गुरुवार, 2 मई 2019

स्क्रीन-शॉट

खबर गर्म है कि व्हाट्सएप्प ने ‘स्क्रीन-शॉट’ लेने पर पाबंदी लगा दी है। अब कोई किसी की भी नितांत ‘निजी चैट’ का स्क्रीन-शॉट नहीं ले पाएगा। बाकी किसी के लिए हो या न हो किंतु मेरे लिए यह पाबंदी ‘वरदान’ से कम नहीं। घर में जब कभी मोबाइल छूट जाता था, यही खतरा बना रहता था कि कहीं बीवी मेरा व्हाट्सएप्प खोलकर चैट न पढ़ ले। हालांकि उस चैट में ‘इश्क-फ़्लर्ट या गंदी बात’ जैसा कोई मसला नहीं होता था लेकिन फिर भी बीवी तो बीवी है। कब किस बात को पकड़ पूछताछ कर बैठे, यह तो आज तक ईश्वर भी नहीं जान पाया है।

एक व्हाट्सएप्प ही नहीं, सोशल मीडिया पर स्क्रीन-शॉट के मसले तगड़े हैं। जाने कितने हंसते-खेलते रिश्ते इसकी जद में आकर टूट चुके हैं। कितने ही प्रेमियों ने अपनी प्रेमिकाओं और कितने ही पतियों ने अपनी पत्नियों के आगे कथित स्क्रीन-शॉट्स पर सफाइयां पेश की हैं।

कहना न होगा, स्क्रीन-शॉट्स एक तरह से धमकाने का औजार बन चुके हैं। किसी की किसी से किसी मुद्दे पर ठन जाए फिर देखिए वो उसकी चैट्स के ऐसे-ऐसे नमूने (स्क्रीन-शॉट) पेश करता है, अगले के पैरों तले जमीन ही खिसकने लगती है।

सिर्फ इसी वजह से मैंने सोशल मीडिया पर पराई औरतों से बातचीत करना बंद कर रखा है। न उनकी ‘हाय’ का जवाब देता हूं न ‘बाये’ का। एकदम नूट्रल बना रहता हूं, जैसे मुझे कुछ पता ही नहीं। सही भी है न, इस बवाले-जान से जितना दूर रहो, उतना ही अच्छा।

हालांकि मुझे बदनामियों का डर नहीं पर जब तक बचा रहूं, अच्छा है।

मैंने देखा है, दुनियाभर की प्रेम-कहानियां व्हाट्सएप्प पर ही चला रही हैं। किसी जमाने में प्यार का पहला खत फिजिकल मोड में लिखा जाता था, अब डिजिटल मोड में लिखा जा रहा है। यह खोज का विषय बना सकता है कि अब तक कितनी तरह के डिजिटल प्रेम-पत्र व्हाट्सएप्प पर लिखे जा चुके हैं।

कई दफा मन मेरा भी करता है कि मैं भी व्हाट्सएप्प पर अपनी प्रेम कहानी चलाऊं। लेकिन फिर बीवी का ख्याल आते ही कदम वापस खींच लेता हूं। शादी-शुदा मर्द की यही तो सबसे बड़ी समस्या कि वो प्रेम तक अपनी मर्जी का नहीं कर सकता।

हो सकता है, व्हाट्सएप्प ने स्क्रीन-शॉट को बंद करने का फैसला हम शादी-शुदा मर्दों की इज्जत को संज्ञान में लेते हुए ही लिया हो। मेरे विचार में तो स्मार्टफोन से स्क्रीन-शॉट लेने का फीचर ही खत्म कर देना चाहिए। न रहेगा सांप न टूटेगी लाठी।

चैट-बॉक्स की स्थिति भी लगभग स्क्रीन-शॉट जैसी ही है। वहां भी किसी से ऐसी-वैसी बात क्या कर लो, अगला झट से स्क्रीन-शॉट पेल देता है। लोग भी अजीब हैं सही चीज का गलत इस्तेमाल खूब कर लेते हैं।

