रविवार, 10 जून 2018

महाभारत काल में 'इंटरनेट' का होना

अगर वो बताते नहीं तो हमें भी कहां पता नहीं चल पाता कि महाभारत काल में भी 'इंटरनेट का अस्तित्व' था! मैं समझ नहीं पा रहा महाभारत के रचयिता और सीरियल बनाने वालों ने हमसे इस 'महत्त्वपूर्ण रहस्य' को छिपाए क्यों रखा? महाभारत काल में 'इंटरनेट' का होना कोई छोटी-मोटी घटना नहीं थी। यह युद्ध से कहीं अधिक मायने रखती थी।

बल्कि मुझको तो ऐसा भी लगता है कि महाभारत की प्रत्येक घटना उस वक्त 'इंटरनेट' पर जरूर डाली गई होगी। यह गहन खोज का विषय है। इतिहासकारों एवं वैज्ञानिकों को इस पर अवश्य ही शोध करना चाहिए।
मुझे पक्का यकीन है, उन्होंने महाभारत काल में इंटरनेट होने की बात हवा में नहीं कही होगी। अवश्य ही उनके पास इसके ठोस तथ्य मौजूद होंगे। कोई और भले ही कर ले किंतु नेता लोग कभी इतिहास से छेड़छाड़ नहीं किया करते! हो सकता है, कभी उन्होंने भी उन जगहों की खुदाई की हो, जहां महाभारत का युद्ध घटा! जहां कौरव-पांडव आदि रहा करते थे। खुदाई के दौरान हो सकता है, उन्हें इंटरनेट चलाने वाली कोई डिवाइस मिली हो! सिम या फिर उस वक्त का कोई डेटा प्लान की शीट आदि ही हाथ आ गई हो!

जब उस दौर में इंटरनेट था ही तो यह भी संभव है कि किसी न किसी शक्ल में मोबाइल भी जरूर रहे ही होंगे। वरना, तब वे लोग इंटरनेट चलाते किस पर थे।

मुझे तो इस बात की भी हैरानी है कि पूर्व में हुईं इतनी खुदाइयों के बाद भी खुदाई-कर्त्ता वो नहीं खोज पाए जो उन्होंने एक ही बार में खोजकर देश को बता दिया। इससे यह बात भी प्रमाणित होती है कि देश के नेता सिर्फ राजनीति ही करना नहीं जानते बल्कि वे पैराणिक काल की भी ठीक-ठाक जानकारी रखते हैं।

उनके कहे पर मेरी सहमति इस कारण भी बनती है क्योंकि महाभारत के युद्ध का आंखों-देखा हाल संजय ने महाराज धृतराष्ट्र को सुनाया था। एक-एक पल की खबर उन्हें वे देते रहते थे। इतना ही नहीं वासुदेव कृष्ण भी युद्ध का परिणाम बहुत अच्छे से जानते थे। एक-दूसरे के खेमे की गुप्त सूचनाओं का आदान-प्रदान भी, तब के इंटरनेट के, माध्यम से ही होता रहा होगा।

इंटरनेट का तो खैर उन्होंने बता ही दिया, साथ ही, यह भी खोज और जिज्ञासा का विषय है कि क्या यूट्यूब का जलवा तब भी था! राजा-महाराजा अपना मनोरंजन गीत-संगीत-नृत्य आदि से तो करते ही थे, क्या दिल बहलाने को यूट्यूब का भी इस्तेमाल किया करते थे! जब इंटरनेट था तो संभव है, यूट्यूब भी रहा ही होगा! वैसे, इस विषय पर शोध किया जा सकता है।

अभी एक नेता ने और भी दिलचस्प बयान दिया कि नारदजी के पास गूगल समान जानकारियां रहती थीं। कुछ समय पहले इन्हीं नेता जी ने राम के तीरों को इसरो के रॉकेट जैसा बताया था! मगर लोग हैं कि इस सब को मजाक समझ हवा में उड़ा दे रहे हैं। किंतु मैं ऐसा कतई नहीं करता। बल्कि मुझे तो गर्व टाइप फील हो रहा है कि मेरे देश के नेता वैज्ञानिक सोच के मामले में दस कदम आगे हैं। बेशक, उनकी बातों-बयानों को सुनकर आपका सिर चकरा रहा होगा पर पौराणिक सत्य को कभी झुठलाया नहीं जा सकता।

