मंगलवार, 17 जुलाई 2018

स्मार्टफोन न खरीद पाने का दुख

यों तो ऊपर वाले का दिया मेरे पास सबकुछ है, बस स्मार्टफोन ही नहीं है। ऐसा नहीं है कि मैं स्मार्टफोन खरीद नहीं सकता। खरीद सकता हूं, लेकिन खरीदता इसलिए नहीं क्योंकि स्मार्टफोन मेरे लिए 'अशुभ' है!

पिछले दिनों शहर के एक ऊंचे ज्योतिष ने- मेरे ग्रहों के बर्ताव को देखते हुए- मुझे हिदायत दी कि मैं स्मार्टफोन न ही रखूं! यह मेरी सेहत और व्यवहार के वास्ते विकट अशुभ साबित हो सकता है! उन्होंने यह भी बताया- इसका असर मेरे जीवन पर तकरीबन दस साल तक बना रहेगा।

इस अशुभता से निजात पाने का जो उपाय उन्होंने बताया वो मेरे तईं कम से कम इस जीवन में तो कर पाना संभव नहीं। उपाय यह है कि हर हफ्ते शनिवार के दिन मुझे अपनी पत्नी से लड़ाई करनी होगी! पत्नी से लड़ लेने का मतलब आप समझते हैं न। अंधे कुएं में छलांग लगाने से क्या हासिल!

इसलिए चाहते हुए भी मैं स्मार्टफोन नहीं खरीद सकता।

बिन स्मार्टफोन के मेरी जेब और लाइफ तकरीबन खाली-खाली सी लगती है। इस दर्द को केवल मैं ही समझ सकता हूं। कई दफा दिल में उचंग उठती है कि ग्रहों की बंदिशों को धकिया कर अभी बाजार जाऊं और एक बढ़िया-सा स्मार्टफोन खरीद लूं। मगर नहीं खरीदता। कल को कहीं ग्रहों में ऊंच-नीच हो गई तो सारा दोष मेरे माथे ही मढ़ दिया जाएगा।

स्मार्टफोन का न होना मेरे लिए दुनिया के तमाम दुखों से कहीं बड़ा दुख है। कभी-कभी तो इस वहज से मैं ऑफिस और नाते-रिश्तेदारियों में होने वाले फंक्शन में भी नहीं जाता। क्या भरोसा कोई पूछ ही बैठे, आपके पास स्मार्टफोन नहीं है क्या? तब मेरे पास आसमान को ताकने के सिवाय कोई और रास्ता न होगा!

आप यकीन नहीं करेंगे, मेरे तो ऑफिस-बॉय के पास भी स्मार्टफोन है! अक्सर ही वो मुझे मेरे पास स्मार्टफोन न होने का अहसास कराता रहता है।

स्मार्टफोन पास होता है तो मन और जीवन में एक आत्मविश्वास-सा बना रहता है। दुनिया वालों पर एक ठसक सी कायम रहती है, सो अलग।

वाकई बड़े खुशनसीब हैं वे लोग जो स्मार्टफोन रखते हैं। सुना है, स्मार्टफोन रखने वालों के सितारे कभी गर्दिश में नहीं आते! जिसके पास स्मार्टफोन होता है, दुनिया उसे उसी तरह झुककर सलाम ठोकती है, जैसे पहले कभी मारुति-800 रखने वालों को ठोका करती थी।

समाज के बीच अपने स्टेटस को बनाए रखने के लिए इंसान क्या-क्या नहीं करता।

ग्रहों और ज्योतिष महाराज के मुताबिक अभी मुझे दस साल स्मार्टफोन के लिए इंतजार करना होगा। दस साल में दुनिया-समाज जाने कहां से कहां पहुंच जाएगा। यहां तो एक पल में ही टेक्नोलॉजी के भीतर-बाहर कितना कुछ बदल जाता है।

इस बात की भी क्या गारंटी है कि दस साल तक मैं इस धरती पर बना ही रहूं! लाइफ की कोई वेलिडिटी न होती प्यारे।

शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

जल्द ही मैं भी अपना लक पहनकर चल सकूंगा

मैं कई दिनों से इस कोशिश में लगा हूं कि अपना लक पहनकर चल सकूं। लेकिन लक है कि मेरे खांचे में ही नहीं आ पा रहा। जबकि लक की जरूरत के मुताबिक मैंने अपना आकार-प्रकार भी घटा लिया है। बात फिर भी बन नहीं पा रही।

बार-बार दिल में यही ख्याल आता है कि मेरा लक दूसरों के लक से भिन्न क्यों है? भाग्य (लक) जब सबका साथ देता है तो मेरा क्यों नहीं दे रहा?
आप यकीन नहीं करेंगे। अपने लक को मनाने की खातिर मैंने 14 बुधवार के व्रत और 5 शनिवार की पूजा तक निपटा डाली है। अपनी नास्तिकता की प्रवृत्ति को आस्तिकता में तब्दील कर लिया है। मेरे भीतर इस धार्मिक परिवर्तन को देख घर वाले भी खासे आश्चर्यचकित हैं। सब कह रहे हैं कि ये मुझे हुआ क्या है? हालांकि मैं किसी के कहने-सुनने पर ध्यान नहीं देता। मुझे जो करना होता है, करता हूं।

आसपास के लोगों को जब मैं उनके पहने हुए लक के साथ चलता देखता हूं तो मन में भीषण ग्लानि-सी पैदा होती है। अपने-अपने लक के साथ लोग बड़े ही खुश नजर आते हैं। उनका जीवन मुझे अपने से ज्यादा सरल दिखाई देता है। आज लक का दिया उनके पास सबकुछ है। मेरे पास क्या है? ले देके एक उम्मीद। अब उम्मीद पर भी दुनिया या लक कहां कायम है! समय साथ सब बदल चुका है।

बताते हैं, मेरे लक में बचपन से ही खटाई पड़ी हुई है। जब मैं हुआ था, तब हस्पताल में बाढ़ आ गई थी! सूरज का रंग पीले से सिलेटी पड़ गया था! हवा उल्टी दिशा में बहने लगी थी! तब मुझसे अधिक मेरे लक (भाग्य) को कोसा गया था। यहां तक की डॉक्टर साहिब ने भी कह दिया था कि ये बच्चा बड़ा होकर बेहद अन-लक्की लेखक साबित होगा। देखिए, सबूत सामने है।

अपना लक अपने खिलाफ भी हो सकता है, यह मैंने खुद पर पड़ी तब जाना।

ऐसा भी नहीं है कि मेरी मेरे लक से बहुत बड़ी-बड़ी ख्वाहिशें हों। मुझे तो सिंपल उसे पहनकर चलना है। दुनिया को बताना है कि मैं भी अपना लक पहनकर चलने की हैसियत रखता हूं। उस पर भी मेरे साथ इतना भेदभाव। यह तो ठीक नहीं है।

अरे, लोग तो जाने क्या-क्या पहनकर चलते हैं। उसमें भी जाने कितना चोरी और उधार का शामिल होता है। मगर उनका लक तो उनसे खफा नहीं होता। तो मेरे लक को मुझसे ही क्या प्रॉब्लम है?

मेरा लक कहीं मतलबी तो नहीं हो गया है? हालांकि यह मेरी महज खामख्याली है। पर कभी-कभी न चाहते हुए भी अपने लक पर शक करना पड़ता है। शक करना तो वैसे भी मानव-प्रवृत्ति है। जाने कितने ही घर शक की आग में भस्म हो गए। फिर भी, मनुष्य ने शक पर विश्वास रखना बंद नहीं किया। तो मैं कौन-सा नया काम कर रहा हूं? किसी और के नहीं खुद के लक पर ही तो शक कर रहा हूं। हो सकता है, इसी से मुझे मानसिक शांति मिल जाए।

जो भी हो लेकिन मुझे इस बात का भी पक्का यकीन है कि एक दिन मैं अपने लक को खुद के फेवर में पटा ही लूंगा। औरों की तरह मैं भी अपना लक पहनकर चल सकूंगा। तब मुझे खुद पर शर्म भी नहीं आएगी।

फिलहाल, इस करिश्मे के इंतजार में हूं।

सोमवार, 9 जुलाई 2018

मेरे मरने के बाद...