लेकिन कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें जो करना है वो करते हैं। उनकी सेहत पर स्क्रीन-शॉट लेने या न लेने से खास फर्क नहीं पड़ता। उनकी अपनी अलग ही दुनिया होती है, जिसमें वे खुश और मस्त रहते हैं।

सही भी है न इन छोटी-छोटी बातों और मसलों में अगर उलझे रहेंगे तो जी ली जिंदगी। दरअसल, स्क्रीन-शॉट तो बहाना है असली मकसद तो दिल का गुबार निकालना है।

मंगलवार, 30 अप्रैल 2019

बीवी का मजदूर

बतौर शौहर मैं अपनी बीवी का ‘मजदूर’ हूं। मुस्कुराई मत, आप भी हैं। भले ही कम या ज्यादा हों।

लेकिन मुझे बीवी का मजदूर होने में कतई ‘शर्म’ महसूस नहीं होती। बल्कि ‘गर्व’ होता है कि यह जिम्मेदारी मेरे हिस्से आई। मजदूर होना ‘गुलाम’ होने से कहीं बेहतर है।

एक बीवी के ही नहीं, जिंदगी में हम किसी न किसी मजदूर ही हैं। कोई कंपनी का मजदूर है, कोई जनता का मजदूर है, कोई व्यवस्था का मजदूर है, कोई राजनीति का मजदूर है, कोई वोट का मजदूर है, कोई पैसे का मजदूर है तो कोई इश्क का मजदूर है।

लेकिन मैं इस बात से बिल्कुल भी सहमत नहीं कि हम मजबूरी के नाते मजदूर हैं। मजबूरी का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। मजबूरी कैसी? मजदूर हैं तो हैं।

यों भी, मजदूर होना इतना बुरा नहीं जितना लोग मानते-समझते हैं। दुनिया में अगर मजदूर न हों तो यह एक पल भी विकास के पथ पर आगे बढ़ ही न पाए। मजदूर उद्योग से लेकर समाज तक की बुनियाद हैं।

आप समझ नहीं सकते उस वक़्त कितनी खुशी जब मिलती है, जब बीवी मुझे अपना कोई काम करने को कहती है। उसके कपड़े धोने से लेकर स्कूटी स्टार्ट करने तक सारे काम मैं ही करता हूं। सही भी है न कम से कम इस बहाने मुझे खाली खटिया तोड़ने और यहां-वहां बकलोली करने से मुक्ति तो मिल जाती है। समय का सद्पयोग हो जाता है सो अलग।

दो जन जब घर में हैं वही जब एक-दूसरे का काम नहीं करेंगे तो पड़ोसी तो आकर कर नहीं देंगे। एकल परिवार होने के कुछ नुकसान हैं तो कुछ फायदे भी हैं। मगर इस पर फिर कभी बात करेंगे।

कहना न होगा शौहर अपनी बीवी का मजदूर उसी दिन बन जाता है, जब वो उसके संग सात फेरे लेता है। हालांकि यह बात कभी कोई पंडित नहीं कहे-बताएगा किंतु अंतिम सच यही है।

मैंने ऐसे भी कई शौहर देखे हैं, जिन्हें अपनी बीवी का मजदूर बनने में बड़ी शर्म आती है। वो चाहते हैं, उनकी बीवी उनकी मजदूर बनके रहे। ऐसा भला कैसे संभव है? बीवी का बीवी होना ही शौहर के लिए बहुत है। वो उसकी मजदूर हो ही नहीं सकती। आखिर नारी स्वंतन्त्रता भी तो कोई चीज है।

यह बात अच्छी है कि बीवी ने कभी मुझे अपना मजदूर होने नहीं दिया। हर दफा मना ही किया। मगर मैं उसकी यही बात नहीं मानता बस। मुझे उसका मजदूर बनकर रहने में आनंद आता है, तो आता है। आप चाहें तो मुझे कुछ भी कहते रहिए, मेरी सेहत पर फर्क न पड़ना।