न भूलें, डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को भी पिछले दिनों एक नेता ने चुनौती दी थी।

चलिए, वापस महाभारत पर लौटते हैं। अक्सर जब महाभारत के युद्ध के विषय में सोचता हूं तो मेरे दिमाग में बार-बार यही प्रश्न कौंधता है कि महाभारत का युद्ध कहीं इंटरनेट की मदद से तो नहीं लड़ा गया था? कहीं युद्ध के तौर-तरीकों को गूगल तो नहीं किया गया था? मामा शकुनि के बारे में अक्सर मुझे कुछ ऐसा ही शक होता है। उनके पास अपने प्रिय भांजे दुर्योधन को देने के लिए इतनी सलाहें थीं। इतने तो वाण भी न होंगे अर्जुन के तरकश में।

महाभारत के किसी भी पात्र की बात कर लीजिए, हर किसी में कुछ न कुछ इंटरनेटिए प्रभाव दिखेगा ही।

मुझे तो पांडवों द्वारा इंद्रप्रस्थ का निर्माण भी गूगल किया हुआ ही लगता है।

इतने प्रमाण मिलने के बाद भी उनके बयान 'महाभारत काल में इंटरनेट था' पर विश्वास न करना कोरी बेवकूफी ही कहलाएगी। शेष आपकी मर्जी।

शनिवार, 9 जून 2018

व्यंग्य में 'पाथ ब्रेकिंग'

जीवन में सफलता का रास्ता अच्छा पढ़ने या अच्छा करियर बनाने से ही नहीं निकलता, 'पाथ ब्रेकिंग' से भी निकलता है। 'पाथ ब्रेकिंग' की अवधारणा को काफी हद तक स्वरा भास्कर ने साबित भी किया है। खुलकर बताया कि मनुष्य के 'चरम सुख' का सुख 'पाथ ब्रेकिंग' में ही निहित है। हालांकि हमारा ऊपर से 'सभ्य' लगने-दिखने वाला समाज अभी 'पाथ ब्रेकिंग' के कॉन्सेप्ट पर नाक-मुंह जरूर सिकोड़ रहा है पर भीतर ही भीतर इसका दीवाना भी बन चुका है। लेकिन बताएगा थोड़े न!

वो तो लोगों को 'पाथ ब्रेकिंग' के कॉन्सेप्ट का एहसास 'वीरे दी वेडिंग' में हुआ जबकि यह उपलब्धि तो चचा वात्स्यायन जाने कब की हमें 'कामासूत्र' के रूप में दे चुके हैं। वही है न कि 'घर की मुर्गी दाल बराबर।'

लोगों के बेड-रूम का तो मुझे नहीं पता मगर सोशल मीडिया पर 'पाथ ब्रेकिंग' ने इन दिनों गजब ढाह रखा है। 'पाथ ब्रेकिंग' पर बनने वाले जोक और वन-लाइनर्स इसकी सफलता की कहानी खुद कह रहे हैं। 'पाथ ब्रेकिंग' शब्द को ईजाद करने वाले ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उसका यह शब्द 'यूथ आइकन' बन जाएगा। आलम यह है कि अब तो सड़क चलते कोई भी पूछ लेता है 'और जनाब 'पाथ ब्रेकिंग' कैसी चल रही है?'

