गुरुवार, 20 सितंबर 2018

इंस्टाग्राम पर शायरी

इधर, मुझ इंस्टाग्राम पर शायरी करने का भूत सवार हुआ है। लोग फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप पर शेर कह रहे हैं, मैंने सोचा क्यों न मैं इंस्टाग्राम पर शायरी करूं। यह थोड़ा लीक से हटकर भी रहेगा और मुझे एक नए सोशल प्लेटफार्म पर शायर होने की इज्जत भी हासिल हो जाएगी। एक पंथ, दो काज होने का अपना ही मजा है।

एक ही तरह का लेखन करते-करते मुझे बोरियत महसूस होती है। इसीलिए अपने लेखन में नित नए-नए प्रयोग कर लिया करता हूं।
जब से लोगों के जीवन में सोशल मीडिया ने कदम रखा है, हर कोई अपने मन की बात अपने अंदाज में कह-लिख रहा है। कोई खुद की आत्ममुग्धताओं पर लिख रहा है तो कोई दूसरे को पटखनी देने के लिए। मगर सबसे ज्यादा हाथ लोग कविताओं और शेरो-शायरी में ही आजमा रहे हैं।

फेसबुक तो कवियों और कविताओं की शरण-स्थली है। मन में भाव चाहे जैसा हो फेसबुक पर वो कविता की शक्ल में आ ही जाता है। आलम यह है, जिन्होंने जीवन में कभी कविता का 'क' नहीं पढ़ा-जाना, वे भी मस्त होकर यहां कविताएं लिख रहे हैं। खूब तबीयत से लिख रहे हैं।
एकाध दफा तो मैंने भी कविता के मैदान में हाथ आजमाए पर बात बनी नहीं। मेरी कविता कविता कम 'अ-कविता' ज्यादा जान पड़ती थी। फिर एक दिन मेरे एक शुभचिंतक में समझाया कि तुम कविता का पल्लू छोड़कर शायरी का दामन थाम लो, वो भी इंस्टाग्राम पर। यहां शायरी की अच्छी-खासी डिमांड है। शायरी का बाजार भी खूब है।

शुभचिंतक की सलाह को संज्ञान में लेते हुए मैंने इंस्टाग्राम पर तुरंत शायरी करना शुरू कर दी। ऊपर वाले का करम से मेरी शायरी यहां खूब फल रही है। अब तो अच्छे-खासे फॉलोवर्स भी बढ़ गए हैं मेरे।

वैसे, शेरों की तुकबंदी तो मैं बचपन से ही बैठा लिया करता था। कहीं से कैसा भी शेर बना डालता था। लगे हाथ दाद भी मिल जाया करती थी। बाद के दिनों में जब इश्क-मोहब्बत में पड़ा तो पढ़ाई से ज्यादा मन शेरों-शायरी में रमा करता था। बाज दफा तो मुझे खुद में मीर, दाद, ग़ालिब की आत्मा घुसी जान पड़ती थी। यों भी, इश्क की अगन अच्छों-अच्छों को शायर और कवि बना देती है।

इंस्टाग्राम पर शेरों-शायरी का अपना आनंद है। गुलज़ार साहब को यहां जो रूतबा हासिल है, देखते ही बनता है। गुलज़ार साहब के शेर और कविताएं यहां बिखर कर अपनी खुशबू फैलाए रहते हैं। मैं भी उन्हीं के पदचिन्हों पर चलने की कोशिश में लगा रहता हूं। कभी-कभी मेरे कहे शेर जम भी जाते हैं। भरपूर वाह वाह भी पा जाते हैं। यह मेरे शेरों की मार्केटिंग के लिए भी अच्छा है।

सिर्फ लिखने से ही बात नहीं बनती, जब तक कुछ कमाई-धमाई न हो। तमाम सोशल प्लेटफार्म के साथ-साथ इंस्टाग्राम भी कमाई का मस्त माध्यम बनकर उभर रहा है। अपने सेलिब्रिटी लोग तो यहां से लाखों पीट रहे हैं। जब वे अपनी ब्रांड-इमेज के दम पर कमा सकते हैं तो मैं ही क्यों पीछे रहूं शायरी के दम पर कमाने में। शायर हो या लेखक थोड़ा-बहुत मनी-माइंडेड तो उसे होना ही चाहिए।

