मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

दुमदार बुद्धिजीवि

मेरे पड़ोस में एक ‘दुमदार बुद्धिजीवि’ रहते हैं! नहीं.. नहीं..उनकी सचमूच की ‘दुम’ नहीं है। हैं वो हमारी-आपकी तरह ही सामान्य इंसान। दुमदार उन्हें इसलिए कह रहा हूं क्योंकि वे हर वक्त मुझे यह एहसास करवाते रहते हैं कि उनकी बुद्धिजीविता उनकी दुम (विचारधारा) में बसा करती है। यों, मोहल्ले में उनका किसी से भी दुआ-सलाम नहीं है सिवाय मेरे। उन्हें ऐसा लगता है, चूंकि मैं अखबारों में लिखता हूं, इस नाते मैं भी उन्हीं की तरह बुद्धिजीवि हूं और मेरी भी दुम है!

जबकि हकीकत यह है कि मैं न बुद्धिजीवि हूं। न मेरी कोई दुम (विचारधारा) है। न ही मैं किसी टाइप के बुद्धिजीवि से दूर-पास का रिश्ता रखना पसंद करता हूं। बुद्धिजीवियों से मैं उत्ता ही घबराता हूं, जित्ता इंसान सांप से। मोहल्ले में आते-जाते जब भी वो मेरे सामने पड़ते हैं, कोशिश यही रहती है, उनसे हट-बचकर निकला जाए। किंतु हर दफा किस्मत भी कहां साथ देती है।

अभी दो-चार रोज पहले वे हमारे घर आ धमके। घर आए पड़ोसी को यों टरकराना भी अच्छा नहीं लगा सो उनके साथ बैठक जमानी पड़ी। साहित्य-राजनीति-समाज आदि से जुड़े मुद्दों पर आपस में खूब लंबी-लंबी खींची।

पहला सवाल उन्होंने मुझ पर यह दागा कि मैं किस विचाधारा को मानता हूं? जिज्ञासावश मैंने उनसे पूछ लिया- ‘विचारधारा...? यह क्या बला होती है भला?’ चेहरे पर गंभीरता का भाव लाते हुए बुद्धिजीवि महोदय बोले- ‘अरे, आप विचारधारा नहीं जानते? ‘विचारधारा’ तो बुद्धिजीवियों की ‘दुम’ समान होती है। जैसे- मेरी है। मैं बिना दुम (विचारधारा) के न कुछ सोच सकता हूं न लिख सकता। लेखन की बुनियाद विचारधारा पर ही टिकी होती है।‘

बुद्धिजीवि महोदय से बात करते वक्त मैं थोड़ा ‘नर्वस’ था। पहली दफा किसी दुमदार बुद्धिजीवि का सामना कर रहा था न। उस पर विचारधारा पर बहस...! ये तो मेरे सिर के ऊपर से ही जा रही थी। थोड़ा हिम्मत का दामन थामने हुए मैंने उनसे कहा- ‘महोदय, यह सच है कि मैं लेखक हूं। लिखता हूं। किंतु किसी दुम (विचारधारा) का गुलाम नहीं हूं। मैं लेखन में ‘बे-दुम’ ही रहना चाहता हूं। वैचारिक प्रतिबद्धता को साथ लेकर चलना तो आप जैसे ऊंचे दुमदार बुद्धिजीवियों का काम है। मैं खुद को इस लायक नहीं मानता।‘

इत्ता सब सुनने के बाद बुद्धिजीवि महोदय लंबी सांस भीतर खींचते हुए बोले- ‘आपकी मर्जी...। लेकिन बिना दुम (विचारधारा) के आप न लेखन, न साहित्य में ज्यादा टिक नहीं पाएंगे। लेखन विचारवानों-विचारशीलों की दुनिया है। यहां बे-दुमों का कोई काम नहीं। मैं हैरान हूं कि आप बिना विचारधारा के लिख कैसे लेते हैं?’