मैं, बतौर बीवी का मजदूर, दुनिया भर के शौहरों से आह्वाहन करता हूं कि वे अपनी बीवियों के मजदूर बनें ताकि मजदूर का सिर गर्व से हमेशा ऊंचा रहे।

बनना नेता था, बन लेखक गया

मैं जब भी आईने में खुद को बतौर लेखक देखता हूं, तो मुझे घोर निराशा होती है। अपने चेहरे-मोहरे में कोई बदलाव नजर ही नहीं आता। वही मासूमियत, वही सच्चाई, वही आदर्शवाद झलकता मिलता है। जबकि इतना नफासत, नजाकत वाला जीवन मुझे कतई पसंद नहीं। मन में और चेहरे पर जब तलक 'कइयापन' न हो तो क्या फायदा! आजकल तो इंसान के शैतान होने का रास्ता 'शातिराना हरकतों' के दरमियान से ही निकलता है। यों तो शातिर लेखक भी खूब होते हैं किंतु अभी ये गुण मुझमें नहीं आ पाया है। इसका मुझे बेहद अफसोस है।

लेकिन मैंने लेखक बनना कभी नहीं चाहा था। न कभी लिखने, पढ़ने की चाहत ही पाली थी मन में। फिर पता नहीं कैसे, किस बहाने लेखक बन गया। जबकि मेरे परिवार में तो क्या पुरखों में भी कोई लेखक-वेखक नहीं हुआ। हां, बचपन में नेता बनने के सपने जरूर देखा करता था। अपने स्कूल-कॉलेज के ग्रुप में अक्सर नेतागीरी भी झाड़ लिया करता था। कुछ बिंदास टाइप के नेताओं (नाम न बताऊंगा) को अपना आदर्श भी मान रखा था।

खूब याद है, मोहल्ले से पार्षद-सभासद चुनाव के लिए खड़े होने वाले साथियों का चुनाव भी खूब लड़वाया। थोड़ी-बहुत नेताबाजी भी की उनके साथ। मगर खुद नेता बनने का चांस कभी नहीं मिला। कुछ तो घर-परिवार वालों का डंडा रहा तो कुछ इच्छाशक्ति की कमी भी रही।
पर आज जब अपने नेताओं के ठाठ-बाट देखता हूं तो सीना गर्व से चौड़ा हो लेता है। क्या जनता, क्या अफसर, हर कोई कैसा बिछा-सा नजर आता है उनके आगे। नेता जी, नेता जी... करके कितनी पूछ रहती है यहां-वहां।

सोसाइटी में तो उस बंदे को भी खासा मान-सम्मान मिलता है जो खुद नेता तो नहीं होता लेकिन अमुख नेताजी के संग 24x7 साए की तरह रहता-घुमता है। अपने नेताजी से हर काम को करवाने की गारंटी ले लेता है। नेताजी की चप्पल उठाने में भी गुरेज नहीं करता। क्या एक लेखक ऐसा कर सकता है?

लेखक बने रहकर क्या मिलेगा इतना सम्मान? उसकी किताबों और पाठकों के बीच भले ही मिल जाए पर जनता तो उसे पहचानेगी भी नहीं। अरे, इतने साल से लेखक बने रहकर मैंने कौन-सा तीर मार लिया? आलम तो यह है, मेरे पड़ोसियों-रिश्तेदारों तक को नहीं मालूम कि मैं लेखक हूं।

यह दीगर बात है, देश-समाज में जितनी छूट नेता को मिली होती है लेखक को नहीं। नेता स्वतंत्र है कुछ भी कहने-बोलने के लिए। यहां लेखक ने अगर कहीं कुछ टेढ़ा लिख दिया तो कुछ ही देर में उसकी शामत आ ही जानी है। नेता अपने बयान से 'हीरो' बन जाता है। लेखक अपने 'लेखन' से जीरो। अब इस हकीकत को मानो या न मानो आपकी मर्जी।

हालांकि वक़्त तो अभी भी नहीं निकला है मेरे नेता बनने का। देख भी रहा हूं आजकल युवाओं में नेता बनने की होड़-सी मची है। दो-तीन युवा नेता तो इन दिनों इतना छाए हुए हैं कि मीडिया उन्हें हाथों-हाथ ले रहा है। ये बात अलग है कि सबकी अपने-अपने फायदे की राजनीति है। पर नेता तो बन ही गए हैं न। यह क्या कम है!