क्या बुरा है, इंस्टाग्राम पर शायरी का दौर भी चलता रहे और कमाई भी होती रहे। शेरों-शायरी तो हर उम्र के लोगों की जान और पसंद होती ही है। यों भी, शायरी में एक अजीब-सा सुख है। सुख ही अंतिम सत्य है।

मंगलवार, 18 सितंबर 2018

72 पर टिका रुपया

डॉलर ने एक दफा फिर से रुपए को टंगड़ी मार गिरा दिया है। रुपया 71 के स्तर पर चारों खाने चित्त पड़ा है। बड़ी उम्मीद से वो सरकार और रिजर्व बैंक की तरफ देख रहा है; कोई तो आकर उसे उठाए। उससे सांत्वना के दो बोल बोले। उसमें फिर से उठने का जोश भरे।

अफसोस, सरकार की तरफ से रुपए की गिरावट पर चिंता प्रकट करना तो दूर उसे उठाने की कोशिश भी नहीं की जा रही। अपनी उपेक्षा से रुपए में जबरदस्त रोष है। लेकिन देशहित की खातिर वो अपना रोष जतला नहीं सकता। कल को लोग कहीं यह न कहने लगें कि देखो, अब तो रुपया भी खुद को लोकतंत्र में असुरक्षित महसूस कर रहा है। तिल का ताड़ बनते देर ही कितनी लगती है यहां।

देश की इज्जत रुपए के लिए प्रथम है।

सच कहूं, मैं व्यक्तिगत तौर पर रुपए की सेहत के प्रति फिक्रमंद हूं। मेरी निगाहें हर पल स्क्रीन पर टिकी रहती हैं, जहां रुपए के रेट में घट-बढ़ चलती है। रुपए को जब भी लाल तीर पर लटका देखता हूं, मेरा कलेजा मुंह को आ जाता है। मन करता है, अभी इसी वक्त अपने हाथों से रुपए को हरे तीर पर लाकर खड़ा कर दूं।
मगर कुछ चीजों को हम चाह कर भी अपने बस में नहीं कर सकते।

यह कोई पहली दफा नहीं, जब रुपए पर गिरावट के बादल छाए हैं। ऐसा नवंबर 2016 और अगस्त 2013 में भी हो चुका है। तब भी रुपए ने खुद को बड़ी मुश्किल से संभाला था। तब भी सरकार और वित्तमंत्री ने कुछ खास नहीं किया था। तब भी उसे विपक्ष के मजाक का सबब बनना पड़ा था।
अब जब रुपया लुढ़ककर 72 पर आ टिका है, सरकार कह रही है कि वो जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लेगी। ये ग्लोबल समस्या है।

ये क्या बात हुई भला! एक तरफ रुपए की जान पर बन गई है और सरकार अब भी जल्दी के मूड में नहीं! अब एक्शन में नहीं आएगी तो क्या तब आएगी जब रुपया 59पर आ टिकेगा। माना कि रुपया बे-ज़बान होता है पर इसका यह मतलब नहीं कि उसे कैसे भी दबा लिया जाए।

सरकार और वित्त मंत्री महोदय शायद भूल रहे हैं कि अर्थव्यवस्था का सारा दारोमदार रुपए की इज्जत पर ही कायम है।

जिस तरह से रुपए के 72 होने पर उसका सरेआम मजाक उड़ाया जा रहा है। ट्विटर और फेसबुक पर चुटकुलों भरे तंज कसे जा रहे हैं। विपक्ष उसे 'बुरे दिनों' का खलनायक बता रहा है। ये सब देख-सुनकर बेहद दुख हो रहा है। सवा करोड़ की आबादी के बीच हमारा रुपए खुद को अकेला महसूस कर रहा है।

सरकार तो सबको साथ लेकर चलने का दावा चार साल से ठोक रही है। 'सबका साथ, सबका विकास' के तराने जोर-शोर से गा रही है। फिर भी, रुपए की गिरावट पर मौन। भला ऐसे कैसे होगा- सबका विकास?