मैंने भी दो-टुक लहजे में उनसे कह दिया- ‘लेखन में न मुझे करियर बनाना है न सम्मान-पुरस्कार हासिल करना। गाड़ी जब तलक चल रही है, चलने दे रहा हूं। मैं मेरे लेखन के साथ खुश हूं। लिखता मैं इसलिए हूं ताकि कुछ खरचा-पानी निकल सके। बाकी लेखन में विचारधारा, गंभीरता, वैचारिकता, सहजता, कथ्य, सौंदर्य आदि-आदि को जीवित रखना तो आप जैसे दुमदार बुद्धिजीवियों का काम है।‘

बुद्धिजीवि महोदय के चेहरे पर मुझसे घोर असहमति के भाव साफ नजर आ रहे थे। वो तो उनका बस नहीं चल पा रहा था, नहीं तो मेरे खिलाफ उसी वक्त ‘फतवा’ जारी कर देते। फिर भी, अपने गुस्साई अंदाज में उन्होंने मुझसे कह ही दिया- ‘आप लेखक हैं नहीं। आपको विचारधारा से ज्यादा प्रिय पारिश्रमिक है। अतः मेरी आपसे कतई नहीं बन सकती। मैंने बहुत बड़ी गलती की जो आपसे मिलने आपके घर चला आया।‘

बिना नमस्कार किए हुए ही दुमदार बुद्धिजीवि अपनी दुम को संभाले मेरे घर से रुखस्त हो लिए। और मैं पुनः डट गया, एक बे-वैचारिक टाइप व्यंग्य खींचने में।

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

टि्वटर के बाबा लोग

टि्वटर पर बाबाओं की धूम है। ये बाबा धरती पर पाए जाने वाले भगवा-धारी बाबाओं से भिन्न होते हैं। ज्यादातर बाबा ‘ट्रौलर्स’ हैं पर हैं ‘मजेदार’। उनके ट्वीटस पढ़कर तबीयत हरी हो जाती हैं। विषय चाहे राजनीति का हो या कोई और बाबा किसी को नहीं बख्शते। टि्वटर पर सबसे उम्दा वनलाइन बाबाओं की तरफ से ही आते हैं।

एक व्यंग्य को लिखने में जहां हम 400 से 500 शब्द खरचा कर देते हैं टि्वटर के बाबा मात्र 140 कैरेक्टर में ही समा बांध देते हैं। उनके 140 कैरेक्टर भारी-भरकम व्यंग्य पर भारी पड़ते हैं। बाबाओं ने ही हमें बताया कि व्यंग्य 140 कैरेक्टर में भी खींचा जा सकता है। बस आपका ‘विट’ स्ट्रांग होना चाहिए। क्या समझे...।

इस वक्त सबसे बढ़िया व्यंग्य टि्वटर पर ही लिखा जा रहा है। न विषय की सीमाएं। न अधिक शब्दों का झंझट। न इस-उस की रोक-टोक। न भाषाई हदबंदियां। मात्र 140 कैरेक्टर हैं आपके पास। इसी दायरे के बीच आपको धांसू-सा वनलाइनर (व्यंग्य) खींचना है। टि्वटर के बाबा लोग यह काम बहुत प्रोफेशनल तरीके से कर रहे हैं। कम शब्दों में बात को कहने का हुनूर तो कोई टि्वटर के बाबाओं से सीखे।

जोकबाजी और वनलाइनर के लिए टि्वटर सबसे मस्त जगह है। फेसबुक पर कब्जा जमाए बैठे किस्म-किस्म की विचारधाराओं के बुद्धिजीवि तो यहां कहीं नहीं ठहरते। न वे ज्यादा टि्वटर पर आते हैं, न ट्रौलर-बाबाओं से सीधा पंगा ही लेते हैं। उन्हें यह अच्छे से मालूम है, बाबा लोग ट्रौल करने में माहिर होते हैं। ट्रौलर्स से तो सेलिब्रिटी लोग भी हट-बचकर रहते हैं।

टि्वटर पर मौजूद बाबाओं की खास बात यह है कि वे न किसी खास (अपवादों को छोड़कर) राजनीतिक दल के समर्थक हैं, न विचारधाराओं के गुलाम। एकदम स्वतंत्र। खुल्ला होकर अपने ट्वीट करते हैं। अच्छा लगे तो रि-ट्वीट कर दीजिए वरना मन ही मन कुढ़ते रहिए। उनकी सेहत पर कोई फरक न पड़ना। दीन-दुनिया से बेखबर अपनी ही मस्तियों में मस्त रहते हैं टि्वटर के बाबा लोग।