बस जरा अपनी इच्छाशक्ति को मजबूत कर लूं। फिर मैं भी बन ही जाता हूं नेता। लेखक बने रहने में कुछ नहीं धरा। केवल अपने वक़्त को बरबाद करना है। नेता बनकर कम से कम जग-प्रसिद्धि तो मिलेगी। है कि नहीं...!

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2019

झूठ बोलना पाप (नहीं) है!

हालांकि मानने वाले आज भी यही मानते हैं कि झूठ बोलना ‘पाप’ है। कुछ समय पहले तक मैं भी ऐसा ही मानता था। लेकिन जब से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आठ हजार बार से ज्यादा झूठ बोलने के बारे में खबर पढ़ी, तब से मेरा मत ‘झूठ बोलना पाप है’ पर बदल गया।

जाहिर-सी बात है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति इतना झूठ बोल सकता है तो मेरे-आपके झूठ की बिसात ही क्या!

वैसे बता दूं, झूठ मैं भी कम नहीं बोलता। सबसे ज्यादा झूठ तो मैं मेरी बीवी से बोलता हूं। कभी-कभी तो उससे इतना ऊंचा झूठ बोल देता हूं कि वो मेरे झूठ की ‘दीवानी’ हो जाती है। जबकि उसे यह अच्छे से मालूम है कि मुझे झूठ बोलने में महारत हासिल है, तब भी उसने मुझे कभी मेरे झूठ के लिए रोका-टोका नहीं।

दरअसल, हम पति-पत्नी ने अपने-अपने झूठों पर आपस में बेहतर समझदारी बना ली है। तय किया है कि दिन में अगर चार झूठ मैं उसको बोलूंगा तो छः झूठ वो मुझे बोलेगी। कह सकता हूं- हमारी वैवाहिक जिंदगी झूठ के दम पर ही सही मगर बहुत कायदे और आराम से चल रही है।

मेरा निजी मत है कि झूठ जितना हो सके बोलना चाहिए। वो इसलिए क्योंकि सच बोलने पर हमेशा ‘गालियां’ ही सुनने को मिला करती हैं। मुझसे जीवन में जितने भी सच बोलने वाले टकराए, आज की तारीख में सब से सब दुखी हैं। कितने तो ऐसे हैं, जिनका तलाक सच बोलने पर हो गया। जाने कितनों की नौकरी सच बोलने पर चली गई। कितने तो ऐसे भी हैं, जो सच बोलने के कारण नेता नहीं बन पा रहे।

वैसे, ‘झूठ बोलने की कला’ हमें नेताओं से सीखनी चाहिए। जिस और जितनी खूबसूरती से झूठ वे बोल लेते हैं, गारंटी है, धरती से लेकर आकाश तक कोई बोल ही नहीं सकता। इतना समझ लीजिए, वे झूठ का चलता-फिरता ‘इंसाकिलोपीडिया’ होते हैं।

सच कहूं, मुझे झूठ बोलने की ‘प्रेरणा’ नेताओं से ही मिली है!

तो गलत ही क्या किया ट्रंप ने आठ हजार बार से अधिक झूठ बोलकर!

