शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018

आतंकवादी नहीं हैं मच्छर

आजकल मुझे मच्छरों से पीड़ित लोग बहुत मिल रहे हैं। हर किसी की जुबान पर बस यही शिकायत है- 'मच्छरों ने आतंक मचा रखा है।' तो क्या मच्छर आतंकवादी हो गए हैं? नहीं। मैं मच्छरों की तुलना आतंक या आतंकवादी से करने के सख्त खिलाफ हूं। यह एक निरही जीव को बदनाम करने की कुत्सित साजिश है।

मैं इस बात की पूर्ण जिम्मेदारी लेने को तैयार हूं कि मच्छर कभी आतंक मचा ही नहीं सकते। आतंक न तो मच्छरों के स्वभाव में है न ही उनका शौक। यह मैं इसलिए भी कह रहा हूं क्योंकि मेरा उनका साथ 24x7 का है। न वे मुझसे एक पल को दूर रह सकते हैं न मैं उनसे।

सिर्फ हल्का-सा काट भर लेने के अतिरिक्त मच्छर कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। ईश्वर ने डंक उन्हें दिए ही इस बात के लिए हैं ताकि वे उनके माध्यम से खुद का दाना-पानी ले सकें। क्या हम मच्छरों के पेट की खातिर अपना थोड़ा-सा खून भी नहीं दे सकते? हे! मनुष्य, इतना भी स्वार्थी न बन कि एक नन्हे से जीव को जीवन भी न दे सके। यों भी बेचारे मच्छर की जिंदगी होती ही कितनी-सी है। बामुश्किल दस-पन्द्रह दिन।

मेरा ही खून दिन भर में जाने कितनी बार मच्छर पी लेते हैं किंतु मैंने न तो कभी बुरा माना न कभी शहर के डीएम साहब से शिकायत की। पी लेते हैं तो पी लें। इतने बड़े शरीर से चींटी बराबर खून अगर निकल भी जाएगा तो मेरा क्या चला जाएगा। जरूरतमंद को खून देना शास्त्रों में पुण्य का काम बताया गया है।

न जाने क्यों हम इंसान पुण्य कमाने से घबराते हैं। जबकि सबको पता है खाली हाथ आए थे, खाली हाथ ही जाना है। फिर भी...!

मच्छरों का वर्चस्व सर चढ़कर बोल रहा है। जमीन से लेकर जहाज तक में उनका रुतबा कायम है। अभी खबर पढ़ी कि एक विमान में मच्छर के काट लेने से अंदर विकट अप्रिय स्थिति बन गई। एयर-होस्टेस ने तो यात्री से यह तक कह डाला- 'हर कहीं हैं मच्छर। तुम देश बदल लो।'

मच्छरों से पार पाना फिलहाल असंभव-सा जान पड़ता है। लेकिन मच्छर आतंकवादी नहीं हैं।

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

नाम में कुछ न रखा

तय किया है कि मैं अपना नाम बदलूंगा! यह नाम अब मुझे जमता नहीं। न तो मेरे नाम में फिल्मी फील है न साहित्यिक प्रभाव। जब भी कोई मेरा नाम पुकारता है, लगता है, शुष्क नदी में पत्थर फेंक रहा हो! पता नहीं, क्या और क्यों सोचकर मेरे घर वालों ने मेरा यह नाम रख दिया।

बहुत अच्छे से याद है, जब क्लास में टीचर मुझे मेरे नाम से बुलाया करते तो सारे दोस्त मुझ पर हंसा करते थे। मजाक उड़ाते हुए कहते- कभी टाइम निकालकर दो-चार फूल हमारी बगिया में भी लगा जाना यार। कसम से उस वक़्त इतनी आक्रमक टाइप फील आती थी कि बस कुछ पूछिए मत। मन मसोस और मुट्ठी भिंच कर रह जाता था। लड़-भिड़ इसलिए नहीं सकता था क्योंकि मेरी गिनती क्लास के चरित्रवान स्टूडेंट्स में हुआ करती थी।

वैसे, मेरा चरित्रवान होना उनका कोरा भ्रम ही था। जबकि चरित्र से मेरा नाता दूर-दूर तक न तब था न अब है।

मैं अपने नाम के साथ कुछ ऐसा जोड़ना चाहता हूं ताकि भीड़ से अलग दिखूं। नाम से कुछ फेम तो कुछ बदनामी भी मिले। बदनामी से मैं डरता नहीं। क्योंकि लेखक आधा बदनाम ही होता है।