जीते-जी इस बात का पता लगाना बेहद मुश्किल है कि ये दुनिया, समाज और नाते-रिश्तेदार आपके बारे में क्या और कैसा सोचते हैं। ये सब जानने के लिए आपको मरना पड़ेगा। क्योंकि इंसान की सामाजिक औकात का पता उसके मरने के बाद ही लगता है।

तो, एक दिन मैंने भी यही सोचा क्यों न मर ही लिया जाए। यों भी, जिंदा रहकर मैं कौन-सा अपने चमन को गुलजार कर रहा हूं। मरूंगा तो कम से कम चार लोग मेरी खैर-खबर तो लेंगे। मेरे बारे में दो बातें बुरी तो पांच अच्छी भी बोलेंगे। यमराज की भी एक दिन की दिहाड़ी पक्की हो जाएगी।

मौका पाते ही एक रोज मैंने अपने मरने की खबर वाइरल करवा दी। खबर एक घर से दूसरे घर कम, फेसबुक-व्हाट्सएप पर अधिक दौड़ी। जिसने सुना लगभग हिल-सा गया। अभी उम्र ही क्या थी...के जुमले फिजाओं में तैरने लगे। मेरे जाने को व्यंग्य लेखन का बहुत बड़ा नुकसान बताया गया। फेसबुक पर मेरे लिखे व्यंग्य टांगे जाने लगे। मुझ पर पोस्टें भी लिखी गईं। व्हाट्सएप पर मुझे धीर-गंभीर टाइप श्रद्धांजलि भी दी गई।

ये सब तो खैर सोशल मीडिया पर चलता रहा। आदमी का चरित्र सोशल मीडिया पर कुछ और जमीन पर कुछ और ही होता है।

जमीन पर मेरे खर्च होने की जमीनी हकीकत यह रही कि सब अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त रहे। मेरे मरने की खबर को 'आम खबर' की तरह ही लिया गया। दो-चार लेखक लोग मेरे घर मुझे 'अंतिम सलाम' कहने पहुंचे। दो-चार मिनट मेरे सिरहाने भी बैठे। एक ने तो आपसी खुसर-पुसर में यहां तक कह डाला- 'अच्छा ही हुआ जो महाराज निपट लिए। अखबार में कम से कम एक जगह, एक दिन तो खाली हुआ। वरना, तो जब तक रहा अखबार के कॉलम पर अपना हक जमाए रहा।'

दूसरे ने पहले वाले कि हां में हां मिलाते हुए कहा- 'ठीक फरमाया यार। व्यंग्य की बहुत बड़ी चिरांद था ये। खुद को शौकत थानवी और लतीफ घोंगी से कम नहीं समझता था। जबकि आता-जाता इसे व्यंग्य का 'व' तक नहीं था।' व्यंग्य लेखन पर बोझ थे मियां। तीसरे ने नुक्ता जोड़ा।

मैं अपने भूतपूर्व साथी लेखकों की अपने बारे में जाहिर की जा रही राय को सुन मन ही मन खुश हो रहा था। खुद को दुआएं भी दे रहा था कि अच्छा हुआ मुझे मेरी लेखकीय औकात का अहसास करवा दिया साथी लोगों ने। वरना तो मैं अपने को जाने क्या माने बैठा था।