मेरे विचार में 'फॉग' के बाद सबसे ज्यादा पूछे जाने वाला सवाल 'पाथ ब्रेकिंग' ही है।

'पाथ ब्रेकिंग' में मुझे अनंत संभावनाएं नजर आ रही हैं। सबसे ज्यादा व्यंग्य में। व्यंग्य के लिए सबसे धांसू नजरिया है 'पाथ ब्रेकिंग'। एक से बढ़कर एक 'पाथ ब्रेकिंग' व्यंग्य लिखे जा सकते हैं। बल्कि मैं तो यहां तक कहने को तैयार हूं 'पाथ ब्रेकिंग' व्यंग्य का भविष्य है। मौजूदा दौर के व्यंग्यकारों को इस मसले पर गंभीर चिंतन करने की जरूरत है।

आपाधापी भरी जिंदगी में जैसे कुछ पल का 'चरम सुख' शरीर को लाइट रखने का काम करता है, वैसे ही व्यंग्य में 'पाथ ब्रेकिंग' मूड को रिफ्रेश करने के काम आएगा। दिमाग पर हर वक्त गंभीरता का लबादा ओढ़े रखना भी ठीक नहीं।

मैं तो यह सोचकर हैरान हूं कि हमारे पुराने और वरिष्ठ व्यंग्यकारों ने 'पाथ ब्रेकिंग' के कॉन्सेप्ट को अपने व्यंग्य लेखन में लेने का प्रयास क्यों नहीं किया? इतनी उत्तेजक रचनात्मकता से अपने पाठकों को महरूम क्यों रखा? माना कि व्यंग्य में जरा बहुत संवेदना, सरोकार, कलात्मकता जरूरी है किंतु 'पाथ ब्रेकिंग' भी उतनी ही आवश्यक है।

खैर...। जो हुआ सो हुआ। वो समय अलग था, यह समय अलग है।

व्यंग्य में नई चमक और गर्माहट पैदा करने के लिए 'पाथ ब्रेकिंग' जरूरी है। लेकिन ये व्यंग्य में आ तभी पाएगी जब हमारे जीवन में भी थोड़ी-बहुत 'पाथ ब्रेकिंग' का चांस बना रहे।

शुक्रवार, 8 जून 2018

फूफा जी का डांस

डांस हर कोई नहीं कर सकता। न डांस हर किसी को कराया जा सकता है। जो डांस नहीं कर सकते, उन्हें आंगन हर वक्त टेढ़ा ही नजर आता है। लेकिन विदिशा (मध्य प्रदेश) वाले फूफा जी ऐसे नहीं हैं। वे शादी में आए अन्य फूफओं से बहुत अलग हैं। आजकल तो अपने 'अद्भुत डांस' के चलते पूरी दुनिया में वायरल हो रखे हैं। दुनिया ही नहीं पूरा सोशल मीडिया उनके डांस का मुरीद बन बैठा है। ट्विटर पर उनके डांस को जमकर रि-ट्वीट किया जा रहा है। तो फेसबुक की पोस्टों में फूफा जी के चर्चे हैं।

जिसे देखो उसी की मोबाइल स्क्रीन पर फूफा जी डांस करते दिख जाएंगे। फूफा जी के डांस ने ऐसा रंग जमाया है कि बॉलीवुड से लेकर मामा जी तक को तारीफ करनी पड़ गई है। मामा जी ने तो यहां तक कह डाला कि मध्य प्रदेश के पानी में कुछ बात तो है। सही है। पानी आखिर कहीं तो अपना असर छोड़ता ही है।

फूफा जी के फुर्तीले डांस को देखकर एक बार फिर यह धारणा मजबूत हो चली है कि डांस में उम्र मायने नहीं रखती। बस दिल का जवां और शरीर का चुस्त होना जरूरी है। वजन भी खास मायने नहीं रखता फूफा जी को नाचता देखकर।

पता नहीं गोविंदा ने फूफा जी का डांस अभी देखा होगा कि नहीं। अगर देख लेंगे तो दीवाने वे भी उनके हुए बिना न मानेंगे।

फूफा जी को डांस करते जब से देखा है, मेरा दिल भी डांस करने को मचलने लगा है। बीच में पत्नी ने भी ताना मार दिया- 'देखो, ऐसे होता है डांस। तुम्हारी तरह नहीं सिर्फ हाथ-पैर हिला लिए।' पत्नी ने हल्की-सी हिदायत भी दे डाली- 'मेरी मानो थोड़े दिन विदिशा में रहकर फूफा जी से डांस सीख आओ।'

