गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

इश्क में उम्र का क्या काम

कहते हैं- इश्क उम्र की बंदिशों का मोहताज नहीं होता। इश्क कभी भी, कैसी भी उम्र वाला कर सकता है। इतिहास कम और ज्यादा उम्र में इश्क करने वालो के किस्सों से भरा पड़ा है। दिल अगर जवान है तो इश्क एक से कीजिए या अनेक से सब कुबूल है।

यों, लोगबाग इश्क करने की राय तो एक ही से देते हैं। उससे आगे को 'वासना' कहते हैं। अजी, लोगों का क्या है वे तो जिंदगी को भी 'ईमानदारी' के साथ जीने की राय देते हैं, क्या इतने विकट तिकड़मी समय में जिंदगी ईमानदारी के साथ जी जा सकती है? लोगों को रायचंद बने रहने दें, आप तो वही करें जो आपका दिल कहता है। इश्क के मामले में किसी की नहीं केवल दिल की ही सुननी चाहिए।

सच कह रहा हूं। मुझे अगर अपने दिल का सहारा न मिला होता तो मैं जीवन में इतने इश्क चला ही न पाता। जब भी किसी से नया इश्क हुआ, दिल ने हमेशा यही कहा- 'फिक्र न कर। इश्क किए जा।'

ज्यादा मात्रा में किए गए इश्क से पास से कुछ नहीं जाता, किस्म किस्म के अनुभव ही हाथ आते हैं। जीवन में जिसने इश्क के अनुभव ले लिए फिर उसके तईं दुनियादारी को समझना इतना कठिन नहीं रह जाता।

इश्क में प्रकृति के साथ-साथ इंसान की चेष्टाओं एवं कु-चेष्टाओं का हर रंग मौजूद रहता है। कुछ इश्क बैठे-ठाले हो जाते हैं तो कुछ के लिए पापड़ तक बेलने पड़ जाते हैं। मुझे लगता है, इश्क करना या होना पुराने जमाने में ज्यादा आसान था। क्योंकि तब आशिक और माशूका के बीच इतनी चालाकियां न थीं। आज के डिजिटल समय में इस बात का ही कन्फर्म न रह पाता कि इश्क आशिक का सच्चा वाला है या माशूका का। क्या पता, एक ही चैटिंग एप पर कई से इश्क एक साथ फरमाया जा रहा हो। कसमें-वादों का सिलसिला हर तरफ से सामान चल रहा हो। दिल के जो इमोजी उसे भेजे जा रहे हैं, हो सकता है, इसे भी भेजे जा रहे हों। मोबाइल फोन के जमाने में इश्क के प्लेटफार्म पर गाड़ी कहीं से भी कहीं को चलाई और दौड़ाई जा सकती है।

चलो अच्छा ही है न। कम से कम युवा पीढ़ी एक ही के साथ हिलग के बोर तो नहीं हो रही। बाजार के असर ने तो इश्क को और भी ग्लोबल कर दिया। कभी वेलेंटाइन विदेशों में मनाया जाता था, अब शहर से लेकर गांव-देहात तक में पूर्ण उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। देश बदल रहा है। यही तो 'न्यू इंडिया' है पियारे।

ऐसा लोगों का भरम है कि इश्क को निभा पाना खासा कठिन होता है। अगर कठिन ही होता तो कृष्ण जी ने अपने समय में इतना इश्क न फरमाया होता। इश्क निभाना उतना ही सरल है जिनता पकौड़ा तलना। बस आंच का ख्याल रखना पड़ता है। कहीं ज्यादा तलकर 'जल' न जाए। बाकी एक के बाद एक इश्क करते रहिए, सब निभ जाएंगे।

और हां, इश्क करते या वेलेंटाइन मानते वक़्त इस पर खाक डालिए कि लोग क्या कहेंगे। 'अमर प्रेम' का वो गाना तो याद है न- 'कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना...'। तो जो कह रहा है, कहने दीजिए। आप बस इश्क, प्यार, मोहब्बत के दरिया में यों ही डूबते-उतरते रहिए। बाकी श्रीराम जी भला करेंगे।