टि्वटर पर बाबा लोगों की पूरी फौज है। फौज मौज लेने का कोई मौका नहीं छोड़ती। या तो ये बाबा लोग आपस में ही ट्रौलिंग करते हैं या फिर वनलाइनर जोक चिपकाते रहते हैं। अजीबो-गरीब नाम के बाबा लोग मिलेंगे यहां। मसलम- अदृश्य बाबा, गंजेड़ी बाबा, धाकड़ बाबा, चिलम बाबा, बलिया वाले बाबा, ट्रौल बाबा, बावला बाबा, डॉलर वाले बाबा, लड्डू वाले बाबा, रिउड बाबा, बाबा उल्टानंद, बुलट बाबा, नीम-हकीम बाबा, लुटेरा बाबा आदि-आदि। एक तरह से टि्वटर के हर कोने में कोई न कोई बाबा घुसा बैठा है।

जिन भाषावादियों को भाषा की चिंता हर वक्त परेशान किए रहती है, उन्हें जरूर बाबा लोगों के ट्वीट की भाषा रास न आए फिर भी टि्वटर पर उनके ‘फॉलोअर्स’ की संख्या गजब है। यों भी, उनका उद्देश्य लोगों का मनोरंजन करना है, भाषा-सुधार का ठेका लेना नहीं। सोशल मीडिया में तो ऐसी भाषा चलती है। एकदम आम और फ्री टाइप। मानसिक तृप्ति भी अब इसी भाषा में मिलती है।

भाषाई गरिमा या किन्हीं आदर्शों को परे रख कभी टि्वटर के बाबा लोगों की दुनिया के बीच जाकर देखिए अगर आनंद न आए तो वापस अपनी दुनिया में लौट आइएगा। वनलाइनर ट्वीट का असली लुत्फ तो यहीं है प्यारे।

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

लाठी के वीर और वैलेंटाइन डे

बातें चाहे कित्ती ही क्यों न बना लें पर दुनियां-जहां में चलती लाठी के वीरों की ही है। लाठी के वीरों से आम तो क्या खास भी ‘कंपता’ है। उचित दूरी बनाकर रहता है। न उनका साया खुद पर, न खुद का साया उन पर पड़ने देता है। लाठी के वीरों का क्या भरोसा कब में अपना ‘ब्रहमास्त्र’ चल दें। उनके ब्रहमास्त्र को झेलने वाला पानी तक न मांगता।

अक्सर देखा है, वैलेंटाइन डे के आस-पास लाठी के वीरों की सक्रियता सड़कों-चौराहों, पार्कों-रेस्त्रां, स्कूल-कॉलेजों में खासा बढ़ जाती है। लाठी थामे तैयार रहते हैं देश की सभ्यता-संस्कृति से खिलवाड़ करने वाले तत्वों से निपटने के लिए। उनमें कुछ वीर ऐसे भी होते हैं, जो वैलेंटाइन-समर्थकों को सरेआम मुर्गा बनाने में पीछे नहीं हटते। दो मिनट में इश्क-प्यार-मोहब्बत का भूत उतारने का माआदा रखते हैं। मजाल है, कोई उनकी प्यारी संस्कृति का अपमान कर जाए।

इसीलिए तो मैं वैलेंटाइन वाले दिन घर से ही नहीं निकलता। घर में रहकर ही अपनी पत्नी संग वैलेंटाइन डे मनाने की कोशिश करता हूं। हालांकि पत्नी ‘जिद्द’ यही रहती है कि हम वैलेंटाइन बाहर कहीं रेस्त्रां-पार्क में बैठकर ‘सेलिब्रेट’ करें। कुछ तुम अपने दिल की, कुछ मैं अपने दिल की कहूं। यों, कहने-सुनने में ही पूरा दिन तमाम हो जाए। मगर मैं पत्नी को साफ मना कर देता हूं कि नहीं, वैलेंटाइन बाहर नहीं केवल घर में ही मनेगा। क्योंकि मुझमें अभी इत्ता ‘साहस’ नहीं आ पाया है कि मैं सरेआम लाठी के वीरों से लड़-भिड़ सकूं। इसी मसले पर हम पति-पत्नी के बीच बहस चलती रहती है और वैलेंटाइन डे ‘हंगामा डे’ सरीखा बन जाता है।

कोई नहीं। मुझे अपने वैलेंटाइन डे का हंगामा डे बनने का अफसोस नहीं। कम से कम ‘पीठ’ और ‘खोपड़ी’ तो ‘सुरक्षित’ हैं। वैलेंटाइन का क्या है, कभी भी मना लो। पर उस खास दिन बाहर जाने से बचो।