एक अपने ही देश में नहीं बल्कि विश्वभर में रुपए की फिसलाहट से हमारी अच्छी-खासी किरकिरी हो रही है। उधर, डॉलर हमारे रुपए को निरंतर आंखे तरेरे रहा है। रुपए को धोबी पछाड़ देकर बाजार का राजा बना बैठा है।

रुपए की ये तौहीन देश बर्दाश्त नहीं करेगा। आखिर सहन करने की भी एक सीमा होती है।

थोड़े-बहुत सुधार से नहीं, पूरे और पक्के सुधार से ही रुपए की गिरती सेहत को सुधारा जा सकता है। डॉलर का बढ़ना देशहित में कतई नहीं। डॉलर विदेशी मुद्रा है। विदेशियों के आगे घुटने टेकना न तो हमें मंजूर है न ही रुपए को। इसीलिए तो इतना सब सहने के बाद भी रुपया जमा हुआ है, डॉलर की तानाशाही के आगे। रुपया बड़ा वीर है।

रुपया बचा रहेगा तो देश की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ इसका सम्मान भी बचा रहेगा। रुपए का 72 होना बहुत खल रहा है हमें।

मंगलवार, 28 अगस्त 2018

कटी नाक का सुख

आईना निहारने का मुझे शौक नहीं। मजबूरीवश निहारता हूं ताकि अपनी नाक को देख सकूं।

चेहरे पर नाक मेरी मजबूरी है। आईने में अपनी साबूत नाक देखकर परेशान हो जाता हूं कि ये अभी भी जगह पर है, कटी क्यों नहीं!

साबूत नाक के अपने लफड़े हैं। कटी नाक के नहीं। हालांकि सुख सबसे अधिक नाक के कटने में ही है। लेकिन नाक-प्रेमी कटी नाक वालों को बेहद हेय दृष्टि से देखते हैं। कटी नाक वालों से हद दर्जे की नफरत करते हैं।

जबकि सच तो यह है कि साबूत नाक वाले बेहद दंभी और चालक होते हैं। हर वक्त अपनी नाक पर यों गर्व करते रहते हैं मानो ये ईश्वर का कोई वरदान हो!

लेकिन कटी नाक वाले साबूत नाक वालों से कहीं बेहतर और सज्जन होते हैं। मेरे ऐसे कई परिचित हैं, जिनकी नाक किसी न किसी बहाने कटी है मगर उन्हें इस बात का जरा भी अफसोस नहीं। न ही वे खुद को साबूत नाक वालों से कमतर समझते हैं।

मैंने ही खुद जाने कितनी दफा प्रयास करके देख लिया अपनी नाक को काटने का। किंतु नाक है कि कटने में ही नहीं आ पाती। बल्कि इस बार ईद पर मैंने बकरे की जगह अपनी नाक काटने की सिफारिश भी की थी। मगर कसाई ने मेरी काटने से यह कहते हुए मना कर दिया कि हम व्यंग्यकारों की नाक नहीं काटते।

सच कहूं, नाक कटे लोग मुझे बहुत पसंद हैं। मैं तो चाहता हूं दुनिया में मुझे सिर्फ नाक कटे लोग ही दिखाई पड़ें। साबूत नाक वाले बड़े मतलबी होते हैं।

अब तो उस दिन की प्रतीक्षा में हूं कि किसी रोज सो कर उठूं और मुझे अपनी नाक आईने में कटी मिले। पता नहीं, वो 'सौभाग्यशाली दिन' कब आएगा।