मरने के बाद अमूमन आदमी को अपनी तारीफें ही सुनने को मिलती हैं मगर मैं लक्की रहा कि मुझे अपनी बुराइयां सुनने को मिलीं। बुरा बनकर रहने में भी सुख है। पर ये सुख हर किसी के नसीब में नहीं आ पाता।
एक बात मुझे और भी पसंद आई कि मेरे जाने के बाद न अखबारों में मेरे ऊपर कोई लेख ही आए न पत्रिकाओं ने मुझ पर केंद्रित अंक ही निकाले। अगर आ जाते तो ऊपर वाले को अपने लेखकीय चरित्र का स्पष्टीकरण देना मेरे तईं बड़ा कठिन पड़ता।

वैसे, बतौर लेखक मरने में हजार झंझट हैं। लोगबाग लेखक को बुद्धिजीवि समझ सेंटी टाइप हो जाते हैं। जबकि हकीकत यह है कि लेखक बुद्धिजीवि नहीं होता। सिर्फ अपनी बुद्धि की कमाई खाता है।

अगर आप भी लेखक हैं तो एक दफा मरकर जरूर देखिए। लोगों के भीतर छिपे, आपके बारे में, सारे सच पता चल जाएंगे।

मंगलवार, 3 जुलाई 2018

देख लेना, गिरकर फिर उठेगा रुपया

गिरना एक स्वभाविक प्रक्रिया है। कुछ मैदान-ए-जंग में गिरते हैं तो कुछ मैदान-ए-बाजार में। गिरकर जो उठ या संभल नहीं पाते, दुनिया उन्हें बहुत जल्द भूला देती है। जैसे- शेयर बाजार के जाने कितने ही शेयर। आज उन शेयरों का अता-पता तक नहीं। एक बार गिरे तो कभी उठ ही न सके।

यह भी उतना ही सत्य है कि गिरने वाले की हंसी अवश्य बनाई जाती है। उस पर हंसकर उसे इस बात का एहसास कराया जाता है कि तूने गिरकर कितना बड़ा 'अनर्थ' कर डाला। फिर भी, होते है कुछ ऐसे लोग जो अपने गिरने का जबाव खीझकर नहीं बल्कि खुद को साबित कर देते हैं। जैसे- खेल के मैदान पर इस बात को जाने कितनी ही दफा सचिन तेंदुलकर और महेंद्र सिंह धोनी ने सिद्ध भी किया है।

हाल-फिलहाल तो गिरावट का संकट रुपए पर आन पड़ा है। रुपया गिरकर 69 पर अटक गया है। डॉलर ने रुपए को भरे बाजार पटखनी दे डाली है। गिरे रुपए का मजाक बनाया जा रहा है। कोई सोशल मीडिया पर चुटकले खींच रहा है तो कोई बाजार में बत्तीसी फाड़ रहा है। मंदड़िये रुपए के फिसलने पर खुश हैं तो तेजड़िये दुखी।

मगर रुपया स्थिर है। वो अपनी हंसी बनाने का बुरा नहीं मान रहा। उसे मालूम है कि यह गिरावट आंशिक है। गिरकर वो फिर से उठेगा। डॉलर को ईंट का जबाव पत्थर से देगा।

इससे पहले भी तो जाने कितनी दफा रुपया गिरा है। किसी ने संभाला नहीं, खुद ही संभला है। रुपया बहुत समझदार है। उसे अच्छे से मालूम है कि देश की अर्थव्यवस्था का दारोमदार उसके कंधों पर टिका है। वो गिरा-पड़ा रहेगा तो आर्थिक ढांचा ही गड़बड़ा जाएगा।

रही बात उसके लुढ़कने पर हंसने वालों की तो ये वही लोग हैं जो अपनी हंसी हंसते और दूसरे की हंसी पर रोते हैं। इनकी फिक्र रुपया नहीं करता।

रुपए को मैं अपनी प्रेरणा मानता हूं। उसके गिरकर उठने के जज्बे को सलाम करता हूं। ऐसा साहस बहुत कम लोगों में होता है। अपने इसी साहस के दम पर ही तो रुपया बाजार में अब तलक टिका हुआ है।