मैं अपनी ही बताए देता हूं- मैंने अपने नाते-रिश्तेदारों में यह झूठ जमकर फैला रखा है कि मुझे साहित्य का सबसे ऊंचा पुरस्कार मिल चुका है। अब तक एक दर्जन से ज्यादा मेरी किताबें आ चुकी है। और, जाने कितनी ही किताबों का संपादन कर चुका हूं। कोई मामूली लेखक नहीं, कितनी ही दफा मैं चेतन भगत सरीखे ऊंचे लेखकों के साथ लंच ले चुका हूं। लेखन में मेरा सिक्का वैसे ही चलता है, जैसे कभी गब्बर सिंह का रामगढ़ में चला करता था।

देखिए, ऊंची छोड़ने और झूठ बोलने में जाता कुछ नहीं, बस मन को तसल्ली मिल जाती है।

यही वजह है कि मैं किसी के भी झूठ पर कभी ‘शक’ नहीं करता।

ऐसा तो इस दुनिया-ए-फानी में कोई होगा ही नहीं जिसने कम या ज्यादा झूठ न बोले हों। कुछ झूठ भलाई तो कुछ दिली-तसल्ली के लिए बोले जाते हैं। लेकिन बोले जाते हैं, यह सत्य है।

हमारे जीवन में झूठ बोलने की प्रासंगिकता को सबसे अधिक ‘मोबाइल’ ने ही बढ़ाया। इस यंत्र पर दिनभर में कितने झूठ बोले जाते हैं, यह खोज का विषय है। सबसे बड़ा झूठ तो ‘बस अभी दो मिनट में आया’ और ‘तबीयत खराब की छुट्टी लेने’ का ही है।

तो जनाब झूठ जितना और जहां तक सध जाए बोलते रहिए। नहीं बोलेंगे तो एक दिन ज़बान आपका साथ छोड़ देगी। बाकी आपकी मर्जी।

गुरुवार, 3 जनवरी 2019

न्यू ईयर, चारपाई और रजाई

सर्दी शुरू होने से पहले ही तय कर लिया था, इस दफा 'न्यू ईयर' चारपाई पर रजाई में घुसकर ही मनाऊंगा। न कहीं बाहर जाऊंगा, न बाहर से किसी को घर बुलाऊंगा। कम से कम साल का पहला दिन सुकून से तो गुजरे।

घर के एक कोने में बरसों से उपेक्षित पड़ी चारपाई दिल में बड़ा दर्द देती थी। जिस चारपाई पर खेल बचपन बीता, उससे यों मुंह मोड़ लेना भी तो ठीक नहीं। हालांकि शहरों में बहुत हद तक चारपाई के दिन लद चुके हैं। चिंता, चिंतन और अन्य करतब अब बेड पर ही होते हैं। लेकिन तब भी चारपाई की अपनी प्रासंगिकता है।

कभी गांव-कस्बों में चले जाइए, वहां पंचायत आज भी चारपाई पर ही जमती है। हुक्का चारपाई पर गुड़गुड़ाया जाता है। गर्मियों में पेड़ के नीचे ठंडी हवा का आनंद चारपाई पर लिया जाता है।

इसी कारण तो मैंने चारपाई का दामन दोबारा थाम लिया।

'न्यू ईयर' को देसी रंग में मनाने की बात ही कुछ और है। चारपाई, रजाई और कॉफी दिन बनाने के लिए काफी हैं। अब जिनके पास है मुफ्त का फूंकने को वे महंगे होटलों में जाकर नोट फूंकें। अपने को न तो इतना शौक है न नोट है।

हालांकि बीवी को देसी अंदाज में मेरा 'न्यू ईयर' मनाना कतई पसंद नहीं आता। वो मुझे 'पिछड़ी सोच' का बता तमाम बातें सुना देती है। पर, सुन लेता हूं। सुन लेने के अतिरिक्त मेरे कने कोई और चारा भी तो नहीं। ये तो जन्म-जन्मांतर की खुराक है, जो हर हाल में लेनी ही लेनी है। बेहतर है कि बीवी की प्रत्येक जली-कटी निश्चिंतता के साथ एक कान से सुनकर दूसरे कान से बाहर निकाल दी जाए।

मूर्ख हैं लोग जो न्यू ईयर पर किस्म-किस्म के संकल्प लेते हैं। जबकि संकल्प पूरे एक दिन भी टिके नहीं रह पाते। रात की खुमारी उतरते ही संकल्प भी भाप बनकर उड़ जाते हैं। लेकिन लोगों ने आदत बना रखी है।