इश्क में उम्र पर भी इतना तबज्जो देने की जरूरत नहीं। इश्क बे-उम्र होता है। सैफ ने करीना या करीना ने सैफ से इश्क फरमाते वक़्त क्या उम्र का लिहाज किया? इधर इश्क परवान चढ़ा, उधर निकाह में तब्दील हुआ। अजी, खुद मैं कभी इश्कबाजी में उम्र को बीच में न लाया। जिससे हो गया, कर लिया। मन और दिल बहलता रहना चाहिए बस।

इश्क में बोल्ड बने रहने का जज़्बा रखिए। बाकी आगे की राहें खुद ब खुद आसान होती चली जाएंगी।

'इश्क कीजिए फिर समझिए जिंदगी क्या चीज है...'।

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

बजट, वसंत, वेलेंटाइन और पकौड़े

बजट

लोग भी अजीब हैं। बताइए, बजट को समझने में लगे पड़े हैं। जिसे देखो वो ही हाथ में गुलाबी अखबार की प्रति थामे, एक-दूसरे से बजट पर बहस करे चला जा रहा है। जबकि, यह हकीकत है, उसे अपने घर के बजट के बारे में रत्तीभर मालूम नहीं होगा। उसका हिसाब-किताब रखने के लिए पत्नी है। सबसे उम्दा पॉलिसी मुझे पत्नियों की लगती है: वे कभी बजट पर न खास चर्चा करती हुई मिलती हैं न दिमागी पर अतिरिक्त लोड लेती हुई। उन्हें तो अपने घर के बजट से मतलब। देश के बजट की वित्तमंत्री जानें या फिर अर्थशास्त्री लोग।

सही भी है। लोग जितनी ऊर्जा बजट को समझने-समझाने में बर्बाद कर देते हैं उतने में तो एक लेख या फ़िल्म के आइडिया पर काम किया जा सकता। लेकिन नहीं। लोगों को तो बीमारी है दूसरे के काम में अपनी टांग घुसेड़ने की। जबकि बजट में समझने लायक कुछ होता ही नहीं। महज आंकड़ों और बड़ी-बड़ी योजनाओं-परियोजनाओं की जुमलेबाजी होती है। बजट के बहाने कुछ सरकार के तो कुछ जनता के हित साध लिए जाते हैं।

किसानों पर कागजों पर मेहरबानी कर दी जाती है। जबकि देश में किसान और खेती के हालात क्या हैं, बच्चा-बच्चा जानता है। तिस पर भी दावा यह कि ये किसानों का बजट है।

वसंत

वसंत का असर बजट पर भारी है। वसंत का चार्म हर किसी को मदहोश किए पड़ा है। वासंती हवा बह रही है। हालांकि मौसम में अभी कुछ सर्दी बाकी है फिर भी मजा दे रही है।

दिल में वसंत की उमंग का आलम ये है कि मचला-मचला जा रहा है। एक जगह दिल लगा होने के बावजूद कोशिश में है दूसरी जगह भी सेट हो जाए। सोशल मीडिया के जमाने में यह असंभव भी तो नहीं।
कवि वसंत पर कविता अब पन्नों या डायरी पर नहीं बल्कि अपने फेसबुक पेज पर लिख रहा है। तो कुछ ऊंचे टाइप का कवि अपनी वसंतमय कविता ट्विटर पर ट्वीट कर रहा है। वसंत पूरी तरह से डिजिटल हो लिया है। होएगा भी कैसे नहीं। आखिर यह 'न्यू इंडिया' का वसंत जो है।

नए जमाने का यूथ व्हाट्सएप्प पर वसंत सेलिब्रेट कर रहा है। वो ज्यादा कुछ वसंत के बारे में न जानते हुए भी पूरी शिद्दत से लगा पड़ा है वसंत-प्रधान कविता या वन-लाइनर को ग्रुप में फैलाने में।