अच्छा, हमारे लाठी के वीर भी खूब हैं। इन्हें अपनी कथित सभ्यता-संस्कृति की याद ठीक वैलेंटाइन डे वाले दिन ही आती है। इस दिन उनका सांस्कृतिक प्रेम इत्ता जागता है इत्ता जागता है कि वैलेंटाइन डे को उन्होंने ‘मातृ-पितृ दिवस’ ही घोषित कर डाला है। प्रेम दोनों ही जगह कॉमन है बस प्रतिबिम्ब बदले हुए हैं। लाठी के वीरों को यह कौन समझाए कि यार, डंडे के दम पर अगर प्रेम को रोका जा सकता तो यहां न हीर-रांझा हुए होते, न शीरीं-फरहाद, न रोमियो-जूलियट, न राधा-कृष्ण। पर लाठियां कहां प्रेम की परिभाषाओं को समझ पाई हैं।

जब से हमारा दखल ‘सोशल नेटवर्किंग’ के बीच बढ़ा है, तब से हम हर दिवस-त्यौहार को ऑन-लाइन या डिजिटली मनाना अधिक पसंद करने लगे हैं। वैलेंटाइन के दीवानों ने भी अब इसी रास्ते को चुन लिया है। वे अब पार्कों या रेस्त्रां आदि में अपने प्यार का इजहार करने के बजाय सीधा वाट्सएप करते हैं। चिट्ठी-पत्री, ग्रिटिंग-कार्ड के जमाने अब हवा हुए। न इधर-उधर मिलने का झंझट न खुलेआम वीरों की लाठियां खाने का रगड़ा। सिंपल वाट्सएप पर प्रपोज करो। उत्तर आया तो सही, नहीं तो कोई और देखेंगे। इश्क अब ‘इंसटेंट-कॉफी’ की तरह हो लिया है। तुरंत तैयार। तुरंत खत्म।

ऑन-लाइन या डिजिटल इश्क पर तो लाठी के वीर पहरे नहीं बैठा सकते न। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हर पल जाने कित्ती प्रेम कहानियां चलती और खत्म होती रहती हैं। कोई हिसाब नहीं।

दूसरों को सभ्यता-संस्कृति की नसीहतें देने वाले लाठी के वीर खुद कौन-सा दूध के धुले टाइप होते हैं। बल्कि वैलेंटाइन-समर्थकों से कहीं ज्यादा रंगीन-तबियत होते हैं। हां, यह बात और है कि वे मुंह में राम, बगल में छुरी रखें पर भीतर की बातें कहां छुपती हैं भला।

इश्क चीज ही ऐसी है प्यारे कि दिल मचले बिना मानता ही नहीं। हर तमन्ना का रास्ता दिल से होकर ही गुजरता है। लाठीबाज भी अपने दिल के हाथों मजबूर रहते हैं। इस हकीकत को वे स्वीकार करें या न करें किंतु ‘अंतिम सत्य’ यही है।

चलिए। खैर। लाठी के वीर कोशिशें कित्ती ही कर लें पर वैलेंटाइन की कशिश को प्रेमियों के दिलों से जुदा कभी न कर पाएंगे। लाठियां थक जाएंगी मगर इश्क की दास्तानें कभी खत्म न होंगी।

हैप्पी वैलेंटाइन डे।

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

काश! रेनकोट वाला ज्ञान महीने भर पहले मिला होता

ज्ञान लेने या देने के मामले में मैं जरा ‘चूजी’ हूं। एंवई, हर किसी से न ज्ञान लेता हूं, न देता है। आज के डिजिटल युग में लोग ज्ञानियों की शरण में न जाकर सीधा गूगल करना ज्यादा पसंद करते हैं। सही भी है। अपना ज्ञान, अपना रिस्क।

लेकिन संसद में प्रधानमंत्रीजी से ‘रेनकोट’ वाला जो ज्ञान मिला, उसे पाकर मैं ‘अभिभूत’ हूं। हालांकि उनका ‘तंज’ कहीं और था मगर ‘फायदा’ मुझे हुआ। काश! यह ज्ञान महीने भर पहले मिल जाता तो मुझे इत्ती विकट ठंड में नाहते वक्त इत्ता ठिठुरना तो नहीं पड़ता। सीधा रेनकोट पहनकर ही न नाहता। नहाने के पीछे न हर रोज पत्नी से कहा-सुनी होती। न ही ऑफिस वाले मुझे मेरे न नहाने के पीछे ताने देते।

मगर ज्ञान और इश्क किसी के चाहने या न चाहने से भला कब मिले हैं? कोई नहीं, देर से ही मिला पर मिला तो, अब इस ज्ञान को मैं ‘ताउम्र’ अपने पास रखूंगा।