इसीलिए तो न मैं कोई संकल्प न्यू ईयर पर लेता हूं न लेने को किसी को कहता हूं। मैं नए साल और सर्दी का आनंद अपनी चारपाई और रजाई में बैठकर उठा रहा हूं। इतना बहुत है मेरे लिए।

मुबारक न्यू ईयर।

बुधवार, 19 दिसंबर 2018

काम निकलने से मतलब

मैं काम निकालने में अधिक विश्वास रखता हूं। काम निकलना चाहिए बस, चाहे वो कैसे या कहीं से भी निकले। साफ सीधा-सा फलसफा है, भूख लगने पर खाना ही पेट की अगन को शांत करता है, ऊंची या गहरी बातें नहीं। बातों से ही अगर पेट भर रहा होता तो आज किसान न खेती कर रहा होता, न रसोई में चूल्हे ही जलते नजर आते।

ठीक यही फंडा काम निकालने पर लागू होता है। काम निकालने का बहुत कुछ संबंध 'जुगाड़' से है। है तो है, इसमें गलत भी क्या है। अरे भई, जो बंदा या आईडिया काम निकालने के वक़्त काम न आ सका, वो बेकार है। जुगाड़ के काम में अगर हम आदर्शवाद का राग अलापेंगे तो, मैं समझता हूं, हमसे बड़ा बेवकूफ कोई न होगा!

रुपए-पैसे के मामले में मैं काम निकालने या चलाने को ही महत्त्व देता हूं। जरूरत के वक़्त उसी दोस्त से मांगता हूं, जो वक़्त पर काम चला दे। आई बला को टलवा दे। यही असली दोस्ती है। ज्यादा हिसाब-किताब से अगर चलूंगा तो जिंदगी भर खुद को सिमेटते ही रह जाऊंगा।

देखा जाए तो एक मैं ही नहीं पूरी दुनिया काम निकालने के पैटर्न पर ही चल रही है। कोई राजनीति में तो कोई लेखन में तो कोई प्रेम में तो कोई शादी-ब्याह में काम निकालने में लगा पड़ा है। खासकर, राजनीति और लेखन तो टिके ही काम निकालने के दम पर हुए हैं। नेता चुनाव में ऊंचे वायदे तो लेखक ऊंची बातें कर काम निकाल रहा है। सार यह है कि दुकानें दोनों की ही चल रही हैं। दुकानों का चलते रहना महत्त्वपूर्ण है। बाकी तो बातें हैं। बातों का क्या...।

पहले मैं भी काम निकालने जैसी शॉर्टकट विद्या पर यकीन नहीं करता था। काम चलाने या निकालने वालो को तुच्छ निगाह से देखा करता था। लेकिन एक दिन एक तांत्रिक ने मुझे बताया- 'बेटा, दुनिया-समाज बड़ा मतलबी है। काम निकालने में विश्वास करता है। काम निकल जाने के बाद पलटकर पूछता है- आप कौन? तो जितना और जहां से हो सके काम निकाले जा। फल अवश्य मिलेगा।'

बस उसी दिन से, तांत्रिक की बात मानते हुए, काम निकालने पर ही जोर दे रहा हूं।

बदलते वक्त ने समाज को बड़ा चालू और चालाक बना दिया है। उसका सारा फोकस दूसरे को उल्लू बना अपना काम निकालने पर ही रहता है। आप रोते रहिए सामाजिकता का रोना मगर समाज को चलना अपने तौर तरीके से ही है। फिर भी, हैं कुछ ऐसे लोग भी जो चौबीस घंटे समाज क्या कहेगा की चिंता में ही घुले रहते हैं। जबकि यही समाज काम निकल जाने के बाद पूछता तक नहीं।

दुनिया, समाज, रिश्ते, संबंध सब प्रोफेशनल हो चले हैं। अपनी फंसी को सुलझाने के लिए गधे को बाप बनाने से भी न चूकें।