सोमवार, 27 अगस्त 2018

पर्सनल नार्मल के बीच फंसे हम

नॉर्मल लोग बड़ी आसानी से मिल जाते हैं। पर्सनल लोग खोजे नहीं मिल पाते। जीवन में घटने वाली तमाम घटनाओं के साथ जितना उम्दा सामंजस्य नार्मल लोग बैठा लेते हैं, उतना पर्सनल नहीं।

यों भी, पर्सनल होने के नार्मल होने से कहीं ज्यादा खतरे हैं। मगर जो इन दोनों को साध ले, वो ही सच्चा संत।

मेरी कोशिश यही रहती है कि मैं जीवन में उन्हीं लोगों की संगत में रहूं, जो पर्सनल कम नार्मल अधिक हैं। पर्सनल मत के लोग अधिकार जतलाते हैं। जबकि नार्मल लोग कूलता में विश्वास करते हैं।

जमाना खराब है। किसके मन में भूत बैठा है। और, किसके मन में राधा। कुछ पता नहीं रहता। एक कान की बात दूसरे कान को पता नहीं चल पाती। पहले तो फिर भी पेट में दबी रहती थीं बातें मगर अब मोबाइल पर आकर तुरंत ही वायरल हो जाती हैं। इज्जत का खतरा है।

पर्सनल से न ज्यादा दोस्ती भली न दुश्मनी।

कृष्ण को ही ले लीजिए। लोग उनके साथ कितना ही पर्सनल होने की कोशिश करें पर वे सबके साथ नार्मल ही रहते थे। यहां तक की गोपियों से भी बहुत पर्सनल न होकर नार्मल का रिश्ता ही रखते थे।

बाकी दुनियादारी में तो फिर भी चल जाता है पर्सनल-नार्मल का राग लेकिन राजनीति और साहित्य में न चल पाता। यहां तो जितनी टांग नार्मल वाला खींचता है, उससे ज्यादा पर्सनल वाला। मैंने तो कई दफा दोनों के मध्य तलवारें तक खींचती देखी-सुनी हैं।

हां, अपने मतलब को साधने के लिए अगर नार्मल या पर्सनल को अपना बाप तक बनाना पड़े तो आराम से बना लीजिए। काम का निकलना जरूरी है, बनिस्बत जोड़-घटाने के। क्या समझे...।

रविवार, 26 अगस्त 2018

लाइन मारते रहिए

लाइफ में सबकुछ मिलना इतना सरल न होता। संघर्ष तो करना ही पड़ता है। जीने से लेकर मृत्यु तक संघर्ष ही संघर्ष है।

फिर भी, कुछ संघर्ष ऐसे होते हैं जो 'लाइन मारने' पर निर्भर करते हैं। जी हां, लाइन मारना भी संघर्ष की ही निशानी है।

अमूमन लोग लाइन मारने को गलत-सलत अर्थों में ले लेते हैं। कहीं की बात कहीं ले जाकर लाइन का महत्व खत्म कर देते हैं। मैंने ऐसे भद्रजनों को बहुत करीब से देखा-जाना है, जिन्होंने नौकरी से लेकर शादी तक 'लाइन मार संघर्ष' किया है। जब तलक नौकरी में रहे बॉस को लाइन मारते रहे, जब शादी के बंधन में बंध गए बीवी को लाइन मारने का फर्ज निभाया। वो तो गनीमत रही कि बीवी ने उनकी लाइन मारने की आदत को कभी अदरवाइज नहीं लिया। सब स-हर्ष स्वीकार किया।

इन दिनों जिस तेजी से 'बाजार' हम पर लाइन मार रहा है, हम चारों खाने चित्त हैं। कोई पर्व, कोई त्यौहार, कोई उत्सव हो बाजार ग्राहकों पर लाइन मारना नहीं छोड़ता। लुत्फ यह है कि हम बाजार के लाइन मारने का रत्तीभर बुरा नहीं मानते। न उसे बीच चौराहे गलियाते हैं। न थाने में रपट दर्ज करवाते हैं। न सरकार न किसी पायदार मंत्री-संत्री से शिकायत ही करते हैं। बल्कि बाजार को पूरा चांस देते हैं कि वो आए और हम पर दिल खोलकर लाइन मारे।