पत्नी की सलाह नेक है लेकिन नौकरी की अपनी दुश्वारियां हैं।
बचपन में बड़ी तमन्ना थी, जब भी माइकल जैक्सन को डांस करते देखता था, उस जैसा बनने की। वैसा ही डांस करने की। बॉडी को उतना ही लचीला बनाने की। केवल डांस के दम पर पूरी दुनिया पर छा जाने की। मगर हर कोई तो माइकल जैक्सन नहीं हो सकता न। जैक्सन बनने का ख्वाब ख्वाब ही रहा। फिलहाल, लेखक बन गया।

लेकिन फूफा जी के गोविंदा स्टाइल डांस ने दिल मोह लिया। शरीर में इतना लोच, इतनी स्फूर्ति जाने कहां से लाते हैं फूफा जी।

मानना तो पड़ेगा, डांस प्रेमी होते बहुत जिंदादिल हैं। कहीं भी, कैसे भी डांस करवा लो बिना शर्माए नाच जाते हैं। वे डांस कर अपने शरीर की चपलता को बनाए रखते हैं। और एक हम लेखक हैं, जो इस-उस पर टिका-टिप्पणी कर अपना दिल जलाते रहते हैं।

कितना खुशनसीब है वो परिवार जिसमें ऐसे मस्त डांसर फूफा जी हैं। फूफा शादियों में सिर्फ मुंह ही नहीं बिगाड़ते, डांस भी बिंदास करते हैं। जियो फूफा जी।

बुधवार, 6 जून 2018

फ्लिपकार्ट का बिकना

जब भी किसी को बिकते देखता हूं तो खास आश्चर्य नहीं होता। सोचता हूं, अगले में बिकने का गुण रहा होगा, इसीलिए तो बिका। वरना, इस घोर प्रतिस्पर्धा के समय में बिकना-बिकाना इतना आसान कहां।
मैं तो जब आईपीएल के खिलाड़ियों को बिकते देखता हूं तो यह हौसला मन में जगा रहता है कि बिकना इतना बुरा भी नहीं अगर ठीक-ठाक पैसे मिल रहे हों।

इसीलिए फ्लिपकार्ट ने ठीक किया वालमार्ट के हाथों बिक कर। खुद की मेहनत पर खड़ी की दुकान बंद करने से तो बेहतर था कि उसे बेच दिया जाए। जब बिजनेस की झोंक खुद से न संभल पा रही हो तो उसका तियां-पांचा कर ही देना चाहिए।

मगर फ्लिपकार्ट के बिकने पर देश का बुद्धिजीवि वर्ग बड़ा परेशान है। उनकी परेशानी को सुनकर लग तो ऐसा रहा है मानो- उनके बेटे की दुकान बिक गई हो! जबकि खुद बड़े आराम की जिंदगी बसर कर रहा है देश का बुद्धिजीवि वर्ग। सिवाय हर मुद्दे पर गाल बजाने और जुबान चटखाने के कोई खास काम उनके कने नहीं होता।

कह रहे हैं, फ्लिपकार्ट का बिकना देश को विदेशी पूंजीवाद के हाथों गिरवीं रख देने जैसा है। सरकार धीरे-धीरे कर देश के उद्योग-धंधों को विदेशी कंपनियों को सौंप रही है। पहली बात तो यह है कि फ्लिपकार्ट ने बिकने का फैसला खुद से किया है, सरकार का इस डील में कोई रोल ही नहीं बनता। और फिर ऐसा कौन-सा धंधा है, जहां विदेशी हस्तक्षेप नहीं है। खाने से लेकर जीने तक हर कहीं विदेशी आइटम्स का दबदबा है। पूंजीवाद का विरोध तो महज दिखावा है। बुद्धिजीवि खुद अंदर से कितना पूंजी में डूबे हुए हैं, सब जानते हैं।

वैसे, जब भी देशी कंपनियों को विदेशियों के हाथों बिकते देखता हूं तो यही सवाल मन में आता है कि हम भारतीयों को बाजार की मांग के मुताबिक चलना नहीं आता। कस्टमर्स का टेस्ट कंपनियां जान नहीं पातीं। जबकि अपना माल बेचने में विदेशी हमसे कहीं अधिक चालक और तेज होते हैं। अगर यह सच न होता तो मोबाइल मार्केट में चाइनीज फोनों की धूम न होती।