सोच रहा हूं, मैं भी अपने नाम के बीच में 'राम जी', 'शिव जी', 'गणेश जी', 'टकला', 'लंगड़ा', 'कबाड़ी', 'भूरा' आदि उपनाम लगा लूं। ये सभी नाम हिट हैं। और, आसानी से किसी की भी जुबान पर चढ़ जाने के लिए पर्याप्त हैं।

कोशिश मेरी यही रहेगी कि मेरे नाम पर थोड़ा सियासी बवाल भी हो। मेरे 'उपनाम' की प्रासंगिकता या अप्रासंगिकता पर नेता और बुद्धजीवि लोग आपस में बहस करें। मेरे उपनाम से जुड़ा इतिहास खंगाला जाए। सोशल मीडिया पर मेरे 'उपनाम' के स्क्रीन या फोटो-शॉप्ड लगे जाएं।
इससे मुझे और मेरे नाम दोनों को समान फायदा मिलेगा। साथ ही, इस अवधारणा पर लोगों का विश्वास मजूबत होगा कि नाम में कुछ न रखा। कभी भी कैसे भी इस्तेमाल कर लो।

मैं तो कहता हूं, एक मुझे ही नहीं हर किसी को अपने नाम के साथ कुछ-न-कुछ खिलवाड़ करते रहना चाहिए। इससे खुद के साथ-साथ कई लोगों का मन लगा रहता है।

बदनाम होकर नाम कमाने का चार्म ही कुछ अलग है बॉस।

बुधवार, 11 अप्रैल 2018

लोटावाद की जय

सिवाय 'लोटावाद' को छोड़कर दुनिया के किसी भी वाद में मेरा रत्तीभर विश्वास नहीं। बाकी वादों के साथ अपनी-अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताएं हैं लेकिन लोटावाद के साथ ऐसा कुछ भी नहीं। यह वाद एकदम स्वतंत्र है।

हालांकि लोग ऐसा मानेंगे नहीं लेकिन अपनी-अपनी लाइफ में थोड़े-बहुत लोटे तो हम सभी हैं। जहां सुविधा या निजी हित देखें हैं, वहां लुढ़के भी हैं। सफलता का पूरा स्वाद केवल वही लोग चख पाते हैं, जिन्होंने लुढ़कने को अपने जीवन का मंत्र बनाया हुआ है।

खामखां के आदर्शों से दिल को सुकून तो अवश्य मिल सकता है किंतु पेट नहीं भरा जा सकता। पेट भरने के लिए लोटा तो बनना ही पड़ेगा।
लुढ़काऊपन लोटे में स्वभाविक है, बनावटी नहीं। जिस भी दिशा में चाहता है वो लुढ़क सकता है। लोटे के लुढ़कने पर किसी का जोर नहीं। यही वजह है कि लोटावादी अपने लोटावाद के साथ ज्यादा सहज रह पाते हैं। जैसे मैं।

दुनिया में जितने भी किस्म के वाद हैं, हर वाद अपने साथ किसी न किसी वैचारिक मजबूरी को ढोह रहा है। वैचारिक मजबूरियां तब अधिक बोझप्रद जान पड़ती हैं जब उन्हें जबरन थोपने की कोशिश की जाती है। आजकल यही हो रहा है। अपने-अपने वाद में यकीन रखने वाले वादी पूरी मुस्तैदी से लगे हैं दूसरे के वाद को खारिज करने में। उनके वाद ने उन्हें लोटा बना रखा है लेकिन वे यह मानेंगे थोड़े ही।

मगर लोटा-प्रेमी मस्त हैं अपने लोटावाद के साथ। उन्हें किसी के वाद से कोई मतलब नहीं। न उनकी किसी के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता है न वाद की मजबूरी। उनका पूरा ध्यान लुढ़कने में केंद्रित रहता है। जिसे वे अच्छे से निभा रहे हैं।

मुझे भी लोटावाद एक आदर्श वाद लगता है। इसीलिए हर किस्म के वाद से मैं खुद को दूर रखता हूं। चूंकि मुझे- अपनी सुविधानुसार- लुढ़कना पसंद है इसलिए लोटों में मेरा विश्वास गहन है।