किस्म-किस्म के ऑफर्स और डिस्काउंट लाइन मारने के बहाने ही तो हैं।

न केवल बाजार, देश-दुनिया में कहीं भी निकल जाइए- हर कहीं, हर कोई किसी न किसी दृष्टिकोण से लाइन मारता हुआ दिख ही जाएगा। ये बात अलग है कि हम किस लाइन मारने को किस प्रकार से लेते हैं।

साहित्य में क्या कम लाइन मारूं हैं! एक से बढ़कर एक लाइनबाज मिल जाएंगे यहां। लेख से लेकर किताब छपवाने तक लेखक-साहित्यकार जाने कितनी तरह की लाइनें मार देता है। आलम यह है, साहित्य की हर विधा में लाइन मारी जा रही है। कहीं ज्यादा तो कहीं कम।

कठिन और व्यस्त जीवन में अगर दो-चार दफा लाइन मारने का सुख मिल रहा है- मैं तो कहता हूं- ले लीजिए। चांस हाथ से निकल जाने के बाद कहीं 'पछताना' न पड़े।

बुधवार, 8 अगस्त 2018

कामयाबी के शिखर पर सेंसेक्स

सेंसेक्स ने कामयाबी का एक और नया शिखर पार कर लिया। उसे कोटि-कोटि बधाई।

दिली खुशी मिलती है सेंसेक्स को चढ़ता देख। बिना शोर-शराबा या शिकवा-शिकायत किए बेहद खामोशी से वो अपना काम करता रहता है। मैंने कभी उसे खुद से अपनी सफलता का जश्न मनाते या असफलता का रोना रोते नहीं देखा। यहां तक कि वो लोगों के कहे पर भी कभी अपने कान नहीं देता।

37 हजार तक का सफर उसके लिए इतना आसान नहीं था। यहां तक पहुंचने के लिए उसे जाने कितनी ही मुश्किलों से दो-चार होना पड़ा। किस-किस की क्या-क्या जली-कटी नहीं सुननी-झेलनी पड़ी। जाने कितनी ही दफा गिरा, टूटा, लुढ़का मगर हिम्मत फिर भी हिम्मत न हारी। हर बड़ी गिरावट के बाद खुद को संभालते हुए पुनः मुस्तैदी के साथ उठ खड़ा हुआ।

विपरीत परिस्थितियों में भी इसका हार न मानना मुझे व्यक्तिगत तौर पर बहुत ताकत देता है। इसके संघर्ष को देख मेरे मन में कभी निराशा घर नहीं करती। सच कहूं- मैं जीवन में कभी महापुरुष नहीं बल्कि सेंसेक्स जैसा बनना पसंद करूंगा।

अब का नहीं बहुत पुराना परिचय है मेरा इससे। खूब याद है, जब ये  5 हजार के आस-पास टहला करता था। न बहुत ज्यादा गिरावट रहती थी, न बढ़त। कभी कहीं से जोर का झोंका कोई आ जाता तो ये डर-सा जाता था। अपने संवेदी स्वभाव के कारण जाने कितनी ही दफा छोटी-मोटी खबरों पर ये मुंह के बल गिरा है। मंदड़ियों ने कितनी ही बार इसे लहू-लुहान भी किया है।

पर इसने कभी किसी नकारात्मक खबर को दिल पर नहीं लिया, न ही अपने घाव किसी को दिखाए। हां, बीच-बीच में सेंटीमेंट जरूर बिगड़े पर जल्द सुधर भी गए।

सेंसेक्स हमारी अर्थव्यवस्था की जान है। ये बढ़ता है तो देश में आर्थिक खुशहाली के दर्शन होते हैं। न सिर्फ देश बल्कि विदेश तक में इसकी कामयाबी के गीत गाए जाते हैं।

अक्सर सेंसेक्स की सफलता रुपए की गिरावट के गम को गलत कर देती है। रुपया तो एक बार को फिर भी धोखा दे सकता है किंतु सेंसेक्स नहीं।