खैर, फिर भी दो बंदों ने फ्लिपकार्ट को इतने लंबे समय तक अपने दम पर टिकाए रखा बड़ी बात है। बाद में जब कंपनी हाथ से फिसलने लगी तो बेच दी। बिल्कुल ठीक किया। फिसलने से पहले संभल जाने में ही तो समझदारी है।

बिकना-बिकाना खुद को मार्केट में बनाए रखने के फंडे हैं। आज के दौर में कामयाब भी वही है जो खुद को ऊंचा बेच सके। चाहे खिलाड़ी हो या कलाकार या फिर लेखक ही क्यों न हो। अंटी में आता पैसा किसे बुरा लगता है जनाब।

मुझसे तो कोई आकर कहे कि मैं आपके लेखन को खरीदना चाहता हूं, मैं तो हंसी-हंसी स्वीकृति दे दूंगा। खरीद ले। पर पैसा मस्त दियो। पैसा ही जीवन का अंतिम सत्य है। बाकी सब हवाबाजी है महाराज।

खैर, जिसे बिकना था वो बिक गई। जिन्हें पूंजीवाद को गरियाना है, गरियाते रहें। मुनाफा पहले है। जज्बातों का कोई अचार थोड़े न डालना है उम्रभर। क्या समझे।

मंगलवार, 5 जून 2018

खटमलों से प्रेम

पिछले दिनों एक सज्जन के घर ठहरने का मौका मिला। सज्जन की सज्जनता तब बहुत भा गई, जब रात को सोने से पहले ही उन्होंने मुझे बता दिया कि उनकी खटिया और बिस्तर में खटमल हैं! खटमल का नाम सुनते ही मेरा मन प्रसन्न हो उठा। मैंने उन्हें खटमल वाली खटिया और बिस्तर पर मुझे सुलाने के लिए तहे-दिल से धन्यवाद दिया। एक बार को वे भी थोड़ा सकपका-सा गए कि कैसा बंदा है, जो खटमल की खटिया और बिस्तर पर सोने के लिए बाबला हुआ जा रहा है।

उन्होंने मुझसे पूछा भी कि मुझे खटमलों के साथ सोने में कोई एतराज तो नहीं। मैंने उन्हें साफ कह दिया एतराज का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। बल्कि खटमलों के प्रति तो मेरे दिल में बचपन से ही प्यार और आदर हैं। खटमल द्वारा इंसानों का खून पीने को मैं कतई बुरा नहीं मानता। इंसान का खून उनका भोजन है। यों, किसी के भोजन पर लात मारना उचित नहीं।

वक्त ने इंसान को बड़ा निर्दयी और मतलबपरस्त बना दिया है। हमेशा वो अपना ही भला सोचता है। कभी नहीं चाहता कि उसके दम पर किसी दूसरे के साथ भी अच्छा हो। अपवादों को छोड़ दें तो 'अच्छाई' करना इंसानों की कुंडली में लिखा ही नहीं।

किंतु मैं ऐसा रत्तीभर नहीं सोचता। चाहे खटमल हो या छिपकली, इंसान हो या शैतान कोशिश मेरी यही रहती है, उनके साथ अच्छा ही करूं। बताते है, अच्छा करने से स्वर्ग मिलता है। हालांकि मुझे स्वर्ग की कभी तमन्ना नहीं रही, फिर भी, अगर मिल जाए तो क्या हर्ज?