समाज और दुनिया को समझने के लिए आपको लोटा बनना ही पड़ेगा। जब तक आप लुढ़केंगे नहीं, जान ही नहीं पाएंगे कि सयाने किस एंगल की ओर झुके हुए हैं।

ये वाद-फाद सब ऊपरी दिखवे हैं, असली मकसद है अपने काम का निकलना। काम निकालने के लिए इंसान किसी भी हद तक जा सकता है। वादवादी तो अपने-अपने वादों को खुद पर इसलिए ढो रहे हैं ताकि समाज की सहानुभूति जुटा सकें। नादान हैं।

अगर खुद की प्रासंगिकता को बचाए रखना है तो वैचारिक वादों से ध्यान हटाकर लोटावादी बनिए। जहां मतलब निकलता हुआ दिखे बस वहीं लोट जाइए। दुनिया क्या कहेगी, इसकी फिक्र दुनिया वालों पर छोड़िए।

लुढ़कते लोटावाद को अपने जीवन का अंतिम सत्य मानकर चलिए। दुनिया आपके कदमों में न हो तो मेरा नाम बदल देना।

आइए, खुद पर हंसा जाए

हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हम खुद पर हंसने से कतराते हैं। हां, दूसरों पर हंसने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते। दूसरों पर हंसना हमें अपनी 'उपलब्धि' नजर आता है। कुछ चेहरे ऐसे भी होते हैं जिन्हें देखकर यह सोचना पड़ता है कि आखिर बार वे कब और कितना हंसे होंगे? एक अजीब टाइप की गंभीरता वे अपने चेहरे पर धरे रहते हैं। मानो, अपनी गंभीरता के दम पर शांति का नोबेल जीत लेने की तमन्ना रखते हों!

लेकिन वो लोग सबसे खतरनाक होते हैं जो अपनी हंसी हंसते और दूसरे की हंसी रोते हैं। इन पर हंसने का आप दुःसाहस भी नहीं कर सकते।
इतिहास गवाह है, दुर्योधन अपनी हंसी हंसता और दूसरे की हंसी रोता था। हिटलर कब हंसता था यह खुद उसको भी मालूम न रहता होगा!
इनसे इतर, चार्ली चैपलिन ने तो खैर हंसते-हंसाते ही अपनी जिंदगी गुजार दी। जॉनी वॉकर कभी उधार की हंसी नहीं हंसे। केश्टो मुखर्जी तो अपने चेहरे के चाप से ही हमें उन पर हंसने को मजबूर कर देते थे। लगभग ऐसा ही हाल मिस्टर बीन का है। उनकी शक्ल देखते ही हंसी आ जाए।

हंसी एक नायाब अस्त्र है खुद और दूसरों को मानसिक रूप से जवान रखने का। यों, हंसते तो हम सभी हैं पर अपने पर हंसी गई हंसी का कोई मुकाबला नहीं।

इसीलिए तो मेरी हरदम कोशिश यही रहती है कि मैं ज्यादा से ज्यादा खुद पर ही हंसूं। खुद पर कटाक्ष करूं। खुद की खिंचाई करूं। खुद की बेवकूफियों को केंद्र में रख खुद पर तंज कसूं। आखिर पता तो चले कि मुझमें खुद पर हंसने की कितनी कुव्वत है।

असली सुख तो मुझे तब हासिल होता है, जब लोग मुझ पर हंसकर खुश होते हैं। उनकी खुशी मेरे लिए मायने रखती है। वरना, भाग-दौड़ भरी जिंदगी में किसके पास इतना समय है कि वो किसी पर हंसकर खुश होए। खुशी और हंसी से तो लोग ऐसे दूर भागने लगे हैं जैसे बिल्ली को देखकर चूहा।

दिल से निकली हंसी की बात ही कुछ और है। पर कुछ लोग दिल से न हंस हंसने के लिए लॉफ्टर क्लब का सहारा लेते हैं। लॉफ्टर क्लबों की हंसी वास्तविक नहीं कृत्रिम होती हैं। वहां खुद से हंसा नहीं जाता, जबरन हंसाया जाता है।

न न मुझे उधार की ऐसी हंसी कतई स्वीकार नहीं। हंसने के लिए किसी का मुंह ताकने से बेहतर है कि खुद ही खुद पर हंस लें। किसी से शिकायत भी नहीं रहेगी।