उधर वसंत पसोपेश में है कि ये हो क्या रहा है? पर कर भी क्या सकता है, वसंत अपने डिजिटल होने पर खीझ भी रहा है और प्रसन्न भी हो रहा है। पर जमाने के साथ चलने को प्रतिबद्ध है।

वेलेंटाइन

वसंत में वेलेंटाइन का शबाब अपने जोरों पर है। अपनी-अपनी सुविधा-सुरक्षा के हिसाब से सभी इसको मनाने में व्यस्त हैं। युवा (प्रेमी) युगल वेलेंटाइन पर पेड़ों के पीछे कम घर के किसी कोने में बैठ अपने दिली अरमान व्हाट्सएप्प कर पूरे कर रहे हैं। 'प्रेम' यानी 'डिजिटल लव' को सुकून से चलाए रखने का इससे उम्दा दूसरा माध्यम नहीं।

दूसरी तरफ, लाठी वीर इस जुगाड़ में हैं कहीं कोई पवित्र भारतीय संस्कृति का ढोल बजाता हुआ दिखे-मिले तो तुरंत उसे मुर्गा बना अपने 'मन की भड़ास' शांत कर लें। सालभर उन्हें इसी दिन का तो इंतजार रहता है। इस बहाने टीवी, अखबार में उनके चेहरे भी चमक जाते हैं। देशवासियों को भी पता चल जाता है कि लाठी वीर कितने संस्कृति और सभ्यता के हितैषी हैं।

मगर आज का यूथ भी घणा होशियार है। वेलेंटाइन डे घर से बाहर मनाने का खतरा कम ही उठाता है। चूंकि एक-दूसरे को कार्ड या लव-लैटर देने की परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है इसलिए उसे जो कहना-सुनना होता है अपने स्मार्टफोन पर ही कर लेता है। तकनीक ने प्रपोज करना अब इतना सरल बना दिया कि एक व्हाट्सएप्प में काम पूरा। हमें अपने समय में तो सौ दफा सोचना पड़ा था तब कहीं जाकर दस लाइनों का पत्र लिख पाए थे। खैर, समय-समय की बात...।

पकौड़े

पकौड़ों का वसंत और वेलेंटाइन से सीधा कोई सरोकार नहीं पर चर्चा में खूब हैं। शायद ही कोई ऐसा घर, दफ्तर या सोशल प्लेटफॉर्म बचा हो, जहां पकौड़ों का जिक्र न छिड़ा हो। उस दिन तो एक बड़े मंत्री जी ने भी कह डाला- बेरोजगारी से भला है पकौड़े बेचना। काश! उनका यह कथन कुछ बरस पहले आ गया होता तो कहे को मैं लेखक बनता, मोहल्ले के नुक्कड़ पर खड़ा हो पकौड़े नहीं बेच रहा होता।

राजनीतिक मंचों और सोशल मीडिया पर बहसबाजी से पकौड़ों को जो अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि मिली है, उस आधार पर मैं कह सकता हूं, देश में पकौड़ों का भविष्य उज्ज्वल है। अब तो मेरे दिमाग में भी यह विचार बैठने लगा है कि अपनी नौकरी और लेखन छोड़ पकौड़े बेचूं। काम काम होता है। काम में भला कैसी शर्म! ठीक है न...!

मंगलवार, 13 फ़रवरी 2018

इन-बॉक्स में वेलेंटाइन

वेलेंटाइन डे बड़ी सहूलियत के साथ मनाना चाहिए। न दिमाग पर लोड हो न 'लोग क्या कहेंगे' टाइप चिंता। अजी, कुछ लोगों ने तो जन्म ही धरती पर इस शर्त के साथ लिया है कि उन्हें कुछ न कुछ कहते ही रहना है। सो, मोके-बेमौके कहते रहते हैं।

यों, वेलेंटाइन मनाने वाले भला कहां चिंता किया करते हैं लोगों के कहने-सुनने की। चिंता करनी चाहिए भी नहीं। जीवन और दुनिया में वैसे ही चिंताएं क्या कम हैं!