रुपया बरेली के बाजार में गिरा झुमका थोड़े है कि उठे ही न।

सोमवार, 2 जुलाई 2018

बुरा मानने वाले

ऐसे लोग मुझे बेहद पसंद हैं, जो बुरा मानते हैं। या कहूं, धरती पर जन्म ही उन्होंने बुरा मानने के लिए लिया होता है। वे इसी खुशफहमी में डूबे रहते हैं कि यह दुनिया टिकी ही उनकी बुरा मानने की आदत पर है। वे अगर बुरा नहीं मानेंगे तो विश्वभर की तमाम बुरी आत्माओं का भविष्य खतरे में आ जाएगा।

उनके बुरा मानने का कोई विषय या मुद्दा निर्धारित नहीं होता। किसी भी बात का बुरा मान सकते हैं। यों भी, बुरा मानने या जुबान चलाने में कभी एक नया पैसा खर्च नहीं करना होता।

बुरा मानने का तो ये है कि आप नल में पानी न आने से लेकर पक्षी के सिर पर हग देने तक का बुरा मान सकते हैं। हालांकि इन दोनों घटनाओं के घटने पर जोर किसी का भी नहीं है, तो क्या, उनको तो बुरा मानने से मतलब। कई बुरा मानने वाले मैंने तो ऐसे भी देखे हैं, जो अक्सर अपने जन्म लेने को ही बुरा मानते हैं। कहते हैं, जन्म लेकर जीवन की बहुत बड़ी गलती कर दी।

उन्हें समझाना बेकार है क्योंकि बुरा मानने को वे अपना लोकतांत्रिक हक मानते हैं।

सुन या देखकर ऐसा लगता जरूर है कि बुरा मानना बेहद सरल विधा है। किंतु ऐसा है नहीं। हर बात पर बुरा मानने के लिए आपको दिल से ज्यादा दिमाग को मजबूत करना होता है। काम सिर्फ बुरा मानने से ही नहीं चल जाता। डिपेंड यह करता है कि आप किस बात का कितनी देर या कितने लंबे समय तक बुरा मानते हैं। कुछ क्षणिक भर को बुरा मानते हैं तो कुछ जन्म-जिंदगी भर बुरा माने रहते हैं। बुरा माने रहने में धैर्य बहुत बड़ी भूमिका निभाता है।

निजी और सामाजिक जीवन में जब से सोशल मीडिया का असर बढ़ा है, लोगों की बुरा मानने की आदत में भी खासा इजाफा हुआ है। जहां तक मेरा अंदाजा कहता है, सोशल मीडिया पर तकरीबन अस्सी प्रतिशत लोग किसी न किसी बात पर बुरा मान ही जाते हैं। कभी-कभी तो मामला कोर्ट-कचहरी तक भी खींच जाता है।

बर्दाश्त करना क्या होता है, इस पर तो सोशल मीडिया पर बुरा मानने वाले वीर विचार करना ही पसंद नहीं करते। मानो- जब तक वे किसी बात का बुरा नहीं मान जाएंगे, उनका खाना हजम नहीं होगा।

गाहे-बगाहे मैं भी कोशिश करता रहता हूं बुरा मानने की लेकिन अभी वो बात मुझमें नहीं आ पाई है। मगर लगा हुआ हूं। एक दिन मैं भी बुरा मानने का हुनर सीख ही लूंगा। किसी और लाइन में भले ही नाम न कर पाऊं, बुरा मानने में तो कर ही लूंगा।

अच्छे और भले लगते हैं मुझे वे लोग जो अपने बुरा मानने को दिल में नहीं रखते। बाहर निकाल देते हैं। जमाना ही कुछ ऐसा हो चला है, जो जितना बुरा मानेगा, वो उतना ही बड़ा साहसी कहलाएगा।

शुक्रवार, 29 जून 2018

पाप का घड़ा

इन दिनों मेरे साथ कुछ भी ठीक नहीं हो रहा। कभी बनता काम बिगड़ जाता है, तो कभी सड़क चलते कोई भी लड़ लेता है। चार रोज हुए, उल्टे पैर की कन्नी उंगली में ऐसी चोट लगी कि दिन में चांद-सितारे नजर आने लगे। जैसे-तैसे उससे करार पाया तो अभी कोई फुटबॉल चुरा ले भागा। कल जेब से पांचों का नोट गिरकर जाने किस का भला कर गया।
आलम यह है कि अब तो खुद की शक्ल आईने में देखने से घबराने लगा हूं, क्या पता, आईना ही कहीं टेढ़ा-मेढ़ा न हो जाए!