ऐसा मुझे तो याद नहीं पड़ता जब इसने किसी का जानबूझकर नुकसान किया हो! अति-उत्साही लोगों ने अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारी है। अपनी खामियों का दोष जब लोग सेंसेक्स पर मढ़ते हैं तो मुझे बहुत बुरा लगता है। कलेजा मुंह को आ जाता है।

सेंसेक्स कभी न अपने लिए जीता है न किसी से कुछ मांगता। वो तो हरदम यही चाहता है कि लोग उसके मार्फ़त अधिक से अधिक आर्थिक फायदा उठा सकें। दो का चार कर सकें। आसमान सरीखी बुलंदियों को छू सकें।

दरअसल, गड़बड़ तब शुरू होती है जब लोग बाग खुद को सेंसेक्स का बाप समझने लगते हैं। उससे जीतने की हिरस करने लग जाते हैं। खुद को सट्टेबाजी में लिप्त कर लेते हैं। अपनी जमीन-जायदाद तक दांव पर लगा देते हैं।

जब मोटा नुकसान झेलते हैं, तब सेंसेक्स को गरियाते हैं। लेकिन सुधरते फिर भी नहीं। न सुधरना शायद इंसान की फितरत में शामिल हो चुका है।

ऐसे लोग भी कम नहीं जिनका दिल किस्म-किस्म के शेयर्स पर आया रहता है। शेयर्स को वे अपनी जान से भी ज्यादा सहेज कर रखते हैं। बढ़ने पर बेचते नहीं। गिरने पर रोना रोते हैं। और, गिरावट का सारा दोष बेचारे सेंसेक्स के माथे मढ़ देते हैं। समझते नहीं, सेंसेक्स खुद से नहीं बल्कि शेयर्स के सहारे ही चलता है। शेयर बढ़ेंगे तो सेंसेक्स भी बढ़ेगा। शेयर गिरेंगे तो सेंसेक्स भी गिरेगा।

मैं तो हमेशा ही सेंसेक्स को सकारात्मक रूप में देखने की कोशिश करता हूं। उसके प्रति मन में कभी कैसी भी दुर्भावना नहीं रखता। अगर कभी गिरता है तो उसे गीता का यह उपदेश 'जो होता है अच्छे के लिए होता है। जो होगा वो भी अच्छे के लिए होगा' ही सुनाता हूं।

सेंसेक्स विकट दयालु है। वो किसी का बुरा या नुकसान नहीं चाहता। उसकी शरण में जो भी आता है, सभी को बड़ी सहजता और सरलता से लेता है। कभी-कभी तो मुझे सेंसेक्स के दिल में कवि या साहित्यकार घुसा हुआ-सा जान पड़ता है।

सेंसेक्स इसलिए भी अधिक सहज है क्योंकि वो दिखावा नहीं करता। जैसा बाहर से है, वैसा ही भीतर से भी। उसका अब तक का रिकॉर्ड देख लीजिए, जो कभी उसने अपनी सफलता का जश्न मनाया हो। हां, उसके चाहने वाले मानते हैं, तो उसे अच्छा लगता है। इतनी विनम्रता तो इंसानों में भी नहीं पाई जाती।

मैं तो दिल से चाहता हूं, सेंसेक्स दिन दुगनी, रात चौगनी तरक्की करे। अभी इसने 37 हजार के स्तर को पार किया है, जल्द ही 44 हजार को भी क्रोस कर जाए। दुनिया को दिखा दे कि कामयाबी का रास्ता खमोशी से भी निकल सकता है।

औरों का नहीं मालूम लेकिन मेरे लिए तो प्रेरणा का दूसरा नाम सेंसेक्स है। इतनी ऊंचाई पर पहुंच कर भी खुद को इतना सहज रख पाना यह हर किसी के बस की बात नहीं।