बे-अक्ल हैं वे लोग जो मूर्खों पर गुसाते हैं। जबकि मूर्ख तो हंसी का सबसे उत्तम वाहक हैं। वे न हों तो लोग शायद हंस ही न पाएं! इसीलिए तो मुझे अपनी बेवकूफी पर गुस्सा नहीं, हंसी आती है। मैं चाहता भी यही हूं कि लोग मुझे पर हंसें ताकि हमारे दरमियान हंसी का कारोबार चलता रहे।

सोमवार, 9 अप्रैल 2018

मच्छर हैं सदा के लिए

'जियो और जीने दो' में मेरा विश्वास बचपन से है। अपनी तरफ से मेरी पूरी कोशिश रहती है- मैं न किसी को सताऊं, न मारूं, न दबाऊं। खुद भी सुकून की जिंदगी काटूं, दूसरे को भी काटने दूं। क्योंकि जीवन अनमोल है।

इसीलिए मैंने मच्छरों को मारना, उड़ाना, भागना कतई बंद कर दिया है। कमरे में विकट मच्छर होने के बावजूद न मैं कॉइल जलाता हूं न रैकेट ही चलाता हूं। उन्हें इत्मिनान से विचरण करने देता हूं। जहां जिधर भी बैठना चाहें बैठे रहने देता हूं। अब तो कमरे से मैंने सीलिंग फैन भी उखड़वा दिया है। हालांकि इस मुद्दे पर पत्नी से भीषण बहस कई दफा हो चुकी है मगर मैं अपने इरादे पर कायम हूं। क्योंकि जैसे मेरा जीवन अनमोल है वैसे ही मच्छरों का भी।

मच्छरों के प्रति हम बेहद नकारात्मक नजरिया रखते हैं। हर वक्त उनका विनाश करने का ही प्लान बनाते रहते हैं। अब तो सरकारें भी मच्छरों के अस्तित्व पर सख्त हो गई हैं। विडंबना देखिए, सरकार मधुमक्खी पालन पर तो जोर देती है किंतु मच्छर पालन पर गोल रहती है। क्या यह मच्छर प्रजाति का अपमान नहीं? जबकि मच्छर से कहीं ज्यादा नुकसान मधुमक्खी करती है। जिन्हें मधुमक्खी ने काटा हो, वे उस असहनीय पीड़ा को बेहतर समझ सकते हैं।

इंसान के आक्रामक व्यहवार को देखते हुए मच्छरों ने भी खुद को बदल लिया है। वे भी ढीठ हो चले हैं। इंसान कितनी ही जुगत कर ले उन्हें भगाने या मारने की अब न वे भगाते हैं न मरते। आलम यह है, उन पर किसी हानिकारक कॉइल, दवा, इस्प्रे, रेपिलेंट का भी कोई असर नहीं होता। वे धड़ल्ले से हमें काट रहे हैं। और अपना पेट भर रहे हैं।

देख रहा हूं, जिन मच्छरों से प्रायः मैं कटवाता रहता हूं, वे सेहत में बड़े बलशाली हैं। खूब मोटे-ताजा। किसी भी खाए-पीए मच्छर को दीवार पर बैठे देखता हूं, मेरा दिल अंदर से खासा गर्व फील करता है कि मेरा खून किसी के तो काम आ रहा। इंसान को खून पिलाने से कहीं बेहतर समझूंगा मच्छर को खून पिलाना। कम से कम वो मेरा एहसान तो मानेगा।

मैं सबकुछ सह सकता हूं लेकिन मच्छरों के प्रति बेवफाई बर्दाश्त नहीं कर सकता। चाहे कोई हो। मैं मच्छरों को यों बेमौत मारे जाने के सख्त खिलाफ हूं। मच्छर की उम्र यों भी 10-12 दिन की ही तो होती है। क्यों उसे उतने दिन सुकून से जीने दिया जाए। हमें किसी की भी जान लेने का लीगल अधिकार नहीं। नहीं तो हममें और जानवर में फर्क ही क्या रह जाएगा।

सोच रहा हूं, अपनी बची-खुची जिंदगी मच्छरों को बचाने, उनके हितों की रक्षा में खर्च कर दूं। इंसानों के साथ सहानुभूति जताने के हश्र उपेक्षा के रूप में ही मिला है मुझे। क्यों न अब मच्छरों के जीवन को ही बचाया जाए।