न केवल सर्दियों में बल्कि गर्मियों में भी रेनकोट में नहाने का कॉनसेप्ट है बढ़िया। ये तो हींग लगे न फिटकरी रंग जोखा वाली कहावत को चरितार्थ सा करता है। मुझ जैसे विकट ‘न’ नहाने के चोरों के तईं यह किसी ‘वरदान’ से कम नहीं। यों भी, सर्दियों में बिना कपड़ों के नहाना शरीर की ‘बेइज्जती’ टाइप करना ही है। मेरा बचपन से यही मानना रहा है कि नहाने से कुछ नहीं होता। इससे केवल शरीर के ऊपरी हिस्से का मैल ही साफ होता है, जो मैल शरीर के भीतर भरा पड़ा है वो यथावत रहता है।

दुनिया का ऐसा कोई साबुन या पानी नहीं बना जिससे इंसान के भीरती मैल को नहाकर साफ-सुधरा किया जा सके। नहाना महज एक ‘भ्रम’ है। इसी भ्रम को जिंदा रखने की खातिर हम सदियों से बेचारे शरीर को जाड़ा-गर्मी-बरसात में ‘कष्ट’ देते चले आ रहे हैं। शर्मनाक।

पर अब और नहीं। अब से मैंने तय किया है कि मैं चाहे मौसम कैसा भी क्यों न हो सिर्फ और सिर्फ रेनकोट पहनकर ही नाहूंगा। अब चाहे पत्नी से पंगा हो या ऑफिस वाले बातें बनाएं।
इत्ता लाभकारी ज्ञान बड़े सौभाग्य से मिला करता है।

जब हम बरसातों में रेटकोट पहनकर न भीगने का ‘सुख’ उठा सकते हैं तो नहाने वक्त इस सुख को ले लेने में भला क्या ‘बुराई’ है? क्यों...?

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

शव और सेल्फियां

डिसक्लेमर- यह किस्सा नितांत काल्पनिक है। अतः रत्तीभर भी दिल पे न लिया जाए।

तो प्यारे, किस्सा कुछ यों है। हमारे पड़ोस में रहने वाले एक सज्जन अचानक से स्वर्ग सिधार गए। बतला दूं, सज्जन हर काम अचानक से ही किया करते थे। अचानक से ही हमारे घर आ धमकते थे। अचानक से ही कहीं भी चल पड़ते थे। अचानक से उन्हें सर्दी-गर्मी का एहसास होने लगता था। अचानक से ही खाते थे। अचानक से ही पीते थे। अचानक से ही सोते थे। अचानक से ही जागते थे। और तो और (जैसाकि उन्होंने एक दफा बताया) अचानक से ही उनकी शादी और बच्चे भी हुए थे।

मतलब- उन सज्जन की पूरी जिंदगी ही अचानक-अचानक किस्म के किस्सों से भरी पड़ी थी। इसीलिए अचानक से ही वो हमारे बीच से खर्च भी हो लिए।

मुझे उनके इस तरह अचानक से चले जाने का जरा भी ‘अफसोस’ नहीं हुआ। मुझे मालूम था कि एक दिन को वो यों ही अचानक से चले जाएंगे। वैसे, अचानक से मौत आने का लुत्फ अलग ही होता है। एक दम चुप-चाप बिना किसी को बताए, परेशान किए पतली गली से निकल लेना। यह क्या कि भयंकर बीमार होकर, घिसट-घिसटकर मरे भी तो क्या मरे। खुद तो परेशान हुए ही, दूसरों को उससे ज्यादा किया।

सज्जन चूंकि भरे-पूरे परिवार के मालिक थे अतः उनके अचानक से चले जाने पर घर में ज्यादा चीख-पुकार सुनाई न दी। घर वाले हल्की-फुल्की हंसी-ठिठोली टाइप मूड में लग-दिख रहे थे। पड़ोसी होने के नाते अपनी शोक संवेदनाएं व्यक्त करने मैं भी उनके घर गया। जहां उनके शव को रखा गया था, वहां का नजारा ही डिफरेंट था। घर-परिवार वाले और नाते-रिश्तेदार एक-एक कर सज्जन के शव के साथ सेल्फियां लेने में लगे हुए थे। सेल्फियां लेते वक्त किसी के चेहरे पर मुस्कुराहट थी। कोई विकटरी का चिन्ह बनाए हुआ था। किसी ने अपनी सीधी उंगली को उनकी तरफ इंडिकेट कर रखा था। एक मियां तो ऐसे भी दिखे, जो अपने नए-नवेले स्मार्टफोन से पहली सेल्फी सज्जन के शव के साथ ले रहे थे।