ऊपर वाले से दुआ करता हूं, सेंसेक्स की ये ऊंचाई, उदारता और सहजता हमेशा बनी रहे।

गुरुवार, 2 अगस्त 2018

आइए, मुझे 'ट्रोल' कीजिए

यद्यपि मैं जानता हूं कि 'ट्रोल करना' या 'ट्रोल होना' दोनों ही सबसे खतरनाक सोशल अवस्थाएं हैं, फिर भी, मैं 'ट्रोल' होना चाहता हूं। ट्रोल होकर उससे मिलने वाले 'यश' या 'अपयश' को भुगतना चाहता हूं। देखना चाहता हूं, कल को मेरे ट्रोल होने पर अखबारों में जो 'हेड-लाइन' बनती हैं, वो कैसी होंगी। निजी अनुभव लेना चाहता हूं कि मेरे ट्रोल होने पर सोशल मीडिया और मेरे नाते-रिश्तेदार मेरे बारे में क्या और कैसी राय बनाते हैं।

ट्रोल होने पर किसकी निगाह में मैं कितना उठता और कितना गिरता हूं।
वैसे, अब तक देखने-सुनने में तो यही आया है कि जो ट्रोल हुआ, उसकी किस्मत चमक गई। रातोंरात सेलिब्रिटी होने का खिताब पा गया। कल तक जो उसके नाम और काम से परिचित न थे, सब जान गए। देश से लेकर विदेश तक में उसकी ट्रोलिंग की तूती बोलने लगी। बहुत से दिलजलों ने उसकी राहों पर चलना भी शुरू किया किंतु उतने सफल न हो सके, जितना कि वो।

किस्मत चमकने का सितारा हर किसी की जेब में नहीं होता। जैसे- पहले कभी मैं भी यही चाहता कि प्रियंका चोपड़ा की तरह मैं भी बॉलीवुड में नाम कमाऊं। मगर जब अपनी शक्ल आईने में देख लेता था, 'हीरो' बनने का भूत तुरंत मेरे सिर से उतर जाता था।

मैं अच्छे से जानता हूं कि खुद को ट्रोल किए जाने की ख्वाहिश मेरा काल्पनिक भूत है पर कभी-कभी दिल को खुश रखना भी जरूरी हो जाता है।

आजकल तो कवि लोग, सोशल मीडिया पर, दिल को भी ट्रोल करने से बाज नहीं आ रहे! दिल पर ट्रोलिंग-प्रधान कविताएं लिख रहे हैं। विडंबना यह है कि लोग भी ऐसी कविताओं को चटकारे लेकर पसंद कर रहे हैं।
ट्रोलिंग आलोचना का बिगड़ा रूप है। पहले जमाने में आलोचना खासी तमीज के साथ की जाती थी, अब ट्रोलिंग बदतमीज होकर की जा रही है। ट्रोलर्स के हाथ ट्रोलिंग का उस्तरा क्या आ गया, सबको निपटाने को तैयार बैठा रहता है।

इधर सरकार भी ट्रोलिंग को लेकर सख्त जान पड़ रही है। सोशल प्लेटफार्म भी ट्रोलिंग पर हिदायतें दे रहे हैं। मगर ट्रोलर्स हैं कि मानते ही नहीं। किसी न किसी रास्ते वे अगले को ट्रोल करने का नुक्ता छेड़ ही देते हैं।

मालूम है कि ट्रोलिंग के अनुभव काफी बुरे रहे हैं पर चार लोग जान तो पाए हैं अगले को। बस ऐसा ही कुछ मैं खुद के साथ भी चाहता हूं। अच्छे करम कर मशहूर न हो सका तो क्या, ट्रोलिंग से ही हो जाऊं क्या बुरा है। यों भी, बदनामी से मिली प्रसिद्धि मुझे कुछ ज्यादा ही रास आती है। नाम है तो दुनिया-जहान में पहचान है, वरना कुछ भी नहीं।

तो साहेबान, आप लोगों को खुली छूट देता हूं। आप आइए और मुझे जमकर ट्रोल कीजिए। मैं आपके द्वारा खुद को ट्रोल किए जाने का कतई बुरा न मानूंगा, इस बात की गारंटी देता हूं।