हां, तो मैं कह रहा हूं वेलेंटाइन मनाने की सबसे धांसू जगह फेसबुक का इन-बॉक्स है! सुरक्षित भी। सम्मानजनक भी। हर प्रकार के बाहरी झंझटों से मुक्त। यहां कैसी भी, कितनी भी कसमें खाइए-खिलाइए कोई आपको रोकने-टोकने वाला नहीं। अब तो वीडियो कॉलिंग की भी सुविधा है। जितना दिल चाहे बातें कीजिए। डेटा की कोई फिक्र नहीं। आटे से कहीं सस्ता तो आजकल डेटा मिल रहा है। डेटा कंपनियां अपने ग्राहकों पर पूरी तरह मेहरबान हैं। दो वक्त की रोटी मिले या न मिले पर डेटा मिलने में जरा भी बाधा नहीं आनी चाहिए।

वेलेंटाइन प्रेम-मोहब्बत के इजहार का पर्व है। ये पर्व प्यार के अरमान और अहसास को दिल में जिलाए रखता है। अपने मन की बात जो लोग सीधा नहीं कह पाते इन-बॉक्स में आनकर कह डालते हैं। उद्देश्य- बात पहुंचनी चाहिए चाहे इन-बॉक्स से पहुंचे या लैटर-बॉक्स से।

वैसे, समाज में इन-बॉक्स की इमेज कोई खास अच्छी नहीं। मुझ जैसे इज्जतदार लोग तो इन-बॉक्स की छाया तक से दूर रहते हैं। चाहे कोई कितना ही अपना या करीबी क्यों न हो, मैं तो साफ कह देता हूं- मुझे छत पर आकर मिलना मंजूर है इन-बॉक्स में घुसकर नहीं। आज के निरंतर टेढ़े होते समय में किसी की नीयत का कोई भरोसा नहीं। क्या मालूम कौन घात लगाए बैठा हो, इन-बॉक्स की चैट का स्क्रीनशॉट बनाकर सोशल मीडिया पर वाइरल करने में।

अपना तो एक ही के साथ ढंग से वेलेंटाइन डे मन जाए यही बहुत है। क्या करें, वैवाहिक जीवन के अपने कष्ट है पियारे। मन हो या न हो प्रेम की अलख तो जलाए रखनी ही पड़ती है, नहीं तो रात को रोटी मिले न मिले!

फिर भी हैं कुछ ऐसे इन-बॉक्स वीर जो अपने प्रेम और फ़्लर्ट को साथ-साथ साधे हुए हैं। उन्हें सलाम है मेरा। एक तीर से कई निशाने साधने की कला हमें उनसे सीखनी चाहिए।

इन-बॉक्स में वेलेंटाइन मनाने का एक फायदा यह भी है कि यहां बहुत अधिक शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती। किस्म-किस्म के इमोटिकॉन्स आपकी बात का इजहार करने में सक्षम हैं। हर इमोटिकॉन का मतलब हर कोई समझता है। दो प्रेमियों के बीच इमोटिकॉन्स एक प्रकार से सेतु की भूमिका निभा रहे हैं आजकल।

इन-बॉक्स और व्हाट्सएप्प सबसे सुरक्षित जगहें हैं लव-शव करने के लिए। इन सब पर वेलेंटाइन डे अगर फूल-फल रहा है तो यह प्यार के डिजिटल होने का शुभ संकेत है। आखिर हम 'न्यू इंडिया' में कदम रख चुके हैं भाई।

