही फर्क है कि शादी में बाजी बमुश्किल पलटती है जबकि राजनीति में बाजी को कभी भी कितनी बार पलटा जा सकता है।

खैर, मुझे क्या? मुझे तो ढोल-नगाड़े वैसे भी आतंकित करते हैं।