कोई ऐसा मानेगा तो नहीं पर हम इंसानों ने खटमलों के साथ ज्यादती बहुत की है। उन्हें यों उपेक्षित रख छोड़ा है मानो वे हमें भारी नुकसान पहुंचाते हों! जबकि हकीकत यह है कि खटमल सिवाय इंसान का खून चूसने के और कोई हानि उसे नहीं पहुंचाता। एक नन्हा-सा जीव इतने बड़े इंसान का कितना खून चट कर जाएगा भला! उससे कहीं अधिक मात्रा में इंसान जानवरों का खून कर रहा है। खुद ही एक-दूसरे के खून का प्यासा है।

लेकिन खटमल जरा-सा क्या पी ले, हमें तरह-तरह की मुसीबतें होने लगती हैं। तुरंत ही उसे मारने के इंतजाम किए जाते हैं। जबकि खटमल से कहीं खतरनाक मच्छर है पर उस पर इंसान का जोर चल ही नहीं पा रहा। देश में मच्छर सुकून भरी जिंदगी जी रहे हैं। और बेचारे खटमल विलुप्ति की कगार पर हैं।

खटमलों के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए किया मैंने यह है कि मैं उन सज्जन के यहां से दस-बीस खटमल मांग लाया हूं। ताकि उन्हें अपनी खटिया और बिस्तर पर संरक्षण दे सकूं। रात को जब सोऊं तो वे मेरे खून से अपनी भूख मिटा सकें। भूखे को भोजन खिलाना शास्त्रों में भी पुण्य का काम बताया गया है।

शेर, चीता, गाय आदि तो हम बचाते ही रहते हैं अब थोड़ा हमें खटमलों को बचाने के बारे में भी सोचना चाहिए। खटमलों को भी हमारे प्यार की दरकार है।

गुरुवार, 31 मई 2018

आत्मचिंतन ही तो कर रहा हूं

मेरे शुभचिंतक अक्सर मुझे यह सलाह देते हैं कि मैं अपने लेखन पर आत्मचिंतन करूं! उनका मानना है कि निरंतर आत्मचिंतन से मैं अपने लेखन को और भी निखार सकता हूं।

उनकी सलाह सिर-आंखों पर। ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि मेरे शुभचिंतक मुझे सलाह दें और मैं न मानूं। मैंने धरती पर जन्म ही अपने शुभचिंतकों की सलाहें मानने के लिए लिया है! जिस दिन मैं उनकी सलाह मानने में अपनी दिलचस्पी रखना छोड़ दूंगा, समझिए मेरी रचनात्मकता कूड़ा हो जाएगी!

ऐसा नहीं कि मैं आत्मचिंतन नहीं करता। खूब करता हूं। कभी-कभी तो एक साथ इतना आत्मचिंतन कर लेता हूं कि मेरी आत्मा और मेरा चिंतन दोनों मिलकर मुझे गरियाने लग जाते हैं। एक दफा की बात है, मेरी आत्मा ने मेरे भीतर रहने से ही इनकार कर दिया था। आरोप लगा रही थी कि मैं चिंतन के बहाने उसका (आत्मा) का मानसिक शोषण कर रहा हूं! वो तो भला हो मेरे शुभचिंतकों का कि उनकी रिक्वेस्ट पर वो वापस लौट आई।

वैसे, लगता नहीं कि मुझे मेरे लेखन पर आत्मचिंतन की आवश्यकता है। क्योंकि चिंतन-परक ऐसा कुछ मैं लिखता ही नहीं। लेखन में मैंने हमेशा ऐसे विषयों से जी चुराने की कोशिश की है, जिसमें बहुत अधिक चिंतन की जरूरत पड़े। चिंतन और चिंता दोनों को मैं चिता समान मानता हूं। (ये मेरा निजी मत है। मेरे शुभचिंतक कृपया दिल पर न लें।)

फिर भी, हल्का-फुल्का आत्मचिंतन मैं इसलिए कर लेता हो ताकि मेरे दिमाग का विकास ठीक-ठाक होता रहे। 'सबका साथ, सबका विकास' में मेरी घोर आस्था है!

जिस प्रकार का आत्मचिंतन बुद्धिजीवि लोग कर लेते हैं, उतना तो मैं दस जन्म लेकर भी नहीं कर सकता। पता नहीं उनकी आत्मा उनसे नाराज होती भी है या नहीं? कहीं यह सोचकर तो चुप्पी नहीं मार जाती कि बुद्धिजीवियों से क्या पंगा लेना। ये तो इनका 24x7 का काम है। सही भी है न, बुद्धिजीवि आत्मचिंतन नहीं करेगा तो क्या मुझ जैसे ठलुए करेंगे?