ये सब देखकर मुझे थोड़ा अटपटा-सा लगा तो बाजू में खड़े उनके परिवारिक सदस्य से पूछा। महोदय- ‘शव के साथ किस्म-किस्म की सेल्फियां आप लोग ले रहे हैं, यह तो बड़ा शर्मनाक है।‘ वे बोले- ‘शर्मनाक कैसा भाईसाब। आजकल हर चीज ऑन-रिकार्ड होनी चाहिए। हम हमारे अंकल के साथ सेल्फियां इसीलिए ले रहे हैं ताकि प्रमाण साथ रहे। आगे किसी किस्म का परिवार में कोई झगड़ा-शगड़ा न हो।‘ मैंने बीच में टोकते हुए कहा- ‘किंतु ये सब करने की क्या जरूरत है? आखिर डेथ-सर्टिफिकेट तो नगर निगम से मिलेगा ही न।‘ वो बोले- ‘हां, वो तो मिलेगा ही। चूंकि सब लोगों की इच्छा थी कि उनके शव के साथ और शव-यात्रा की सेल्फियां ली जाएं तो हम सब ले रहे हैं। सेल्फी लेना तो आजकल का ट्रेंड है भाईसाब। सब चलता है। आप एंवई दिल पे लोड ले रहे हैं।‘

इससे पहले मैं उससे कुछ और कह पाता वो यह कहते हुए चला गया- ‘अभी हम सब को अंकल की शव-यात्रा के साथ भी सेल्फियां लेनी हैं। आइए, आइए आप भी आइए न। पड़ोसी होने के नाते एक सेल्फी आपके साथ भी बनती है।‘

न.. न.. मैंने दूर से ही हाथ जोड़कर मना कर दिया। और मन में सोचने लगा- वाकई जमाना कित्ता बदल लिया है। अभी सेल्फियां खुद तक सीमित थीं, अब शव-यात्रा के साथ भी ली जा रही हैं। तभी मुझे टि्वटर पर देखी उस सेल्फी का ध्यान हो गया, जिसमें एक बंदा संडास में बैठा अपनी सेल्फी ले रहा था। वाह रे, सेल्फी-संपन्न युग।

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

सेंसेक्स को बजट समझ आ गया

मुझे कभी इस बात की चिंता नहीं रही कि बजट मुझे समझ आया कि नहीं। बजट दरअसल चीज ही ऐसी है, जो समझ में तो किसी के नहीं आता फिर भी लोग पब्लिक में जतलाते ऐसे हैं कि वित्तमंत्री के बाद अगर बजट किसी को समझ आया तो वे ही हैं। किंतु मैं ऐसा ‘शो-ऑफ’ करना पसंद नहीं करता। मेरा बजट से उत्ता ही नाता रहता है, जित्ता नमक का पानी से। केवल मोटी-मोटी बातें ही दिमाग में रखता हूं बाकी किनारे कर देता हूं। यों भी, बजट को समझकर या ना-समझकर कौन-सा मुझे वित्तमंत्रालय में नौकरी मिल जानी है।

हां, मुझे इस बात की घणी प्रसन्नता है कि सेंसेक्स को पूरा बजट समझ आ गया। खुशी के मारे ऐसा झूमा, ऐसा झूमा कि चार सौ अंकों के पार निकल गया। मंदड़ियों को एक ही झटके में चारों खाने चित्त कर डाला। बेचारे न घर के रहे, न घाट के। अक्सर देखा यही है कि बजट के दौरान सबसे अधिक कूदा-फांदी मंदड़िए ही किया करते हैं। पूरा जोर इनका इस बात पर रहता है कि सेंसेक्स बजट को न समझ पाए और घड़ाम से गिरा जाए। अपने चहाने वालों को डूबा जाए। स्टॉक मार्केट में अंधेरा छा जाए। बाजार मंदी की गर्त में चला जाए। बहुत, बहुत ही शातिर होते हैं स्टॉक मार्केट के मंदड़िए।