झूठ क्यों बोलूं- मैंने भी काम निकालने को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया है। समझ चुका हूं, बेबजह जज्बाती होने में कुछ न धरा। अपना काम निकलवाते रहो। दुनिया-समाज इसी में खुश है।

पत्नियां वो ही ज्यादा प्रसन्न रहती हैं, जो पतियों से अपना काम निकल जाने के बाद उन्हें अपनी ताकत का एहसास तो करवा देती हैं। उनसे जीत पाना बड़ा मुश्किल। किसी और पर क्या टिप्पणी करूं खुद इस दर्द को अक्सर ही झेलता रहता हूं। मगर खुश हूं। पत्नी की मर्जी सर-आंखों पर।

काम निकलवाने के प्रति प्रतिबद्धता बनाए रखिए। ऊपर वाला सब देख रहा है।

रविवार, 18 नवंबर 2018

अंकल ही कहो मुझे

सुनने में पहले जरूर थोड़ा अटपटा टाइप लगता था। मगर अब आदत-सी हो गई। यों भी, आदतें जितनी व्यावहारिक हों, उतनी ठीक। ज्यादा मनघुन्ना बनने का कोई मतलब नहीं बैठता। यह संसार सामाजिक है। समाज में किस्म-किस्म के लोग हैं। तरह-तरह की बातें व अदावतें हैं। तो जितना एडजस्ट हो जाए, उतना ठीक।

ओहो, बातों-बातों यह तो बताया ही नहीं कि क्या सुनने की आदत पड़ गई है मुझे। दरअसल, बात कुछ यों है कि अब मैं भाई या भाईसाहब के मुकाबले' अंकल' अधिक पुकारा जाने लगा लूं। बाहर वालो का क्या कहूं, खुद की घरवाली भी मुझे अंकल कहकर ही प्रायः संबोधित करती है।

यों, बाहर वाले को तो फिर भी अंकल शब्द पर हल्की-सी आंखें चढ़ा सकता हूं किन्तु घरवाली तो आखिर घरवाली ही ठहरी न।

लेकिन कोई नहीं। अंकल संबोधन को मैंने अब लाइफ-स्टाइल में शामिल कर लिया है। सही भी है न। इस पर किस-किस से भिडुंगा, किस-किस पर आंखें तरेरुंगा। किस-किस पर मन ही मन बद्दुआएं दर्ज करवाऊंगा।

साफ-सीधी सी बात है, उम्र भी तो हो चली है अब। दिल बेशक कितना ही जवान क्यों न हो, सिर और दाढ़ी के सफेद पड़ते बाल; बाहर के राज बे-पर्दा कर ही देते हैं। जैसे, पीने के बाद शराबी बदबू को जेब में कैद कर नहीं रख सकता।

माशाअल्लाह शादीशुदा हूं। दो प्यारी बच्चियों का बाप हूं। चालीस पार उम्र जा चुकी है। घर-परिवार में कई बच्चों का मामा, मौसा, ताऊ, चाचा, फूफा भी हूं। अब भी अंकल न कहलाऊंगा तो भला क्या उम्र के आखिरी दौर में कहलाऊंगा!

अंकल होना या पुकारे जाना गाली थोड़े है। मैंने तो बड़े-बड़े फिल्मी स्टारों तक को अंकल कहे जाते अपने दोनों कानों से सुना है।

इस कड़वी हकीकत से क्या मुंह फेरना, जब दुनिया में आए हैं तो एक दिन अंकल भी कहे जाएंगे ही। मगर कुछ मोहतरमाएं ऐसी हैं, जो खुद के 'आंटी' पुकारे जाने पर बड़ा खराब-सा चेहरा-मोहरा बना लेती हैं। मानो- उन्हें गाली ही दे दी हो! छूटते ही कहती हैं, 'आंटी मत कहो मुझे!' यह भी कोई बात हुई भला!

इस संसार में एक भगवान-खुदा ही है जिसे कोई अंकल नहीं कहता। वरना तो हम इंसान पैदाइशी अंकल-आंटी ही हैं!