शहर के सबसे समझदार ज्योतिष को अपना हाथ दिखाया तो उन्होंने मेरे ग्रहों का चाल-चलन दुरुस्त न बताकर दो हजार रुपए सीधे कर लिए। साथ में एक उपाय और बता दिया कि रोज आधी रात के बाद गधे की पूंछ के चार बाल तोड़कर शमशान की मिट्टी में गाड़ दूं। लेकिन इस बात का खास ख्याल रखूं कि गधा हर बार अलग होना चाहिए।

अब मेरा कोई गधों का कारोबार तो है नहीं कि हर रोज एक नया गधा मिल जाएगा। यों भी, शहर में हर रोज एक नए गधे को ढूंढना, सड़क पर गड्ढे ढूंढने से भी ज्यादा कठिन काम है। शहरी गधे देहाती गधों के मुकाबले यों भी सयाने होते हैं।

अतः ज्योतिष महाराज के उपाय से अपना पिंड छुड़ाया।

बहुत सोचने पर मैंने पाया कि ये सब मेरे 'ग्रह-दोष' के कारण न होकर मेरे 'पाप का घड़ा' भरने की वहज से है। मतलब- मेरे पापों का घड़ा भर चुका है। जब पाप का घड़ा ओवरफ्लो होने लगता है तब जीवन में ऐसी खतरनाक किस्म की घटनाएं होने लगती हैं।

यह बात अलहदा है कि किसी के पाप का घड़ा देर से भरता है तो किसी का जल्दी। लेकिन भरता अवश्य है, यह तय है।

मगर मैं मेरे पापों का घड़ा भरने से परेशान कतई नहीं हूं। बल्कि खुश ही हूं कि चलो, पाप का घड़ा मेरी उम्र के चालीसवें बसंत में ही भर गया। वरना तो लोगों के पापों का घड़ा अस्सी-नब्बे साल की उम्र तक भी न भर पाता। यह ऊपर वाले की मुझ पर अतिरिक्त कृपा रही। मैं उसका ऋणी हूं।

समय रहते जो काम निपट जाए उसी में भलाई है। मैं भी कब और कहां तक अपने पाप का घड़ा यहां-वहां लिए-लिए घूमता।

अब जबकि मेरे पाप का घड़ा भर ही चुका है, तो मैंने हर किसी से डरना भी छोड़ दिया है। यहां तक की बीवी से भी। पहले तो अनजाने डर के कारण से उसे मैं जबाव भी नहीं दे पाता था, मगर अब तुरंत दे देता हूं। ऑफिस में बॉस को भी जब मौका पड़ता है, खरी-खोटी सुना डालता हूं। मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाते। बस मन मसोस कर रह जाते हैं।

ऐसा लोगों का भरम है कि पाप का घड़ा भरना बुराई का प्रतीक है। जबकि ऐसा कुछ नहीं है। पाप का घड़ा भरते ही बंदा एकदम निडर टाइप हो लेता है। बिल्कुल मेरी तरह।

कम उम्र में पाप का घड़ा भर जाने का सबसे बड़ा फायदा यही मिलता है कि ज्यादा बड़े घड़े की जुगाड़ नहीं करनी पड़ती। छोटे घड़े से ही काम चल जाता है।

इतने ज्यादा पापों से भी क्या हासिल कि अतिरिक्त घड़े की व्यवस्था करनी पड़े। कम पाप, छोटा घड़ा।