लेकिन कुछ भी कहिए, इस दफा सेंसेक्स ने न केवल मेरी बल्कि वित्तमंत्री के साथ-साथ इकोनॉमी की भी इज्जत रख ली। सरपट-सरपट ऐसा दौड़ा कि पीछे मुड़कर ही नहीं देखा। आखिरकार, बुल ने बियर के गले में घंटी बांध ही दी।

अब तो यह भी सुनाई में आने लगा है कि आगे आने वाले महीने सेंसेक्स की बढ़ोत्तरी के ही हैं। होने चाहिए भी। बेचारा एक तरफा गिर-गिरकर दुबला भी तो कित्ता हो गया था। बजट ने सेंसेक्स की सेहत में फिर से एक नई स्फूर्ति पैदा कर दी है। बहुत मुश्किल है मंदड़ियों के हाथ अब सेंसेक्स की लगाम आ पाना। सेंसेक्स तो छुट्टा सांड है, एक दफा जिस रास्ते पर दौड़ गया फिर इत्ती आसानी से वापस नहीं लौटता।

नोटबंदी के बाद वित्तमंत्री ने बजट में जो गुलाबी राहत दी, उससे आम आदमी के साथ-साथ सेंसेक्स भी खासा सुकून में है। इस गुलाबी राहत का आंकलन अर्थशास्त्री या विपक्ष अपने हिसाब से चाहे जैसा करे, उससे कोई फरक पड़ने वाला नहीं। इतिहास गवाह है, विपक्ष को बजट न पहले कभी समझ आया न अब समझ आएगा। प्रत्येक विपक्षी को बजट किसान, गरीब, दलित विरोधी ही नजर आता है। उनके कथन पर अपना दिमाग काहे खोटी करना।

इकोनॉमी को बूस्ट सेंसेक्स के दम पर ही मिलता है। सेंसेक्स की चाल मस्त रहती है तो बाजार में भी खुशियों का आलम बना रहता है। अपना सेंसेक्स तो हमेशा से ही इकोनॉमी को मजबूत करने के पक्ष में रहा है मगर कुछ मंदड़िए टाइप लोग पीछे से उसकी टांग खींच लेते हैं तो बेचारा घड़ाम हो लेता है। वरना, सेंसेक्स हर आमो-खास का हितैषी है। इस बजट में बढ़कर उसने अपनी बात को सिद्ध किया भी।

बाकी जिन्हें बजट, इकोनॉमी और सेंसेक्स को लेकर निगेटिव मिस्ट-कॉट करनी हैं, खूब तबीयत से करें। इससे फरक न कोई इकोनॉमी पर पड़ना है, न सेंसेक्स पर। सेंसेक्स के अच्छे दिन आ चुके हैं। अब उसे आगे की तरफ दौड़ते जाना है। अजी, इकोनॉमी को गुलाबी रंग देने का पूरा दारोमदार जो है उस पर।