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

बैक बैंचर होने का सुख

मेरा नाम 'ए' से होने के बावजूद मेरी कोशिश यही रहती थी कि क्लास में मैं चौथी या छठी बैंच पर ही बैठूं। बैठता भी था। इसके दो फायदे मुझे मिल जाया करते थे: पहला, टीचर की निगाह मुझ पर आसानी से नहीं पड़ती थी। दूसरा, याद न करने के कारण टीचर को सुनाने से बच जाता था। किंतु, यह लक हर समय नहीं काम आता था। बारी जब 'नेमवाइज' हाजरी या सुनाने की आती थी तब आगे आना ही होता था। तब डांट तो पड़ती ही थी, साथ में चार-पांच संटीयों का स्वाद भी चखने को मिल जाता था दोनों हाथों पर।

घर आनकर यह भी नहीं बता सकता था कि आज टीचर ने सुताई की। तब सुताई का मामला दोहरा भी हो सकता था। मजबूरी थी। अतः उस डांट और मार का कड़वा घूंट पीकर रह जाना होता था। पर, जो भी हो उसमें परम-आनंद था। आजकल के बच्चों की तरह नहीं कि टीचर ने बच्चे को जरा-सा टच क्या कर दिया, मां-बाप राशन-पानी लेकर टीचर और प्रिंसिपल पर सवार हो लिए। समय-समय की बात है।

लेकिन बैक बैंचर होने में शर्म मुझे कभी महसूस नहीं हुई। उल्टा मजा ही आता था। पीछे बैठके किसी के चिकोटी काटो या टीचर का कार्टून बनाओ, कोई देखने वाला नहीं। क्लास में ज्यादा एक्टिव या पढ़ाकू होने के अपने नुकसान थे। दिमाग पर लोड उतना ही रखो जितना वो वहन कर पाए। ज्यादा पढ़-लिखकर कौन-सा मुझे देश का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनना था। लेखक कैसे बन गया, इसी पर मुझे आज भी आश्चर्य होता है। जबकि लेखक होने-बनने की तो कभी सोची भी नहीं थी। मेरी पढ़ाई-लिखाई के स्तर को देखकर पिता जी अक्सर मुझे या तो गधा बनने का आशीर्वाद देते थे या फिर रिक्शा चलाने का। दुर्भाग्य से मैं दोनों ही उपलब्धियों में पिछड़ गया।

लोग ऐसा समझते हैं कि बैक बैनचर होना नुकसानदेह है। इससे मान गिरता है। जग-हंसाई होती है। विफलता का सूचक है। जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। अरे, बड़े नसीब वाले होते हैं वो जिन्हें स्टूडेंट लाइफ और जीवन में बैक बैंचर होने का सौभाग्य प्राप्त होता है। आगे वाली बैंच पर बैठकर कुछ देर तो अच्छा लगता है पर यह ज्यादा कामयाब नहीं। ध्यान रहे, गालियां फ्रंट वाले को ही पड़ती हैं, पीछे वाले को नहीं।

फिर भी कुछ ऐसे लोग हैं समाज में जिन्हें बैक बैंचर होने में बड़ी शर्म आती है। वे अपने पीछे बैठने को बड़ा मुद्दा बना राजनीति करने लग जाते हैं। कायदा तो यह है कि जिसे जहां जगह मिल जाए, वो वहीं बैठ जाए। लेकिन नहीं। पीछे बैठकर उनकी इज्जत को बट्टा लगता है। वे यह भूल जाते हैं, इमेज में अगर दम होगा तो वो पीछे बैठने में भी उतनी ही चमकेगी जितनी की आगे। बैक बैनचर या फ्रंट बैनचर होना सब बेमतलब के शोशे हैं, भला आदमी तो कहीं भी एडजस्ट हो लेता है।

वो तो चलो (बचपन) स्कूल की बातें रहीं, मैं तो अपने दफ्तर में भी बैक बैंचर ही हूं। करते रहें, अन्य दफ्तर वाले बॉस की जी-हुजूरी पर मुझे तो पीछे बैठ सबकुछ देखने में ही आनंद आता है। कम से कम बॉस की खामखां की डांट तो बच ही जाता हूं। कोई चापलूसी का आरोप तो नहीं लगता न। काफी है।