आत्मचिंतन बहुत उम्दा चीज है अगर देख-भाल कर किया जाये। शायद इसीलिए मेरे शुभचिंतक मुझे आत्मचिंतन करने की सलाह देते रहते हैं।
जी, आत्मचिंतन में ही लगा हूं।

शहरों को बदनाम करने की साजिश

एक सर्वे में एंवाई 14 शहरों को बदनाम कर डाला कि वो 'गंदे' हैं। शहर भला गंदे क्यों होने लगे! शहरों ने खुद को थोड़े न गंदा किया है। शहर तो गंदे इंसानों ने मिलकर किए हैं। सड़क से लेकर हवा-पानी तक को इतना दूषित कर दिया कि रहना तो छोड़िए, सांस लेना तक मुश्किल। शहरों की गंदगी जब खुद से संभल नहीं पाई तो कह दिया कि अमुख-अमुख शहर गंदे हैं।

जबकि हकीकत तो यह है कि शहर नहीं इंसान की मानसिकता ही गंदी है। इतने बरसों में इंसान न खुद को साफ-सुथरा रख सका न अपने शहरों को। जहां भी गया गंदगी लेकर गया। वो तो गनीमत बस इतनी रही है कि अभी चांद और सूरज रहने लायक ठिकाने नहीं बन पाए हैं इंसानों के इसलिए गंदगी से बचे हुए हैं। वरना उन्हें भी इंसानों ने कब का प्रदूषित कर डाला होता। फिर भी, कवायदें जारी हैं मंगल ग्रह पर आशियाना बसाने की।

गंदगी से हमारा प्रेम अब का नहीं बल्कि आदमजात के जन्म से है। तब हम अपनी अनिभिज्ञता के चलते गंदे रहते थे, अब अभिज्ञता के चलते रहते हैं। प्राथमिकता में हमारी अपने घर का चबूतरा साफ-सफाई संपन्न रहे, यही रहता है। पड़ोसी का चबूतरा या गली की नालियां कितनी ही गंदी रहें, हमसे नहीं मतलब। अपना चकचक रखने के चक्कर में हम प्रायः दूसरे का घर गंदा करने से कभी गुरेज नहीं करते।

शहरों का हाल भी कुछ ऐसा ही है। शहर खुद से गंदे कभी नहीं रहे। गंदा तो हमने उन्हें किया है। अपने दिमागों में पसरा कचरा हम शहरों की सड़कों-नालियों में डालते रहते हैं। धीरे-धीरे कर कचरे ने इतना विकराल रूप ले लिया कि खुली हवा में सांस लेना तक दुभर हो गया। हम कपड़ों से लेकर रहन-सहन तक में आधुनिक होते चले गए मगर अपनी सोच को गंदगी से पाट दिया। नतीजा सामने है।

देख रहा हूं आजकल शहरों को स्मार्ट बनाने का खूब हल्ला मचा पड़ा है। जिसे देखो वही जुटा है अपने शहर को स्मार्ट घोषित करवाने में। कभी शौचालय बनाकर तो कभी सफाई अभियान चला कर शहरों को स्मार्ट सिटी की घोड़ा-दौड़ में लाया जा रहा है। यहां भी नंबर गेम की जुगाड़ जोरों पर है।

तिस पर भी पान की थूक और राह चलते कुछ भी फेंक देने की आदत में सुधार नहीं आ पाया है। बरसों पुरानी आदत है इतनी जल्दी कैसी छूट जाएगी भला। अपनी आदतों पर पर्दा डालने का सबसे उत्तम समाधान है शहरों को गंदा दिखाकर उन्हें बदनाम कर दो। हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा।

सुना है, 14 शहरों की बदनामी होते ही सरकारी अमला नींद से जाग गया है। पूरी जी-जान से जुट पड़ा है, शहरों की गंदगी के प्रदूषित दागों को धोने के लिए।

फिलहाल, यह अभी रहस्यमय ही है कि प्रदूषित दाग कब तलक धुल पाएंगे। जो हो पर शहर तो खामख्वाह बदनाम हो ही गए न।