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

निजता का लीक होना

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी कभी था। अब सोशल मीडिया का प्राणी है। जागने से लेकर सोने तक के सारे काम अब वो सोशल मीडिया पर 'ही' करता है। उसकी उंगलियों को तब तक चैन नहीं पड़ता जब तक वो उससे छोटी से छोटी बात का स्टेटस उसके फेसबुक पर डलवा नहीं लेतीं।

सोशल मीडिया पर किसी का किसी से कुछ भी छिपा नहीं है। हर कोई हर एक के बारे में उसकी पसंद, उसके टहलने-घुमने का समय, उसने क्या खाया, क्या पचाया, कब किससे कहां मिला सब जानता है। आलम यह है कि दो पड़ोसी आपस में एक-दूसरे को न जानते हों, न कभी मिले हों पर सोशल मीडिया पर सारी औपचारिकताएं निभा लेते हैं। व्यक्तिगत रूप से मिलना अब बोझ टाइप मामला लगने लगा है।

इतना कुछ सोशल मीडिया पर डालते रहने पर कभी-कभी वो चीजें भी यहां आ लेती हैं जिन्हें नहीं आना चाहिए। निजता में खलल पड़ने जैसा मामला हो जाता है। निजता में खलल पड़ते ही लिकिंग का दौर शुरू हो जाता है। न केवल सोशल मीडिया, बाहर पर खूब हंगामा मचता है।
जिनका डाटा लीक होता है वो तो शोर मचाते हैं ही, वो लोग भी खूब उछल-कूद करते हैं जिन्हें इस मसले से न लेना एक न देना दो होता है। बहती गंगा में भला कौन हाथ नहीं धोना चाहेगा।

डाटा लीक के मुद्दे पर जितना राजनीतिक दल आपस में मुंह-जोरी कर रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा बुद्धिजीवि सुलग रहे हैं। ये सारा सीन घटित हो सोशल मीडिया पर ही रहा है। हालांकि हमाम में नंगे सभी हैं पर स्वीकार कोई नहीं करना चाहता। निजता पर बहसबाजी चल अवश्य रही है पर छींकने, खंखारने की पोस्टें और पाउट बनाने की सेल्फियां फिर भी फेसबुक पर छाई हुई हैं। इनमें कहीं कोई कमी नहीं आई है।

लोग इतनी-सी बात नहीं समझते कि सोशल मीडिया या फेसबुक पर हमारा कुछ भी निजी नहीं है। सबकुछ पब्लिक डोमेन है। हमने खुद ही सबको यह अधिकार दे रखा है कि 'आओ, हमारा कुछ भी लीक कर जाओ।'

सोशल मीडिया पर निजता का लीक होने भी 'बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा' टाइप मामला है। यहां जिसकी निजता सबसे अधिक लीक हुई है, वो रात भर में सेलिब्रिटी बन गया। मसला यह नहीं है कि क्या लीक हुआ, सुकून इस बात का है कि जो लीक हुआ चलो अच्छा ही हुआ। घर बैठे मिला फेम भला कौन नहीं लेना चाहेगा!

सौ बात की एक बात ये है पियारे कि निजताएं कितनी भी क्यों न लीक हो जाएं लेकिन हम सोशल मीडिया या फेसबुक का साथ नहीं छोड़ने वाले। चूंकि लिकिंग का मामला अभी नया-नया है तो हल्ला कट भी रहा है, जैसे-जैसे लीकता के मामले पुराने पड़ने लगेंगे सब भूल जाएंगे। कुछ दिनों बाद लोग खुद ही कहते मिलेंगे- जैसे पैसा हाथ का मैल है, उसी तरह निजता का लीक होने सोशल मीडिया का मैल है। लेकिन यह मैल डिजिटल है अतः लोगों से सध जाएगा।

फिर भी, आप अपनी निजता के लीक होने की चिंताएं करना चाहते हैं तो शौक से करें। आखिर दिमाग है आपका।

शनिवार, 31 मार्च 2018

सोशल मीडिया के मूर्ख

पत्नी मुझे सोशल मीडिया का मूर्ख कहती है। पत्नी है। सच ही कहती होगी! यों भी, पत्नियां अपने पतियों के बारे में 'झूठ' कहती कब हैं! खुद के बारे में पत्नी के कहे का पहले कभी बुरा नहीं माना तो अब क्या मानूंगा! यह क्या कम बड़ी बात है कि पत्नी मेरे बारे में 'कुछ कहती' है। 'सही' कहती है या 'गलत'; यह अलहदा बहस का मुद्दा हो सकता है। मगर मैं बहस कभी नहीं करना चाहूंगा। पत्नी के कहे पर पति को बहस कभी करनी चाहिए भी नहीं। बहस बेलन में तब्दील होते देर ही कितनी लगती है।