रविवार, 29 जनवरी 2017

कौन डरता है बजट से

हालांकि मैं कॉमर्स का स्टूडेंट जरूर रहा लेकिन मुझे न कभी कॉमर्स पल्ले पड़ी, न अर्थशास्त्र, न ही बजट। कॉमर्स का इस्तेमाल मैंने केवल पास हो जाने भर के लिए ही किया। इसमें न कभी गंभीरता दिखाई, न दिलचस्पी। वो क्या है, मेरी कोशिश हमेशा से अपनी अक्ल को पढ़ाई के बोझ से मुक्त करने में ही रही। सो, उत्ती पढ़ाई की जित्ती से खाने-कमाने भर का काम चल जाए। जो अधिक पढ़ लिए उन्हें उनकी पढ़ाई बहुत-बहुत मुबारक। मैं कम पढ़ा-लिखा होने में ही मस्त हूं।
ठीक ऐसी ही स्थिति मेरे तईं बजट की रही है। सच बोलूं, बजट की महिमा आज तलक मुझे कभी समझ नहीं आई। घंटे-दो घंटे खड़े होकर वित्तमंत्रीजी क्या कह-बोल जाते हैं, जोर देने के बाद भी मेरी खोपड़ी में नहीं घुस पाता। मेरे तईं बजट की सीधी-सी परिभाषा है- जो बढ़ गया, जो घट गया, जो चुनावी झुनझुना बन गया बस यही बजट है। आम जनता का बजट से लेना-देना कित्ता है, कित्ता नहीं; ये सब अर्थशास्त्री टाइप ज्ञानी जानें। मगर हां इसमें ज्यादातर हित कॉरपोरेट घराने वालों के ही निहित होते हैं।
आपने देखा भी होगा, बजट पर सबसे पहले प्रतिक्रिया कॉरपोरेट तंत्र वालों की ही आती है। वो ही सबसे पहले जुटते हैं अपने-अपने जोड़-घटाने में। एक बेचारा सेंसेक्स है, जो बजट वाले दिन खामखां ही बलि का बकरा बन जाता है। बजट मन-मुताबिक आता है तो झुम पड़ता है। नहीं तो अपने चाहने वालों को ऐसी धोबी पछाड़ देता है कि बेचारों के सालों-साल अपने पिछवाड़ों को सहलाने में ही निकल जाते हैं। मतलब- करे कोई, भरे कोई।
बजट आने के बाद मुझ जैसे लेखक के घर का सीन (बाकियों का मुझे नहीं मालूम) यथावत रहता है। न दिमाग पर किसी खरचे के बढ़ने का लोड, न घटने की खुशी। एकदम नॉरमल टाइप। मुझे पता है, मैंने अपने घर का बजट ‘वित्तमंत्री’ के कहने से नहीं, अपनी ‘होम-मंत्री’ के कहने से बनाना है। कहां कित्ता खरच करना है। किसे कित्ता देना है। अपनी पॉकेट में कित्ता रखना है। बच्चों, नाते-रिश्तेदारों, कपड़ों-लत्तों, किचन आदि-इत्यादि के साथ कैसा फाइनेंशियल व्यवहार रखना है; सारा दरोमदार होम-मंत्री पर ही रहता है। तो प्यारे, बजट चाहे ‘करेला’ टाइप आए या ‘मलाईदार’ अपनी सेहत पर कोई फरक न पड़ना।
अच्छा, मैंने तमाम ऐसे लोग देखे हैं जो बजट आने के हफ्ते-दस दिन तक इत्ता टेंशन में रहते हैं मानो उनके बोर्ड एग्जाम का रिजल्ट आया हो। जाने क्या-क्या खुरपेच बजट के भीतर-बाहर करते रहते हैं। टीवी चैनलों पर रात-दिन लंबी-लंबी बहसें चलती रहती हैं। गुलाबी अखबार पढ़ने वाले- भले ही अपने घर का बजट सेट न कर पाते हों- हमें ज्ञान ऐसे देते हैं मानो हमारे गुरु हों। खासकर, अर्थशास्त्रियों की तो बाछें ही खिल जाती हैं। बजट बेला में ऐसा प्रतीत होता है मानो ईश्वर ने आज के दिन उनके दिमाग में अतिरिक्त ज्ञान फिट कर दिया हो। तब तो मोहल्ले का छोटा-मोटा अर्थशास्त्री भी खुद को ऐसे प्रोजेक्ट करता है जैसे अगला बजट का ज्योतिषी हो।
किंतु बजट के इस शोर-शराबे से मैं खुद दूर और मुक्त ही रखता हूं। क्योंकि जिस गली जाना नहीं, वहां की कन्या से भला क्या दिल लगाना। मूड को लाइट रखिए। चाहे बजट आए या शेर; आपकी बला से। बजट के जोड़-घटाने में खोपड़ी खपाके भला कौन-सी वित्तमंत्रालय में नौकरी मिल जानी है। मेरे घर का बजट (बजट आने से पहले और आने के बाद) एकदम टनाटन रहता है।
हां, वित्तमंत्री महोदय से अपनी इत्ती गुजारिश अवश्य है कि कभी समय निकालकर बजट में हम लेखकों पर भी कुछ ध्यान दे लें। बजट में कुछ ‘लाभकारी गणित’ हम लेखकों के लिए भी सेट करें। अखबारों-पत्रिकाओं को निर्देश दें, लेखकों को पारिश्रमिक बढ़ाकर दिया करें। आखिर हम लेखक अपनी-अपनी कीमती खोपड़ी खरच करते हैं, लेख आदि को लिखने में। मुफत की दुकानदारी अब हमने न होने वाली। बाकी आप वित्तमंत्री हैं जैसा उचित लगे, करें।
तो प्यारे, बजट एक ‘तिलिस्मी तहखाना’ है, इसके आजू-बाजू जाने से बचें। अपनी खोपड़ी की ऊर्जा को बचाकर रखें। अगर सब बजट के लाभ-हानि जानने-समझने में खरच कर दी, तो आगे रिचार्ज कराने में घणी मुसीबत आ सकती है। शेष आपकी मर्जी।