बैक बैंचर होने में तमाम सुख हैं। जीवन में कभी इस अनुभव को आजमा कर तो देखिए।

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

नुक्कड़ पर पकौड़े बेचकर दिखाओ

मुझे चुनौती मिली है। किसी और से नहीं। खुद की बीवी से। चुनौती में कहा गया है- 'एक दिन लेखन छोड़ मोहल्ले के नुक्कड़ पर खड़े होकर पकौड़े बेचकर दिखा दो। तुम्हें मान जाऊंगी।'

बात लेखन से चलकर पकौड़े बेचने तक न आती अगर मैंने उसे बजट की मोटी-मोटी बातें बता दी होतीं। किंतु, मेरी समस्या यह है कि बजट मुझे बचपन से ही कभी समझ न आया। क्या सस्ता हुआ। क्या महंगा। ये तो चलो अखबार में पढ़कर जान लेता लूं। पर टैक्स आदि से जुड़ी बड़ी-बड़ी बातें मैं नहीं समझ पाता।

अच्छा, बीवी का सारा जोर टैक्स पर रहता है। वो मुझसे पूछती है, 'वित्तमंत्री जी ने किस पर कितना और क्यों टैक्स लगाया? आय में छूट की सीमा कितनी रही? खेती-किसानों को क्या दिया? क्या छीना? ईएमई का क्या रहा?' और भी ऐसी जटिलतम बातें।

हर दफा बीवी को मैं यही बोलता हूं- 'प्रिये, मैं सिर्फ लेखक हूं। अर्थशास्त्री नहीं। बजट को समझ पाने में मेरा दिमाग कतई 'जीरो' है।'

बीवी इतने पर ही मुझ पर भड़कती हुई कहती है- 'तुम्हें समझ है किस बात की? अभी पिछले दिनों तुमसे जीएसटी के बारे में पूछा था तो तुमने साफ मना कर दिया, मैं इस बारे कुछ नहीं जानता। राशन और दूध वाले का बिल जोड़ने को दिया तो तुम जोड़ न पाए। पता नहीं, लेखक कैसे बन बैठे?'

'देखो प्रिये, लेखक बनना और बजट को समझकर समझाने में बहुत फर्क है। लेखक बनना इतना आसान न होता जितना तुम समझती हो। बजट तो फिर भी अखबारों में पढ़कर या किसी अर्थशास्त्री को पकड़कर समझा जा सकता है लेकिन लेखक तो खुद की वैचारिकता के दम पर ही बनता है।' मैंने समझाने की हल्की-सी कोशिश की।

'लेखक कैसे बनते हैं यह भाषण मुझे न दो। मुझे भीतर की सारी हकीकत मालूम है। लेखक बनकर तुम खुद को इतना ही महान मानते हो तो- बजट को छोड़ो- जरा नुक्कड़ पर पकौड़े बेचकर ही दिखा दो तो मान जाऊंगी तुम्हें।' बीवी का पलटवार।

अब बस यही सुनना बाकी रह गया था। लेखक बनकर नुक्कड़ पर पकौड़े बेचने से तो बेहतर यही रहेगा कि मैं लिखना ही क्यों न छोड़ दूँ। न रहेगा सांप। न टूटेगी लाठी।

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

करते रहिए फ़्लर्ट!