जी हां, मुझे यह स्वीकार करने में रत्तीभर एतराज नहीं कि मैं सोशल मीडिया का मूर्ख हूं। जिनके लिए होगा लेकिन मेरे लिए मूर्ख होना न तो पाप है न शर्मिंदा होने का कोई कारण। खुशनसीब होते हैं वो जिनमें मूर्खता जन्मजात होती है। मुझमें है, इस बात का मुझे गर्व है।

एक मैं ही क्यों सोशल मीडिया पर मौजूद हर शख्स किसी न किसी लेबल पर मूर्ख ही है। अपनी मूर्खता का प्रमाण वो अक्सर अपनी पोस्टों से देता रहता है। कुछ मूर्ख तो इतने महान हैं कि वे 24x7 फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से समाज-दुनिया में क्रांति करने का जोर लगाते रहते हैं। पर क्रांति है की होना तो दूर, उनके आस-पास भी नहीं फटकती। क्रांति कोई लड्डू-पेड़ा थोड़े ही है कि खाया और हो गई।

सोशल मीडिया पर मूर्खता दर्शाने का अपना आनंद है। किसी भी छोटे से छोटे मुद्दे पर ट्रॉलिंग का लेबल चढ़ा कर उसे एकाध दिन खूब भुनाया जा सकता है। जिसे देखो वो ही बहती गंगा में हाथ धोने आ जाता है। आनंद तो वे लोग भी खूब लेते हैं जो अक्सर ट्रोलिंग पर लंबा-चौड़ा भाषण देते पाए जाते हैं।

दूसरे की मूर्खता पर हंसना सबसे आसान होता है बा-मुकाबले अपनी मूर्खता पर हंसने के।

मैं तो कहता हूं, सोशल मीडिया की गाड़ी चल ही हम जैसे सोशल मूर्खों के कारण रही है। अगर हम अपनी मूर्खताओं को जग-जाहिर न करें तो न यहां कोई हंसे न मुस्कुराए। सब बुद्विजीवियों की तरह या तो माथे पर बल डाले बैठे रहें या फिर किसी गंभीर विमार्श में अपनी खोपड़ी खपाते रहें। वो तो बुद्विजीवियों ने सोशल मीडिया पर अपना कब्जा जमा रखा है वरना यह प्लेटफॉर्म उनके लिए है ही नहीं। वे तो किताबों के पन्नों पर ही चंगे लगते हैं।

जो करते हों उनकी वे जाने पर मैं सोशल मीडिया पर जरा भी बुद्धि का इस्तेमाल नहीं करता। यह वो जगह है ही नहीं जहां बुद्धि को खर्च किया जाए। यह तो नितांत मनोरंजन की जगह है। जहां आप अपनी निजताओं का त्याग कर सुकून भरी सांस ले सकते हैं। अपने खान-पान से लेकर सोने-जागने तक के सिलसिले को लिख अपनी वॉल भर सकते हैं। तिस पर भी आप जुकरबर्ग को सिर्फ इसलिए कोसते रहें कि उसने आपकी निजता का ख्याल नहीं रखा, तो महाराज आप बहुत बड़े वाले हैं। अपनी निजता अपने हाथ। जुकरबर्ग ने कोई ठेका थोड़े न लिया हुआ है आपकी निजताओं के सरंक्षण का।

लेकिन मुझ जैसे मूर्ख इन सब बोगस चिंताओं में नहीं पड़ते। हम सोशल मीडिया के मूर्खों का कुछ भी निजी नहीं। सबकुछ पब्लिक है। जो भी जब चाहे हमारी मूर्खताओं का आनंद उठा सकता है।

इसीलिए तो मैं पत्नी के मुझको सोशल मीडिया का मूर्ख कहने का बुरा नहीं मानता। अपने पति की काबिलियत को पत्नी से बेहतर कोई समझ सका है भला! नहीं न...!

तो अपनी मूर्खताओं पर खिझिये नहीं, उन्हें एन्जॉय कीजिए। जैसे मैं करता रहता हूं। सोशल मीडिया का लुत्फ खुद मूर्ख बने लिया ही नहीं जा सकता।