पहले के मुकाबले आज के समय का इंसान ज्यादा समझदार है। वक्त से पहले ही अपने पापों का घड़ा भर जीवन से मुक्ति पा लेता है। किया भी क्या जाए; अब पाप ही इतने तरह के होने लगे हैं। पाप भी ऐसे-ऐसे की दांतों तले उंगली दबा ले।

बहरहाल, जिनके पापों का घड़ा जल्दी भर गया है, वे मेरी तरह जश्न मना सकते हैं। बाकी अपने घड़ों के भरने का इंतजार करें।

गुरुवार, 28 जून 2018

सपनों का न आना

मुझे सपने नहीं आ रहे। सपनों के न आने से मैं खासा परेशान हूं। पूरा दिन इसी सोच-विचार में निकल जाता है कि आखिर क्या कारण है, जो सपनों ने मुझसे किनारा कर लिया है।

सपने न आने की समस्या जब भी पत्नी या यार-दोस्तों के समक्ष रखता हूं तो यह कहकर मुझे टाल देते हैं कि 'अच्छा है जो तुम्हें सपने नहीं आ रहे। आजकल के वक्त में सपनों का न आना ही बेहतर।' मगर उन्हें मैं यह कैसे समझाऊं कि सपनों का न आना मेरे लिए सही नहीं है। सपनों से मुझे उतना ही प्यार है, जितना एक मां को अपने बच्चों से होता है।

सपने मेरे जीवन का आईना हैं। इस आईने में मैं वो सबकुछ देख पाता हूं, जो मुझे हकीकत में कहीं नजर नहीं आता। मुझे अपने पागलखाने में होने का अहसास सपने में ही तो हुआ था। मैं तमाम पागलों के बीच उनसे जिंदगी के असली मायने समझ-जान रहा था। उनसे बात करके कभी लगा ही नहीं कि वे पागल हैं। बल्कि मुझे तो यह दुनिया, यह समाज उनसे कहीं अधिक पागल नजर आया। मंटो में भी तो इस दुनिया को पागलखाना कहा था।

लोगों और दुनिया के पागल होने के प्रति मेरी धारण इससे भी और मजबूत होती है, जब वे यह कहते हैं कि इंसान को सपने आना उसके पागलपन की निशानी है। उन्हें क्या मालूम इस पागलपन में कितना सुकून है। वो इंसान ही क्या जिसे सपने नहीं आते।

या, कहीं ऐसा तो नहीं मुझे सपने मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल करने के कारण न आते हों? कहीं मोबाइल और सपने के बीच छत्तीस का आंकड़ा तो नहीं? मोबाइल से निकलने वाली खतरनाक तरंगें ही मेरे सपनों को दिमाग में आने से रोके रखती हों? मोबाइल पर मेरी जब से निर्भरता अधिक बढ़ी है, तब से एक सपनों ने ही नहीं बच्चों ने भी मेरे करीब आना छोड़ दिया है। जब तब वो तपाक से मुझसे कहा देते हैं कि पापा आपके पास क्या आएं, आप तो दिनभर मोबाइल में ही व्यस्त रहते हो!

तो क्या मोबाइल ही मेरे सपनों को काट रहा है! सम्भवता यही वजह हो सकती है मुझे सपने न आने की। सपनों को भी एक स्पेस चाहिए होता है, हमसे रू-ब-रू होने के लिए। मगर हमने तो उस खाली जगह में मोबाइल को कब्जा दे दिया है। फिर भला कैसे आएंगे सपने मुझे।
लेकिन मैं सपने चाहता हूं। इसके लिए चाहे मुझे मोबाइल को ही अपनी जिंदगी से रुखसत क्यों न करना पड़े। सपने नहीं आएंगे तो जिंदगी में उमंग कहां रह जाएगी। बिन सपनों के जिंदगी बड़ी बे-नूर होती है जनाब।

इसका मतलब और लोग भी मेरी तरह सपने न आने की समस्या से जूझ रहे होंगे न? कितना अन्याय कर रहे हैं हम अपने सपनों के साथ।