प्यार का तो कुछ ऐसा है कि किसी न किसी से हो ही जाता है। प्यार होते ही साथ-साथ जीने-मरने की कसमें तो खैर खाई ही जाती हैं। कुछ इससे भी आगे निकल शादी कर लेते हैं। यानी लव; 'लव-मैरिज' में तब्दील हो जाता है। 'लव-मैरिज' वालो को मेरा सलाम।

समाज में कुछ ऐसे भी साहसी लोग हैं जो फ़्लर्ट भी कर लेते हैं। ऐसा वैसा नहीं बल्कि कामयाब फ़्लर्ट। हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा।
कॉलेज के दिनों में मेरा एक दोस्त था। वो फ्लिर्टिंग का मास्टर था।
पढ़ाई-लिखाई से कहीं ज्यादा ध्यान वो किस्म-किस्म के फ़्लर्ट पर देता था। फ़्लर्ट उसकी आत्मा से लेकर स्वभाव तक में शामिल था। एकाध दफा तो ऐसा भी हुआ कि उसके हमारे मोहल्ले में आने पर मोहल्ले वालों ने पाबंदी ही लगा दी। मोहल्ले की लड़कियों से फ़्लर्ट वो कर जाता था, नाम बदनाम मेरा होता था कि ये सब मैं करवा रहा हूं। उड़ते-उड़ते बात मेरे घर तक पहुंच जाती थी। मुझे घर वालो की सख्त नसीहतों का सामना करना पड़ता था सो अलग।

जो भी हो पर मेरे दिल में न केवल उस दोस्त बल्कि हर उस व्यक्ति के प्रति खासा सम्मान है, जो किसी न किसी बहाने फ्लिर्टिंग में लगे रहते हैं। यों भी, आजकल जमाना प्यार से अधिक फ्लिर्टिंग का है। और, सोशल मीडिया पर तो फ्लिर्टिंग के क्या कहने। फेसबुक के इन-बॉक्स में न जाने कितने ही फ़्लर्ट की कहानियां दबी पड़ी हैं।

आदर्शवादी लोग ऐसा मानते हैं कि फ़्लर्ट एक अय्याशी-तलब विधा है। फ़्लर्टवादी समाज का सबसे बिगड़ैल प्राणी होता है। फ़्लर्ट ने प्यार जैसी पवित्र चीज को नुकसान पहुंचाया है। जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। फ्लिर्टिंग की परंपरा तो अपने देश में अनादि-काल से रही है। कितने ही देवी-देवताओं, राजा-महाराजाओं ने अपने जीवन काल में कितने ही फ़्लर्ट किए। चूंकि वो सब पवित्र आत्माएं थीं सो उनके फ़्लर्ट को 'प्रेम' नाम दे दिया गया। हां, यह सत्य है कि उनके फ़्लर्ट बड़े कायदे के और आदर्श हुआ करते थे।

आजकल के जमाने में प्यार होना ही इतना कठिन हो लिया है, फ़्लर्ट करना तो और भी मेहनत का काम है। किसी को क्या मालूम अपने व्हाट्सएप्प पर अगला कितनों से फ़्लर्ट कर रहा है। सबकी अपनी-अपनी चाहतें और स्वतंत्रताएं हैं। आखिर हम एक लोकतांत्रिक मुल्क हैं। लोकतंत्र में सबको प्यार, धिक्कार, स्वीकार, फ़्लर्ट करने का अधिकार है।

गाहे-बगाहे इच्छा तो मेरी भी बहुत होती है कि मैं भी फ़्लर्ट करूं। पर अचानक से पत्नी का कथित रौद्र-रूप ध्यान में आ जाता है और अपनी इच्छा को कैंसिल कर देना पड़ता है। वैसे, जानकारी के लिए बता दूं, शादीशुदा लोग फ़्लर्ट अधिक करते हैं। चाहे तो इस मुद्दे पर शोध करवा लीजिए। मैं गलत साबित न होऊंगा।

तो करते रहिए फ़्लर्ट। बाकी जो होगा सो देखा जाएगा।

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

बिकने में भला क्या हर्ज!

अजी, लोगों का क्या है वो तो रोटी जलने पर भी मुंह टेढ़ा कर लेते हैं। फिलहाल तो बहुत से लोग इस बात पर ही मुंह बनाए हुए हैं कि हर साल खिलाड़ी करोड़ों रुपये में बिक रहे हैं। यों बिकने को वे गलत मानते हैं। तरह-तरह के उल-जलूल सवाल करते हैं। कि, खिलाड़ी क्या बिकने के लिए होते हैं? अपना खेल, अपना ईमान भी भला कोई बेचता है? खिलाड़ियों का इस तरह बिकना देश के लोकतंत्र के लिए क्या ठीक है? आदि-आदि।

नादान हैं लोग। कुछ समझते ही नहीं। दुनिया के साथ चलना उन्हें आता ही नहीं। देखना ही नहीं चाहते कि वक़्त कितनी तेजी से बदल रहा है। महंगाई सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही चली जा रही है। लाइफ स्टाइल को मेनटेन करने के लिए 'अर्थ' की आवश्यकता तो हर किसी को होती ही है। है कि नहीं...!

न भूलें वे खिलाड़ी हैं कोई लेखक नहीं। कि, कम में या फिर खाली जेब भी गुजारा कर लेंगे! सब पैसे का ही खेल है बंधु। पैसा पास है तो हर कोई करीब है। पैसा पास नहीं तो 'हम आपके हैं कौन!' बिकना-बिकना तो दुनिया की रीत रही है।

जो खिलाड़ी जितना ऊंचा बिकता है, समाज और देश में उसे उतनी ही इज्जत मिलती है। खेल-प्रेमी उसके महंगा बिकने पर ससम्मान खड़े होकर तालियां बजाते हैं। उसके खेल का यशोगान किया जाता है। मीडिया उन्हें हाथों-हाथ लेता है। मैच में अगर बढ़िया खेल जाते हैं तो क्या कहने। विज्ञापन कंपनियां भी उन्हें झट से लपक लेती हैं। अपने हीरो विराट को ही देख लो।

और फिर, जब खिलाड़ी ही खुद बिक कर कभी शर्मसार नहीं होते तो भला हम कौन होते हैं, उन पर टिका-टिप्पणी करने वाले। चाहे खिलाड़ी हो या कलाकार या लेखक हर कोई यह चाहता है कि उसे उसके काम का मेहनताना मिले। इस दुनिया में संत कोई नहीं जो मुफ्त में सेवा किए जाए। अपना घर फूंक भला कौन तमाशा देखना चाहेगा।

यकीन मानिए, मुझे कभी-कभी बहुत अखरता है कि मैं क्यों नहीं बिकता? मुझे कोई क्यों नहीं खरीदता? लेखक हूं न! लेखक को कौन खरीदेगा! अगर खरीद भी लिया गया तो लेखक बिरादरी मुझे कितना गरियाएगी। कहेगी- लेखक होकर बिक गया। यहां तो जरा-सी बात का बतंगड़ बनते देर ही कितनी लगती है पियारे।

बिकने के इस खेल को जरा दूसरे तरीके से समझें। खिलाड़ी के बिकने के बाद उसमें अपने खेल के प्रति कॉन्फिडेंस डेवलप होता है। जिम्मेवार बनता है वो अपने खेल के प्रति। महंगा बिका खिलाड़ी पूरी कोशिश में रहता है कि वो अपना बेस्ट दे। हां, कभी-कभी चूक भी जाता है। तो क्या। क्रिकेट है ही 'लक वाई-चांस' का खेल।

खिलाड़ी कोई धर्मशाला खोले न बैठा है। कि, कोई भी मुफ्त में उसमें अपनी जगह बना ले। वो बिक रहा है। यही आज का अंतिम सत्य है। बाकी आदर्शवाद की तो संसार में कमी ही नहीं। जो बिकेगा वही पूरा एन्जॉय भी करवाएगा।

तो खिलाड़ियों के बिकने-बिकाने की प्रथा को यों ही बना रहने दें। उनके खेल का लुत्फ लें। इसी में परम सुख की प्राप्ति है।